देश की गंगा-जमनी तहज़ीब का निरंतर कबाड़ा करते जा रहे हैं सांप्रदायिक फासीवादीः राकेश वेदा

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वाराणसी, 3 अप्रैलः भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की ओर से आयोजित की जा रही ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा अगले माह 8 मई को बनारस पहुँचेगी। यात्रा को सफल बनाने के उद्देश्य से यहाँ स्थित पराडकर भवन में तैयारी बैठक का आयोजन किया गया।
तैयारी बैठक को संबोधित करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव ए्वं प्रसिद्ध रंगकर्मी राकेश वेदा ने कहा कि वित्तीय पूँजी के वर्चस्व के इस युग में सांप्रदायिक फासीवादी देश की गंगा-जमनी तहज़ीब का निरंतर कबाड़ा करते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें उदात्त बनाने वाले प्रेम की संस्कृति का पैग़ाम जन-जन तक पहुँचाना है। प्रेम तो सभी को अपलिफ्ट करता है, पज्जेसिवनेस तो मनोविकृति है, आत्मग्रस्त-आत्मकेंद्रित व्यक्तित्व का प्रतिफलन है।
इस सांस्कृतिक यात्रा को सफल बनाने के सुझाव देते हुए भाकपा-माले (लिबरेशन) के कॉ. वी. के. सिंह ने कहा कि समस्त सृजन-संस्कृति के मूल में उत्पादक श्रम होता है। अतः हमें समस्त संपदा के सर्जक मज़दूर वर्ग की संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए और इसके लिए जरूरी समस्त रचनात्मक उपायों पर गौर करना चाहिए।
बता दें कि कॉ. वीके सिंह चारु मज़ूमदार द्वारा स्थापित पार्टी लिबरेशन के सदस्य हैं, जिनका मानना रहा है कि संसद का इस्तेमाल वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता, जबकि इतिहास वर्ग-संघर्ष से ही आगे की ओर गतिमान होता है। क्रांतिकारी हिंसा नॉन-निगोशिएबल यानि कि अपरिहार्य है। कॉ. चारु के अवदानों का उचित मूल्यांकन करने वाले वाम आंदोलन के तमाम धड़े आज यह मानकर भी चल रहे हैं कि भारतीय समाज का प्रधान अंतरविरोध अब पूँजी-श्रम के बीच है और जमीन-जमीन के मालिक के बीच का अंतरविरोध परिधि का अंतरविरोध बन चुका है।
ऐपवा नेता
कुसुम वर्मा ने कहा कि वे इस यात्रा को सफल बनाने के लिए हर स्तर पर सहयोग प्रदान करेंगी। उन्होंने कहा कि बनारस जो है वह कबीर की नगरी है, जिसे सांप्रदायिक सत्यानाशियों ने कब्जा लिया है और हमें जनता को इसके विरुद्ध गोलबंद करना होगा ताकि शहर बनारस को उसकी वास्तविक जन-पक्षधर संस्कृति लौटाई जा सके।
बेजोड़ संगठनकर्ता प्रलेस के डॉ. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि लेफ्ट मूवमेंट से जुड़े हुए लोग आपसी भाईचारे की जनता की संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए एकजुट होकर कार्य करें।
उदय प्रताप कॉलेज में हिंदी साहित्य के प्रोफेसर गोरख पांडेय ने कहा कि यह यात्रा उन तमाम शहीदों, समाज सुधारकों व भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के पुरोधाओं का सादर स्मरण भी है।

आजादी के 75 साल के मौके पर निकलने वाली “ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा” असल में स्वतंत्रता संग्राम के गर्भ से निकले स्वतंत्रता – समता – न्याय और बंधुत्व के उन मूल्यों के तलाश की कोशिश है, जो आजकत नफरत, वर्चस्व और दंघ के तुमुल कोलाहल में डूब से गये हैं। हालांकि दो हमारे घोषित संवैधानिक आदशों में झिलमिलाते हुये हफों के रूप में, गांधी के प्रार्थनाओं और आंबेडकर की प्रतिज्ञाओं के रूप में हमारी आशाओं में अभी भी चमक रहे हैं। इन्हीं का दामन पकड़कर हमारे किसान, मजदुर, लेखक, कलाकार मानवाधिकार कार्यकर्ता गांधी के अंहिसा और भगत सिंह के अदम्य शौर्य के सहारे अपनी कुर्बानी देते हुए संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में डटे हैं।

यह यात्रा उन तमाम शहीदों, समाज सुधारकों एवं भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के पुरोधाओं का सादर स्मरण है, जिन्होंने भाषा, जाति, लिंग और धार्मिक पहचान से इतर मानव मुक्ति एवं लोगों से प्रेम को आपना एकमात्र आदर्श घोषित किया।

प्रेम जो उम्मीद जगाता है, प्रेम जो बंधत्व, समता और न्याय की पैरोकारी करता है, प्रेम जो कवीर बनकर पाखंड पर प्रहार करता है, प्रेम जो भाषा, धर्म, जाति नहीं देखता और इन पहचानों से मुक्त होकर निरमाता का आदर्श बन जाता है।

आइर…”ढाई आखर प्रेम की इस यात्रा के बहाने बापू के पास चलें, भगत, अशफाक, बिस्मिल रजानेकानेक शाहीदों के पास चलें। उस हिंदुस्तान में चले जो आंबेडकर और नेहरू के ख्वाब में रहा था, जो विवेकानंद के नव वेदांत और रविन्द्रनाथ टैगोर के उद्दात मानवतावादी आदर्शों में कहो रहा था। मानवतावाद जो अंथराष्ट्रवादी-मानवद्रोही विचार को चुनौती देते हुए टैगोर के होमें “उन्नत माल और भय से मुक्त विचार” में मुखरित हो रहा था। जहां ज्योतिबा फुले, वित्रीबाई फले फातिमा शेख और पंडिता रमाबाई जैसे लोग ज्ञान के सार्वभौम अधिकार के लिए लड़ रहे थे। जो आज तक भी हासिल नहीं किया जा सका है। वहीं अंधविश्वास और रूढ़िवाद के खिलाफ ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राम मोहन राय, गरियार ईदी रामासामी सरीखे लोग तर्क बुद्धि और विवेक क दामना पकड़कर एक तर्कशील हिंदुस्तान के रास्ते चल रहे थे। यह रास्ता प्रेम का ज्ञान का रास्ता है।

इन्हीं सूत्रों को पकड़ कर एक तरफ प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर के नेतृत्व में 9 औ 1936 में प्रात्तस की स्थापना हुई जिसे राहुल सांकृत्यायन, यशपाल आदि ने आगे बढ़ाया। 194; “भारत छोडो आदोलन और दूसरी ओर दंगाल के अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए देश में कलाकार एकजुट हुए और “नबान्न” नाटक के साथ इप्टा की यात्रा शुरू हुई। हमारी बाह यात्रा उसी सिलसिले को आगे बढ़ाने वाली और नफरत के बरक्स प्रे कलणा, बंधुन्द, समता और न्याय से परिपूर्ण हिंदुस्तान के स्वप्न को समर्पित है। जिसे हम के मिलकर बना ली जो बनेगा जरूर।

बो सुबह कभी तो आवेगी…!

वो सबह हमीं से आयेगी…..!! कला जनता के नाम एक प्रेमपत्र है वहीं सत्ता के नाम अभियोगपत्र भी। आइए 4 साल में हम सब मित्त कर आजादी की लड़ाई के जाने-अनजाने योद्धाओं, अन्ताकातों को बार बार याद करें और उनकी बनाई राह पर चलें।
तैयारी बैठक में धनंजय सुग्गू, रंजना गौड़, मनीष शर्मा, मेहदी बख्त, शिवकुमार पराग आदि ने भी अपनी बात रखी। ऑल इंडिया सेकुलर फोरम के सूबे के सर्वेसर्वा डॉ. मोहम्मद आरिफ हालांकि निजी व्यस्तताओं के चलते तैयारी बैठक में उपस्थित नहीं हो सके थे लेकिन उन्होंने इस यात्रा को अपना पूरा समर्थन और सहयोग देने की बात कही है। अगली तैयारी बैठक आगामी रविवार 10 अप्रैल को आयोजित की जाएगी।

 

  

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