‘महिला दिवस’ पर महिलाओं को समर्पित कविताओं का संकलन

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आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।ये दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है. इसका बीजारोपण साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी. इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए. एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमरीका ने इस दिन को पहला राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित कर दिया.इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए. एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमरीका ने इस दिन को पहला राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित कर दिया.
1917 में युद्ध के दौरान रूस की महिलाओं ने ‘ब्रेड एंड पीस’ (यानी खाना और शांति) की मांग की. महिलाओं की हड़ताल ने वहां के सम्राट निकोलस को पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया और अंतरिम सरकार ने महिलाओं को मतदान का अधिकार दे दिया.उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर का प्रयोग होता था. जिस दिन महिलाओं ने यह हड़ताल शुरू की थी वो तारीख़ 23 फ़रवरी थी. ग्रेगेरियन कैलेंडर में यह दिन 8 मार्च था और उसी के बाद से अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाने लगा.

पैने चाकू – रमणिका गुप्ता

“मैं
पंख फैलाए
बांधे पंखों में हवा
उन्मत्त मदमस्त उन्मुक्त
गगन में उड़ती थी…
रास नहीं आया उन्हें मेरा उड़ना
वे
पंजे पजा कर
चोंत तेज कर
धारदार पैनी नजरों से
मेरे
पंख काटने को उद्यत
बढ़े आ रहे मेरी ओर बाज-गति से
घेरते गगन
गिद्धों-से
वे मुझे डराना चाहते
मैं
तैर रही थी पंखों के सहारे
हवा में
उड़ रही थी क्षितिज-रेख पर
गगन के किनारे-किनारे
डरी-डरी सी उतरी
धरा पर
आश्रय खोजती
आ बैठी सूखे तरु पर
चुपचाप खोई-खोई दुबकी-सी
गुमसुम ताक रही आकाश…
जहां अब चाकू तैर रहे हैं
कैसे उडूं मैं
वहां बाज ताक रहे हैं?
कैसे चहकूं मैं
वहां गिद्ध तलाश रहे हैं?
क्या भूल जाऊं मैं उड़ना
चहकना चाहना फुदकना
उन्मुक्त मदमस्त हो गाना?
यही तो वे चाहते
वे उड़ें निर्बाध
मैं दुबकी रहूं कोटर में
वे घेर लें आकाश
मैं धरती से सटी-सटी पड़ी रहूं बेआस
वे मदमस्त हवा में तैरें-
उन्मुक्त
मैं पंख बचाने की फिक्र में
जीने की फिराक में
नजरों से बचती फिरूं
छिपती फिरूं
नहीं…होगा नहीं यह
नहीं होंगे कामयाब वे
तेज चोंचों के वार से
टुंग कर
नुकीले पंजों की पकड़ से
गुद कर
पैनी नजरों की धार से
कट कर
चिर कर
उन्हें भोथरा करने के लिए
जरूरी ही है खोलना पंख
तो खोलूंगी मैं
विकल्प उड़ना ही है तो उडूंगी मैं
मेरे होने के इजहार के लिए
विकल्प
वजूद का मिटना ही है
तो मिटूंगी मैं
पर चाकुओं को हवा में तैरने से
रोकूंगी मैं! रोकूंगी मैं! रोकूंगी मैं!”

बैठी हैं औरतें विलाप में   – सविता सिंह

“बैठी हैं एक साथ
गठरी बन
बिसूरती
रोती विलाप करती स्त्रियां
करतीं शापित पूरे इतिहास को
जिसमें उनके लिए
अंधकार का मरुस्थल बिछा है
बैठी हैं याद करतीं
अपनी महान परंपरा को
जिसमें थी उनकी स्वायत्ता
उनका स्वाभिमान
संप्रभुता थी फैली
आसमान-सी करुणामय तरल
किए आच्छादित तप्त भूतल को
अन्नदात्री वे उपेक्षित नहीं करती थीं
एक भी मनुष्य को
बैठी हैं विस्मृति में डूबे
अपने अतःस्तल से निचोड़तीं अपना ही रक्त
रंगतीं धरती को पटी है जो
अनेक ऐसी कथाओं से
स्तब्ध हो जो
मूक सुनती है उनका विलाप…!”

भाषा में छिप जाना स्त्री का – कात्यायनी

“न जाने क्या सूझा
एक दिन स्त्री को
खेल-खेल में भागती हुई
भाषा में समा गई
छिपकर बैठ गई।
उस दिन
तानाशाहों को
नींद नहीं आई रात भर।
उस दिन
खेल न सके कविगण
अग्निपिण्ड के मानिंद
तपते शब्दों से।
भाषा चुप रही सारी रात।
रुद्रवीणा पर
कोई प्रचण्ड राग बजता रहा।
केवल बच्चे
निर्भीक
गलियों में खेलते रहे।”

खांटी घरेलू औरत – ममता कालिया

“कभी कोई ऊंची बात नहीं सोचती
खांटी घरेलू औरत
उसका दिन कतर-ब्योंत में बीत जाता है
और रात उधेड़बुन में
बची दाल के मैं पराठे बना लूं
खट्टे दही की कढ़ी
मुनिया की मैक्सी को ढूंढूं
कहां है साड़ी सितारों-जड़ी
सोनू दुलरुआ अभी रो के सोया
उसको दिलानी है पुस्तक
कहां तक तगादे करूं इनसे
छोड़ो
चलो आज तोडूं ये गुल्लक…।”

क्या तुम जानते हो – निर्मला पुतुल

“क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत
घर-प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन
के बारे में बता सकते हो तुम ।
बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता ।
क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ।
सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तो के कुरुक्षेत्र में
अपने…आपसे लड़ते ।
तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठे खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास
पढ़ा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ
शब्दो की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को ।
उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ो को अपने भीतर ।
क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा
अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में….।”

आज की ख़ुद्दार औरत -सुशीला टाकभौरे

“तुमने उघाड़ा है
हर बार औरत को
मर्दो
क्या हर्ज़ है
इस बार स्वयं वह
फेंक दे परिधानों को
और ललकारने लगे
तुम्हारी मर्दानगी को
किसमें हिम्मत है
जो उसे छू सकेगा?
पिंजरे में बन्द मैना को
क़िस्सागोई पाठ पढ़ाते रहे
लाज-शर्म का हिसाब लगाते रहे
तालाबन्दी का हक़ जताते रहे
जो तुमने पाया वह
तुम्हारा सामर्थ्य
नारी ने स्वयं कुछ किया
तो बेहयाई
अब बताओ
तुम्हेँ क्यों शर्म नहीं आयी?
गल चुकीं
बहुत मोमबत्तियाँ
आज
वह जंगल की आग है
बुझाए न बुझेगी
बन जाएगी
आग का दरिया
उसके नये तेवर पहचानो
श्रद्धा शर्म दया धर्म
किसमें खोजते हो?
सँभालो अपने
पुराने ज़ेवर
थान के थान
परिधान
आज ये ख़ुद्दार औरत
नंगेपन पर उतरकर
परमेश्वर को लजाएगी
पुरुष के सर्वस्व को नकारकर
उसे नीचा दिखाएगी!!”

दरवाज़ा – अनामिका

“मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ !
… और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।”

द्रौपदी – सुमन केशरी

“क्या परिचय दूं मैं अपना
द्रौपदी… पांचाली… कृष्णा… याज्ञसेनी…
सभी संज्ञाएं वस्तुतः विश्लेषण हैं
या सम्बन्ध-सूचक
कभी गौर किया है तुमने
मेरा कोई नाम नहीं
द्रोणाचार्य के अपमान का बदला चुकाने को
पिता को चाहिए था एक
योद्धा
और धृष्टद्युम्न के पीछे
यज्ञाग्नि से औचक ही निःसृत मैं
खुद ही प्रयोजन बनती रही
आजन्म
सुई की नोक बराबर भूमि न पानेवालों के
औरस
अब तक मुझ पर उंगली उठाते नहीं थकते कि
लाखों की मृत्यु का कारण मैं रही
और भी कई कहानियां
बुन ली हैं उन्होंने
महज़ इसलिए कि मैं कभी रोई नहीं…
गिड़गिड़ाई नहीं
न मां के सम्मुख जब उन्होंने मुझे बांट दिया
पांच बेटों में
और न
कुरूसभा में
जहां पांच-पांच पतियों के बावजूद
मैं अकेली पड़ गई
इतिहास गवाह है कि मैंने केवल
कुछ प्रश्न उठाए
कुछ शंकाएं और जिज्ञासाएं
और तुमने मुझे नाम ही से वंचित कर दिया!”

देह का जादू – जया जादवानी

“उगती है देह उसकी हथेली पर
वह मुट्ठी भींच लेती है
उगती है देह उसकी आंखों में
दिखता है लहराता लाल गुलाब
पौधा नहीं दिखता
कसकर मींच लेती है आंखें
चुभते हैं कांटे
झपक कर रोकती है आंसू
गुलाब भीतर खींच लेती है
उगती है देह
उसके बालों की महक में
उचक कर बैठ जाती है माथे पर
ढंकती है इधर तो
बौखलाया उधर दिखने लगता है
कस कर बांधती है चोटी
तो उसकी सलवटों में उगती है देह
देह कभी पीछे
कभी आगे उगती है
बार-बार उसे पीछे खींचती लड़की
हांफती है
पसीने से भीगते हैं वक्ष
देह उन पर उतराती है…!”

इस बार महिला दिवस – अनिता भारती

“इस बार महिला दिवस
समर्पित है उन बच्चियों के नाम
जिन्होंने जन्म लेने से पहले
दम तोड़ दिया कोख में
और उन बच्चियों के नाम भी
जो जन्म लेकर
भूखे मरने और सोने को मजबूर है
इस बार महिला दिवस
उन पत्नियों के नाम
जिसकी सिसकी निर्दयी पति के कान
तक कभी नहीं पहुंची
जो अपने नन्हें- नन्हें बालकों को लिए
रात-दिन नाप रही हैं सीढ़ियाँ
पिता-पति और भाई की
अदालत में…
यह महिला दिवस समर्पित है
उन वधुओं के नाम
जिन्हें बेवज़ह, बेकसूर
दहेज कुंड में झौंक दिया गया
आज एक नहीं अनेक शैतान खड़े हैं
उन्हें
इस अग्निकुंड में ओमस्वाहा
करने के लिए
इस बार का महिला दिवस
समर्पित है उन कुंआरी कन्याओं के नाम
जो अपनी पूरी ऊर्जा, प्रतिभा के साथ
अपने शरीर को घिस रही है
दो कौड़ियों के लिए
किसी कुमार के इन्तज़ार में बैठी
वरमाला लिये
कितने नगरसेठ बैठे हैं
उनका चाम-दाम
बेचने को तत्पर
इस बार का महिला दिवस
समर्पित है उन दलित स्त्रियों के नाम
जिनके स्वाभिमान को
कलंकित करने के लिए
कितने धर्मवीर बैठे हैं
जिनके साथ सिर के बल
मजबूती से खड़े हैं
लोकतंत्र के सारे खम्भे
इस बार का महिला दिवस समर्पित है
उन सभी के नाम
जो संघर्षरत
रात से बैठी हैं सुबह की तलाश में।”

परम्परा – राजी सेठ

“मैं स्त्री हूं
जानती हूं
मुझे बहुत-सा गुस्सा सहना पड़ा था
जो वस्तुतः मेरे लिए नहीं था
बहुत-सा अपमान
जिसे मुझ पर थूकता हुआ इंसान
पगलाए होने के बावजूद
मुझपर नहीं
कहीं और फेंकना चाहता था
यह तो संयोग ही था कि मैं सामने थी
पर मैं भी कहां मैं थी
मुझे तो कल ही उसने भींचा था
हांफते-हांफते
पराजित योद्धा की तरह थककर
मेरे वक्ष पर आन गिरा था
फुसफुसाया था तुम जो हो
मेरी धारयित्री
मेरा परित्राण
मेरी गत-आगत कथा…।”

धारणा – अलका सिन्हा

“तुम व्यर्थ ही कोशिश करती हो
अनदेखा कर देने की
भिंची मुट्ठियों का कसाव, कमानों का खिंचाव
सत्ता की कोख़ में
निरन्तर आकार ग्रहण करती विकृति
युगान्तर की पीड़ा…
तुम समझती क्यों नहीं
पीड़ा आंखों से देखने की वस्तु नहीं
थकाकर चूर-चूर कर देने का अहसास है
मैं मानती हूं कि आंखें मूंद लेने से
थकान का अहसास कुछ कम हो जाता है
पर यह मेरे-तुम्हारे बीच का संबंध नहीं
कि महज आंखें मूंद लेने से निभ जाएगा
खोल दो पट्टी अपनी आंखों से गांधारी
विश्वास मानो इसके बाद भी
तुम उतनी ही पतिव्रता रहोगी
तुम्हारे धर्म पर आंच भी न आएगी
आखिर हम भी तो बगैर पट्टी बांधे ही
निभाए जा रहे हैं अपना-अपना धर्म
धृतराष्ट्री सत्ता से
तुम व्यर्थ ही कोशिश करती हो
आंखें मूंद लेने की
अनदेखा कर देने की
खोल दो पट्टी अपनी आंखों से गांधारी
कि महज आंखें खोल देने से ही
व्यक्ति देख पाएगा
ऐसी तुम्हारी धारणा हो सकती है
सच्चाई नहीं!”

एक औरत की पुकार – मनीषा कुलश्रेष्ठ

“क्यों लगता है औरत को
कि
वह नहीं सुनता उसकी
सालों से
एक मोटी दीवार के
पीछे से
बतियाती रही है वह
बेवजह
या
जिसे वह पुकार कहती है
वह महज गूंज हो
आवारा सन्नाटों की
जिनसे वह दिन – दिन भर उलझी है
शायद वह नहीं जानती
कितना कानफाडू शोर है
घर से बाहर की दुनिया में
कितने प्रश्न गैरों के
कितनी कैफ़ियतें अपनों की
कितनी चीखें अजनबियों की
शायद पहुंचती ही न हो
उसकी वह धीमी सी पुकार
कानों में हमेशा के लिये
खिंच गई
शोर की मोटी दीवार के पार।”

औरतें – अंजना बख्शी

“औरतें –
मनाती हैं उत्सव
दीवाली, होली और छठ का
करती हैं घर भर में रोशनी
और बिखेर देती हैं कई रंगों में रंगी
खुशियों की मुस्कान
फिर, सूर्य देव से करती हैं
कामना पुत्र की लम्बी आयु के लिए।
औरतें –
मुस्कराती हैं
सास के ताने सुनकर
पति की डाँट खाकर
और पड़ोसियों के उलाहनों में भी।
औरतें –
अपनी गोल-गोल
आँखों में छिपा लेती हैं
दर्द के आँसू
हृदय में तारों-सी वेदना
और जिस्म पर पड़े
निशानों की लकीरें।
औरतें –
बना लेती हैं
अपने को गाय-सा
बँध जाने को किसी खूँटे से।
औरतें –
मनाती है उत्सव
मुर्हरम का हर रोज़
खाकर कोड़े
जीवन में अपने।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
रखकर करवाचौथ का व्रत
पति की लम्बी उम्र के लिए
और छटपटाती हैं रात भर
अपनी ही मुक्ति के लिए।
औरतें –
मनाती हैं उत्सव
बेटों के परदेस से
लौट आने पर
और खुद भेज दी जाती हैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में।”

ऐ लड़की – विपिन चौधरी

“तुम क्या पसंद करोगी
कहो
किसी सत्यवान की खातिर तपना पसंद करोगी
या सीता की तरह आग में उतरना चाहेगी
या कोई और ही रास्ता चाहने वाली हो?
पर ध्यान रहे पूरी मर्जी तुम्हारी नहीं
जिस भी रास्ते से तुम जाओगी
वह हमारी सलाहों मशवरों से होकर गुजरेगा
कई अल्पविराम पूर्णविराम होंगे तुम्हारे आगे-पीछे
तुम्हें हर पल परदे में रखा गया
तुम्हारे कदम लक्ष्मण-रेखा के भीतर ही रोके गए
इतनी धनी पहरेदारी पर भी
तुम्हारी आंखों ने उसे ही क्यों भेदा
जो तुम्हारी पहुंच से परे था
एक फंदा भी तैयार है यहां
यहां! इस तरफ
अपना सिर इसमें खुद डालोगी या
इसमें भी हमें हाथ बंटाना होगा
हमें पीसना आता है छोरी
धान भी इंसान भी
हमारे पास मूंछें नाक और सत्ता सब है
एक चुप हजार सुख हैं
सुन ले और हमारी हिदायतों के भीतर रह
यहीं तुम्हारी किस्मत होगी
पर उससे पहले
जरा इधर तो आ!”

पूरी की पूरी एक पेड़ बनना चाहती हूं – पूनम सिंह

“गहरी थकान और हताशा लिये
झुके कंधे गर्द भरे चेहरे पर
आहत उम्मीदों की लहूलुहान खरोंचे
आंखों के कोये में
समुद्री नमक का भहराता टीला
होठों पर मुर्दा चुप्पी लिये
लौट आये हैं पिता सपनों की शवयात्रा से
राख की बंध में लिथड़े
पिता के चेहरे की ओर
कैसी कातर
कितनी असहाय आंखों से देखती है मां
किस अतल से निकला है यह निःश्वास
जिसमें मौत सी ठंडक है
ओ मां! मैं कहां जाऊं
किस पाताल
कुएं में डूब मरूं बोलो
क्यों नहीं आती मुझे मौत
जब बेमौत मरते हैं इतने लोग
आता है भूचाल दरक जाती है धरती
औंधा गिर जाता है आसमान
नमक पानी के पारावार में
तिनके-सी बह जाती है ज़िन्दगी
तब ऐसा कोई सूनामी
मुझे क्यों नहीं बहा ले जाता…मां?
मैं हरगिज़ नहीं चाहती पिता की सांस में
फांस बनकर जीना
तुम्हारी छाती पर अडिग पहाड़ बनकर रहना
भाभी की आंखों में शूल की तरह चुभना
भाई की अनकही पीड़ा में
पतझड़ के उदास रंग की तरह दिखाना
लेकिन मैं क्या करूं मां
मेरे बस में नहीं है
यह सब न होना
कभी-कभी
इस धरती की ढहती दीवारों से लगकर खड़ी
मैं सोचती
क्या मुझे अपनी लड़ाई लड़े बिना
हार मान लेनी चाहिए
अपनी इच्छाओं अपने सपनों की पहरेदारी पर
कोई सवाल नहीं करना चाहिए
मां! मैं जानना चाहती हूं तुमसे
इस आंगन के उस पार
वह जो एक बहुत बड़ी दुनिया है
जीवन के समानान्तर
क्या उसे देखने का मुझे हक नहीं
बताओ मां
क्यों चढ़ी है आज भी इस घर की ड्योढ़ी पर
इतनी मज़बूत सांकल
जिसे हिलाते हुए
कटी डाल की तरह झूल जाती हैं मेरी बांहें
पस्त होता है मेरा हौसला
मां मैं तुम्हारी तरह
किसी जर्जर हवेली की बदरंग दीवारों पर
लतर बेल बनकर नहीं पसरना चाहती
मैं पीपल बरगद आम कटहल की तरह
पूरी की पूरी एक पेड़ बनना चाहती हूं
इच्छाधारी अस्तित्वधारी एक पेड़
तुम देख रही हो किस तरह
ठूंठ हो गए हैं आज पुरखों के लगाये सब पेड़
कब तक इनकी सूखी जड़ों में पानी देती तुम
अपने लगाये पेड़ों को निपात होते देखती रहोगी
बोला मां बोलो!”

स्त्रियाँ – आभा बोधिसत्त्व

स्त्रियाँ घरों में रह कर बदल रही हैं
पदवियाँ पीढी दर पीढी स्त्रियाँ बना रही हैं
उस्ताद फिर गुरु, अपने ही दो-चार बुझे-अनबुझे
शव्दों से ,
दे रही हैं ढाढ़स, बन रही हैं ढाल,
सदियों से सह रही हैं मान-अपमान घर और बाहर.
स्त्रियाँ बढा रही हैं मर्यादा कुल की ख़ुद अपनी ही
मर्यादा खोकर,
भागम-भाग में बराबरी कर जाने के लिये
दौड रही हैं पीछे-पीछे,
कहीं खो रही हैं
कहीं अपनापन,
कहीं सर्वस्व.”

मैं अहिल्या नहीं बनूंगी – अंजू शर्मा

“हाँ मेरा मन
आकर्षित है
उस दृष्टि के लिए,
जो उत्पन्न करती है
मेरे मन में
एक लुभावना कम्पन,
किन्तु
शापित नहीं होना है मुझे,
क्योंकि मैं नकारती हूँ
उस विवशता को
जहाँ सदियाँ गुजर जाती हैं
एक राम की प्रतीक्षा में,
इस बार मुझे सीखना है
फर्क
इन्द्र और गौतम की दृष्टि का
वाकिफ हूँ मैं शाप के दंश से
पाषाण से स्त्री बनने
की पीड़ा से,
लहू-लुहान हुए अस्तित्व को
सतर करने की प्रक्रिया से,
किसी दृष्टि में
सदानीरा सा बहता रस प्लावन
अदृश्य अनकहा नहीं है
मेरे लिए,
और मन जो भाग रहा है
बेलगाम घोड़े सा,
निहारता है उस
मृग मरीचिका को,
उसे थामती हूँ मैं
किसी हठी बालक सा
मांगता है चंद्रखिलौना,
क्यों नहीं मानता
कि आज किसी शाप की कामना
नहीं है मुझे
कामनाओं के पैराहन के
कोने को
गांठ लगा ली है
समझदारी की
जगा लिया है अपनी चेतना को
हाँ ये तय है
मैं अहिल्या नहीं बनूंगी!”

औरत के शरीर में लोहा – आकांक्षा पारे

“औरत लेती है लोहा हर रोज़
सड़क पर, बस में और हर जगह
पाए जाने वाले आशिकों से
उसका मन हो जाता है लोहे का
बचनी नहीं संवेदनाएँ
बड़े शहर की भाग-दौड़ के बीच
लोहे के चने चबाने जैसा है
दफ़्तर और घर के बीच का संतुलन
कर जाती है वह यह भी आसानी से
जैसे लोहे पर चढ़ाई जाती है सान
उसी तरह वह भी हमेशा
चढ़ी रहती है हाल पर
इतना लोहा होने के बावजूद
एक नन्ही किलकारी
तोड़ देती है दम
उसकी गुनगुनी कोख में
क्योंकि
डॉक्टर कहते हैं
ख़ून में लोहे की कमी थी।”

बुरी स्त्री – पूनम तुषामड़

“वह घूंघट नहीं काढ़ती
पुरुषों से करती हैं बातें
मिलाती है हाथ
नहीं शर्माती सकुचाती
जोर से हंसती है
तर्क करती है
हर बड़े-छोटे की आंखों में आंखें डाल
पुरुषों के साथ करती है काम
वह करती है बहस खुलेआम
स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर
एड्स पर
गर्भवस्था में उत्पन्न होने वाली
समस्याओं पर
सड़कों बसों ट्रेनों में
घूरती लपलपाई कुंठित भूखी
आकृतियों को सबक सिखाने को
रहती है तत्पर
मेरे पड़ोसियों की नज़र में
वह औरत बुरी है…!”

वह औरत – ज्योति चावला

“वह औरत अपनी लाल साड़ी के आँचल में
बटोर कर ले जा रही है कई फूल सफ़ेद
ऐसे जैसे बटोर कर ले जा रही हो
आसमान से अनगिनत तारे
इन तारों से रौशन करेगी सबसे पहले
वह अपने घर का मन्दिर
हाथों की ओट दे रख देगी एक तारा
मन्दिर के छोटे से दीप में
फिर इन तारों से जलाएगी
रात भर से उदास पड़ा अपना चूल्हा
उसके आँचल में बटोरे यही तारे
उजास भर देंगे फिर पूरे आँगन में
इस तरह, वह औरत
आज फिर
एक नई सुबह को जन्म देगी ।”

औरतें – स्नेहमयी चौधरी

“सारी औरतों ने
अपने-अपने घरों के दरवाजे़
तोड़ दिए हैं
पता नहीं
वे सबकी सब गलियों में भटक रही हैं
या
पक्की-चौड़ी सड़कों पर दौड़ रही हैं
या
चौराहों के चक्कर काट-काट कर
जहां से चली थीं
वहीं पहुंच रही हैं तितलियां।”

काला मुंह – पद्मा सचदेव

“मुझे तो किसी ने भी नहीं बताया कि
जीने की राह
गेहूं के खेत में से होकर जाती है
पर जैसे मां का दूध पीना मैंने
अपने आप सीख लिया
वैसे ही एक दिन
मैं घुटनियों चलती
गेहूं के खेत में जा पहुंची
गेहूं के साथ-साथ चने भी उगे हुए थे
मेरी मां ने
हरे-हरे चने गर्म राख में भूनकर
मुझे खाने को दिए
मैंने मुंह में चुभला कर
हंसते-हंसते फेंक दिए
अभी मेरे दांत भी नहीं आए थे
भुने हुए चनों से मेरा सारा मुंह
काला हो गया
काली लार टपकने लगी
मां ने तो मुझे यह नहीं बताया था
कि जब भी दो रोटियों की आशा में
कोई आगे बढ़ता है
उसका मुंह ज़रूर काला होता है!”

बिलकिस बानो से -उषा राय

“पतझड़ में केवल
पत्ते ही नहीं गिरते
गिरती है नफ़रत भी ।
पुरानी दीवारों से
केवल भित्तियाँ ही नहीं
झरती हैं साज़िशें भी
बुलन्दी से केवल
झाड़-फ़ानूस ही नहीं गिरते
गिरती हैं आस्थाएँ भी
इन सबमें डूब कर
इतिहास बदलता है
अपना रक्तरँजित पन्ना
सब कुछ भूलकर
एक सामान्य ज़िन्दगी
शुरू करना चाहती हो
बिलकिस, बिलकुल सही
यही कहना था मुझे तुमसे
कुनानपोशपुरा-कश्मीर की
मुस्लिम महिलाओं से भी
यही कहना था मुझे
कि अपमान कभी मत भूलना
दरकती दीवारों की भित्तियाँ
बताती हैं कि साज़िशों को सुनकर
दीवार छोड़ दिया था उन्होंने
पतझड़ की सूखी पत्तियाँ
बताती हैं कि किस तरह
की आग से सूख गई थीं वे
अपनी यातनाओं की बातें
ज़रूर बता देना और यह भी कि
कैसे चलीं थीं तुम काँच की किरचों पर
यह एक मुनासिब कार्रवाई है जो
चलती रहेगी इनके समानान्तर ।”

मैं रेत हूँ – अनामिका अनु

मैं रेत हूँ
तट पर पड़ी प्रतीक्षा करती
समुद्र को चारों तरफ़ से बाँहों में समेटे
भीग जाती हूँ
आती-जाती भावों की बारम्बार लहरों से
पर यह आवर्ती प्रक्रिया भर है
प्रेम जैसा है पर प्रेम नहीं
शायद प्रेम को बाँधना
और फिर साधना नामुमकिन है
मैं भीगती तो हूँ, पर उस इश्क़ को अवशोषित नहीं कर पाती
वह मेरे किसी कण के भीतर समा नहीं पाता
बस, बाहर ही लगा रहता है ।
फिर मुश्किल दौर की उस धूप में मैं छोड़ देती हूँ उसे
या वह उड़ जाता है मौक़ा देखकर पता नहीं
कहा न ये इश्क़ नहीं संसर्ग है
सम्पर्क है जो गाढ़े वक़्त में ख़त्म हो जाता है
चाहे कितना भी लम्बा और आनन्ददायक हो
समुद्र और बालू का वही चिरकालिक रिश्ता है
सम्पर्क, संसर्ग और काम इच्छा वाला
भीगते-भिगाते, सिमटते-बहाते
आती जाती भावों की लहरों वाला
नियमित, आवश्यक, पारम्परिक
ठीक वैसा ही, जैसा वि…”

उजाड़ – गीताश्री

 “सम्भावनाएँ बोती हथेलियाँ
अब उगाती हैं अन्धेरे
चारों ओर रेंगते हैं सन्देह के काले साए
जब गँवा चुकी सारा वैभव
भवन उजाड़ है
हारे हुए जुआरियों सी निहारती हूँ शून्य
बाँहें जाने कब हुईं निरस्त्र
तीर तूणीर विदा हुए
एक छोटी सुई भी डराती है
जो डूब कर आती है शक के नीले ज़हर में
वह सारी भीड़ विदा हो चुकी
जिन्हें लहकते सूरज से ताप खींचने की लत है
अन्दर टिमटिमाती रोशनी की लौ
उनके किसी काम की नहीं
मैं खोजती हूँ एक माचिस की डिबिया
जीवन अपनी ही क़ैद में
हर दिन सलाखों को थोड़ा और मज़बूत करता जाता है
ज़ंजीरें हर रोज़
थोड़ी और भारी हो आती हैं
हर पल एक चट्टान बेआवाज़ टूटती है
थोड़ा और”

कमाल की औरतें  – शैलजा पाठक

“अब गौरैया निशाने पर है
अचूक है तुम्हारा निशाना
तुम एक-एक कर मारना उसे
आखिरी गौरैया को मार कर
उसका पंख रखना निशानी
जब अकाल पड़ेगा
जब नदी सूख जाएगी
जब फसल काले पड़ जायेंगे
जब भर जाएगी तुम्हारे आंखों में रेत
ज़िन्दगी ख़त्म होने के पहले
अपनी काली माटी में रोप देना वो रखा हुआ पंख
उसी में भरी थी उड़ान
उसके घोंसले का पता
उसके बच्चे की भूख
वो धरती को मना लेगी
तुम्हें एक और बार जनेगी
और तुम बार-बार साधना निशाना
शिकारी हो तुम।”

फलक   –रंजीता  सिंह

“अपने दुःखों पर
हँसती हुई औरत
तीर सी आ चुभती  है
देवताओं के भाल  पर
और
इंसानों के कपाल पर
औरत को
सिखाये जाते हैं
संस्कार
दुःख में रोने के
उनके रोने से ही
समृद्ध होता है
हमारा समाज
दुःख में रोती औरत
दुलराई जाती है
चुप कराई जाती है
रोती हुई औरत का
दुःख हरने आते हैं
देवदूत, ऋषि-मुनि
और
दुनिया के
सारे भले लोग
पर
दुःख में हँसती हुई  औरत
पैदा करती है
बड़ा बवाल
दुःख में
हँसती हुई
औरत की हँसी होती  है
जैसे कोई बवंडर
या कोई चक्रवात
खंडित होती  हैं
आस्थायें
भग्न होता है दर्प
और
दुदुम्भी सी
उनकी हंँसी
आ गिरती है
किसी गाज सी
उन सभी कंधों पर
जो चाहे अनचाहे
उनके दुःख के कारक थे
दुःख में हँसती हुई औरत
काली सी विहँसती है
और
धर  देती  है  पांव
रिवाजों की छाती पर |”

रिक्त स्थान – रश्मि भारद्वाज

एक पुरुष ने लिखा दुख
और यह दुनिया भर के वंचितों की आवाज़ बन गया
एक स्त्री ने लिखा दुःख
यह उसका दिया एक उलाहना था
एक पुरुष लिखता है सुख
वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है
एक स्त्री ने लिखा सुख
यह उसका निजी प्रलाप था
एक पुरुष ने लिखा प्रेम
रची गई एक नयी परिभाषा
एक स्त्री ने लिखा प्रेम
लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे
एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ
ये सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं
एक स्त्री ने लिखा पुरुष
वह सीढियाँ बनाती थी
स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द
वे वहां उसकी देह की ज्यामितियां ख़ोजते रहे
उन्हें स्त्री से कविता नहीं चाहिए थी
वे बस कुछ रंगीन बिम्बों की तलाश में थे
भक्ति काल में मीरा लिख गयीं –
राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी…
1930 में महादेवी के शब्द थे –
विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना…
1990 में लिखती हैं अनामिका –
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों–
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!
2018 में यह पंक्तियाँ लिखते
मैं आपके लिए तहेदिल से चाहती हूँ
‘ग्रो अप
एन्ड मूव ऑन’
और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए
20 ….लिख कर रिक्त स्थान छोड़ती हूँ
उम्मीद करती हूँ कि अब कोई नयी बात लिखी जाए!”
 

नया सूरज- विमल किशोर

“धरती का कलेजा लाल है
और आँचल भी
लाल है माथे का सिंदूर
टिकली और बिन्दिया का रंग भी
हृदय से फूटती चिन्गारी का रंग लाल है
और लाल है सख्त चेहरे का रंग भी
लाल है दिये की लौ
और हमारा परचम भी
लाल है जलती हुई मशालों का रंग
हमें साफ साफ दिखता है इसमें
गोलबंद होते हुए लोग
बढ़ते हुए कदम
ढलती हुई रातें
क्षितिज पर फैलती भोर की लाली
चिड़ियों का चहचहाना
और अपनी सम्पूर्ण लालिमा के साथ
उदित होता हुआ
एक नया सूरज।”

 उदासियाँ -अनुपम सिंह

“शाम को जीती हूँ
तमाम उदासियाँ एक साथ
चौखट के पास बैठी माँ की उदासी
वह रोज़ शाम दिये में तेल डालती है
दिया जलाती है, कुछ बुदबुदाती हुई
आँचल को पसार देती है
अनजान दुआओं के लिए
एक लम्बी साँस भीतर भरती हुई
रसोई मे चली जाती है
स्कूल से लौटे बच्चे की उदासी
जिसकी अनुपस्थिति में पिता ने
भैस के पड़वे को बेच दिया
शाम होते ही भैस चिल्लाती है
छीमियों में उतर आता है गाढ़ा दूध
बच्चा दौड़ के उसे पिसान चलाता है
अपने हिस्से की सारी रोटियाँ
खिला देना चाहता है
सूइयों से मथकर जब
पिता दूध निकालते हैं
बच्चा आंखे बंद कर
छुप जाता है माँ के पीछे
फुनगी पर बैठी उस चिड़िया की उदासी
जो हर रात चली आती है
उसके लिए प्रेम
अपने लिए थोड़ी खुशी लिए
वह हर साल एक मौसम का इन्तज़ार करती है
कि अब तिनके बीनने
और घोसला बनाने का
समय आ गया है
आज बहेलिया और उस आदमकाय को
एक साथ देख लेती है
वह आदमकाय अपने को हरी-सूखी
दोनों लकड़ियों का शौकीन बताता है
उजाड़ हो रहे पहाड़ों
सूखती नदियों कि उदासी
जिसकी मेरे पास सिर्फ कल्पनाएँ
और कविताओं में पढ़ी
अलग–अलग छवियाँ हैं
कि जिसको मेरे गाँव की
खूब हँसने वाली लड़की ने
नहीं देखा है।”
संकलन-नीरज कुमार मिश्र

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