जातिप्रथा वर्ग-संघर्ष विरोधी है

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यह आलेख पूर्णतः पोलिमिक है इसलिए विचारों के सिलसिले में क्रमभंगता हो सकता है। चूँकि कई जातियों के साथियों के प्रश्नों को उत्तरित किया गया है इसलिए कई बार मित्रों के अहम पर चोट भी पहुँच सकता है। मेरा किसी भी जाति के व्यक्ति के अहम मर्दन का निजी उद्देश्य नहीं है। किसी भी तरह से आहत मित्रों से मैं पूर्व ही क्षमा प्राथी हूँ। इस आलेख का उद्देश्य विभिन्न जातियों के मध्य से गरीब वर्ग के साथियों को जातिप्रथा से होने वाली मानवता की हानि को संज्ञान में लाकर वर्ग की एकता को मजबूत करने के लिए छांटना भर है जिससे अन्ततः पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति को सफल बनाया जा सके।
मैं अपनी बात शुरू करता हूँ जातिवाद से। जातिवाद पर बात करते समय अक्सर सामने वाला यह कहता हुआ मिल जाता है कि शहरों में अब धीरे धीरे जाति का असर दम तोड़ रहा है;  बिल्कुल सच है। लेकिन, जब वह पुनः प्रश्न करता है कि दलितों की बदहाली के लिए सवर्ण ही जिम्मेदार है, यह कैसे कह सकते है? उसका जवाब यह हो सकता है कि सवर्ण पूँजीवाद का टूल्स है जिसके द्वारा जातीय वैमस्य और साम्प्रदायिकता का विष निम्न जातियों को घुन की तरह चाल डालता है। इसके अतिरिक्त मैं जातिप्रथा उन्मूलन के साथ-साथ वर्ग- संघर्ष की बात कर रहा हूँ। मैं तो यह भी बता रहा हूँ कि हर जाति का नेता अपनी जाति की जनता का ही खूबसूरत वाट लगाता है। सवर्ण जातियों के गरीबों का भला आरएसएस व बीजेपी क्यों नहीं कर रहा है, यह भी लिखा है। जरा इत्मिनान से पोस्ट को पढ़िए। पोस्ट सिर्फ चमारों के हित की बात नहीं करता है, यह बाह्मण, क्षत्रीय और वैश्यों के गरीबों की भी बात करता है। मैं यह भी अपील करता हूँ कि सभी को मिल-जुल कर जातिप्रथा को तोड़ देना ही हितकर होगा। कई उदाहरण दिया है। अब कौन कैसे उसका अर्थ ग्रहण करता है, यह व्यक्ति की मानसिक बनावट पर डिपेंड करता है। संसद और विधान-मंडल के रूप में शासकों द्वारा भारत की जनता पिस रही है। कहीं मंडल-कमंडल, कहीं दलितवाद, कहीं ब्राह्मणवाद और कहीं ठाकुरवाद का बोलबाला है। संविधान में निर्धारित रू. 500 /- भत्ता पाने वाले सांसदों का विकास आज किसी चक्रवर्ती सम्राट की स्थिति में है। वही हाल विधायकों का भी है। उसके बाद जनता चाहे किसी धर्म विशेष या जाति विशेष की हो, क्या फर्क पड़ता है। किसी भी पार्टी का शासन हो जनता की स्थिति हमेशा वही की वही रहती है। नेताओं के विकास का एक रूप राज्यों के टुकड़े करना है ताकि नेताओं की फौज दिनों दिन बढ़ती रहे। जिलों के टुकड़े से भी नेताओं को ही फायदा है। काश! यह बात सभी ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, कायस्थ और दलितों को समझ में आ जाती, तो हम जातिवाद करने वाली इन पार्टियों को सबक सिखा देते। हर जाति का नेता अपने जाति की जनता का तो खून चूसता ही है, समाज में साम्प्रदायिकता का जहर भी बोता है।
जाति व्यवस्था में केवल सवर्ण ही नहीं, सभी जातियां जकड़ी हुई हैं। हिंदू, मुसलमान, इसाई और सिक्ख सभी में जातिवाद अंदर तक भरा हुआ है। धोबी, कोरी, पासी, चमार, खटिक और दुसाध में भी वैवाहिक संबन्ध नहीं हैं। पंजाब में दलितों के गुरुद्वारे अलग हैं, मुसलमानों की मस्जिदें अलग है। कोई अजनबी नमाज पढ़ने से पहले तस्दीक करता है कि ये मस्जिद किस संप्रदाय की है। हम सभी इस आग में जल रहे हैं। इन सब का मुख्य कारण उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था है जो देश के ब्राह्मणवाद से गठजोड़ करके भारतीय जनमानस को विभक्त किए हुए है। वर्ग-संघर्ष ही चारा है किन्तु जाति के भूत को मारे बिना वर्ग-संघर्ष विजयी नहीं हो सकता है।
विमर्श एक ऐसी स्थिति है जहाँ से कई सवाल पैदा होते हैं। एक सहभागी ने मुझसे कहा कि त्रिपाठी जी का दोष यही है कि वे ब्राह्मण हैं, नहीं तो उनका कमेंट कहीं से आपत्तिजनक नहीं लगता है। आख़िर आप या हम किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को केवल अपनी जाति या अपने समाज के हित-साधक के रूप में क्यों देखते हैं? राष्ट्रपति तो सबके हैं, तो फिर वे केवल दलितों के लिए ही काम क्यों करें? सहभागी के अंतिम बात से ही शुरू करूँगा क्योंकि मैं उनके अंतिम बात का कायल हूँ। माननीय कोविंद जी  या माननीया मीरा कुमार में से किसी भी व्यक्ति के राष्ट्रपति बन जाने से किसी दलित को कोई फायदा होने वाला नहीं है, इसलिए जातिगत आधार पर दलितों का चिंतन न सिर्फ बेकार है, अफ़सोस जनक भी है। उदाहरण के रूप में मुख़्तार अब्बास का नाम भी लिखा। अब इतने स्पष्ट कथन को मेरी जातीय सोच तक कोई पहुंचता है, तो मुझे उसके वैचारिक स्तर के आधार तक पहुँचाना जरूरी हो जाता है। यदि त्रिपाठी जी स्वयं जातिवाद व ब्राह्मण धर्म से ऊपर उठकर मुझे फटकारते, तो उनकी बात सौ आने सही होती लेकिन वह तो कट्टर ब्राह्मण और कट्टर हिन्दू हैं। फिर मुझे पुरोहित वर्ग के ब्राह्मणों के लिए लिखना पड़ा। यह पोस्ट प्रगतिशील ब्राह्मण के लिए किसी भी काम का नहीं है क्योंकि प्रगतिशील ब्राह्मण किसी जाति का पक्षधर नहीं होता है, यहाँ तक कि ब्राह्मणों का भी पक्षधर नहीं होता है। जो ब्राह्मण व दलित का पक्ष लेगा वह निश्चित जातिवादी है। और हां, जातिवाद को दलित नहीं तोड़ सकता है वह चाहे जितना जोर लगा ले। जातिवाद को तोड़ने की शुरुआत ब्राह्मण वर्ण को ही करना पड़ेगा। जो कोई जातिवादी नहीं है, ब्राह्मणवादी नहीं है, तो उसे अपने जाति व धर्म के मोह त्यागकर एक क्रांतिकारी लक्ष्य व संस्कृति के संगठन में कार्य करना होगा। आरएसएस, बीजेपी, सपा, बसपा जातिवादी संगठन हैं। इनमें कार्य करने वाला हर कोई जातिवादी है।
एक साथी ने मुझसे कहा कि भारत में जाति, जातिवाद , जातीय चिंतन कभी खत्म होने वाला नहीं है। यह अपने स्वरुप को बदलता रहता है। जातीय संकीर्णता में कमी आएगी और आ भी रही है लेकिन वहां महानगरीय विकास से जुड़ा हुआ विषय है जो बहुत ही मंथर गति से अपनी चल रहा है। सवर्णों में विशेषकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों की पहचान और सम्मान बहुत कुछ उनके जाति से जुड़ी हुई है वह इसे क्यों छोड़ना चाहेंगे, यदि छोड़ने से कोई लाभ हो तो बताइए? अभी कहा जाए की यदि वे अपनी जाति छोड़ दें और अनुसूचित जाति के बन जाए तो आपको आरक्षण का लाभ मिल जाएगा तब देखिए सौ प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति के नजर आएंगे । मुख्य प्रश्न जातीय विचारधारा से जुड़ा है जिसके कमजोर पड़ने में अभी कई सौ वर्ष लगेंगे। एक उदाहरण देना बहुत ही प्रासंगिक होगा। अभी कुछ माह पहले योगी जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर के एक बाहुबली माफिया के घर पर एक अपराधी को शरण देने के कारण छापा पड़ा जिसे इधर के ब्राम्हणों ने एक क्षत्रिय द्वारा ब्राम्हण पर किया गया हमला बताया और खुलेआम जातीय नारे लगाए गए और जुलूस निकाले गए और सबसे ज्यादा विचलित ब्राह्मण नजर आए। एक ने तो यहां तक लिख दिया की राम ने ब्राह्मण रावण को मार कर अपराध किया था। इसके अलावा एक अन्य उदाहरण देना भी जरूरी होगा। जब मध्य प्रदेश सरकार ने कॉलेजों में पुरोहिती का कोर्स शुरु किया और सभी जाति-धर्म के लिए खोल दिया,  तो ब्राह्मणों ने इसका खुलेआम विरोध किया था। आरक्षण विरोधी और योग्यता के पुजारी वर्ग अपने हितों में सौ पर्सेंट आरक्षण चाहते हैं। इन सब का आशय यह है कि आपको अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी है। अन्य वर्गों से बहुत उम्मीद न रखें। केवल विकास ही वह रास्ता है जो अगले 100-200 साल में धीरे-धीरे कई कुरीतियों को कम करेगा लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं कर पाएगा।
मैं इन बात से इत्तिफ़ाक रखता हूँ कि जातियां ख़त्म नहीं होगी, केवल उसका अस्तित्व बदलेगा, वह भी कई सौ वर्षों में-कटु सत्य है। मैं इस बात का कायल हूँ। लिखने-पढ़ने और सामाजिक-राजनितिक संगठनों में कार्य करने का उद्देश्य सिर्फ एक होता है कि प्राकृतिक मोड पर होने में होने वाले परिवर्तन में हम जागरूक लोग सामूहिक व सांगठनिक रूप से और अधिक गति प्रदान कर सकते हैं। इस गति से जाति के अतिरिक्त कई और सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक गतिविधियों में सुधार की अपेक्षा है। बाकी पुराणों में साक्ष्य हैं कि ब्राह्मणों के विरुद्ध लड़ने वाले क्षत्रियों को परशुराम ने नेस्तानाबूत किया। फिर मगध के राजा महापद्मनंद के द्वारा ब्राह्मणों ने क्षत्रियों का संहार करवाया। वशिष्ठ और विश्वामित्र खूब लड़े और यहां तक लड़े कि वशिष्ठ के 100 पुत्रों को विश्वामित्र ने काल के गाल में पहुंचा दिया। इसी लड़ाई का नतीजा था कि पुरोहित वर्ग ने क्षत्रीयों का उपनयन संस्कार बंद कर उन्हें शूद्र वर्ण तक गिरा दिया। वर्तमान शूद्र क्षत्रियों की ही एक शाखा है।
ऐसे भी विचार आते हैं जब लोग कहते हैं कि वर्गीय चेतना इस देश में दूर की कौडी है लेकिन आप के सुन्दर कन्विंसिंग और प्रतिबद्धता पूर्ण लेख से मैं प्रभावित हूं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मैं आप को डा.तुलसीराम (जेएनयू) के विचारों के बहुत नजदीक पाता हूं। आप के जवाबों में जो शालीनता और सौम्यता दिखती है, उसका मैं कायल हो गया हूं। काश ! आपके सपनों और विचारों की दुनियां इस भारतभूमि पर पल्लवित हो सकती। ऐसे लोगो को इसके सिवा और बेहतर जवाब क्या हो सकता है कि वैचारिक प्रतिबद्धताएं यह तय करती हैं कि दुनिया को किस तरफ जाना है। मैं स्वयं नहीं जानता कि साम्यवाद कब आएगा, आएगा भी तो कौन सी शक्ल में आएगा। लेकिन, मैं इतना जरूर समझ पाया हूँ कि साम्यवाद के आने के सिवा कुछ बचा ही नहीं है। और कोई ‘वाद’ अब आने वाला नहीं है। मार्क्सवाद का सिद्धांत ही एक ऐसा सिद्धांत है जो गतिशील है, शेष प्रतिक्रियावादी सिद्धांत हैं। प्रतिक्रियावाद बहुत दिन तक अस्तित्व में नहीं रहता है।
भारत वर्ण और जाति का देश है। भारत का श्रमिक वर्ग जातियों में विभाजित है। अत्यंत गरीब ब्राह्मण को भी सामाजिक श्रेष्ठता बोध प्राप्त है। दुर्भाग्य है कि अत्यंत गरीब ब्राह्मण व क्षत्रीय को उसके सरगना उतना ही शोषण करते हैं या वह उतना ही शोषित है जितना अत्यंत गरीब रघुआ चमार। दोनों की भौतिक गति एक है; लेकिन आध्यात्मिक गति में अंतर की वजह से ब्राह्मण उफ़ करने को कौन कहे वह प्रतिष्ठित महसूस करता हुआ आर्थिक और राजनैतिक संघर्ष में रघुआ चमार का साथ नहीं दे पाता है। यह उसकी विसंगति है।
डा.आम्बेडकर ने कहा था कि हमारे दो दुश्मन है-एक पूँजीवाद, दूसरा ब्राह्मणवाद।
विभिन्न विचारधाराओं के अस्तित्व में होने के बावजूद भी जातिप्रथा ख़त्म होने को न वे इंकार कर रहे हैं और न आप, अर्थात मैं सही हूँ। जातिप्रथा एक दिन ख़त्म होगी। साम्यवाद एक दिन आएगा। यह तो समय की नियति है। होता क्या है जब हम किसी व्यवस्था के बदलने की बात करते हैं, तो लोगबाग यह सोचने लगते हैं जैसे मैं अभी-अभी क्रान्ति संपन्न कर देने की बात कर रहा हूँ। नहीं, ऐसा सोचना अतिवाद है।
बर्फ़ को पतीली में रखिए। उसके नीचे उच्च तापमान की व्यवस्था करिए। आप देखेंगे कि कुछ समय बाद बर्फ़ पानी बन गया, लेकिन उसके खौलने में भी समय लगेगा। आप ने तापमान नहीं बढ़ाया है किन्तु पानी खौलने लगा। खौलता हुआ पानी अपनी तीसरी अवस्था में पहुँच गया। कुछ देर बाद भाप में परिवर्तित होकर अदृश्य हो गया। बर्फ़ अपनी चौथी अवस्था में अदृश्य हुआ। इसी तरह जाति को ख़त्म होने में समय लगेगा लेकिन किसी न किसी आर डी आनंद को सक्रीय होना चाहिए।
सौ साल लगेगा कि दो सौ साल, यह मायने नहीं रखता है। मायने यह रखता है कि सही दिशा में सक्रीय रहा जाय जिससे जाति और वर्ण का विषाणु ख़त्म हो सके। जातियां यदि अपना अस्तित्व नहीं खोती हैं, तो पूँजीवाद के लिए ये जयचंद की भूमिका में रहेंगी और पूँजीवाद एक अमरवेल की तरह दूसरों का खून चूसता रहेगा। इसलिए, जातिप्रथा अर्थात ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद को उखड फेंकने के लिए सकारात्मक सोच विकसित करना विवेकशील लोगों की जिम्मेदारी है।
एक बात और। उच्च जातियों के बहुत से लोग कहते हैं कि ब्राह्मण व क्षत्रियों को सहज ही उच्चता प्राप्त है वह अपने उच्चता बोध को क्यों छोड़ देगा। उनका यह प्रश्न वाजिव है और चिंतन योग्य भी।
यहां बस इतना भर ही कहना है कि दासप्रथा ख़त्म हुआ, सामंतवाद ख़त्म हुआ, राजसी व्यवस्था ख़त्म हुई, जार ख़त्म हुए, तो ब्राह्मणवाद भी ख़त्म होगा और पूँजीवाद भी ख़त्म होगा। सारी व्यवस्थाएं बलपूर्वक टिकाए रखी जाती हैं, तो ऐसी व्यवस्थाएं बलपूर्वक ख़त्म भी की जाएंगी। समय लगेगा। जरूरी नहीं आर डी आनंद ही क्रान्ति के नायक हों। भगत सिंह फांसी पर झूल गए। यदि आत्मा होतीं, और आत्माओं को यह देखने का अधिकार होता, तो भगत सिंह की आत्मा पुनर्विचार करने लगती कि मैं तो नाहक़ फाँसी पर चढ़ गया। लेकिन, उनकी क़ुरबानी के इतने वर्षों बाद भी हम आशा और विश्वास करते हैं कि क्रान्ति होगी।
यह बात सही हैं कि पूंजीवाद आज पहले से भी ज्यादा संश्लिष्ट और भयानक रुप में हमारे सामने खड़ा हो गया है। इस नव-पूँजीवाद से निपटने के लिए हमें नये अस्त्र -शस्त्र भी ईजाद करनें होंगे और ये लडाई घर से शुरु करनी होगी। जब इस देश में जातीय मोहासक्ति ने इस कदर डस रक्खा है, तो पारिवारिक मोह से आदमी अपने को कैसे मुक्त रख सकता है ? वस्तुतः, मैं देश में पहले से भी ज्यादा खतरनाक किस्म का एक धुर्वीकरण देख रहा हूं,जो हमारे राजनीति की देन है। जरुरत इस बात की है कि जनता यथार्थ को तो समझे। विभाजित करो और राज करो के सिद्धांत के तहत नये तरीकों का अन्वेषण हो रहा है और जनता बेवकूफ बन रही है। जब तक जनता अपने को नेताओं के बरक्स “तूं डाल -डाल, तो मैं पात-पात” के स्तर पर नहीं लायेगी, तब तक संघर्ष सफलीभूत नहीं होगा।
जातिवादी और प्रतिक्रियावादी सोच रखने वालों का जवाब बहुत ही रेडीमेड रहता  है। वे कहते हैं कि जाति धर्म से ऊपर उठो, विसंगतियां दूर होंगी। रट लगाने से जाति कभी दूर नहीं होंगी। जवाब में क़हा जा सकता है कि ब्राह्मणवाद छोड़ो। ब्राह्मणवाद ही जातिवाद है। जब तक ब्राह्मण ब्राह्मण बना रहेगा, जातियां बनी रहेंगी। जाति ब्राह्मण ने बनाई है इसलिए उसी का कर्तव्य है कि जातिप्रथा व जातिवाद को तोड़े। जिस दिन ब्राह्मण अपनी जाति ख़त्म कर लेगा, उसी दिन भारत से जातियां ख़त्म हो जाएंगी। किसी की मज़ाल क्या की जातिवाद करे। एक ब्राह्मण यह भी कह सकता है कि क्या जातिवाद खत्म करने के लिये ब्राह्मणवाद ही शब्द मिला है? क्या शब्दकोश मे कोई अविवादित शब्द नहीं है? इस संकीर्ण विचारधारा से कृपया बाहर निकलिये अन्यथा आप का लिखना-पढ़ना-विमर्श करना बेमानी होगी। अब सोचिए इसका सटीक और संतोषजनक उत्तर क्या हो सकता है। उससे यही कहा जा सकता है कि ब्राह्मणवाद के प्रति जो आप का मोह है वह ही जातिवाद है, वह ही ब्राह्मणवाद है। यही संकीर्णता है। क्या आप अपनी जाति छोड़ने को तैयार हैं? भरसक नहीं, क्योंकि ब्राह्मण होने से बहुत सहज ही उच्चताबोध आप को प्राप्त है।  फिर दूसरों को संकीर्ण कहने का अधिकार आप को किसने दिया? “ब्राह्मणवाद” शब्द अविवादित नहीं है। इसे पूरी दुनिया ने इसी नाम से स्वीकार ही किया है। ब्राह्मणवाद शब्द का दूसरा शब्द है नस्लवादी, वर्णवादी, पुरोहितवादी; लेकिन ये उचित अर्थ सम्प्रेषण करने में असमर्थ हैं।
अगर मैं पुनः दोहराऊँ, तो फिर वही बात कहनी पड़ेगी कि जातिवाद शब्द उचित अर्थ नहीं देता है क्योंकि जाति की उत्पत्ति का सिद्धांत ब्राह्मण वर्ण ने दिया है। ब्राह्मण के नाम से ब्राह्मण ग्रन्थ हैं जिसमें ऐतरेय ब्राह्मण और सतपथ ब्राह्मण बहुत ही महत्वपूर्ण माने गए हैं। इसी दौरान ब्राह्मण वर्ण ने ऋग्वेद के साथ एक चालाकी की। चालाकी यह है कि ऋग्वेद में 10वां मंडल जिसे ‘पुरुष सूक्त’ कहते हैं, लिखकर 2000 साल बाद उसमें जोड़ दिया। उसमें लिखा कि विराट पुरुष को देवताओं ने पटककर जब मारा, तब उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रीय, जांघ से वैश्य और पैर से शूद्र की उत्पत्ति हुई, जबकि यह सिद्धांत सरासर झूठ है। ऋग्वेद के 2 से 7वें मंडल तक, जो कि प्रारंभिक अवस्था में लिखी गई थी, में तीन वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य का जिक्र है,  शूद्र सिर्फ एक बार आया है। आप को आश्चर्य होगा कि वर्णों की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रारम्भ में होना चाहिए था जोकि कहीं है ही नहीं। फिर यह सिद्धांत अन्त वाले मंडल में क्यों आया? क्योंकि इस सिद्धांत को ब्राह्मण वर्ण ने बड़ी चालाकी से लिखकर समाहित कर दिया और इस सिद्धांत को वे अपनी उपलब्धि मानते हैं। उन्होंने लिखा कि ब्राह्मण ही ईश्वर का प्रतिनिधि है, वह ही इस सिद्धांत का प्रतिपादक है। कालान्तर में इस सिद्धांत को उन्हीं ने नाम पर “ब्राह्मणवाद” कहा जाने लगा। ब्राह्मणों ने जातियां बनाई। ब्राह्मणों ने ही अन्य को मानने को मजबूर किया। जातिवाद का वही स्रष्टा है। फिर जातिवाद के सिद्धांत को “चमारवाद” कैसे कह सकते हैं? ब्राह्मण वर्ण ने समाज में ऊँच-नीच, छुआ-छूत, गैर-बराबरी पैदा किया। यहाँ तक कि ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध लड़ने वाले क्षत्रियों का उपनयन संस्कार बंद कर दिया, जिससे बाद में वे शूद्र की स्थिति को प्राप्त हुए। आज का शूद्र कल का क्षत्रीय था। यही नहीं, ब्राह्मण वर्ण ने क्षत्रियों से बदला लेने के लिए परशुराम के द्वारा धरती को क्षत्रीय विहीन करवाया। ब्राह्मणों ने बचे-खुचे क्षत्रियों का मूलोच्छेदन मगध के राजा महापद्मनंद द्वारा भी करवाया।
किसी भी ब्राह्मण साथी को जब यह पीड़ा होने लगे कि ब्राह्मणवाद शब्द का जिक्र न करो, तो इसका अर्थ होता है कि वह अपने सिद्धांत की तौहीन नहीं चाहता है। उसे अपने “वाद” से बहुत प्यार है। ब्राह्मणवाद एक प्रकार का जातिवाद ही है लेकिन जातिवाद कहने से जातिवादी ब्राह्मण को कोई पीड़ा नहीं होती है क्योंकि जातिवाद शब्द के उच्चारण से उस पर किसी तरह का कोई आक्षेप नहीं लगता है। जब कोई व्यक्ति जातिवाद को छोड़ चुका है, तो कोई कुछ भी बोले, कौन सी पीड़ा। जैसे कोई मुझे चमार बोलता है, चमार कहकर गरियाता है, मेरे सम्मुख किसी को भी चमार व चमाइन कहता है, तो मुझे उससे ईर्ष्या नहीं होती है बल्कि उस पर दया आती है कि इस बेचारे को जाति की पीड़ा है, यह जातिवाद से ग्रस्त है। मैंने अपने को डी-कास्ट कर लिया है, कम से कम मानसिक स्तर पर, क्योंकि जिसे सामाजिक परिवर्तन करना है उसे सबसे पहले अपने को बदलना होता है। यदि आप जातिवाद के विरुद्ध हैं तो जाति के मोह और ब्राह्मण की पीड़ा से मुक्त होइए, नहीं तो सदियां आप पर तोहमत लगाती रहेंगी।
पुरोहित ब्राह्मण पारंपरिक होता है। वह अपने प्रश्नों को आध्यात्मिक तरह से रखता है। बहुत से दलित सोचते हैं कि यह ब्राह्मण की चालाकी है लेकिन यह सत्य नहीं है। सत्य यह है कि वह ईश्वर और धर्म को लेकर बहुत ही प्रतिबद्ध और पूर्वाग्रही होता है। वह विचार को प्रश्न के तौर पर रखता है कि किसी भी संदर्भ में सत्यता को एक पक्षीय विचारधारा से परिभाषित करना उचित नहीं है। जाति व्यवस्था है और सृष्टि के हर कण में है। आप कहाँ कहाँ मिटा पायेंगे। उदाहरण के रूप में नाक के कील और सडक पर बिछने वाले दोनों पत्थर हैं, पर जाति भेद ही उनको अलग स्थान देता है। इसे मिटाया नहीं जा सकता है, हाँ साथ लेकर चलना चाहिये। अब इस प्रश्न का जवाब तो यही हो सकता है कि वह यह समझे कि सृष्टि का कण-कण हिग्स-बोसॉन है।  हिग्स-बोसान अपना वेट और इनर्जी हिग्स फील्ड से प्राप्त करता है। एक साधारण व्याख्या के अनुसार तत्व, इनर्जी, स्पेस, काल, दिक् और प्रक्रिया एक दूसरे में अन्तर्निहित हैं। इनमें से किसी को अलग नहीं किया जा सकता है। इनके मध्य इलेक्ट्रोन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, सकारात्मक आवेग, नकारात्मक आवेग और इनका नाभिक होता है। इनके मध्य की प्रक्रिया सतत् क्रियाशील अवस्था में रहती है। इसे द्वंद्व कहते हैं। कहीं भी कोई जाति नहीं पाई जाती है। यह तो पुरोहित ब्राह्मण का सातिर दिमाग है जो अपने कमाने-खाने के लिए अनेक उटपटांग सिद्धांत तैयार करके रखता है। श्रुतियाँ कुछ कहती हैं। स्मृतियां कुछ कहती हैं। मनुस्मृति कुछ कहती है। सब एक दूसरे के उल्टे कहते हैं। एक कहता है ब्रह्मा के मुँह से पैदा हुए। दूसरा कहता है विराट पुरुष के मुँह से पैदा हुए। कृष्णा कहते हैं मैने सृष्टि की रचना गुण-कर्म के अनुसार किया है। अर्थववेद कुछ और कहता है। ब्राह्मण ग्रन्थ कुछ और कहते हैं। पूरी खिचड़ी है। लेकिन ब्राह्मण मतों और उनकी एकता को मानना पड़ेगा, वे सब की पूजा-अर्चना करवाते हैं। किसी को झूठा सिद्ध नहीं करते हैं।
भारत में जातियां हैं। भारत में वर्ण-व्यवस्था है। ऊँच-नीच, छुआ-छूत है। यहाँ कुत्ता, बिल्ली और विभिन्न जानवर पाल लेंगे। उसका छुआ खायेंगे। उसका मल-मूत्र साफ करते हैं। वाह रे ब्राह्मण और तेरी जातिवाद! शूद्र-चमार अछूत है, अपवित्र है। वाह रे तेरा ज्ञान-विज्ञान! तिस पर बुद्धिजीवी भी बनता है। इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस, रूस इत्यादि में तो जाति नहीं है। छुआछूत नहीं है। मनुष्य अछूत नहीं है। इस दर्शन से ब्राह्मण एक दिन गुलाम बना लिया जाएगा क्योंकि अन्य जातियां अनीश्वरवादी हैं, अवैदिक हैं, अधार्मिक हैं, अव्रत है, मृध्वाक हैं और वैज्ञानिक अवधारणाओं पर कार्य कर रही हैं। आप करो पूजा-पाठ। आप करो गायत्री मंत्र का जाप। आप करो उपनयन संस्कार। हमें इससे कोई दिलचस्पी नहीं है। हम वर्ग-संघर्ष के लिए विभिन्न जातियों के प्रगतिशील लोगों को तलाश रहे हैं जो यह नहीं मानते हैं कि कोई जाति श्रेष्ठ है। वे मानते हैं कि मनुष्य एक प्रक्रिया के तहत पैदा हुआ है। न कोई ऊँच है न कोई नीच। ऐसा मानने वाले मनुष्यता पर कलंक हैं। मानवता के दुश्मन हैं। इन पर विजय प्राप्त करना अच्छे मनुष्यों का लक्ष्य है। कुछ विमूढ़ धार्मिक बुद्धिजीवियों का मानना है कि वर्ण और जाति व्यवस्था ख़त्म नहीं की जा सकती है। जो जिस वर्ण और जाति में हैं उसी क्रम में उनको धर्म का अनुपालन करते हुए चलना चाहिए। उन्हें धर्म के नियमों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अर्थात कोई निम्न जाति में पैदा हुआ है, तो उसे निम्न जाति के कर्तव्यों का अनुपालन करना चाहिए। मनु के कहा है कि नारिशुद्रोनधीयताम्, तो नारियों और शूद्रों को शिक्षा नहीं प्राप्त करना चाहिए। अरे पुरोहित मित्र! फिर भारतीय नव-संविधान को क्या करोगे? उसे क्या जवाब दोगे? एमनेस्टी इंटरनेशनल को क्या जवाब दोगे? ये जो 4 करोड़ शूद्र और 39 करोड़ स्त्रियां पढ़-लिख गई हैं, इनका क्या करोगे? डा.आम्बेडकर के हिन्दू कोड बिल का क्या करोगे? इन कम्युनिस्टों का क्या करोगे जो नित नई दुनिया के लिए उद्यमित हैं? माना आरएसएस और उसके अनुसांगिक दिन रात इस प्रयास में हैं कि पुनः मनु के विधान को लागू कर लिया जाएगा लेकिन आप भूल रहे हैं कि जिस दिन पूँजीपतियों को नस्लवाद की जरूरत नहीं रहेगी, उस दिन आरएसएस और उनके अनुसांगिकों को दूध से मक्खी की तरह निकालकर फेंक देंगे। हलाकि, पूँजीवाद अब विकासशील अवस्था में नहीं है इसलिए उसे भी अपनी मृत्यु हरपल दिखाई पड़ता है जिससे वह डूबते को तिनके का सहारा ढूंढता रहता है। मरणासन्न पूँजीवाद अंतिम दौर तक भी यदि आरएसएस और उसके अनुसांगिकों का साथ नहीं छोड़ता है, तो भी मार्क्स की कही बात चरितार्थ होगी कि पूँजीवाद अपनी कब्र स्वयं खोदता है। इतिहास अपने को दोहराता जरूर है किन्तु समय पीछे कभी भी नहीं लौटता है। यदि इतिहास खुद को दोहराएगा, तो पुरोहित वर्ग शूद्र की स्थिति में जरूर पहुंचेगा। इसलिए, पुनः वह नपाक दौर न गुजरे तो बेहतर होगा क्योंकि हम समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम वर्ण, जाति और वर्ग विहीन समाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम मुनाफे पर आधारित उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था के स्थान पर मनुष्य के भौतिक और नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की उत्पादन व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं।
आर डी आनंद

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