जातिगत जनगणना की मांगः ‘बहुजनों’ के मलाईदार तबके की लूट में हिस्सेदारी की जुगत

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संपादकीय टिप्पणीः इन दिनों ‘बहुजनों’ का मलाईदार तबका सारतः लूट में हिस्सेदारी की चाहत में जाहिरातौर पर इसके उपाय के तौर पर जातिगत जनगणना करवाने की जोरशोर से मांग उठा रहा है। ये नौदौलतिए अपने वर्ग-हितों के अनुरूप शोषणकारी संसदीय व्यवस्था के अंतर्य पर पर्दा डालते हुए शोषक-शासक वर्गों की अतुल्य सेवा कर रहे हैं और अपनी जाति-बिरादरी के कँगलों की रसातल में धँसती जिंदगी की तरफ से आँख बंद किए हुए हैं।

जाति की गणना नहीं तो फिर जनगणना नहीं
– डाॅ. दिनेश पाल
असिस्टेट प्रोफेसर (हिन्दी)
जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा

इक्कीसवीं सदी का इक्कीसवाँ साल चल रहा है और आज भी नब्बे साल पहले गुलाम भारत में अँग्रेजों द्वारा जारी जातिगत जगनगणना को ही ओबीसी के लिए आधार माना जाता है जो कि कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता है। ब्रिटिश हुकूमत द्वाार 1871 से 1931 तक हर दस साल पर जातिगत जनगणना जारी किया गया था। 1941 में भी जनगणना कराया गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण आँकड़ों का सही से संकलन नहीं हो पाया जिसके कारण सम्भवतः जारी नहीं किया गया। फिर 1947 में देश आजाद ही हो गया। स्वतंत्र भारत के हुक्मरानों ने जनसंख्या की गणना तो की, लेकिन सभी जातियों की जाति के साथ संख्या गिनना जरूरी नहीं समझा, जिसके कारण आज भी 1931 की जनगणना से ही जाति के संख्या का अनुमान लगाने की हिमाकत करते हैं। 1931 में पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत में ही थे और आज अलग हैं, तो फिर नब्बे साल पुरानी जनगणना को वर्तमान में कैसे आधार बनाया जा सकता है।
20 दिसम्बर, 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने जब बी. पी. मण्डल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय ‘पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन किया तब आयोग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौति थी पिछड़ों की आबादी का निर्धारण करना। 31 दिसम्बर,1980 को 3743 पिछड़ी जातियों की सूची वाली रिपोर्ट सौंपते समय मण्डल आयोग को 1931 की जनगणना को आधार मानते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी 52 प्रतिशत मानना पड़ा। 07 अगस्त, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मण्डल आयोग की सिफारिश को लागू करने की घोषणा की और 13 अगस्त, 1990 को अधिसूचना जारी कर दी गई। समाजवादी नेताओं के चेहरे पर ओबीसी आरक्षण लागू होने की प्रसन्नता तो थी लेकिन मन में सवाल भी था कि 27 प्रतिशत ही क्यों। 52 प्रतिशत पिछड़ों की आबादी वाली बात समाजवादियों को पच नहीं रही थी, क्योंकि डाॅ. राममनोहर लोहिया ने तो 60 के दशक में ही नारा दे दिया था कि, ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछडे़ पावें सौ में साठ’। लोहिया का 60 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं सवर्ण महिलाओं को मिलाकर था, जिसके कारण बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद का लोहिया तथा उनके संसोपा से मोहभंग हो गया और जगदेव प्रसाद ने ‘शोषित दल’ का गठन कर नारा दे दिया कि, ‘ सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।’
मण्डल आयोग लागू होने के बाद पिछड़ों की राजनीति और सक्रिय हा गई। देश की राजनीति में पिछड़ों की पैठ होते ही मण्डल-कमण्डल की लड़ाई छिड़ गई। 2001 में जनगणना के समय तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी इसलिए जातीय जनगणना की मांग के बावजूद सरकार द्वारा कोई पहल नहीं किया गया। 2011 में मनमोहन सरकार को झुकना पड़ा और अलग से सामाजिक-आर्थिक जनगणना करना पड़ा। आँकड़ा आते-आते इतनी देर हो गई कि काँग्रेस सत्ता खो चुकी थी और केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार बन चुकी थी। नरेन्द्र मोदी सरकार ने तमाम त्रुटियों का हवाला देते हुए आँकड़े को जारी करने से मना कर दी। कोविड-19 की वजह से 2021 की जनगणना थोड़ी देर से शुरू होने वाली है। 2021 की जनगणना को जातिगत जनगणना के रूप में कराने की माँग लगभग पूरे देश में तेजी से हो रही है। बिहार में भाजपा को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों द्वारा जातिवार जनगणना की माँग की जा रही है। भाजपा के नेता भी गाहे-बगाहे उपर्युक्त माँग का समर्थन करते दिख जा रहे हैं लेकिन दिल्ली में बैठे अपने नेताओं का रूख देखकर ये खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं।
बिहार में राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ ओबीसी कर्मचारियों तथा बुद्धिजीवियों ने भी जातीय जनगणना के पक्ष में आवाज तेज कर दिया है। इसी कड़ी में 14 अगस्त, 2021 को बिहार की राजधानी पटना के दारोगा राय पथ स्थित ‘श्रीकृष्ण चेतना परिषद्’ में ‘जातीय जनगणना’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में तमिलनाडु से चलकर आये विशिष्ट वक्ता थिरू जी. करुणानिधि ने विस्तार से बताया कि जातिवार जनगणना की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने एनडीए सरकार के ढुलमुल रवैया पर सवाल करते हुए कहा कि 31 अगस्त, 2018 को गृह मंत्रालय द्वारा जारी बयान में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा कहा गया था कि 2021 की जनगणना के रोडमैप पर चर्चा हुई है, जिसमें तय किया गया है कि 2021 की जनगणना में ओबीसी के आँकड़े इकट्ठे किये जायेंगे, लेकिन अब जब जनगणना कराने की बारी आई है तो केन्द्र सरकार अपने ही वादे से मुकर रही है। एनडीए सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री श्री रामदास अठावले ने भी 12 जुलाई, 2021 को जातीय जनगणना को देश की जरूरत बताया था। इतना ही नहीं भाजपा सांसद डाॅ. प्रीतम गोपीनाथ मुंडे ने भी 13 मार्च, 2020 को लोकसभा में बहस करते हुए कहा था कि, ‘ऑनलाइन जनगणना आवेदन में ओबीसी काॅलम नहीं है, ओबीसी काॅलम को आवेदन में जोड़ा जा सकता है।’ करूणानिधि ने आगे बताया कि डीएमके सांसद थिरु टी. आर. बालु ने संसद में आगामी जनगणना में जाति की गणना से संबंधित सवाल किया तो केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब में बताया कि महाराष्ट्र तथा ओडिशा सरकार की ओर से आग्रह किया जा चुका है कि आगामी जनगणना में जाति के आँकड़े इकट्टे किये जाएं, लेकिन भारत सरकार की योजना में जातिवार जनगणना कराने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है, सिर्फ एससी-एसटी की ही जातीय गणना की जाएगी जो कि पहले से होती आ रही है।’
करूणानिधि ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के जनगणना 2020 का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ भी सभी रंग व वर्ग कि गिनती की जा रही है, जिसका कई मामलों में अपना देश अनुकरण करने की कोशिश करता है, तो फिर जनगणना में भी अनुकरण करते हुए सभी जातियों की गणना करनी चाहिए। इतना ही नहीं उन्होंने संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री उपेन्द्र कुशवाहा को यूएसए के जनगणना 2020 की प्रश्नावली का प्रारूप भी सौंपा, जिसपर सबसे ऊपर में लिखा हुआ था- नेशन डिमाण्ड्स कास्ट सेन्सस। विदित हो कि करूणानिधि ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ अदर बैकवाॅर्ड क्लासेस इम्प्लाॅईज वेलफेयर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि यह संगोष्ठी देश के सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दे पर आयोजित किया गया है इसलिए आयोजक मण्डल बधाई के पात्र हैं। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की मनसा पर सवाल उठाते हुआ कहा कि ये लोग पिछली सामाजिक तथा आर्थिक जनगणना के आँकडे़ में त्रुटि बताकर जारी नहीं किये और अब जातीय तनाव की बात कर रहे हैं। जब एससी-एसटी की गणना, धार्मिक गणना एवं भाषिक गणना होती है तब तो तनाव नहीं बढ़ता है, फिर ओबीसी की गणना से तनाव कैसे बढ़ जायेगा। जातीय जनगणना से तनाव बढ़ेगा नहीं बल्कि तनाव घटेगा। उन्होंने संघ के दबाव में भाजपा नेताओं द्वारा दिए जा रहे दलीलों को बहानेबाजी व बकवास तक कह डाला। बिहार सरकार विधानसभा में दो बार सर्वसम्मति से जातीय जनगणना का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भेज चुकी है, फिर भी केद्र सरकार जातीय जनगणना से कतरा रही है। आखिर किस बात का डर है। उपेन्द्र कुशवाहा ने आह्वान किया कि ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ के तर्ज पर जातीय जनगणना की बात को जन-जन तक पहुँचाकर इसे जन आंदोलन बनाइए। यह मुद्दा सिर्फ नेताओं तथा बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगे कहा कि यह सुखद है कि बिहार की सिर्फ एक पार्टी को छोड़कर शेष सभी पार्टियाँ इस मुद्दे पर एकजुट हैं। उन्होंने 1931 की जनगणना के आँकडे़ पर सवाल करते हुए कहा कि नब्बे साल पुराने आँकडे़ आज कहीं से प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। उस वक्त पाकिस्तान तथा बांग्लादेश भी भारत के साथ थे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने छात्र-जीवन को याद करते हुए बताया कि 1980 के दशक में लोग खुलकर अपनी जाति नहीं बताते थे, क्योंकि जातिगत भेदभाव बहुत ज्यादा था, फिर 1931 में सब अपनी जाति सही-सही बताये होंगे, इसपर मुझे संदेह है।
संगोष्ठी में श्री इन्द्र कुमार सिंह चन्दापुरी, डाॅ. (प्रो.) शशिभूषण कुमार, डाॅ. (प्रो.) दिनेश पाल, डाॅ. (प्रो.) विकास विद्यार्थी, डाॅ. (प्रो.) हबीबुल्लाह अंसारी, अरविंद यरवदा, वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुुशवाहा, डाॅ. (प्रो.) सुजीत कुमार ‘निराला’ एवं श्रीमती शशिप्रभा आदि ने भी अपना वक्तव्य रखा। चन्दापुरी ने ओबीसी आरक्षण लागू कराने की संधर्ष-या़त्रा पर सिलसिलेवार ढंग सेे तथ्य प्रस्तुत किया। शशिभूषण तथा सुजीत ने माँग किया कि डिजिटल इंडिया में जनगणना के आँकड़े ऑनलाईन उपलब्ध होने चाहिए ताकि हम अपना विवरण जाँच सकें कि हमारे संबंध में सही जानकारी है या नहीं। अरविंद तथा अरुण ने काॅलेजियम सिस्टम की भर्त्सना करते हुए आईएस के तर्ज पर नियुक्ति की माँग किया। हबीबुल्लाह ने तो कहा कि या तो जाति व्यवस्था को तोड़ दो, वरना जाति की संख्या जोड़ दो। दिनेश का कहना था कि एक गृहिणी भी घर आये मेहमानों को जलपान तथा भोजन की उचित व्यवस्था करने के लिए उनकी संख्या जानना चाहती है और सरकार बिना जनसंख्या जाने ही योजना बनाकर जनता की सारी समस्याओं का समाधान कर विकास करने का सपना देखती है। किसी का भी निदान करने से पहले आँकड़ा चाहिए होता है, फिर उसका विश्लेषण किया जाता है तब कहीं निदान के लिए पहल की जाती है। जातीय जनगणना राष्ट्र-निर्माण के लिए बहुत जरूरी है। इसे सिर्फ आरक्षण तक ही सीमित करके नहीं देखना व सोचना चाहिए। जातीय आँकडे़ योजना बनाने में बहुत मददगार साबित होंगे। जातीय आँकड़े अतिपिछड़ा समाज के लिए सर्वाधिक फायदेमंद हैं, क्योकि उनकी आबादी के अनुरूप भागीदारी बहुत कम है। शशिप्रभा ने जातीय जनगणना को नारी-सशक्तिकरण के लिए भी सहयोगी माना। उपर्युक्त वक्ताओं के अलावे कमलेश, रामनरेश यादव, डाॅ. बिनोद पाल, डाॅ. रामस्वरूप भगत, मुरलीधर, गजेन्द्र, आशीष रंजन आदि समेत सैकड़ों ओबीसी कर्मचारी व बुद्धिजीवी संगोष्ठी में शामिल हुए।
उपर्युक्त संगोष्ठी का आयोजन ओबीसी इम्प्लाॅईज फेडेरेशन, बिहार तथा सोशलिस्ट इम्प्लाॅईज वेलफेयर एसोसिएशन (सेवा), बिहार द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत में अतिथियों को शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। तत्पश्चात ओबीसी इम्प्लाईज फेडरेशन, बिहार के जनरल सेक्रेटरी श्री रविन्द्र राम द्वारा स्वागत भाषण प्रस्तुत किया गया। सेवा, बिहार के संयोजक श्री राकेश यादव ने कार्यक्रम का संचालन किया। धन्यवाद ज्ञापन सेवा, बिहार के प्रांतीय अध्यक्ष श्री बिजय कुमार यादव, सेवानिवृत्त डीएसपी द्वारा किया गया। विदित हो कि सेवा संगठन की स्थापना 20 जनवरी, 2009 में हुई थी। इस संगठन की स्थापना पिछड़ी जातियों/ओबीसी से आने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों ने अपने हितों की रक्षा तथा उन हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया था, किन्तु उनका उद्देश्य इतना तक ही सीमित नहीं था। यह संगठन वर्तमान में दस सूत्री माँगों के साथ संघर्षरत है, जिसमें पहली माँग मण्डल आयोग की शेष अनुशंसाओं को लागू करना है और दसर्वी माँग न्यायपालिका में आरक्षण की है।

निष्कर्षतः संगोष्ठी में जातिवार जनगणना को राष्ट्र-निर्माण के लिए अत्यन्त जरूरी समझा गया। सरकार को 2021 के जनगणना में जाति की गणना करने के लिए मजबूर किया जाएगा। 1931 के आँकड़े वर्तमान में वैध नहीं हैं। जातीय जनगणना की उपयोगिता सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि विविध रूप में उपयोगी है। इससे सही मायने में सामाजिक न्याय तथा आर्थिक न्याय किया जा सकेगा। जातीय जनगणना से जातीय तनाव उत्पन्न होने की दलील देना बिल्कुल बकवास व बहानेबाजी है, क्योंकि एससी-एसीटी, धर्म आधारित एवं भाषिक जनगणना के आँकड़े जारी होने पर कभी तनाव नहीं होता है। इससे सच सामने आयेगा कि कौन किसका व कितना हक मार रहा है। डिजिटल युग है इसलिए जनगणना के आँकड़े को ऑनलाईन करना चाहिए ताकि लोग अपने विवरण की सत्यता जाँच सकें। जातीय जनगणना आंदोलन सिर्फ नेताओं तथा बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं रखा जाएगा बल्कि इसे जन-आंदोलन में तब्दील किया जायेगा। जब हमारी शिक्षा, पेशा, गाड़ी एवं पशु आदि की गिनती होगी तब हमारी जाति भी लिखी जानी चाहिए। जातीय जनगणना सभी समाज के लिए हितकर है, इसलिए सभी वर्ग को इसकी माँग करनी चाहिए। जाति की गणना नहीं तो फिर जनगणना नहीं।

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