लाला जी को तब पैरों में ना गिरना पड़ता क्योंकि नैतिकता का बल होता

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उर्दू का एक बड़ा मशहूर ताना है “दूध पीने वाले मज़नू.” इसे उन लोगों को दिया जाता है जो कहीं, किसी दूसरे के नाम पर दी जाने वाली मदद या संसाधन को बीच में से चट कर जाते हैं. और नाम भी नहीं आता है.

यानी यह चालाक और मक्कार लोगों को इंगित करता हुआ वाक्य है. कुछ ऐसी ही मिलती जुलती एक आंचलिक कहानी भी है. और यह कहानी अंग्रेजों के दौर से संबंधित है.

तो हुआ यूँ कि यूपी के किसी गाँव में नया पोस्ट-ऑफिस या डाकखाना खुला. यहाँ काम करने के लिए एक लालाजी मय परिवार आए. और चूँकि गाँव कस्बे से दूर था, इसीलिए परिवार को यहाँ ही रखना पड़ा.

लेकिन गांव में पाठशाला थी और खाने पीने के शुद्ध मिलने की व्यवस्था थी इसीलिए पैसों का भी हिसाब अनुकूल लगने के कारण लालाजी यहाँ आ जमे.

इसी गाँव के ही एक चौधरी साब थे, बड़ा रूतबा था बहुत सी भैंसें और बहुत लंबी चौंड़ी खेती थी. साथ ही चौधरी साब पुश्तैनी लठैत थे.

इतने कि थानेदार, वह भी अंग्रेजों के जमाने वाला, इनसे दो हाथ दूर ही रहना पसंद करता था.

ख़ैर तो डाकखाना खुला तो चौधरी साब के जोत यानी खेत में ही. इसी बीच में दैवयोग से या कहिए कहीं कोई भगवान होता है जिसकी कृपया से चौधरी साब के लड़के को डाक्टरी की पढ़ाई का बुलावा मिल गया.

चौधरी के कुनबे में इस लड़के अलावा, किसी ने स्कूल का मुँह नहीं देखा था और अब लड़का छोटे के बाद, सीधे बड़े शहर पढ़ने जा रहा था.

ख़ैर थोड़ा ना नुकुर के बाद और डॉक्टर का रूआब सोचते हुए चौधरी ने जाने दिया.

कुछ एक महीने बाद चौधरी और चौधराइन दोनों शहर, लड़के से मिलने पहुँचे. और चौधराइन ने लड़के का हॉस्टल देखा और संजोग से खाना भी देख लिया जो मेस से आया था.

अब एक तो परंपरागत भारतीय मां, ऊपर से सैकड़ों जोत और पचास भैंस की मालकिन चौधराइन और तिस पर एक महीने बाद लड़के को देख रही है, “लल्ला, कुछ खाते नहीं हो का?”

आंसू भरी आँखों से बेटे को देखती हुई चौधराइन को मेस का खाना अपनी भैसौं के चारे से भी गया गुजरा लग रहा था.

ख़ैर लड़के ने किसी तरह से समझा-बुझाकर माता-पिता को बिदा किया. ख़ैर पिता तो अंग्रेजी में बात करते और किताबें पढ़ते बेटे को देखकर गदगद थे, लेकिन चौधरानी गुमसुम लौट पड़ीं.

चौधरी को तो भनक नहीं थी कि बगल में ओढ़नी में लिपटा कोई तूफान भंवर काट रहा है.

ख़ैर चौधरी गांव पहुँचे. और जब उन्होंने घर में रोटी की आस जोही. और खाना तैयार हुआ, परोसा गया लेकिन दाल में घी जरा कम था, एक रोटी सादी थी.

चौधरानी का ध्यान तो लड़ने में था तो रोटी और दाल में घी जितना डाल दिया वह भी बहुत था.

तो चौधरी ने पूछा, “भाई, घी नहीं क्या, ऐसे खाना क्यों दिया?”

इतना सुनना था कि चौधराइन का तूफान फट पड़ा, “तुम यहाँ एक बूंद कम होने पर निवाला नहीं खा पा रहे हो, और हमारा लल्ला भैंसों के चारे जैसा सूखा खाना खा रहा है.”

“तुम आदमी हो की ढोर, हमारे भैंस भी अपने बच्चे को मोह करते हैं और तुम्हें घी की पड़ी है.”

और यह कहने साथ ही चौधराइन ने पूरे घी की मटकी चौधरी के दाल में पटक दी.

अब जैसा हिंदुस्तान की परंपरा रही है कि सारे जमाने औघड़ भी पत्नी के सामने सिर नहीं उठा पाता है वही हाल चौधरी साब के सामने भी था.

और फिर चौधराइन ने अपने गणेश के लिए पार्वती के बजाए काली रूप धारण कर लिया था तो शिव को चरणों में लोटना ही था.

तो फिर चौधरी परिवार में राय हुई कि क्या किया जाए, हमेशा शहर जाना तो संभव नहीं होगा. और नौकर-चाकर का क्या भरोसा वह शहर में पहुँच पाएं कि नहीं.

तभी अचानक चौधरी को डाकखाने के लालाजी याद आए.

लालजी ने चौधरी साब से डाकखाने के फायदे बताते हुए कहा था, “चौधरी साब यहाँ से चिट्ठी और सामान कहीं भी, विलायत तक भेजा जा सकता है.”

तो यही सोचते हुए चौधरी साब ने कहा, “अरे जब विलायत तक सामान जाता है तो हमारा लल्ला यहीं इसी देश के शहर में है. लाला का डाकखाना पहुँचा देगा.”

इस विचार के साथ सुबह होते ही चौधरी मय लट्ठ और आसामी के साथ डाकखाने में प्रकट हुए और दो बड़े मटकों में दही और दूध.

अब जिस चौधरी से थानेदार कांपता हो, उसके सामने खानदानी डेढ़ पसली के लालाजी के तो देवता ही कूच कर गए.

हाथ जोड़कर बोले, “हुकुम चौधरी साब, आज इधर कैसे?”

चौधरी साब ने बताया, “मेरे बेटे को यह दही और घी भेजना है. इसे भेज दो और डाक का खर्च बताओ.”

सीधे लहज़े में चौधरी ने अपनी बात कही.

लालाजी ने कहा, “यह सामान डाक से नहीं जा सकता चौधरी साब, यह कच्चा सामान है ख़राब हो जाएगा.”

“तुमने तो कहा था कि सामान चला जाएगा, कच्चा पक्का तो बताया नहीं था.”

“मेरे साथ चालाकी मत करना समझे, वर्ना डाकखाने सहित खोदकर गाँव के बाहर फेंक दूँगा.” चौधरी साब गुर्राए.

चौधरी, एक तो वैसे ही चौधरी ऊपर से चौधराइन का आदेश था, अगर लड़के को दही, घी ना पहुँचा तो चौधरी साब के ऊपर ही ख़तरा था. तो पारा वैसे ही गर्म था.

लालाजी ने माजरा समझा और फ़ौरन दही और घी को डाकखाने में जमा कराया और कह दिया कि पहुँच जाएगा.

चौधरी साब अपने गाँव में सरकारी कागज़ों को कुछ समझते नहीं थे, सो उन्होंने किसी कागज़-पुर्जी की ज़रूरत नहीं समझी.

अब लालाजी देर तक डाकखाने में पड़े रहे उनको समझ ही नहीं आ रहा था की क्या करें. लेकिन फिर घर की ओर चल दिए, उन हांडियों के साथ कि हो सकता है ललाइन कुछ बताएँ.

ललाइन ने पूरी बात सुनी और चौधरी साब के रूतबे के मारे वह भी कुछ राय नहीं दे पाईं.

लेकिन असली खेल तो दो दिन के बाद शुरू हुआ जब घर में शुद्ध दूध की दही और शुद्ध देशी घी की महक गमकने लगी. माल भले ही डर का था लेकिन था तो पराया माल.

और दो दिन पराया माल पास रहने से डर खत्म होने लगा और लालच बढ़ने लगा.

पराया बिना मेहनत के माल पर जी कड़ा करके काबू पाना सबके बूते का कहाँ. तो लाला परिवार ने तय किया की मरना तो है ही लाओ चखकर मरा जाए.

तो फिर जब चखना शुरू हुआ तो खालिस बिना मेहनत का माल किसे रास नहीं आता है. संभवतः यहीं से रिश्वत खाने की परंपरा शुरू हुई होगी जो आज भारतीय सरकारी संस्कृति है.

बहरहाल जब कुछ दिन में पूरा माल खत्म हो गया. तो मन बार-बार और माल खाने को होने लगा. अब सोचिए कहाँ पहले तो दो दिन माल खाया ही नहीं गया, वहीं अब और माल की चाह होने लगी.

इसी बीच चौधरी साब फिर प्रकट हुए. और इस बार लालाजी में डर का बहुत कम अंश बचा था. इसलिए उन्होंने सप्रेम माल स्वीकार किया.

इस बार दोनों हांडी घर पहुँची और ललाइन तो जैसे इंतजार कर रहीं थीं उन्होंने फटाफट रोटियों पर लगाया और सब्जी भी घी में बनाईं.

लाला जी खाने के बाद बोले, “सही किया भागवान अब सरसो के तेल की सब्जी अच्छी नहीं लगती है, बदबू सी आती है.”

ललाइन ने भी कहा, “हाँ जी, लेकिन बीच में समय काफी लग जाता है, इतना मिला करे की महीना भर तो चले.”

अब लालाजी को भी ललाइन की बात जमने लगी. आखिर पराए तर माल की पौष्टिकता अधिक जो होती है.

ख़ैर चौधरी साब अगले महीने फिर आए, तो इस बार रही सही शर्म और डर भी त्यागकर लालाजी बोले, “चौधरी साब माल तो पहुँच जाता है, लेकिन रेलगाड़ी और गाड़ी में मज़दूर सब दुष्ट होते हैं. छलका देते हैं तो अगर माल ज्यादा रहता, तो पूरा पहुँच जाया करता.

वर्ना छोटे चौधरी को माल कम पड़ता होगा.”

चौधरी साब को बात फौरन समझ आ गई, “मजदूर दुष्ट तो होते ही हैं उनके ही खेत में अगर कोड़ा और लट्ठ ना हो तो चौधरी साब के मज़दूर भाग ही लेते.”

और दही, घी की चौधरी साब को क्या कमी फ़ौरन दो मटके और भिजवा दिए.

अब दो की जगह चार मटका दही, घी पाकर पूरा लाला परिवार मगन था. अब ना तो कोई चोरी का डर या मार खाने की चिंता यानी पराए माल के तर होने पर मगन हो चुके थे.

तो लालाजी और पूरा परिवार बकायदा जमकर खाता और “लल्ला” के नाम पर क्वालिटी की शिकायत भी दर्ज करता.

बहरहाल जैसे होना ही था, एक दिन लल्ला की चिट्ठी आ गई, और चूँकि चौधरी साब की अक्षर से भेंट नहीं थी.

तो पढ़ने के लिए लालाजी को दिया गया. जैसे ही लालाजी ने पढ़ा उनके तो देवता एक बार फिर से कूच कर दिए.

बदहवासी में शाम को जैसे ही लालाजी घर पहुँचे और यह ख़बर घर में दी तो वहाँ मातम पसर गया और पिछले छह महीनों में खाया दही और घी संखिया सा लगने लगा.

फिर यह तय किया गया सुबह पूरा परिवार “लल्ला” से माफी मांगेगा और इसीलिए डाकखाना बंद करके सुबह ही लालाजी मय परिवार नजदीक के स्टेशन पहुँचे और अंदाजे से शहरी सूट-बूट वाले लल्ला की खोज करने लगे.

ख़ैर किस्मत एक बार फिर से लालाजी के साथ थी और चौधरी साब के भेजे तांगे और सामान उठाने वाले साइस से पहले “लल्ला” लालाजी को दिख गए.

और पूरा परिवार याचना की मुद्रा में दंडवत हो गया. अब लल्ला को तो सारा माजरा समझ नहीं आया. लालाजी उनको किनारे चलने का अनुरोध करने लगे.

किनारे साइस और तांगे वाले की नज़र से बचकर किनारे ले जाकर लालाजी ने सारी राम कहानी सुनाई और माफी मांगने लगे.

ख़ैर लल्ला भले ही चौधरी साहब का खून था लेकिन शहर की पढ़ाई और हॉस्टल व शहरी जीवन की वास्तविकता के चलते वह लालाजी को माफ़ कर बैठा.

तो वैसे लालाजी चाहते तो बिना माल खाए भी चौधरी साब को मना कर देते, और समझाने की कोशिश करते या डाकखाना जाने देते.

हो सकता है तब पैरों में ना गिरना पड़ता क्योंकि नैतिकता का बल होता. और उस समय अगर पैरों पर भी गिरते तो निर्बल होकर, आज की तरह चोर होकर तो नहीं.

लेकिन माल खाने के चलते उन्होंने बाद में पैरों में गिरना और याचना करनी ही पड़ती है. लेकिन मुफ्त के माल का स्वाद ही ऐसा होता है कि एक बार लत लग जाने के बाद कुछ भी करा लेता है.

ख़ैर बाद में सुना गया कि लालाजी डाकखाने में आने वाले चिट्ठी लिखाई में दही और घी का हिस्सा लेने लगे थे. यानी मुफ्त का माल खाना ज़रूरी होता है.

हरिशंकर शाही

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