कार्ल मार्क्स : जीवन और सिद्धांत

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कार्ल मार्क्स : जीवन और सिद्धांत

सर्वप्रथम यह जान लेना चाहिए की मानव इतिहास के युग–प्रवर्तक मेहनतकशों के महान योद्धा मार्क्स , एंगेल्स ,और लेनिन, ने अपने निजी जीवन के बारे में न कोई लेख लिखा और ना ही कोई आत्मकथा लिखी ।

हालांकि मेहनतकश वर्गों के वास्ते ताउमर लड़ते हुए उन्हें अथाह मुसीबतें और यातनाएं झेलनी पड़ी । तिसपर भी उन्होंने उस पर अपनी जुबान से चर्चा नहीं की । कारण मार्क्स, एंगेल्स , लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी अपने जीवन को सामाजिक जीवन का एक अंग मानते थे ।अपने द्वारा किए महान कार्यों को समस्त जनता द्वारा किए क्रांतिकारी कार्यों का एक हिस्सा मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चाएं नहीं की ।

जैसे कि पंडित नेहरू ,गांधी ,जैसे तमाम तुमाम पूजीवादी नेता विनम्रता के जामे में अपने व्यक्तिगत क्रियाकलापों की सेखियां बघाराने के वास्ते अपने व्यक्तिगत जीवन के वृतांत या आत्मकथाएं लिखते रहे हैं ।

इसलिए मार्क्स,एंगेल्स, लेलिन का जीवन परिचय हमें उनके समकालीन या बाद के लेखकों द्वारा ही मिल पाता है ।

कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को आज के जर्मनी के राइन प्रदेश के त्रियेर नगर में हुआ था ।
उन दिनों यह प्रदेश प्रसिया राज्य में था। हालांकि प्रसिया राज्य सामंती निरंकुशता व शोषण में फंसा हुआ था ,फिर भी फ्रांस की जनतांत्रिक क्रांतिओं के चलते राइन प्रदेश में प्रगतिशील व उदारवादी विचारों का प्रभाव फैला हुआ था ।

कार्ल मार्क्स के पिता , जो एक वकील थे , वे भी उदारवादी विचार रखते थे– परंतु क्रांतिकारी नहीं । पूरे परिवार का माहौल भी वैसा ही था— सुसभ्य, सुसंस्कृत और खुशहाल ।

1830 में मार्क्स जिस पाठशाला में दाखिल हुए वहां भी राज्य विरोधी प्रगतिशील साहित्य लुके छिपे पढ़ा जाता था । मार्क्स ने अपना स्कूल छोड़ते समय जो एक लेख लिखा उससे उनके भविष्य की बखूबी झलक मिल सकती है ।

लेख का शीर्षक था , “अपना पेशा चुऩने के बारे में एक नौजवान के विचार ” मार्क्स ने लिखा, “इतिहास उन आदमियों को महानतम कहता है, जो आम लोगों की भलाई कर के खुद महान बने हो । वही आदमी अधिकाधिक सुखी कहलाएगा, जिसने अधिकाधिक लोगों को सुखी बनाया हो”

समाज के दुखी व उत्पीड़ित लोगों के प्रति ऐसे दृढ़ संकल्प लेकर मार्क्स स्कूल छोड़ने के बाद 1835 में पहले बोन, फिर 1 साल बाद बार्लिंन विश्वविद्यालय में कानून पढ़ने हेतु दाखिल हुए।

प्रसिया राज्य की राजधानी बार्लिन देश का राजनीतिक केंद्र तो था ही ,साथ ही कान्ट,फिशे, हेगेल और बाद में फायरबाख जैसे चीर- प्रसिद्ध दार्शनिकों के विचारों का गढ़वी था । ऐसे माहौल का मार्क्स पर भी असर पड़ा। हालांकि मार्क्स कानून के अपनी पढ़ाई में जमके लगे हुए थे ,

परंतु मार्क्स नें जब पाया कि जो सामाजिक प्रश्न उन्हें कचोटते रहते हैं ,उनके जवाब कानून विदेशी भाषाओं के उनके पाठ्यक्रम नहीं दे पाते हैं , तो वे इतिहास व दर्शन का भी अध्ययन करने लगे उन दिनों हेगेल के दर्शन और हिंगलवादियों का बड़ा बोलबाला था ।

हेगेल की यह दार्शनिक उक्ति कि “हर वस्तु या घटना को उसके जन्म विकास और हास्य की दृष्टि से देखना चाहिए ” काफी प्रचलित थी।

हेगेल के अनुयाई पुराने व युवा हेगेलवादियों में बटे हुए थे । मार्क्स युवा खेलों के सदस्य बन गए, जो वर्तमान समाज धर्म व प्रतिक्रियावादी दर्शन का कड़ा आलोचक था ।

परंतु बाद में जब मार्क्स ने गहरे अध्ययन के द्वारा हेगेल के दर्शन को भाववादी पाया तो वह उसे असंतुष्ट हो गए ।

क्योंकि मार्क्स उन दिनों भी दर्शनशास्त्र को मात्र चिंतन का एक विषय नहीं मानते थे , बल्कि उसे वस्तुगत जगत की जीवित सामाजिक समस्याओं के साथ जोड़कर सोचते विचारते थे ।

यह बात उनकी पीएचडी डिग्री के विषय— प्राचीन भौतिकवादी यूनानी दार्शनिकों डिमाकिटस व एपिक्यूरस– से भी प्रचलित होती है ।
उसी लेख से हमें मार्क्स के तमाम विरोधी तूफानों के बीच चट्टानों की तरह खड़ा रहने के दृढ़ संकल्पित होने का भी पता लगता है।

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कार्ल मार्क्स: जीवन और सिद्धांत
भाग -2

1841 में अपनी डिग्री प्राप्त करने के बाद मार्क्स ने विश्वविद्यालय में अध्यापकी करने का पहले विचार किया ,परंतु बाद में प्रशियाई सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण यह विचार छोड़ दिया ।

क्योंकि प्रशियाई सरकार ने कई युवा हेगेलवादियों को उनके प्रगतिशील पूंजीवादी विचारों के कारण अध्यापन कार्य से निकाल दिया था ।

1842 में मार्क्स ने कुछ प्रगतिशील पूंजीवादी विचारकों के साथ मिलकर राइनी अखबार नामक एक पत्रिका निकाली । इस पत्रिका में मार्क्स ने सामाजिक व राजनीतिक रूप से संपत्तिहीन लोगों की हिमायत में और सरकार की तानाशाही नीतियों के विरोध में जो लेख लिखे उनके कारण पत्रिका के प्रकाशन के एक साल बाद सरकार ने उन पर रोक लगा दी।

प्रकाशको ने जब सरकार– विरोधी विचारों को कम कर के छापने की कोशिश की तो मार्क्स ने उनसे अपना नाता तोड़ लिया ।

कहते हैं इससे मार्क्स ने दो बातें सीखी—- एक यह कि भौतिक स्वार्थ आदमी के जीवन में भारी भूमिका निभाते हैं। और दूसरी यह कि पूंजीपति वर्ग सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष में ढुलमुल होता है ।
यह दूसरा सबक उन्होंने जीवन में पहली बार सीखा था । हर घटना हर वस्तु को गहराई व जिज्ञासा से विचारने वाले मार्क्स ने ऐसे अनुभव प्राप्त करके आर्थिक व सामाजिक समस्याओं का गहनतम अध्ययन शुरू किया।

परंतु सरकारी सेंसर ने उन्हें अपने मातृभूमि छोड़कर फ्रांस जाने पर मजबूर कर दिया , जहां एक के बाद एक क्रांति की लपटें उठ रही थी ।

देश त्यागने से पहले मार्च में 1843 में जेनीवान वेस्टफालेन नामक एक युवती से शादी की, जो अभिजात सामंती घराने से संबंधित थी ।उसका एक भाई बाद में जर्मन के राज दरबार में गृह मंत्री बना था।

जेनी अपनी सुंदरता के वास्ते प्रसिद्ध होने के साथ-साथ कुशाग्र वह प्रतिभावान बुद्धि की भी मालिक थी । इसी कारण प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों के आराम दे घरानों में पलने के बावजूद जेनी ने मार्स जैसे जीवन साथी को चुना था ।

जिसकी मेघावी बुद्धि का तेज उन्हीं दिनों चमकने लगा था , परंतु जिसका भविष्य भी उतना ही खतरनाक अंधकारमय था । शादी के तुरंत बाद मार्क्स और जेनीे का नवविवाहित जोड़ा अक्टूबर 1843 में फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुंचा।

पेरिस में उनके सामने अन्य नवविवाहित जोड़ों की तरह मस्ती भरे जीवन की कल्पना नहीं थी , बल्कि प्रवासी जीवन की मुसीबतें मुंह बाए खड़ी थी । परंतु साथ ही थे , मार्क्स के हर माननीय शोषण उत्पीड़न के विरुद्ध एक दैत्य़ की तरह भिड़ने के दृढ़ इरादे ।

और यहीं से मार्क्स और उनके विचारों के विकास का जीवन शुरू होता है , जिन्हें सारी दुनिया आज मार्क्सवाद के नाम से जानती है और भविष्य में भी जानती रहेगी ।

मार्क्स के परिवारिक जीवन की अगर कोई एक विशिष्ट या प्रमुख बात नोट करने वाली है तो वह यही कि मार्क्स नें अपने पारिवारिक जीवन की असाधारण मुसीबतों के बावजूद न तो कही समझौता किया और नहीं अपने बिचारों व कार्यो से तिलभर भी हटे, और न ही कही किसी के आगे रत्ती भर झुकें ।

मार्क्स व जेनी ने क्या–क्या नहीं खेला ! कई बार पैसे –पैसे की मोहताजी, कर्जदारों के तकाजे, पैसे के अभाव में अपने लड़के का ठीक से इलाज न कर पाने के कारण उसकी मौत हो जाना , और फिर कफन तक के वास्ते दूसरे से कर्ज लेना आदि आदि ।

फिर इन सबके ऊपर जानलेवा परिश्रम । उनकी ऐसी मुसीबतों को देखकर ही किसी ने कहा था कि मार्क्स ने पूंजीवाद का विश्लेषण करने में और “पूंजी ” नामक पुस्तक लिखने में जितनी मेहनत की है , उतनी मेहनत अगर वह पूजी इकट्टी करने में करते तो करोड़ों रुपए कमा लेते ।

परंतु परिवारिक जीवन की विपदाएंं दुश्मनों की उनकी बेखुदी नींन्दाए उन पर लगाए गए झूठे इल्जाम और यूरोप भर के शासकों द्वारा शिकारी कुत्ते की तरह उन्हें परेशान करने के प्रयास, यह सब कभी भी उन्हें नहीं डगमगा पाए , और ना ही उन्हें निराश व हतोत्साह कर पाए ।

वह बिना दम लिए निरंतर कार्य करते रहे , अपने दुश्मनों से निरंतर संघर्ष करते रहे । जैसा कि उन्होंने खुद भी कहा था कि “मैं दुनिया की दोनों पूजनीय शक्तियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष करता रहूंगा —एक है परमात्मा, और दूसरा है बादशाह”। दोनों को जनता पूछती है दोनों से भय खाती है, दोनों की दास है।

परंतु मार्क्स एक विशालकाय दैत्य की तरह दोनों के खिलाफ भीषण संग्राम में कूद रहे , ताकि मानवता दोनों की दास्तां व शोषण से मुक्त हो सके ।

तमाम विरोधों और दुश्मनीयों तथा पारिवारिक विपदाओं के बावजूद वह अपने हर कार्य में जी जान से आगाध मेहनत किया करते थे —-अध्ययन में , क्रांतिकारी संगठन बनाने में, आंदोलन व क्रांतियों की अगुवाई करने में , मजदूर आंदोलनों की छोटी से छोटी समस्या सुलझाने से लेकर दुनिया में हो रही तमाम बड़ी से बड़ी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक ,और औद्योगिक, राजनीतिक व अन्य घटनाओं व समस्याओं पर सक्रिय रूप से विचार थे ।

चाहे वह घटना भारत में होने वाला सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हो (जिस पर मार्क्स,एंगेल्स ने कई लेख लिखे हैं ) चाहे वह रुस व टर्की का युद्ध हो ,चाहे वह आयरलैंड व पोलैंड की आजादी हेतु पूजीवादी भी संघर्ष हो ,
अथवा वह फ्रांस में होने वाली क्रांतियां, प्रतिक्रांतियां व गृह युद्ध हो ।

अध्ययन के क्षेत्र में अगर मार्क्स, एंगेल्स के अध्ययन की सूची देखी जाए तो वह भी हैरान की में डाल देती है । यह दोनों क्रांतिकारी यूरोप और अमेरिका की अधिकांश भाषाएं जानते थे कहते हैं, किसी भी भाषा में पत्र आता उसी में वे उसका जवाब देते थे ।

अंग्रेजी, फ्रांसीसी व जर्मनी भाषाओं के तो वे दोनों माहिर ही थे । क्योंकि वे इन तीनों भाषाओं के सैकड़ों साल पुराने रूपों को भी जानते थे। भाषाओं के अलावा खगोल शास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, जीव विज्ञान, शरीर- क्रिया विज्ञान, रसायन विज्ञान , गणित, अर्थशास्त्र ,इतिहास ,समाज विज्ञान, आदि आदि का भी अध्ययन करते थे।

शायद आप जानते हो मार्क्स के प्रिय विषय केवल अर्थशास्त्र व इतिहास ही नहीं थे बल्कि गणित भी था , जिसमें उन्होंने कई शोध कार्य किए थे । उसी प्रकार एंगेल्स प्रकृतिक विज्ञानों के अलावा युद्ध कला के अध्ययन में अधिकाधिक रुचि लेते थे।

पूंजीवादी तक उन्हें युद्ध विशेषज्ञ मानते थे ।

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कार्ल मार्क्स: जीवन और सिद्धांत भाग = 3

मजदूर आंदोलनों या फ्रांसीसी क्रांति जैसे क्रांतिकारी राजनीति में भाग लेने के बावजूद उन्होंने इतना अध्ययन क्यों किया ?

क्योंकि वे मानव- समाज को , प्रकृति को और फिर प्रकृति और मनुष्य के अंन्तर्सबंधों को जानना चाहते थे । क्यों ?

क्योंकि उन तमाम भ्रामक , कपटी , छली, मनगढ़ंत विचारों तथा रीति-रिवाजों का खंडन करना चाहते थे, जिनके अनुसार मानव प्रकृति का असहाय समझा जाता था ।

उदाहरण, यह समझ की प्रकृति एक ना जानी जा सकने वाली देवी शक्ति है। बारिश ,पानी, आग, वायु सब देवी देवता है ।

मनुष्य उनके आगे अनजान और असहाय है ।वह उन पर जिंदगी और मौत के वास्ते पुर्णत: आश्रित है । प्रकृति या देवी शक्तियां क्रोधित होकर मानव समाज को बर्बाद कर सकते हैं ।

पुजारी वर्ग इन सारी दलीलों का सहारा लेकर समाज के अंजान दिन दुखी व गरीब मेहनतकशों को हर समय ठगता रहता था और ठगता रहता है ।
इतना ही नहीं सामंती वर्ग अपने आप को देवताओं का अवतार कहकर पूरे समाज का शोषण दोहन करता था । परिणाम स्वरूप समाज के निचले तबके समाज का सारा उत्पादन करने के बावजूद सदियों सदियों से गरीबी व बदहाली का जीवन जीते थे।

साथ ही दोहरी दास्तां के अंतर्गत भी पिसते रहते थे ।एक दास्तां थी सामंती वह पुजारी वर्ग की, और दूसरी थी प्रकृति से जुड़े काल्पनिक देवताओं की ।

मार्क्स, एंगेल्स ने इसी दोहरी दसता व शोषण उत्पीड़न से आम जनता को मुक्त करवाने हेतु एक तो मानव समाज की संरचना का, दूसरे प्रकृति का ,और तीसरे प्रकृति का और मानव समाज के अंतर संबंधों का गहरा अध्ययन किया।

अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों व वैज्ञानिकों की खोजों के आधार पर मार्क्स ने बताया कि मनुष्य शुरू से अपनी जीविका के संसाधन (जैसे पेट भरने के साधन ) जुटाने के वास्ते प्रकृति से संघर्ष करता आया है— इसके वास्ते चाहे वह प्राचीन काल में जंगली जानवर मारता रहा हो, या जंगल काटकर खेतिया करता रहा हो , अथवा चाहे आज जमीन व पहाड़ों के पेट फाड़कर खनिज पदार्थ निकलता हो ।

क्योंकि प्रारंभिक काल में मनुष्य प्रकृति के बारे में अनजान था, अपने जीवन हेतु उस पर पुर्णत: निर्भर था, उसके सामने असहाय था , इसलिए उसने प्रकृति को सर्वशक्तिमान मान लिया, और बाद में उसे मनुष्य रूपी देवता मान बैठा ।

प्रकृति के बारे में सुरु– सुरु में बिना छल कपट या स्वार्थ के बनाई गयी इसी अवधारणा को बाद में पुरोहित वर्ग अपने स्वार्थों हेतु इस्तेमाल करने लगा ,जो आज तक करता आ रहा है ।

हालांकि आज मनुष्य ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी की सहायता से जीविका– उत्पादन के नए- नए साधनों (जैसे खेती के हजारों तथा कल कारखानों में लगी मशीनों आदि) का विकास कर लिया है , परंतु उन पर धनवान वर्गों ने कब्जा कर रखा है ।

बिना काम किए हुए सारा उत्पादन हड़प जाते हैं। कमकरो को केवल पेट भरने लायक मजदूरी देते हैं‌। इसी के फलस्वरूप समाज में एक तरफ निठल्लापन अमीरी व अय्याशपस्ती हैं , और दूसरी तरफ ,मेहनत ,मशक्कत, गरीबी ,अभाव और तंगदगस्ती है ।

इसी असमानता को, इस अत्याचार व उत्पीड़न को ग़रीब कमकर , धनिया से दया की भीख मांग कर खत्म नहीं कर सकते बल्कि संघर्ष द्वारा ही खत्म कर सकते हैं।

कामकर वर्ग को खुद समाज के सारे उत्पादन का मालिक बन जाना चाहिए । जब वह खुद मालिक बनेगा तो वह विज्ञान व तकनीकी की सहायता से उत्पादन के साधनों का इतना विकास कर लेगा कि उससे समाज के तमाम प्राणियों की तमाम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाएगी ।

तब तंगदस्ती , अभावग्रस्तता तथा गरीबी का अंत हो जाएगा । साथ ही आम आदमी को जहालत व अंधकारमयी परंपराओं और विचारों की बेड़ियों से भी मुक्ति मिल जाएगी।

उपरोक्त सिद्धांतों का प्रतिपादन मार्क्स ने एंगेल्स के सहयोग से किया, दोनों ने मिल मिलाकर इतिहास में सबसे पहली बार दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, और हुकूमती वर्गों को अपनी क्रांतियों से कापने दो ‘ का गर्जन भरा नारा इस धरती पर पहली बार लगाया ।

क्या नारा मात्र ही दिन ? नहीं अपने नारे और अपने विचारों को व्यावहारिक राजनीति में लाने हेतु मार्क्स एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र निकाला ।

इस घोषणा पत्र में उन्होंने संक्षेप में पूंजीवाद, पूंजीवादी शोषण, सर्वहारा वर्ग, मध्यमवर्ग, पुजवादी पार्टियों , और नामधारी दिखावटी समाजवादी पार्टियों आदि का विश्लेषण किया। उनके प्रति सर्वहारा वर्ग की पार्टी का क्या दृष्टिकोण हो , यह भी उन्होंने बताया ।

इसके साथ ही उन्होंने सर्वहारा वर्ग की अपनी एक अलग स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी बनाने पर भी जोर दिया सर्वहारा क्रांति के वास्ते सर्वहारा पार्टी के कार्यक्रम का उन्होंने आम खाका भी खींचा ।
उस समय मार्क्स की उम्र मात्र 30 साल और एंगेल्स की 28 साल थी ।
प्रवीण चौरसिया

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