15 मार्च को आदिवासी करेंगे जंतर—मंतर पर धरना प्रदर्शन

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  • विशद कुमार

    आदिवासी-इंडीजीनस धर्म समन्वय समिति, भारत के मुख्य संयोजक अरविंद उराँव ने बताया कि पिछले दिनों वर्चुअल मिटिंग के माध्यम से 2021 की जनगणना में आदिवासियों के लिए ट्राईबल सेपरेट काॅलम जनगणना प्रपत्र में शामिल करने की मांग को लेकर 15 मार्च को दिल्ली के जंतर—मंतर पर धरना प्रदर्शन करने का सामूहिक निर्णय लिया गया। वर्चुअल मिटिंग में अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, असम, पं0 बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश,  तेलंगाना, तमिलनाडु आदि राज्यों के संयोजक एवं प्रतिनिधि शामिल थे। उन्होंने बताया कि निर्णय के बाद यह जानकारी सामुहिक करने के लिए झारखंड की राजधानी रांची के नागरा टोली सरना भवन सभागार परिषद मुख्यालय में ट्राइबल कॉलम की मांग को लेकर पिछले दिनों एक प्रेस कांफ्रेंस की गई।

प्रेस कांफ्रेंस में ‘जय आदिवासी केंद्रीय परिषद झारखंड,’ ‘राष्ट्रीय आदिवासी-इंडीजीनस धर्म समन्वय समिति भारत,’ ‘झारखंड राज्य गोंड आदिवासी महासभा,’ ‘आदिवासी छात्र मोर्चा’ एवं ‘आदिवासी छात्र संघ’ द्वारा संयुक्त रूप से बताया गया कि केंद्र सरकार 2021 की जनगणना में आदिवासियों के लिए ट्राईबल सेपरेट काॅलम जनगणना प्रपत्र में शामिल करे, जिसे लेकर 15 मार्च 2021 को 29 राज्यों के आदिवासी लाखों की संख्या में दिल्ली कुच करेंगे।

जंतर—मंतर पर धरना प्रदर्शन करेंगे एवं अन्य मांगों में ट्रैवल लैंग्वेज मुंडारी, कुरुख, हो, गोंडी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करेंगे। कहा गया कि केंद्र सरकार आगामी सत्र में ट्राईबल सेपरेट काॅलम जनगणना प्रपत्र में शामिल करने  की बिल को सदन से पास कर अंतिम मुहर के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तावित करे। कहा गया कि ट्राईबल सेपरेट काॅलम हमारी राष्ट्रीय पहचान को सुनिश्चित करने का मामला है, जिसे किसी भी परिस्थिति में टाला नहीं जा सकता है।

ट्राईबल सेपरेट काॅलम के लिए हम आंदोलन के किसी भी हद जा सकते हैं। प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया कि अगर आगामी 2021 की जनगणना प्रपत्र में भारत के आदिवासियों को उनका अलग धर्म कॉलम नहीं दिया गया तो पूरे देश में आदिवासी जनगणना का पूर्ण रूप से वहिष्कार करेंगे। कहा गया कि आजादी के बाद से ही आदिवासी जनजाति समुदाय अपनी पहचान को लेकर बाट जोह रहे हैं और अपनी भाषा, संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और मान्यताओं के साथ साथ जल, जंगल, जमीन की रक्षा, उनका संरक्षण करते आ रहे हैं। इसके लिए हम हमेशा संघर्षरत व आंदोलनरत रहे हैं।

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