जाति प्रथा और वर्ग संघर्ष

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सभी भले मनुष्य बन्धुत्व (भातृत्व) को लोकतंत्र का आधार समझते हैं और यह समझना ठीक भी है। किसी भी मनुष्य के विकास और सुख से संबंधित दर्शन के लिए मानवीयता का प्रथम गुण बन्धुत्व का होना नितांत आवश्यक है इसलिए, कोई व्यक्ति चमार या ब्राह्मण होने से दूषित नहीं हो जाता है। यह बात दलितों के संबंध में ब्राह्मणों को और ब्राह्मण के संबंध में दलितों को आत्मसात करना होगा। ब्राह्मण सदियों से दलित जातियों को अछूत मानते रहे हैं, यहाँ तक कि बहुसंख्य परम्परावादी ब्राह्मण (सभी सवर्ण जातियाँ) अभी भी दलितों से छुआछूत करते हैं बल्कि संस्कृति और आदतों में शामिल हो गया है कि दलित जातियाँ ईश्वरीयकृत अछूत और गन्दे हैं, उन्हें अपने किसी भी स्तर पर मिलाया नहीं जाना चाहिए। यह उनके वर्चस्व का भी दर्शन है और जीवन के दर्शन को न समझ पाना भी है। ठीक उसी तरह, दलित भी यही समझता है कि ब्राह्मण कभी न सुधरने वाली जाति है। ब्राह्मणों को कभी भी अपने में नहीं मिलाया जाना चाहिए बल्कि, दलित यह मानता है कि ब्राह्मण जन्मनः ब्राह्मणवादी है। ब्राह्मण और दलित दोनों को यह मानने में परहेज़ है कि दोनों जातियाँ प्रगतिशील भी हो सकती हैं।
यह सत्य है कि ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद का जनक है तथा ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद करता है लेकिन यह बात कि ब्राह्मण परिवर्तित नहीं हो सकता है, गलत अवधारणा है बल्कि दलित चिंतकों को सत्य प्रतीत होते हुए भी यह विज्ञान विरोधी अवधारणा है। यह प्रत्ययवादी अवधारणा है। यह पदार्थवादी अवधारणा के विरुद्ध है। यह चिंतन सिद्ध करता है कि ब्राह्मण और उसका चिंतन सार्वभौमिक सत्य है। एक तरह से उसके श्रेष्ठ होने और अपरिवर्तनीय होने की पुष्टि करना है। जबकि परिवर्तन प्राकृतिक नियम है। परिवर्तन ही सत्य है। जो कल था आज नहीं है जो आज है कल नहीं रहेगा। यदि कोई परिवर्तन के इस सिद्धांत के विपरीत बोलता है तो वह अनजाने ही सही ब्राह्मणों के ईश्वरीय सिद्धांत को ही स्वीकार करता है। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद अपरिवर्तनीय नहीं है। कार्य और कारण का सिद्धांत सभी पर लागू होता है। सही दिशा में कार्य किया जाएगा तो ब्राह्मणवाद का किला भरभरा कर गिर जाएगा। पदार्थवादी अवधारणा की समझ है कि मनुष्य का दिमाग भौतिक परिस्थितियों की उपज है। घटनाएँ मनुष्य के दिमाग़ में प्रतिबिम्ब के रूप में इंद्रियों द्वारा ग्राह्य होकर मस्तिष्क में रूपाकार होकर विचार के रूप में अनुवादित होती रहती हैं। ब्राह्मणों के भौतिक परिस्थितियों को परिवर्तित कर देने से उनकी समझ भी परिवर्तित हो जाएगी लेकिन यह न एक बार में परिवर्तित होगा और न एक दिन में, इस परिवर्तन के लिए सतत और लम्बे प्रयास की जरूरत होगी बल्कि सांस्कृतिक और भौतिक परिवर्तन को टिकाए रखने के लिए सर्वजन की तानाशाही की अनवरत आवश्यकता बनी रहेगी। मन में तत्काल प्रश्न का उठना लाज़िमी है कि वह भौतिक परिस्थिति क्या है? वह भौतिक परिस्थिति न ईश्वर है, न वर्ण है, न जाति है, न धर्म है, न धार्मिक अवधारणा है, न वेद-पुराण हैं, न आत्मा है, न पुनर्जन्म है और न पूर्वजन्म है। वह भौतिक परिस्थिति है-उत्पादन, उत्पादन के संसाधन और मठ-मंदिर।
उत्पादन के संबंध में यह देखना है कि उत्पादन का उद्देश्य क्या है? क्या उत्पादन सभी मनुष्य के हितों की पूर्ति के लिए किया जाता है? बिल्कुल नहीं। तो फिर उत्पादन किस लिए किया जाता है? उत्पादन सामंतों (प्रत्येक अमीर सवर्ण) और पूँजीपतियों के मुनाफे के लिए किया जाता है।
संसाधन के रूप में जमीन और कल-कारखाने तथा उन पर कार्य करने के औजार मुख्य हैं, जो इन्हीं चंद सवर्णों और पूँजीपतियों के हाथों में हैं। शेष जनता श्रमिक है। श्रमिकों को विभिन्न स्तर में वर्गीकृत कर बाँट दिया गया है तथा नियंत्रित रूप से बाँटे रहा जाता है।
मार्क्स ने साम्यवाद का दर्शन दिया। उसमें उन्होंने लिखा कि उत्पादन का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं होना चाहिए बल्कि उत्पादन जनता के नैतिक और भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए होना चाहिए। पूँजीपति सिर्फ उतना ही उत्पादन करता है जितना उसके मुनाफे के लिए जरूरी होता है, भले जनता भूखों-नंगों रहे। उत्पादन के सभी संसाधन-भूमि, कल-कारखाने, औजार, हथियार, सेना, मिलिट्री, मीडिया, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कम्प्यूटर, साइंस इत्यादि चंद पूँजीपतियों के हाथ में होता है। शेष जनता सर्वहारा है। अपने श्रम शक्ति को बेचकर जीवन-यापन करती है। संसाधनों का मालिकाना व्यक्तिगत हाथों में न होकर सामूहिक हाथों में होना चाहिए।
डॉ. आम्बेडकर ने भारतीय संविधान का ड्राफ्ट तैयार करते समय लिखा था कि संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार खत्म कर देना चाहिए। हर तरह के संसाधनों-जमीन, बैंक, खेत, कृषि, कारखाने, कम्पनियाँ, औजार, हथियार, पुलिस, मिलिट्री, सिनेमा, व्यापार, मीडिया, प्रेस, अखबार, पत्र, पत्रिका का राष्ट्रीय होना चाहिए। डॉ. आम्बेडकर हिंसा और तानाशाही रहित साम्यवाद चाहते थे। (संदर्भ: राज्य और अल्पसंख्यक-डॉ. आम्बेडकर)
यदि उत्पादन का उद्देश्य सभी के भूख, हित और जरूरतों के लिए कर दिया जाय और मुनाफे के लिए बंद कर दिया जाय तथा संपत्ति पर निजी स्वामित्व खत्म कर दिया जाय, तो सभी सामान स्थिति में हो जाएंगे। यदि उत्पादन के सभी संसाधनों पर सामूहिक स्वामित्व हो जाय, तो सामंत, सवर्ण और पूँजीपति आम जनता जैसे ही हो जाएंगे।
यदि मठ, मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा, बौद्ध -विहार राष्ट्रीय घोषित हो जाँय तथा उनमें आए चढ़ावा को मंदिर बन्द होते समय बैंक में आए राशि की तरह सरकारी खजाने में जमा करवा दिए जाँय, तो इन पवित्र संस्थानों में पुजारी, महंत, मौलवी, वाहेगुरु, भिक्षु की लंबी लाइन खत्म हो जाएगी। जब धन नहीं तो फालतू की भक्ति कौन करेगा।
धन कमाने के सभी संसाधन व्यक्तिगत हाथों से ले लिए जाँय, तो पूँजीवाद, जातिवाद, जातिप्रथा, सवर्णवाद, ब्राह्मणवाद, दलितवाद, दादागिरी, वर्चस्ववाद एवं पहचान की राजनीति धरासाई हो जाएगी। जातिप्रथा बालू की भीत पर खड़ा है। यदि उसकी नींव (उत्पादन और संसाधन) में पानी (सर्वहारा की आवश्यक आवश्यकता की पूर्ति और संसाधनों का राष्ट्रीकरण) डाल दिया जाय तो जातिप्रथा भरभरा कर गिर जाएगी।

 

 

 

 

आर डी आनंद

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