भाजपा के पक्ष में मतदान करने वाली जनता नासमझ कैसे हुई?

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जीएसटी काउंसिल ने बहुत से मालों पर दरें बढा दीं, और बहुतों पर छूट घटा दी, जो बढाना ही हुआ। और बहुत सी बढानी हैं पर एक साथ करना ठीक नहीं समझा गया, अतः उन्हें अगली बैठकों के लिए टाल दिया गया। अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढता रहेगा।
खैर, हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार जुलाई 2017 से जीएसटी काउंसिल का हरेक, हर एक, फैसला पूर्ण सहमति से हुआ है, सिर्फ एक अपवाद था लॉटरी पर जीएसटी की दरों को लेकर जिस पर सहमति नहीं बन पाई थी। कौन से राज्य लॉटरी चलाते हैं देखने से पता चल जायेगा कि असहमति किसकी थी।
विपक्ष? दोष जनता को दिया जाता है चुनावी राजनीति में कि वह मूर्ख है असंतोष के बावजूद भी विपक्ष को वोट नहीं देती। पर पूंजीवाद परस्त नीतियों का विपक्ष कहां है? ‘विपक्ष’ को भी राजनीति तो वही करनी है धर्म वगैरह की, और उसमें जो सबसे आगे व कुशल है उसे ही वोट मिले तो इसमें जनता की मूर्खता का सवाल कहां खडा होता है?
पर इससे भी बडी बात यह है कि अगर पूंजीवादी व्यवस्था में ही सरकार चलानी है तो कोई पार्टी इससे अलग नीति ले भी कैसे सकती है? वो खुद को दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी, वामपंथी कुछ भी कहती रहे। लेकिन एक ही नीति पर सबको चलना है तो जिसकी प्रस्तुति सबसे निपुण व जोरदार है अर्थात जिसके पास ऐसा करने के लिए सबसे अधिक संसाधन है (क्योंकि पूंजीपति वर्ग ने उसको अपना नुमाइंदा चुना है) अगर जनता उसी को स्वीकृति प्रदान करती है तो इसमें जनता की मूर्खता का सवाल कहां खडा होता है? बुर्जुआ चुनावी राजनीति में पूंजीपति वर्ग द्वारा चुनी गई पार्टी के ही हमेशा विजयी होने के ठोस वस्तुगत कारण हैं।
इन नीतियों को चुनौती देने के लिए तो कहना पडेगा कि यह व्यवस्था बदलनी पडेगी। मगर यह कहकर आप चुनाव नहीं लड सकते – रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट वाला कानून पढ लें। राजनीतिक दल के चुनाव आयोग में पंजीकरण के लिए उसके संविधान में यह लिखा होना जरूरी है कि उसे भारतीय संविधान में पूर्ण आस्था है। चुनाव उम्मीदवार को नामांकन के वक्त ऐसी शपथ लेनी होती है। झूठी शपथ लेकर प्रचार के लिए चुनाव लडा जा सकता है, लडने में ऐतराज भी नहीं है पर यह तभी तक मुमकिन है जब तक ऐसा करने वाले व्यवस्था को वास्तविक चुनौती देने में अक्षम हैं।
अभी तो बडे बडे जनतंत्र माने जाने वाले विकसित पूंजीवादी देशों की स्थिति भी यह है कि व्यवस्था परिवर्तन की सोचने तक न वाले, पूंजीवाद में ही कुछ राहत देने की नीतियों वाले कोर्बिन व मेलेंशों जैसों के चुनाव में थोडी मजबूती की स्थिति में आते ही फौज व पुलिस की ओर से चेतावनी जारी होने लगती हैं कि अगर ये सत्ता में आये तो इनके आदेश मानने से इंकार कर देंगे। जेरेमी कोर्बिन ब्रिटिश लेबर पार्टी का नेता था। मेलेंशों फ्रांस में वाम गठजोड़ का नेता है।
पर चुनाव के जरिए परिवर्तन की बात से मेहनतकश जनता उत्साहित नहीं होती यह कहना कुछ साथियों की नजर में जनता को मूर्ख समझना है। मैं कहता हूं कि जनता को मूर्ख वो समझ रहे हैं जो सोचते हैं कि मेहनतकश लोग यह बात नहीं समझते। ठीक है, वे बडी बौद्धिक बहसें नहीं करते, उनके पास वक्त भी कहां है, पर मेहनतकश जनता की भी अपने जिंदगी के तजुर्बे आधारित एक स्वतः स्फूर्त चेतना है, जिससे उसे मालूम है कि चुनावी राजनीति का कुल जमा नतीजा क्या है। अगर उससे वह व्यवस्था परिवर्तन जैसी आशा नहीं रखती तो वह मूर्ख नहीं समझदार है।
मुकेश त्यागी

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