रुपये-पैसे की बादशाहत अगर कायम रही तो जनता की वास्तविक राय आ ही नहीं सकती सामने

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संपादकीय टिप्पणीः लेख में जो बात कही गई है उसका लब्बो-लुबाब यह है कि गाँधीछाप नोटों के पास लोगों को भरमाने-उन्हें भ्रष्ट बनाने की बड़ी ताकत है। हमारे देश में तर्क-विवेक की तो छोड़िए, मानववाद के प्रति पक्षधरता भी सिरे से गायब है। किंचित खा-कमा रहा तबका और 400 रुपये की दिहाड़ी के लिए भी तरस रहा तबका दोनों ही एक-दूसरे को इंसान मानने से इन्कार करते हैं। वह कैसे? बताता हूँ। नोयडा में सब्जी का ठेला लगाने वाला एक शख्स कह रहा था कि सब्जियों को अगर नाले के गंदे पानी से नहीं धोया जाए तो साहब लोगों को सब्जियाँ अच्छी ही नहीं लगतीं। (उसके शब्द ठीक-ठीक याद नहीं)। खाते-कमाते और अकिंचन वर्गों के बीच अपरिचय-अजनबियत की खाई इतनी अधिक बढ़ी हुई है वे एक-दूसरे को अपने जैसा मनुष्य मानने से इन्कार कर देते हैं। —————–अब आइए, पोस्ट की मूल बात पर चलते हैं। जैसे ही आप नियम-कायदे के तहत मनुष्य को उसकी गरिमा दिलाने की लड़ाई छेड़ेंगे, गाँधीछाप नोट रूपी सरकारी कागज भाँति-भाँति से अपने होने का एहसास कराने लगेगा। ग्राम प्रधानी के चुनाव में करेंसी नोट कैसी भूमिका निभाते हैं, सभी को मालूम है। तो हमें अगर अपने मनुष्य होने की गरिमा पाने की लड़ाई लड़नी और जीतनी है तो सबसे पहली कोशिश यह करनी होगी कि रुपये-पैसे की ताकत को खेलने का मौका न दिया जाए और बड़ी पूँजी की दम पर संचालित मीडिया को ध्वस्त-निष्क्रिय कर दिया जाए और इस काम को हमें नग्न-निरंकुश ताकत के दम पर करना होगा यानि कि बरजोरी से। हमें उन सभी मनुष्यों के पास ताकत-हिंसा के इस्तेमाल की सहमति लेने के लिए जाना होगा जो कि मनुष्य को उसकी मनुष्यता-गरिमा दिलाना चाहते हैं। बल-हिंसा का विरोध करने वालों की असलियत को मुकेश जी भलीभाँति समझ रहे हैं और बता रहे हैं कि  ऐसे लोग पूँजी के हाथों होने वाले हमारे अमानवीकरण के उत्कट पक्षधर हैं। 
मुकेश त्यागी

कल्पना करें, भारत में एक सच्चे मानों में जनपक्षधर सरकार आ जाए, पर ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ को मानते हुए रिपब्लिक, जी, आजतक, सुदर्शन, टाइम्स ऑफ इंडिया, जागरण वगैरह को छुट्टा छोड़ दे। क्या होगा?
चिली की जनता ने पांच दशक का फासिस्ट शासन बहादुर जनसंघर्ष से उखाड़ फेंका। 80% ने जनमतसंग्रह में नया संविधान बनाने की हिमायत में मत दिया। उत्पीडित मूल निवासियों की समुचित भागीदारी और बराबर संख्या में स्त्री पुरूष सदस्यों वाली संविधान सभा बनी। इसने संविधान का अत्यंत प्रशंसा हासिल करने वाला प्रारूप तैयार किया। उसकी 388 धाराओं में भागीदारी, स्त्री अधिकार, श्रमिक अधिकार, सामाजिक-आर्थिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, आदि की वे सभी प्रगतिशील जनवादी बातें थीं, जिनकी आजकल बात होती है।
80% जनता जैसा संविधान बनाने के पक्ष में थी, 4 सितंबर के जनमतसंग्रह में वह 38 के मुकाबले 62% मतों से अस्वीकृत हो गया!
जनमत संग्रह कराने वाली संस्था के आंकड़े हैं, कुल आधिकारिक खर्च का 89% संविधान विरोधियों ने खर्च किया, अनाधिकारिक खर्च का तो क्या ही पता। कॉर्पोरेट चैनल अखबार, चर्च के पादरी, बड़े विद्वान-विशेषज्ञ दिन रात बता रहे थे – आर्थिक न्याय अर्थात व्यक्तिगत संपत्ति खत्म, सरकार सबके घर छीन लेगी; सामाजिक न्याय अर्थात मूल निवासी बाकी सब पर जुल्म करेंगे, जंगल राज आ जाएगा; गर्भपात आदि स्त्री अधिकार अर्थात परिवार-विवाह खत्म, अनैतिकता छा जाएगी; कैथोलिक धर्म नष्ट हो जाएगा; यूनियन बनाने का अधिकार अर्थात मजदूर निठल्ले, अर्थव्यवस्था बरबाद, जिंदगी बदहाल; वगैरह वगैरह।
वैसे तो शासक वर्ग के पास न्यायपालिका, अफसरशाही, पुलिस फौज, अपराधी गिरोह जैसे कई हरबे हथियार हैं अपने शोषण की व्यवस्था को सुरक्षित रखने के, पर इस दांव में तो उनका पहला औजार अर्थात मीडिया, धर्म, विद्वान विशेषज्ञों ने ही उन्हें दांव जिता दिया।
अब पीछे हटने को मजबूर पराजित फासिस्ट शक्तियों का जोश फिर से उभार पर है, उन्हें पुनर्संगठित होने का मौका मिल गया है, जनता में भ्रम फैल गया है। आगे स्थिति क्या मोड़ लेगी, देखना होगा।
पर पूंजीपति शासक वर्ग, उसके औजारों-गिरोहों, फासिस्टों के लिए मानव व जनवादी अधिकारों की हिफाजत वाली ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ शासकों के बहुत काम आती है, यह तो तय है।

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