विकास के नाम पर तोड़ दिया मजदूरों का ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय”

178
1452

 विशद कुमार  

 3 दशक से एक दलित परशुराम राम द्वारा खड़ा किया गया सपना ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” को प्रशासनिक अमला द्वारा बड़ी बेरहमी से बोकारो हवाई पट्टी की विस्तारीकरण के नाम पर पिछले 30 अगस्त को तोड़ दिया गया। आदिवासी, दलित व मजदूरों के बच्चों को शिक्षित करने के सपनों के साथ परशुराम राम ने शुरू किया था यह विद्यालय, जिसने खुद कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था। तिनका तिनका से जोड़ कर तैयार हुआ ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” एक झटके में बिखर गया। जो सरकारें बिरसा और अम्बेदकर की विरासत को संभालने के लिए करोड़ों खर्च करती रही हैं, उसी के करिंदों को इस विद्यालय की दीवारों पर न तो बिरसा की तस्वीर दिखी न ही अम्बेदकर की तस्वीर। सबसे अहम बात यह है कि हवाई पट्टी की विस्तारीकरण के नाम पर की गई तोड़—फोड़ के बाद विस्तारीकरण की योजना रोक दी गई है। इस तोड़—फोड़ के शिकार ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” के साथ—साथ इस क्षेत्र के लगभग 300 परिवार हुए हैं, सभी ओबीसी, दलित व आदिवासी समुदाय के लोग हैं जो पिछले 40—50 वर्षों से यहां बसे हुए हैं। ये 300 परिवार अब बड़ी मुश्किल से इस टूटे झापड़ों में रह रहे हैं, वहीं इस विद्यालय में पढ़ रहे बच्चों के लिए एक बड़ा संकट पैदा हो गया है। वैसे लॉकडाउन के पहले बच्चे बाहर ही पढ़ रहे थे, अब वे छुट्टी पर हैं। वहीं परशुराम राम का परिवार तिरपाल के नीचे गुजर कर रहा है। लॉकडाउन काल में कुछ समर्थ लोग जो परशुराम के इस काम से प्रभावित थे, वे उनकी मदद किया है।

उल्लेखनीय है कि परशुराम की संस्था ‘जन कल्याण सामाजिक संस्था’ जो संस्था सोसाईटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 21.1860 के तहत का निबंधित है, जिसका निबंधन संख्या—320/06—07 है। जिसमें निबंधित कार्यालय का पता झोपड़ी पट्टी सेक्टर—12/ए लिखा हुआ है। जो चीख चीख कर इस बात की ताकीद कर रहा है कि जहां परशुराम राम की झोपड़ी है जिसमें विद्यालय चल रहा है, वह अवैध नहीं है। तो क्या अवैध परशुराम का दलित होना है? कई सवाल हैं जिसका जवाब परशुराम तलाश रहे हैं।

”बिरसा मुंडा नि:शुल्क विद्यालय” की कहानी कुछ इस प्रकार है।

60 के दशक में झारखंड (तत्कालीन बिहार) के बोकारो में जब इस्पात संयंत्र की नीव पड़ रही थी, तब देश के कई भागों से लोग रोजगार की संभावना के मद्देनजर बोकारो (तत्कालीन माराफारी) आए। उसी दरम्यान उत्तरी बिहार, संताल, कोल्हान, छोटानागपुर आदि क्षेत्रों से आदिवासी—दलित व पिछड़े वर्ग के लोग भी उक्त संभावना को लेकर आए और उन्होंने खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर अपना बसेरा बनाया। इस्पात संयंत्र के साथ—साथ शहरीकरण का भी विकास शुरू होने लगा। शहर में दुंदीबाद नाम का एक बड़ा बाजार विकसित हुआ जो सरकारी जमीन पर ही बसता गया। इसके आस—पास की सरकारी जमीनों पर रोजगार की तलाश में आए आदिवासी—दलित व पिछड़े वर्ग के लोग भी बसते गए।

इन्हीं लोगों के बीच बिहार के सिवान में जन्मे परशुराम राम राेजगार के लिए 1970 के दशक में बोकारो आये। राजमिस्त्री के साथ हेल्पर का काम करते करते अंतत: परशुराम ने राजमिस्त्री का काम सिख लिया। अस्सी का दशक आते-आते वे राजमिस्त्री का काम करने लगे थे। वर्ष 1985 में बड़े भाई की मौत के बाद भाभी को जीवनसंगिनी बना लिया।

बताना जरूरी होगा कि मजदूरी करने वाले मजदूरों में महिला मजदूरों की संख्या अधिक होती थी, जिसे रेजा कहा जाता था। लगभग मजदूर आदवासी व दलित वर्ग के थे। न तो ये लोग पढ़े—लिखे थे और न ही इनमें अपने बच्चों को पढ़ाने की कोई उत्सुकता थी। अत: ये लोग अपने साथ अपने बच्चों को भी साथ लाते थे और अपने साथ काम करवाते थे, जिसे देख परशुराम राम को काफी नागवार गुजरता था। शायद यही वजह रही कि परशुराम राम ने जब दलित, आदिवासी मजदूर के बच्चों को भी अपने मां-बाप के साथ काम करते देखा, तो उनके मन में एक टीस के साथ सवाल उभरा कि ‘क्या ये बच्चे भी मजदूर ही बनेंगे?’ यह सवाल बराबर उनका पीछा करता रहा और वे अंदर ही अंदर इस सवाल से उत्पन्न समस्या का समाधान ढूंढते रहे। अंतत: एक दिन समाधान मिला, मिला नहीं बल्कि सुझा। उन्होंने उन नौजवानों से जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर अपनी जीविका भी चलाते थे, को अपने भीतर की टीस के साथ उभरे सवाल से परिचय कराया। तब शुरू हुआ मजदूरों के बच्चों को शिक्षित करने का परशुराम का मिशन। वे शिक्षित नौजवान मजदूर के बच्चों को पढ़ाने को तैयार हो गए। बदले में परशुराम ने उन्हें अपनी मजदूरी से मिले पैसा भी देते रहे।

बिहार के सिवान जिला अंतर्गत आंदर थाना का खटईला गांव के एक दलित परिवार मुखदेव राम घर में परशुराम राम का जन्म 1952 में  हुआ है। बता दें कि तत्कलीन सामाजिक व्यवस्था के कारण जाति के चमार परिवार में जन्मे परशुराम को स्कूली शिक्षा नसीब नहीं हो पायी। खेलते-कूदते कब जवान हो गए पता ही नहीं चला। मगर जब पारिवारिक स्तर से यह एहसास कराया गया कि उन्हें कमाना होगा, तब वे 1972 में रोजी-रोटी की तलाश में बोकारो आए तो यहीं के होकर रह गए। खुद के अनपढ़ होने की उनकी मजदूर के बच्चों को देखकर और बढ़ गई थी। यही वजह रही कि वे अपनी कमाई का कुछ हिस्सा मजदूरों के बच्चों पर खर्च करने लगे थे।

नब्बे के दशक में उन्हें लगा कि उनके प्रयास से मजदूरों के बच्चे केवल साक्षर भर हो रहे हैं। उन्हें जब स्कूल की पढ़ाई और वैसी पढ़ाई का फर्क समझ में आया, तब उन्होंने 1992 में बोकारो के सेक्टर 12-ए स्थित हवाई अड्डा की बाउंड्री के पीछे एक झोपड़ी बनाकर विधिवत रूप से ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” की शुरूआत की। मात्र 15 बच्चों से शुरू हुआ इस विद्यालय में अगस्त 2019 के पहले तब लगभग 150 बच्चे थे। जबकि इस विद्यालय से मात्र 3-4 सौ मीटर की दूरी पर एक सरकारी विद्यालय भी है, जहां मध्याह्न भोजन की व्यवस्था है। इस दो दशक के बीच कई बच्चों ने यहां की निचली क्लास की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा पाकर सरकारी नौकरियां भी कर रहे हैं।

परशुराम राम के इस मिशन में उनकी पत्नी पाना देवी का बड़ा सहयोग रहा है। वे धाई (प्रसव कराना) का काम करके परिवार का भरण-पोषण करतीं रहीं और परशुराम अपनी मजदूरी के पैसों को इन मजदूर के बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते रहे। परशुराम के चार बच्चे हैं दो लड़का और दो लड़की। दोनों लड़की की शादी हो गई है, जबकि दोनों लड़के अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बिरसा विद्यालय में भी पढ़ाते हैं और बाहर के बच्चों को ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर अपना खर्च वहन करते हैं।

स्कूल चलाने के लिए कुछ लोगों की सलाह पर परशुराम राम ने 2006 में संस्था सोसाईटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 21.1860 के तहत ‘जन कल्याण सामाजिक संस्था’ का निबंधन कराया, जिसका निबंधन संख्या—320/06—07 है। जिसमें निबंधित कार्यालय का पता झोपड़ी पट्टी सेक्टर—12/ए लिखा हुआ है। लेकिन आजतक उनकी इस संस्था को किसी भी तरह का सरकारी अनुदान नहीं मिला है। इस बाबत परशुराम बताते हैं कि ”एक बार कुछ सुधि लोगों के कहने से मैं बोकारो के डीसी से मुलकात कर विद्यालय में सहयोग करने की मांग की थी, उन्होंने अनुशंसा भी कर दी थी, मगर आफिस में फाइल को आगे बढ़ाने के लिये पैसों की मांग की गई। मैंने इंकार कर दिया और उसके बाद कभी भी प्रयास नहीं किया, क्योंकि मुझे एहसास हो गया कि इस भ्रष्ट सिस्टम में बिना समझौता किए कुछ नहीं हो सकता है। अत: मैंने समाज के लोगों पर ही भरोसा किया है और मेरा भरोसा आज भी बरकरार है।”

बता दें कि परशुराम राम ने इन दलित, आदिवासी मजदूरों के बच्चों की निर्बाध पढ़ाई के लिये समाज के लोगों से सहयोग मांगना शरू किया। कुछ लोग कतराए तो कुछ ने दिल खोल कर परशुराम की मदद की। ऐसे लोगों ने स्कूल के बच्चों के लिए ड्रेस, कापी-किताब, बैंच-डेस्क, कुर्सी आदि की व्यवस्था की। कुछ ने बच्चों के लिए खिचड़ी की भी व्यवस्था की। परशुराम राम के समर्पण को देखकर 2003 में भारतीय स्टेट बैंक की बोकारो सेक्टर-4 शाखा ने बच्चों की पढ़ाई के लिए सारी सुविधा उपलब्ध कराई। बैंक ने आठ लड़कियों को गोद लेकर उनके ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई का जिम्मा लिया था। वहीं 1997-98 में बोकारो के रितुडीह स्थित मामा होटल के संचालक रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ने बच्चों के लिए स्कूल ड्रेस एवं उनके लिए सप्ताह में एक दिन खिचड़ी की व्यवस्था दी थी।

बताते चले कि इस विद्यालय में अगस्त 2019 के पहले तब लगभग 150 बच्चे थे।

क्योंकि पिछले 30 अगस्त को विद्यालय के पीछे अवस्थित हवाई पट्टी के विस्तारीकरण के नाम पर बिरसा मुंडा नि:शुल्क विद्यालय को तोड़ दिया गया। मजे की बात तो यह है की इस तोड़ फोड़ के बाद विस्तारीकरण की योजना भी रोक दी गई। इस तोड़ फोड़ के शिकार इस क्षेत्र के लगभग 300 परिवार हुए हैं, सभी ओबीसी, दलित व आदिवासी समुदाय के हैं जो पिछले 40—50 वर्षों से यहां बसे हुए हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here