मार्क्सवाद से आगे है आम्बेडकरवाद…

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मेरे फेसबुक मित्र श्री देवोस साँची ने लिखा कि मार्क्सवाद और साम्यवाद अब अप्रासंगिक हो गए हैं क्योंकि अब वह पूँजीवाद से परास्त व पस्त हो चुका है। मार्क्स से आगे आम्बेडकवाद है। डॉ. आम्बेडकर मार्क्स से आगे निकल चुके हैं। निश्चित ऐसे व्यक्ति को एक प्रबुद्ध चिंतक मानना मेरा नैतिक कर्तव्य है। उसी लिहाज से मैंने श्री देवोस जी से जानने की इच्छा जाहिर किया कि वह कौन सी व्यवस्था है जो जातिप्रथा उन्मूलन भी कर सकता है और पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण से भी निजात दिलवा सकता है। मेरे प्रश्न पर श्री देवोस साहब का जवाब अग्रलिखित है।
श्री देवोस साँची के अनुसार, “मार्क्स और आम्बेडकर दोनों ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर वेलौस संस्थापनाएँ सामने लाते हैं। भारत में अब तक क्रांति नहीं आई और आगे भी कोई सूरत-ए-हाल बनते नज़र नहीं आ रहा है। भारत में एक ऐसी सामासिक व्यवस्था है और भारत की इस कंपोजिट सोसाइटी में क्रांति का बीज ऐसे हो जाता है, मानो उसे बंजर में डाल दिया गया हो। ऐसा क्यों है? सर! एक प्रसंग प्रस्तुत है, मार्क्स जब भारत आया और भारत की तराई में दौरा किया तो आश्चर्य में भर गया और सोचने लगा कि भारत में क्रांति के सभी लक्षण मौजूद हैं और क्रांति अब तक हो जानी थी। वह आगे कहता है कि भारत में रूस और चीन से भी पहले क्रांति होनी है। ऐसा उसका तथ्यात्मक निष्कर्ष था परंतु मार्क्स के निष्कर्ष उलट गए और भारत के संदर्भ में गलत हो गए। वह भारत को समझने में जल्दबाजी कर दिया। यहाँ की कंपोजिट कल्चर और टिपकल सोसाइटी को हल्के में ले लिया। मार्क्सवाद के पताकावाज उसी कंपोजिट सोसाइटी से रहे। जनेऊ के ऊपर कोट और कुर्ता था। मंच पर मार्क्स और ड्राइंग रूम में दुर्गा, राधा व कृष्ण थे। मिथक और अर्थशास्त्र के विरोधाभास में फँसे लोग भारत को समझने की गलती तो करते हैं, सो करते रहे हैं। पुनश्च, आज तमाम  बहुजन बुद्धिवादी विमर्शकार मार्क्स और आम्बेडकर को घालमेल करके रखने की बात सोचते हैं। इससे मुझे अजीर्णता पैदा होते लग रही है। मार्क्सवाद और साम्यवाद अब अप्रासंगिक हो गए हैं क्योंकि अब वह पूँजीवाद से परास्त व पस्त हो चुका है। मार्क्स से आगे अंबेडकरवाद है। मार्क्सवाद जहाँ नितांत भौतिकता के द्वंद्वात्मक अपघटन पर परिणाम चाहता है, वहीं आम्बेडकर बुद्ध के अंतसवाद अर्थात आंतरिक नैतिक सीमाओं के साथ आचरण पर अनुशासन का राज्य सोचते हैं जिससे वह अन्यों के लिए मुशीबत न बने। आम्बेडकर का राज्य एक दूसरे की अस्मिता को सम्मान देने पर बल देता है। आम्बेडकर व्यक्ति की आजादी को तरजीह देने के लिए प्रतिबद्ध हैं लेकिन मार्क्सवाद नहीं। मार्क्सवाद में व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वहारा वर्ग की तानाशाही में समाहित हो जाती है। आपने प्रश्न छोड़ा है कि उत्कृष्ट मार्ग क्या है?
मैं कोई निजी निष्कर्ष निकालने के लिए अधिकृत नहीं हूँ और इस लायक भी नहीं हूँ। फिर भी, मेरी समझ संकेत अवश्य देती है कि भारत के सामाजिक ढाँचे को देखते हुए अंबेडकर के मूल सांविधिक मसौदे पर राजकीय समाजवाद पर आधारित सरकार का संचालन हो। बुद्ध और मार्क्स दोनों ने ईश्वर की सत्ता को मिथ्या/काल्पनिक और अकर्मण्य स्वीकार किया तथा शोषण का औजार माना है। आम्बेडकर बड़ी ही सहजता से अलौकिकता को खारिज कर शिक्षा, एकता और संघर्ष का त्रिपाठ प्रस्तुत करते हैं-सम्यक विकास के लिए। पूँजी निषेध का विषय नहीं है बल्कि पूँजी हड़पने की प्रवृत्ति को मृत्युदंड देना अपरिहार्य है। पच्चासी और पंद्रह प्रतिशत आबादी के बीच जो गैर बराबरी और असमान वितरण है, उसके समाधान के लिए आम्बेडकर और उनका लिखा संविधान ही मौजूदा हालातों में समाधान है।”
डॉ. अरुण वर्मा के अनुसार, “विकासवाद से समाज की इतिहास यात्रा का वैज्ञानिक अध्ययन मार्क्स ने किया। देवोस साँची का यह कथन सही नहीं है कि मार्क्स भारत आए। उन्होंने 1857 में भारत की 1947 के सिपाही विद्रोह के साथ जुड़े जन आंदोलन की रिपोर्टिंग डेली ट्रिब्यून और अन्य अखबारों में की थी। क्रांति का वैज्ञानिक दर्शन देने वाले मार्क्स हैं, न बुद्ध न आंबेडकर। बुद्ध और मार्क्स दोनों नास्तिक हैं पर उनकी व्याख्या थोड़ी अलग है। आंबेडकर और पेरियार ने भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जातियों के उन्मूलन की बात कही, लोहिया ने भी जातितोड़ो आंदोलन शुरु किया था, वह सफल नहीं हुआ। मार्क्स इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या के संदर्भ में विभिन्न सामाजिक स्तरों पर वर्ग-संघर्ष के परिणाम स्वरूप क्रांति का वैज्ञानिक खाका तैयार करते हैं। जब तक धरती पर पूंजीवाद और पूँजी के सरमाएदारों का अधिपत्य और आतंक है, तब तक मार्क्सवाद/साम्यवाद अप्रासंगिक नहीं हो सकता। अभी तो उत्तर आधुनिकता के दौर में फैले भूमंडलीकरण और बाजारवाद का पहला चरण (मल्टीनेशनल, बाजार, और आवारा पूँजी की गिरफ्त में राज्य/स्टेट और लोकतंत्र है) ही जारी है और विश्व मानवता विकल होकर कराह रही है। कोरोनावायरस ने तो भूमंडलीकरण को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। किसान/मजदूर/दलित/स्त्रियाँ सभी हाशिए पर हैं। मध्यमवर्गीय जनता भी लुटी-पिटी बैठी है। आंबेडकर और संविधान के अतिक्रमण में भारतीय क्रांति के बीज को देखा जा सकता है। लोकतांत्रिक शक्तियाँ आंदोलन (क्रांति नहीं) के लिए संविधान की दुहाई देते हैं। जय श्रीराम जितना भयाक्रांत करता है, उतना ही भय जय भीम/नमो बुद्धाय भी (चंद्रशेखर रावण के तेवर) भविष्य में भय पैदा करेंगे। ये भी स्तुत्य नहीं होंगे। डॉ. आर डी आनंद ने सही कहा है, पूंजीवाद के संपूर्ण उन्मूलन पर ही समाजवाद के बाद साम्यवाद आएगा। कोई भी समाज हो धरती पर क्रांति का वैज्ञानिक दर्शन मार्क्स से ही मिलेगा। अभी तो मनुष्य को पूंजीवाद और उससे चालित राज्यसत्ता के अनेक तानाशाही/अत्याचार सहन करना है। हमें आरक्षण (जो क्रांति की राह में रूकावट है) के मोह से मुक्त हो, संविधान का अतिक्रमण कर क्रांति के दरवाजे पर दस्तक देनी होगी।”
मार्क्सवाद पदार्थ और समाज को समझने का विज्ञान है तथा समाज को परिवर्तित करने का गाइड भी है जिसे “द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद” कहते हैं। मार्क्सवाद साम्यवाद तथा वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत है। मार्क्सवाद पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की रणनीति, रणकौशल, योजनाएँ और तौर-तरीका भी सिखाता है। मार्क्सवाद पूँजीवादी व्यवस्था के बाद कि दुनिया को संचालित करने का संविधान भी प्रदान करता है। मार्क्सवाद वह विज्ञान है जिसकी रोशनी में हमें जातिप्रथा उन्मूलन करने और उसको स्थाई और अक्षुण बनाए रखने तथा जातिविहीन समाज को संचालित करने की सांविधिक प्रणाली भी बताता है।
आम्बेडकरवाद जातिप्रथा, छुआछूत, ऊँचनीच, भेदभाव व गैर-बराबरी अर्थात ब्राह्मणवाद उन्मूलन का स्वप्न है। आम्बेडकवाद संसदीय लोकतंत्र का हिमायती विचार है। आम्बेडकरवाद बुर्जुआ लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की सिफ़ारिश करता है। आम्बेडकरवाद निजी संपत्ति का अधिकार खत्म करने तथा उत्पादन के सभी संसाधनों को संविधान में राज्य के द्वारा रखने का प्रस्ताव है। आम्बेडकरवाद बुद्ध के करुणा, प्रज्ञा, शील का अनुपालक है। आम्बेडकरवाद मार्क्स की क्रान्ति और सर्वहारा की तानाशाही के विरुद्ध राजाओं, महाराजाओं, सामन्तों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, पंडा, पुजारियों, विधायकों, सांसदों, आतंकवादियों, दुराचारियों, पापियों, दुष्टों, हत्यारों, बलात्कारियों, पूँजीपतियों, प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के चित्त परिवर्तन में विश्वास रखता है। बुद्ध के इस दर्शन से हिंसा की प्रवृत्ति खत्म की जा सकती है।
आलेख का निष्कर्ष है कि “राज्य और अल्पसंख्यक” में उल्लिखित मसौदे के अनुसार सरकार का संचालन हो। मैं भी सहमत हूँ। क्रान्ति कौन सी बड़ी अच्छी चीज है। आंतरिक नैतिक सीमाओं के साथ एक दूसरे की अस्मिता को सम्मान देते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती मार्क्स से आगे का आम्बेडकरवाद को कैसे लागू किया जाय? क्योंकि इतने सुंदर व्यवस्था को लागू किए बिना समस्या का हल नहीं प्राप्त होगा। अब इसके साथ आम्बेडकरवादी साथियों को एक और सवाल पर कसरत करना पड़ेगा कि उस मसौदे को लागू करने पर जातिप्रथा, ऊँचनीच, छुआछूत, भेदभाव, धार्मिक मान्यताएँ और धार्मिक विवाद कैसे खत्म किया जा सकेगा? उसका कोई ठोस तरीका होना चाहिए। यह सिर्फ आप के बौद्धिक स्तर का टेस्ट नहीं है, बिल्कुल नहीं। मैं चाहता हूँ कि इसी तरह विमर्श से कोई उचित सुझाव आए जिसको हम आंदोलनात्मक परिणति तक ले चलें।
दलित संसदीय लोकतंत्र में विश्वास रखता है। वह नए संविधान की कोई रचना नहीं चाहता है। वह इसी संविधान को गीता/कुरान की तरह पूजती है। दलित आम्बेडकर को अभी तक का और भविष्य का भी अद्वितीय विद्वान मानता है। वह मानता है कि आम्बेडकर से अधिक विद्वान कोई नहीं हो सकता है। दलितों के निगाह में आम्बेडकर साहब दुनिया के आखिरी विद्वान हैं। उनके जैसा न कोई हुआ है और न कोई होगा। दलित इस बात से समझौता नहीं कर सकता है और न सह ही सकता है कि कोई यह कहे कि मैं उनसे बेहतर सोचता हूँ। यदि कोई आम्बेडकर साहब से भिन्न और बेहतर सोचता है या सोचने का दावा करता है तो दलित उसकी वाट लगा देंगे। दलित संविधानवादी है। दलित दक्षिणपंथी है। कहने को तो दलित जातिप्रथा व ब्राह्मणवाद विरोधी है लेकिन वह भी जातिवादी है। दलित व्यवस्था परवर्तन नहीं चाहता है वह सिर्फ हिस्सेदारी चाहता है। डॉ. आम्बेडकर संसदीय लोकतंत्र में परिवर्तन चाहते थे। वे चाहते थे कि संसदीय लोकतंत्र उत्पादन के समस्त संसाधनों के राष्ट्रीयकरण हो तथा व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को खत्म कर दिया जाय। इस तरफ कोई भी दलित न चिंतन करता है और न प्रयासरत है। ऐसा इसलिए है कि आरक्षण की वजह से कुछ लोगों को सत्ता और नौकरियों में बने रहने की सुविधा आसानी से प्राप्त है। कौन जाए अन्य 27 करोड़ भूमिहीन/अशिक्षित दलितों के लिए अपने प्राण को संकट में डालने। परिवर्तन के लिए हमेशा प्राण को संकट में डालना पड़ता है। अब बुद्ध की करुणा से धन और सत्ता के लालची कदापि नहीं मानने वाले हैं। दलित अब भी यदि डॉ. आम्बेडकर के हृदय परिवर्तन के दर्शन को दुष्टों/शोषकों को बदलने का आधार मानता है, तो उसे सदियों तक इंतजार करना पड़ेगा। आम्बेडकर साहब के इस दर्शन से दलित दूसरों का हृदय परिवर्तन क्या, अपना हृदय परिवर्तन स्वयं नहीं कर पा रहा है। बुद्ध को मानने वाले दलित साथियों में करुणा और दया है ही नहीं, वे अहमान्यताओं से लबालब भरे हैं जिसे बुद्ध दुख का कारण मानते हैं और सर्वप्रथम अहमन्यता नामक संज्ञा से तत्काल दूर हो जाने की प्रेरणा देते हैं। बुद्ध निब्बान के सिद्धांत और परिमिताओं से यही सिखाना चाहते हैं कि मनुष्य को अतिशीघ्र संज्ञाओं से मुक्त हो जाना चाहिए लेकिन दलित किसी भी संज्ञा से दूर होने के बजाय, अति संज्ञावन होता जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि व्यवस्था के संचालकों के हृदय परिवर्तन संभव है तथा उस चित्त परिवर्तन के लिए क्रान्ति का रास्ता छोड़ दें।
कुछ विद्वान कहते हैं कि मार्क्सवाद और साम्यवाद अप्रासंगिक हो गया है लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि कैसे अप्रासंगिक हो गया है। बर्बर युग, दास प्रथा, सामंतवाद, राजतंत्र, पूँजीवाद, लोकतंत्र के बाद समाजवाद ही वह चरण है जिसको लाए जाने के लिए दुनिया के तमान विद्वान लिख/पढ़ रहे हैं। पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति के लिए लोग कमर कसे हुए हैं। समाजवाद के बाद साम्यवाद आएगा। साम्यवाद मनुष्य की विकसित अवस्था है, जहाँ पर सत्ता, सरकार, संविधान, पुलिस, मिलिट्री, शासन, पशासन का भी लोप हो जाता है। साम्यवाद से पूर्व समाजवाद आएगा। समाजवाद के अंतर्गत कई रूप विकसित हो सकते हैं, कई चरण हो सकता है। समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण बहुत समय लेगा। साम्यवाद मनुष्य के विकास की वह अवस्था है जहाँ मनुष्य में सामूहिक रूप से उठना, बैठना, खाना, पीना, कार्य करना निबद्ध हो जाएगा। चरित्र और ईमानदारी मनुष्य के गुण धर्म के रूप में विकसित हो जाएगा। व्यक्तिवाद, लालच, हत्या, बलात्कार नहीं रह जाएगा। ऊँचनीच, छुआछूत, भेदभाव, जाति, बिरादरी, धर्म, सम्प्रदाय का न सिर्फ सामाजिक रूप से लोप हो चुका होगा बल्कि मानसिक अवस्थिति में भी इसका अवशेष नहीं रह जाएगा। ऐसे सुदर दर्शन/व्यवस्था को जब कोई अप्रासंगिक सिद्ध करने/कहने की कोशिश करता है तो यह समझना भूल जाता है कि यदि समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद अप्रासंगिक है तो पूँजीवाद और बुर्जुआ लोकतंत्र के संसदीय प्रणाली को कौन सा तंत्र रिप्लेस करेगा।
(श्री देवोस साँची के वार्ता पर आधारित लेख)
आर डी आनंद

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