कैमूर ‘‘बाघ अभ्यारण्य’’ : जल-जंगल-जमीन पर कब्जे की साजिश

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कैमूर पठार जंगलों-पहाड़ों, नदियों, घाटियों आदि से घिरा हुआ है। यह अपनी अद्भूत प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 1800 से 3000 फुट तक होगी। क्षेत्रफल के हिसाब से कैमूर पठार बिहार राज्य का सबसे बड़ा जंगली पहाड़ी इलाका है। बिहार में कैमूर पठार के अर्न्तगत दो जिले आते हैं, कैमूर और रोहतास।
यहां का कुल क्षेत्रफल 1800 वर्ग किलोमीटर है। यह आदिवासी बाहुल्य इलाका है। यहां खरवार, उरांव, चेरो, अगरिया, कोरवा आदिवासी समुदाय के लोग ज्यादा संख्या में निवास करते हैं। इसके आलावा यहां गैर परम्परागत वन निवासी(अन्य जाति के लोग) भी रहते हैं। यहां आने के बाद आदिवासियों की अलग भाषा, संस्कृति, परंपरा से आप औगत हो सकते हैं। हालांकि यह इलाका भी गैर आदिवासी संस्कृति, परंपरा की चपेट में बहुत पहले से है। जिसकी वजह से यहां ब्राह्मणवादी जातिवादी शोषणकारी संस्कृति और परंपरा का भी प्रभाव है। साथ ही यहां ईसाई मिशनरियों का भी प्रभाव है।
जिसकी वजह से आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा लगभग नष्ट होने के कगार पर है। यहां आने पर आपको यह पता चलेगा कि जिस इलाके में आदिवासी लोग ज्यादा हैं वहां चोरी कम होती है। आज भी यहां सामूहिकता के बहुत से रूप दिखाई पड़ते हैं।

जहां आदिवासी हैं वहीं जंगल है या यूं कहिए की जहां जंगल है वहीं आदिवासी हैं। इसकी वजह जल-जंगल-जमीन बचाने की जद्दोजहद आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति में निहित है। इसलिए आदिवासियों और जंगलों की कल्पना हम एक दूसरे के बिना नहीं कर सकते। भारत या पुरी दुनिया में जहां भी आदिवासी नहीं हैं या जबरन विस्थापित कर दिये गये वहां आज ज्यादातर जंगल, पहाड़, पशु, पक्षी नहीं बचे हैं। भारत में आजादी से लेकर आज तक कभी बांध के नाम पर तो कभी खान -खदान के नाम पर तो कभी और किसी बहाने से पूंजीपतियों के फायदे के लिए अब तक 3-4 करोड़ आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन आज सरकार अदिवासियों को कैमूर से ये कहकर हटाना चाहती है कि आदिवासी जंल-जंगल-जमीन और वन्यजीवों के लिए खतरा हैं। इसलिए पहले कैमूर पठार को सेंच्यूरी में डाल दिया गया और अब इसे बाघ अभ्यारण्य घोषित कर दिया गया है। सरकार यह कह रही है कि अब यहां बाघ पाला जायेगा। जिसके लिए आदिवासियों को आज नहीं तो कल इन जंगलों को खाली करना पड़ेगा। तो यह सवाल उठता है कि क्या आदिवासियों से बाघों को खतरा है? और जंगल को खतरा है? नहीं जंगलों को खत्म करने का काम तथाकथित आजादी के बाद से ही सरकार और वनविभाग ने कूप कटाई(लकड़ी से कोयला बनाने के लिए) के नाम पर किया है। बाकी जंगलों की कटाई बाहरी लोगों(लकड़ी माफिया) ने जब पठार पर आये तो वन विभाग की मदद से किया है। रही बाघों की बात तो अदिवासी तो हजारों साल से इन जंगलों में बाघों के साथ रहते आये हैं। बाघों की हत्या तो शिकारियों ने तथा बाहरी चरवाहों ने वन विभाग की उपस्थिति में की है। आदिवासियों ने तो जंगलों को बचाया और जानवरों के साथ साहचर्य में अपना जीवन बिताया है।
वास्तव में सरकार तथा वनविभाग को बाघों से प्यार नहीं हैं।

क्योंकि जिनको आदमी से प्यार नहीं उन्हें बाघों से प्यार कैसे हो सकता है? दरअसल इन्हें प्यार साम्राज्यवादियों (देशी-विदेशी कम्पनियों) से है। बाघ अभ्यारण्य के पिछे की जो सच्चाई है वह बाघों की रक्षा नहीं बल्कि आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर कब्जा करना ही सरकार तथा वन विभाग का एक
मात्र लक्ष्य है। क्योंकि पर्यावरण और बाघ के नाम पर आदिवासियों को विस्थापित करना आसान होता है। बाहरी दुनिया का भी समर्थन प्राप्त करना आसान होता है। आज पुरे देश में 52 बाघ अभ्यारण्य हैं। कैमूर बाघ अभ्यारण्य 53 वां और भारत का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व बनने जा रहा है। यह टाइगर रिजर्व 1134 वर्गकिलोमिटर में बनाया जा रहा है।
इस अभ्यारण्य को 450 वर्ग किलोमीटर में कोर एरिया तथा 850 वर्ग किलोमीटर बफर एरिया में बांटा गया है। कोर एरिया में सबसे ज्यादा
गांवों को विस्थापित होने का खतरा है। बाकी बफर एरिया में भी धीरे-धीरे जो गांव प्रभावित होंगे उन्हें बाद में हटाया जायेगा। जहां-जहां भी सेंच्युरी और बाघ अभ्यारण्य बनता है वहां आदिवासियों के लिए बनाये गये सारे कानून जैसे वनाधिकार कानून, पेसा कानून आदि को खत्म (निष्प्रभावी) कर दिया जाता है। चूंकि जंगल ही आदिवासियों की जीविका का मुख्य स्रोत है और अगर जीविका नहीं है तो जीव नहीं हैं। जंगल के उत्पाद महुआ, पियार, जंगी, लाशा, भेला, लकड़ी तथा विभिन्न तरह के औषधियों को बिन-चुनकर के ही आदिवासियों का जीवन चलता है। जंगल ही आदिवासियों की आधी खेती है। आदिवासियों को जंगल से विस्थापित करना तो दूर अगर केवल उन्हें जंगल में जाने से रोक दिया जाय तो उनका जीवन खत्म हो जायेगा। वैसे टाईगर रिजर्व तो एक बहाना है। असल बात तो जंगलों-पहाड़ों में दबे प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों के हाथों कौड़ियों के भाव बेचना ही सरकार का लक्ष्य है। जिसके लिए भारत के मंत्रियों, नेताओं को देशी-विदेशी पूंजीपति करोडों रूपये का लालच देते हैं। तेलंगाना के अमराबाद टाईगर रिजर्व से सरकार ने आदिवासियों को पहले एक साजिश के तहत हटाया और अब उसे युरेनियम माइनिंग के लिए पूंजीपतियों को सौंप रही है।

इसी तरह उत्तराखण्ड़ में हाथी पार्क के नाम पर जल-जंगल-जमीन पर कब्जा किया गया और अब वहां पावर प्रोजेक्ट के नाम पर हाथी पार्क को खत्म किया जा रहा है। ऐसे और भी उदाहरण हैं जहां माइनिंग हो रही है जैसे सतकोशी टाईगर रिजर्व (उड़िसा), सिमलीपाल टाईगर रिजर्व (उड़िसा), उदान्ति- सितानाड़ी, टाईगर प्रोजेक्ट (छत्तीसगढ़), सहयाद्री टाईगर रिजर्व(महाराष्ट्रा), पलामू टाईगर रिजर्व (बेतला) आदि कई बाघ अभ्यारण्य हैं जहां अदिवासियों को हटाने के बाद वहां खनन का काम सरकार द्वारा कराया जा रहा है।
जहां-जहां भी सरकार ने टाईगर प्रोजेक्ट बनाया है अगर उन इलाकों में अदिवासी रहते थे तो उन्हें वहां से सरकार तथा वन विभान ने बहुत ही चालांकी और जोर-जबरदस्ती से हटा दिया। देश में बहुत से ऐसे टाईगर रिजर्व हैं जहां से गाँवों को विस्थापित किया गया और किया जा रहा है जैसे अचानक  मार्ग(अमरकंटक,छत्तीसगढ़) टाईगर प्रोजेक्ट के अंर्तगत 200 गाँवों के विस्थापन का काम चल रहा है, संजय गांधी टाईगर रिजर्व सिद्धि(मध्यप्रदेश)से 50 गाँवों का विस्थापन हो रहा है, मुकुन्दरा टाईगर रिजर्व (राजस्थान) से 13 गाँवों का विस्थापन हो रहा है, पन्ना टाईगर रिजर्व(मध्यप्रदेश) से भी कई गाँवों का विस्थापन हुआ है। इनमें से कई ऐसे टाईगर रिजर्व हैं जो पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के क्षेत्र में आते हैं।

पांचवी अनुसूची और पेसा कानून में परम्परागत ग्राम सभा ही सर्वोच मानी गयी है। लेकिन सरकार ने इन कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए बिना ग्राम सभा की अनुमति के ही यहां टाइगर प्रोजेक्ट लागू कर दिया जो कि पुरी तरह से असंवैधानिक है। विस्थापित परिवारों को न तो ठीक से बसाया जाता है न तो पर्याप्त मुआवजा ही मिलता है। 2017 में टाईगर प्रोजेक्ट प्रशासन के द्वारा तय किये गये 10 लाख रूपया प्रति परिवार(घर और जमीन दोनों का) से ज्यादा मुआवजा किसी को भी नहीं मिला है। उसमें भी कई करणों से सबको मुआवजा नहीं मिल पाता। ऐसे में लोगों का जीवन बर्बाद हो जाता है।
कैमूर पठार को पहले सरकार ने 1982 में वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया। उस समय यहां छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू था। जिसके अनूसार कोई भी गैर आदिवासी न तो आदिवासियों की जमीन खरीद सकता है और न ही बेच सकता है। जंगलों पर पुरा अधिकार आदिवासियों का माना गया है। उसके बाद से ही यहां पर सरकार ने विभिन्न तरह के प्रतिबन्ध जंगलों पर लगाना शुरू किया। सबसे पहले यहां सरकार ने तेंदु पत्ता का टेंडर खत्म करके तेंदु पत्ता के व्यापार पर रोक लगा कर आदिवासियों की जीविका को छीन लिया। रोड, बिजली पर भी रोक लगा दिया। जिसकी वजह से मूलभूत आवश्यकता की चीजें जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार भी कैमूर के आदिवासियों को ठीक से नहीं मिल पाया। आज वन विभाग वनाधिकार कानून 2006, पेसा कानून 1996 आदि की धज्जियां उड़ाते हुए आदिवासियों को जंगल में खेती करने से रोक रहा है, लोगों के घर गिरा रहा है। जैसे- ग्राम- सरईनार, सोढ़ा, दिघार, पिपरा, बहेरा टोला आदि में घर गिराया गया है। महुआ, पियार, जंगी, लकड़ी आदि लाने से रोका जा रहा है। उनके परंपरागत हथियार टांगी को भी जंगल में ले जाने पर छीन रहा है। अब टाईगर रिजर्व हो जाने के बाद तो जंगल में घुसना ही अपराध माना जाएगा। मछली मारने, शिकार खेलने, लकड़ी आदि लाने पर वन विभाग केस करने की बात कर रहा है। ऐसे में आदिवासियों और यहां रहने वाले अन्य लोगों का जीवन कैसे चलेगा यह बड़ा सवाल है। वन विभाग का कहना है कि या तो यहां बाघ रहेगा या तो आदिवासी। जबकी आदिवासी और बाघ इन जंगलों मे सदियों से एक साथ रहते आये हैं।

कैमूर पठार शुरू से ही संघर्षाें का केन्द्र रहा है। आजादी के जमाने में वीर कुंवर सिंह ने कैमूर पठार में ही रहकर यहीं के अदिवासियों केे सहयोग से अपने 400-500 छापामारों के साथ अंग्रजों से लोहा लिया था। अस्सी, नब्बे के दशक में कैमूर पठार का नाम सुनते ही वन विभाग और भारत सरकार के होश उड़ जाते थे। इन जंगलों-पहाड़ों में कभी बागियों(मोहन बिन्द, रामाशीष, हाकिम आदि) का राज हुआ करता था, जिनकी मदद यहां के आदिवासियों ने की। जिन्होंने सामन्ती उत्पीड़न के खिलाफ यहां से ही युद्ध का बिगुल फुंका था। उसके बाद यहां 1990 के आस- पास नक्सल आन्दोलन के दौर
में क्रांतिकारी संघर्ष हुए। तब नक्सलियों का साथ यहां के आदिवासियों ने दिया। इस दौर में तेंदु पत्ता का दाम बढ़ाने, सामंती शक्तियों को कुचलने आदि में यहां के आदिवासियों ने नक्सलियों का साथ दिया। तब से लेकर आज तक पठार की
जनता ने अपने अधिकारोें की रक्षा के लिए कभी नक्सलियों के नेतृत्व में हथियारबन्द संघर्ष किया तो कभी डा0 विनयन(कैमूर मुक्ति मोर्चा) के नेतृत्व में कानूनी तथा जनवादी तरीके से लड़ाई लड़ी। आज जब पहाड़ में न तो डा0 विनयन जिन्दा हैं, न तो नक्सली ही यहां हैं। तो यहां की जनता के सामने संघर्ष की एक बड़ी चुनौती आ पड़ी है।

कैमूर पठार के लोग संगठित हो रहे हैं। आस्तित्व की इस लड़ाई में 10-11 सितम्बर 2020 को कैमूर पठार की जनता ने टाईगर प्रोजेक्ट, वन सेंच्यूरी तथा वन विभाग के अत्याचारों के खिलाफ कैमूर मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में 10 हजार की संख्या में गोलबन्द होकर जोरदार संघर्ष चलाया। जिस दौरान भीषण संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में पुलिस द्वारा लाठी-गोली चलाने के बाद जनता ने भी उग्र होकर संघर्ष किया जिसमें दोनों तरफ से जनता और पुलिस वाले घायल हुए। 32 लोगों पर मुकदमा चला। कुल 400 लोग नामजद हुए। तब से वन विभाग तथा सरकार दलालों के माध्यम से जनता में फुट डालने की कोशिश कर रही है।

आज भी कैमूर की जनता के अन्दर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक ज्वाला धधक रही है। चूँकि आदिवासी इतिहास में अपने पुर्वजों द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किये गये अनगिनत संघर्षों से पुरी तरह वाकिफ हैं। यही कारण है कि वन विभाग और सरकार के खिलाफ आदिवासियों का यह गुस्सा बढ़ता जा रहा है। अगर सरकार नहीं संभली तो यह कौन सा रूप लेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। तब अगर कोई हिंसा और अहिंसा का तर्क देगा तो वह भी सरकार तथा वन विभाग के तरफ ही खड़ा माना जाएगा। हमें और इस दुनिया को भी यह याद रखना होगा कि आज अगर आदिवासी इस धरती से मिट गये तो सिर्फ वही नहीं मिटेंगे। उनके साथ ही मिट जायेंगे ये पहाड़, नदियां, प्रकृति और उनकी परंपरा और संस्कृति भी। यही नहीं उनके खत्म होते ही खत्म हो जायेगी सामुहिकता, भाईचारा और मनुष्यता भी।

क्योंकि धरती पर कहीं ये मुल्य बचे हुए हैं तो इन्हीं आदिवासियों के पास फिर चाहे वह अमेजन में रहते हों, चाहे बस्तर में, चाहे कैमूर में। बहुत कम वक्त बचा है धरती को नष्ट होने से बचाने के लिए, इसलिए कैमूर और इन आदिवासियों के संघर्षो के साथ हम सभी को खड़े होना चाहिए।
दीपक

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