अब जलावन की लकड़ी व वनोपज पर शुल्क वसूलेगा वन विभाग

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विशद कुमार

उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार द्वारा कैबिनेट की बैठक में पिछले 17 जून को 25 फैसलों को मंजूरी दी गई। तमाम फैसलों के बीच एक ऐसा फैसला भी है जो सरकार को कटघरे में खड़ा करता ही नहीं दिख रहा है, बल्कि झारखंड अलग राज्य गठन की अवधारणा को ठेंगा भी दिखा रहा है।

कैबिनेट में लिए गए जिन 25 मुख्य फैसलों को मंजूरी दी गयी, उनमें जहां कोरोना वायरस के रोकथाम और टेस्टिंग के लिए राज्य के तीन स्थानों पर कोविड—19 का टेस्ट और करने की योजना को मंजूरी दी गयी तथा तय किया गया कि अबल इंटरनेट के माध्यम से कोर्ट का फीस और स्टांप पेपर की निकासी की जा सकेगी।

वहीं भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा-41, 42 एवं 76 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड राज्य में वनोपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए वर्ष 2004 में अधिसूचित झारखंड काष्ठ एवं वन उत्पाद (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2004 को निरस्त करते हुए वनोपज के अभिवहन के विनियमन करने के लिए झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2020 की स्वीकृति दी गई। जिसे अमरेंद्र प्रताप सिंह, प्रधान सचिव, झारखंड सरकार ने 29 जून को राज्यपाल, झारखंड सरकार के ‘आदेशानुसार’ का हवाला देकर लागू कर दिया। जिसके तहत अब आदिवासियों को जंगलों से जलावन समेत अन्य वनोपज लाने का भी टैक्स देना पड़ेगा।

कहना ना होगा कि भारतीय वन अधिनियम 1927 से साफ हो जाता है कि आजादी के बाद भी हमारे शासकों की मानसिकता अंग्रेजी हुकूमत के उन्हीं अधिनियम के इर्द—गिर्द ही चक्कर काट रही है, जिससे सत्ता और उसके पोषकों को लाभ पहुंचता हो। जबकि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा ‘संताल परगना टेडेंसी एक्ट’ 1872 के तहत संथाल आदिवासियों की स्वायत्त सत्ता स्थापित की गई थी, जिसे आजादी के बाद 1949 में संशोधित कर दिया गया। दूसरी तरफ तमाम आदिवासियों की स्वायत्त सत्ता के लिए 1908 में बना ‘छोटानागपुर टेंडेंसी एक्ट’ का आजतक पालन नहीं हो रहा है, बल्कि उसमें भी समय दर समय संशोधन की प्रक्रिया जारी है। इतना ही नहीं भूरिया कमिटी की रिपोर्ट पर आधारित पेसा कानून 1996 आदिवासियों की स्वायत्त ग्राम सभा को भी दरकिनार कर पंचायती राज लागू किया गया। जाहिर है सत्ता के ये तमाम कदम जंगल के दावेदर आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की साजिश के तहत उठ रहे हैं।

 

डीएएए—एनसीडीएचआर झारखंड, के राज्य समन्वय मिथिलेश कुमार कहते हैं कि ”आदिवासी-मूलवासी की हितैषी झारखण्ड सरकार में अब आदिवासियों को जंगलों से जलावन समेत अन्य वनोपज लाने का भी टैक्स देना पड़ेगा। यह एक सबसे बड़ा अन्याय है।” वे कहते हैं कि ”जंगलों में निवास करने वाले आदिवासी समुदाय का 6 से 7 माह की आजिवीका और जरुरत की चीजें तथा पोषक तत्व जंगल से ही मिलते हैं। पूर्वजों से जंगल पर मालिकाना हक रखने वाले आदिवासियों को बेदखल करने वाला सरकार का यह फैसला अन्यायपूर्ण है।”

बता दें कि सरकार आज तक वनाधिकार कानून के तहत वनक्षेत्र में रहने वाले लोगों को पट्टा दे नहीं पायी, पर वन माफियाओं के अवैध कारोबार और अफसरों की काली कमाई पर पर्दा डालने के लिए ये फरमान जारी कर दी। ये फरमान वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों की आजिवीका को कितना प्रभावित करेगा? कैबिनेट में यह प्रस्ताव आने के बाद सरकार में शामिल मंत्रियों और अफसरों ने इसके नुकसान का आकलन करने की जरुरत तक नहीं समझा है।

पिछले 17 जून को कैबिनेट की बैठक में हेमंत सरकार ने झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली- 2020 को मंजूरी दी। भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 41, 42 और 76 के अधीन राज्य सरकार में निहित शक्तियों हवाला देते हुए सरकार ने आदिवासियों पर टैक्स का बोझ लाद दिया। इसपर समाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज कहते हैं कि ”जबकि भारतीय वन अधिनियम 1927 की 41(3) में राज्य सरकार को शक्ति प्राप्त है कि वो किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र के निवासियों या विनिर्दिष्ट वनोपज को इस नियम से बाहर रख सकती है। इसके बावजूद सरकार ने गरीब आदिवासियों की आजीविका को नजरंदाज करते हुए ये नियम लागू कर दी और सभी तथा कथित ‘झारखंडी मंत्रियों’ ने भी इस पर मौन सहमती दे दी।”

बताना जरूरी होगा कि झारखण्ड के आदिवासी आज भी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगल पर निर्भर हैं। जलावन के लिए सूखी लकड़ियाँ और पत्ते चुनकर लाते हैं, पर हरे-भरे पेड़ों को नहीं काटते। खाने के लिए जंगली फल-फूल और साग-सब्जियां, दवाओं के लिए जड़ी-बूटी और रोजगार के लिए लाह, महुआ, करंज, चिरौंजी जैसे वनोपजों की बिक्री कर जीवन-यापन करते हैं। परंतु आदिवासियों ने कभी भी अपनी आवश्यकता से अधिक वनोपज का संग्रहण नहीं किया। इन्हीं आदिवासियों की बदौलत आज झारखण्ड में जंगल सुरक्षित है और वनक्षेत्र का अनुपात भी पूरे देश से ज्यादा है। इस लिहाज से वनोपज पर पहला हक़ यहाँ के आदिवासियों का बनता है न कि सरकार का। पर, सरकार अपना राजस्व बढ़ाने के लिए गरीब आदिवासियों के पेट पर लात मारने का काम कर रही है।

जाहिर है, इस नियम से गरीब आदिवासियों की आजीविका को बहुत नुकसान होगा। पर इससे सरकार का राजस्व बढ़ेगा, इसकी कोई भी गारंटी नहीं है। विभागीय अफसरों से साठगाँठ कर वन माफिया अरबों रुपये के इमारती लकड़ियों का अवैध कारोबार करते हैं, पर सरकार को उसका चौथाई हिस्सा भी राजस्व नहीं मिलता है। राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार ने बालू, कोयला, खनिज, वनोपज आदि सब पर टैक्स लगा दिया है। पर, इसका फायदा सरकार कम और माफिया ज्यादा उठा रहे हैं। गरीब आदिवासी जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं, पर सरकार एक-एक करके झारखंडियों से सारे अधिकार छिनती जा रही है।

ये कानून आदिवासियों को जंगलों से दूर रखने की साज़िश है, ताकि जंगल माफिया और भ्रष्ट सरकारी अफसर दोनों मिलकर वन संसाधनों को लूट सकें। झारखण्ड में अब एक और उलगुलान और हुल की जरुरत है।

 

 

 

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