झारखंड में लगातार भूख से हो रही मौतः कारण, जिम्मेदार और समाधान

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झारखंड की परिस्थिति को देखते हुए यह बेहद जरूरी है कि हम इसपर बात करें और समाधान निकालें कि आखिर वह क्या कारण है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरा-पूरा राज्य भूख की कगार पर खड़ा है। इसी विषय को लेते हुए झारखंड के स्वतंत्र व जनपक्षधर पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने अपने फेसबुक पेज से 23 मई 2020 को झारखंड में लगातार भूख से हो रही मौत-कारण, जिम्मेदार व समाधान पर यह वक्तव्य रखा, जिसे शब्दों में हूबहू यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रस्तुतिः
इलिका प्रिय
तमाम दोस्तों को इंकलाबी सलाम,
साथियों,
जैसा कि आप जान रहे हैं, आज का विषय है भूख से होने वाली मौत का कारण, जिम्मेदार और समाधान। मैं इस चर्चा की शुरूआत बाबा नार्गाजुन की एक कविता के जरिये कर रहा हूं, जो उन्होंने भूख से होनेवाली मौत पर ही लिखी थी। इस कविता का शीर्षक है-
वह तो था बीमार
मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार,
लिखवा लेगा घर वालों से, वह तो था बीमार,
अगर भूख की बातों से तुम कर न सके इंकार
फिर तो खाएंगे घरवाले हाकिम की फटकार
ले भागेगी जीप लाश को सात समुंदर पार
अंग-अंग की चीरफाड़ होगी फिर बारम्बार
मरी भूख को मारेंगे फिर सर्जन के औजार
जो चाहे लिखवा लेगी डाॅक्टर से सरकार
जिलाधीश ही कहलाएंगे करूणा के अवतार
अंदर से धिक्कार उठेगी बाहर से हुंकार
मंत्री लेकिन सुना करेंगे अपनी जय जयकार
सौ का खाना खाएंगे पर लेंगे नहीं डकार
मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार,
लिखवा लेगा घर वालों से वह तो था बीमार,
दोस्तों,
बाबा नागार्जुन ने यह कविता आज से लगभग पचास-साठ साल पहले लिखी थी। और आज की परिस्थिति में जब हम झारखंड में लगातार भूख से हो रही मौत पर चर्चा कर रहे हैं, तब हम देखते हैं कि बाबा नागार्जुन के द्वारा आज से 50-60 साल पहले लिखी गयी बातें हूबहू झारखंड पर लागू हो रही है। आज के अखबारों में फिर न्यूज छपी है, देवघर के मोहनपुर थानांतर्गत एक गांव में 20 मई की रात को सुधीर सोरेन नामक 40 वर्षीय आदिवासी युवक भूख से मर जाता है। उनकी पत्नी जियामुनी मुर्मू का कहना है कि मेरे घर में दो दिन से खाना नहीं बना था, लेकिन आज के अखबारों में छपी है रिपोर्ट कि वह बीमार था। उनकी मौत भूख से नहीं बल्कि बीमारी से हुई है।
बाबा नागार्जुन जो आज से 50-60 साल पहले कह रहे हैं, मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार, लिखवालेगा घर वालों से वह तो था बीमार, यही झारखंड के अंदर भी चल रहा है।

झारखंड में भूख से मौत

आप जानते हैं कि झारखंड के अंदर 27 दिसंबर से पहले भाजपा की सरकार थी। भाजपा-आजसू की सरकार थी, जिसमें मुख्यमंत्री रघुवर दास हुआ करते थे। उस सरकार के कार्यकाल के दौरान भी झारखंड के अंदर 22 मौतें भूख से रिपोर्ट की गयी थी। जिसपर जांच कमिटी भी बैठी थी और उसपर आज जो झारखंड के मुख्यमंत्री है, हेमंत सोरेन और जब वे विपक्ष में थे और वे लगातार इस चीज को उठा रहे थे कि यह मौतें भूख से हो रही हंै। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब झारखंड में 27 सितंबर को हेमंत सोरेन ने सत्ता संभाली थी और उसके बाद जब विधानसभा का सत्र शुरू हुआ, तो 5 मार्च को सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के विधायक विनोद सिंह ने विधानसभा में सवाल उठाया, कि पिछली सरकार के दौरान काफी मौंते भूख से हुई थी। उसकी जांच रिपोर्ट क्या कहती है?
भूख से हुई मौतों पर खाद्य मंत्री का जवाब
खाद्य सार्वजनिक वितरण व उपभोक्ता मामले के मंत्री डाॅक्टर रामेश्वर उरांव ने विधानसभा में विनोद सिंह को जवाब देते हुए कहा कि एक भी मौंते भूख से नहीं हुई है।
मतलब कि आज से पहले जब जेएमएम, कांग्रेस विपक्ष में थी, तो उस समय लगातार ये हल्ला कर रहे थे कि रघुवर दास के शासन में भूख से मौंते हो रही है। यहां तक कि आपको याद होगा अक्टूबर 2017 में सिमडेगा की संतोषी जो 11 साल की थी, जब भूख से मर गयी थी, तो पूरे देश में उस मामले ने काफी तूल पकड़ा था। काफी लोगों ने आवाजें उठाई थी। यहां तक कि जो दिसंबर विधानसभा का चुनाव हुआ था झारखंड के अंदर, उस चुनाव में भी हेमंत सोरेन ने इस मामले को काफी उछाला, इस चीज पर लोगों से वोट मांगे कि हम अपनी सरकार में लोगों को भूख से मरने नहीं देंगे। और आप चाहते हैं कि और संतोषी की मौत न हो तो हमें वोट दीजिए, हमें जीताइये, हम सरकार बनाएंगे और झारखंड में भूख से हो रही मौत पर पूरी तरह से लगाम लगाएंगे, लेकिन वे जैसे ही सरकार में आते हैं, तो उनके जो खाद्य मंत्री है, रामेश्वर उरांव वे तुरंत कहते हैं, कि पिछली सरकार में भी कोई भूख से मौत नहीं हुई है। ये 5 मार्च की तारीख को बोलते हैं और अगले ही दिन 6 मार्च को बोकारो जिला के कसमार थाना के करमा शंकरडीह गांव के भूखल घासी की भूख से मौत हो जाती है।
जिस दिन भूखल घासी की भूख से मौत होती है, उसी दिन विधानसभा में हेमंत सोरेन पूरे मंत्रिमंडल के साथ होली खेलने में व्यस्त रहते हैं। बाद में बातें पता चलती है, अखबारों मंे, मीडिया में मामला छाता है और फिर इसकी जांच की बात होती है। लेकिन जांच होने से पहले ही ये लोग कह देते हैं कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है, ये बीमार थे, बीमारी की वजह से इनकी मौत हुई है।
मौतें भूख से या बीमारी से?
दोस्तों,
पिछली सरकार में 22 मौतें 5 साल के कार्यकाल के दौरान हुई, लेकिन हेमंत सोरेन के कार्यकाल में 27 दिसंबर 2019 के बाद से 20 मई 2020 तक में दस मौतें भूख से हो चुकी है। इस रेसियो से अगर जोड़ा जाये, तो इन पांच महीने में आपके कार्यकाल में महोदय दस लोगों की मौत भूख से होती है, तो फिर आने वाले अगले पांच सालों में कितनी मौतें भूख से होगी। लेकिन इन तमाम मौतों को हेमंत सोरेन की सरकर ने जैसे पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान भी हुई भूख से मौत को बीमारी से मौत करार दे दिया, उसी तरह ये दस मौंते भी जो हुई हैं, उन मौतों को भी उसने बीमारी से हुआ करार दे दिया। सभी को बताया गया, किसी को टीवी थी, किसी को कोई बीमारी थी, बीमारी से ही मौत हुई है। लेकिन तमाम मौतों में उनके परिजनों का यही कहना था कि ‘‘नहीं! इनकी मौते भूख से हुई हैं, दो दिन, चार दिन से चूल्हा नहीं जला था।’’ किसी के घर में दो दिनों से चूल्हा नहीं जला था, किसी के घर में चार दिनोें से नहीं जला था।
भूख से मरे दस लोगों की लिस्ट
दोस्तों,
मैं उन सबका नाम गिनाना चाहता हूं, जिन दस लोगों की मौतें भूख से हुई है? फिर हमलोग बात करेंगे किस तरह से उन्हें बीमारी से मौतें बता देते है।
झारखंड के अंदर एक गढ़वा जिला है, गढ़वा जिला में रामप्रीत भुईयां और शांति देवी की मौतें भूख से हुई है। इनके परिजनों का कहना था, इनकी मौते भूख से हुई है। बोकारो के भूखल घासी की मौत 6 मार्च 2020 को भूख से होती है, उनकी पत्नी ने लगातार कहा कि हमारे पति की मौत भूख से हुई है। उसके बाद रामगढ़ की उपासी देवी की मौत 1 अप्रैल को होती है, जो 72 वर्षीय थी, उसके पुत्र जोगन नायक ने कहा कि मेरी मां की मौत भूख से हुई है, दो दिनों से घर में खाना नहीं था। उनके पास राशन कार्ड नहीं था। 2 अप्रैल को ही गढ़वा की 70 साल की सुमरिया देवी की मौत भूख से होती है। उनके पति लच्छू लोहरा बताते हैं कि मेरी पत्नी की मौत भूख से हुई है। उसके बाद बोकारो की मीना मरांडी, जगलाल मांझी की मौत भी भूख से होती है। सरायकेला-खरसांवा मे ं20 अप्रैल को शिवचरण नाम के व्यक्ति की मौत होती है, उसकी मौत भी भूख से होती है। उनके परिजन कहते हैं कि मेरे शिवचरण की मौत भूख से हुई है। उसके बाद 16 मई को एक 5 वर्षीय बच्ची निमनी की मौत लातेहार के मनिका प्रखंड में भूख से ही होती है और अभी फिर 20 मई को देवघर जिला के मोहनपुर थानांतर्गत गांव में सुधीर सोरेन की भूख से मौत होती है।
ये दस भूख से मौतों का मामला सामने आया है। अभी हाल-फिलहाल जब 16 मई को पांच वर्षीय निमनी कुमारी की मौत भूख से हुई, तो बहुत सारा बवाल मचा उसपर। लाॅकडाउन के दौरान भी तमाम लोगांेे ने चाहे बीबीसी हो, द वायर हो, न्यूजक्लिक हो, मीडिया विजिल हो, गांव कनेक्शन हो, हस्तक्षेप हो, हमारा मोर्चा हो, बहुत सारे जगहों पर रिर्पोटें छपी।
भूख से मौत की पड़ताल व सरकार का सफेद झूठ
मैं एक घटना का पूरा जिक्र करूंगा, ये किस तरह से भूख से हुई मौत को पूरा का पूरा झूठ बोलकर बीमारी से मौत बता देते हैं। दोस्तों, निमनी कुमारी के पिता का नाम है जगलाल भुइयां, उनकी मां कलावती देवी। जगलाल भुईंया ईंट मजदूर है, लातेहार र्के इंट भट्ठा में मजदूरी करता है। इस लाॅकडाउन में काम बंद हो गया था, फिर भी किसी तरह वे दोबारा काम पर गये। जगलाल भुंईया को आठ बच्चे थे, उसमें एक 5 वर्षीय निमनी कुमारी भी थी। निमनी की मां कलावती देवी का कहना है कि दो दिनों से हमारे घर में खाना नहीं बना है। वह 16 मई को तालाब में नहाने जाती है और वहां से जब नहाकर आती है, तबीयत खराब होता है और फिर वह मर जाती है। उनकी मां का कहना है कि मेरी बेटी की मौत भूख से हुई।
यह मामला गर्म होता है, अखबारों में छपता है। रातों-रात उसके घर में बीडीयो पहुंचते हैं, सीओ पहुंचते हैं। उनके घर में अनाज, पैसे वगैरह-वगैरह देकर उनके मुंह को चुप कराने की कोशिश होती है। 17 मई को पूरी पुलिस की फौज पलटन लेकर वहां पहुंचती है, पूरे गांव में पुलिस का पहरा होता है। फिर जब भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े हुए लोग जिसमें कि प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज भी हैं, 18 मई को वहां पहुंचते हैं और भी लोग वहां पहुंचते हैं और रिपोर्टें सामने आने लगती है, तो वहां के जो डीसी है जीशान कमर। जब उनसे पूछा जाता है, पत्रकार लोग पूछते हैं, तो बोलते हैं, ये भूख से मौत नहीं है। प्रथम दृष्टया यही कहा जा सकता है कि यह भूख से मौत नहीं है।
क्यों? तो वह बोलते है कि डाॅक्यूमेंटेड है कि इसके परिवार को कुछ दिन पहले ही राशन दिया गया था। यह कहना है, वहां के डीसी जीशान कमर का, उनसे जब पत्रकार पूछते हैं किसने दिया? आखिर कहां डाॅक्यूमेंट है? तो वे एक शिक्षक का नाम बोलते हैं। एक शिक्षक है, वहां पारा शिक्षक जुगलप्रसाद गुप्ता उसी ने उन्हें राशन पहुंचाया था, डाॅक्यूमेंटेड है इसलिए भूख से मौत नहीं हो सकती है। जब पत्रकार जुगलप्रसाद गुप्ता के पास पहुंचते हैं, जब उनसे पूछा जाता है तो वे जो कहते हैं, वह आपके लिए बहुत आश्यर्चजनक बात होगी। डीसी बोलता है कि चार दिन पहले उनके घर में राशन पहुंचाया गया और जिस शिक्षक का नाम बोलते हैं, वह शिक्षक बता रहा है कि मैंने 17 मार्च को 5 किलो चावल दिया है और उसके बाद 23 अप्रैल को एक किलो चावल और 110 रूपये उसके परिवार को दिया है। यानी सीधा झूठ। जिस टीचर का नाम वे बोल रहे हैं, उन्होंने लगभग एक महीने पहले 110 रूपये और 1 किलो चावल दिया है। सोच लीजिए जिसके घर में आठ बच्चे हो, एक मां हो, नौ लोग हो, वहां एक किलो चावल 110 रूपये आप किस मुंह से दे रहे हैं?
सरकार की घोषणाएं
जब लाॅकडाउन शुरू हुआ तो हेमंत सोरेन ने घोषणा किया कि मैं झारखंड के अंदर एक भी मौत भूख से नहीं होने दूंगा। यहां पर जो 58 लाख राशन कार्डधारी है और 7 लाख लोग जिन्होंने राशन कार्ड के लिए अप्लाई किया है, मैं उनको भी दस-दस किलो प्रति व्यक्ति चावल दूंगा। निमनी के परिवार को भी राशन कार्ड नहीं था, उसके मां-बाप को राशन कार्ड नहीं मिला था और सरकार ने जो घोषणा की थी राशन कार्ड नहीं रहने पर भी उसको अनाज मिलेगा, लेकिन वो अनाज भी उन तक नहीं पहुंचा। आखिर क्यों नहीं पहुंचा?
इसी तरह से जितनी भी मौतें हुई है चाहे वह उपासी देवी की मौत हो, सुमरिया देवी को मौत हो, भूखल घासी की मौत हो, या शिवचरण की मौत हो। लगभग मौतों में एक बात काॅमन रूप से सामने आई है कि सरकार ने जिस तथाकथित जनकल्याण योजनाओं की घोषणा कर रखी है, लगातार उसके नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों की लूट हो रही है। वे जो जरूरतमंद है, वास्तविक में उन तक नहीं पहुंच पा रही है। और इसलिए भूख से उनकी मौतें हो रही है।
दोस्तों
अब सोचिये अगर वे भूख से मौतें नहीं थी, पांच वर्षीय बच्ची निमनी कुमारी की भूख से मौत हुई नहीं थी, तो फिर रातोंरात वहां बीडीओ-सीओ और दूसरे ही दिन पूरी पुलिस पलटन का वहां घेरा डालने का क्या औचित्य था? मैं पूछना चाहता हूं वहां के डीसी से, मैं पूछना चाहता हूं मुख्यमंत्री से।
और यहां के खाद्य मंत्री रामेश्वर उरांव जो आदिवासी समुदाय से ही आते हैं बहुत बेशर्मी के साथ कहते हैं कि प्रथम दृष्टया यही जान पड़ रहा है कि निमनी की मौत भूख से नहीं हुई है।
भूख से मौत को मापने का नहीं है कोई तरीका
दोस्तों,
मेडिकल साइंस में भूख से हुई मौत को मापने का कोई तरीका नहीं है कि आप पोस्टमार्टम के जरिये तय कर दीजिएगा कि इसकी मौत भूख से हुई है या नहीं? ऐसा अभी संभव नहीं है। रिम्स के एक डाॅक्टर ने बताया, कि भूख से जो मौत होती है, उसमें जब पोस्टमार्टम होगा तो उसमें यही देखा जाता है कि इनका लीवर जो है, उसका वसा पूरी तरह से गला है या नहीं? दूसरा पेट व अन्न का जो स्टोरेज रहता है, उसमें उसकी मात्रा, उसका अंश है या नहीं? लेकिन डाॅक्टर बताते हैं अगर उस बंदे को, जिसकी मौत भूख से हुई है अगर उनको टीवी है या और कोई बीमारी है, तो फिर पोस्टमार्टम में भूख से हुई मौत नहीं आएगी, क्योंकि टीबी या और जो बीमारी है उसी को लक्षित करेगी।
दूसरी बात है अभी जब निमनी की मौत हुई तो लोगों ने, अधिकारियों ने कहा हम जाएंगे उनके परिवार वालों का सूगर लेवल की जांच करेंगे। हिमोग्लोबीन की जांच होगी और बीएमआई लेबल की जांच होगी। इसपर मेडिकल साइंस का साफ कहना है कि अगर हम सूगर लेबल की जांच करेंगे तो उसमें अगर उसने एक दिन पहले थोड़ा-सा भी कुछ खाया होगा, शरबत भी पीया होगा, तो फिर जो उसका सूगर लेबल दिखाएगा, वह सामान्य ही दिखाएगा। मेडिकल के जरिये आप यह प्रूफ नहीं कर सकते हैं कि किसी की मौत भूख से हुई है या नहीं हुई है?
परिवार वाले कहते हैं मौत भूख से हुई
लेकिन जो पूरी रिपोर्ट सामने आई है निमनी के मामले में, जितने पत्रकार वहां पर गये, अगल-बगल के लोगों से पूछा, पड़ोसियों से पूछताछ हुई तो सभी लोगों ने एक स्वर में कहा कि हां यह परिवार काफी गरीब था, इनको राशन कार्ड नहीं था और इसकी मौत भूख से ही हुई है। लेकिन प्रशासन उसको मानने के लिए तैयार नहीं है। आज से दो दिन पहले 20 मई को सुधीर सोरेन नामक एक आदिवासी व्यक्ति की मौत भूख से होती है। उनकी पत्नी कहती है कि मेरे पति की मौत भूख से हुई है, क्योंकि दो-तीन दिनों से खाना नहीं खाए थे। लेकिन आज के अखबारों में यह न्यूज छाया हुआ है कि उसे टीबी था। टीबी के कारण वे काफी असाध्य थे, चल फिर नहीं पाते थे, जबकि पूरे गांव के लोगांेे का कहना है, कि ये मजदूर थे, डेली मजदूरी पर काम करते थे और लाॅकडाउन के कारण लगभग दो महीने से यह बैठ गये थे। इनको काम नहीं मिल पा रहा था और राशन कार्ड के जरीये जिसमें दो ही लोगोें पति, पत्नी का सिर्फ नाम था, जबकि पांच लोगों का परिवार है, 20 किलो चावल मिला जरूर लेकिन वे पर्याप्त नहीं है क्योंकि एक महीने पहले चावल मिला था, जो खत्म हो गया और अचानक उनकी तबीयत खराब हुई भूख से और उसके बाद उन्हें डाॅक्टर के पास ले भी नहीं जा पाया गया और उनकी मौत हो गयी। उसके बाद हम देखते हैं 20 मई को जब मौत हुई 21 मई की तारीख के अखबारों में कोई न्यूज, समाचार नहीं आता है, 22 मई के अखबार में देवघर के ही एडिशन में इस खबर को छापा गया। एक आदमी की भूख से मौत हो जाती है, लेकिन यह कितनी शर्मनाक बात है यह मीडिया के लिए खबर नहीं बनती, इस खबर को सिर्फ देवघर के पन्नों में कैद करके रख दिया जाता है। लेकिन वहां से खबरें उठती हैं, कुछ लोग सवाल उठाते हैं, हमलोगों ने भी उठाया, ट्वीटर के जरिये, फेसबुक के जरिये बातें आती हैं। पर फिर भूख से मौत हुई यह खबर दब जाती है और आज फिर खबर बनता है कि उनकी मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है।
पार्टी का चरित्र
जहां मौत हुई है, वहां पूरी भाजपा की पलटन भी पहुंच गयी है। भाजपा बोल रही है भूख से मौत हुई है। प्रशासन, जेएमएम और कांग्रेस बोल रही है कि भूख से मौत नहीं हुई है। मतलब क्या है? मतबल यही है कि अगर हम सत्ता में हैं तो भूख से हुई मौत को भी कहेंगे भूख से मौत नहीं है और अगर हम विपक्ष में हैं, तो हम कहेंगे भूख से मौत हुई है। मैं आज भाजपा वालांे से ही पूछना चाहता हूं, कि आपके राज में भी 22 लोगों की मौत भूख से हुई थी, आपने उस समय चुप्पी साध लिया था। क्यों? आपको उन तमाम 22 लोगों की मौतों को भी बोलना होगा कि ये तमाम मौंते भूख से ही हुई हैं। मैंने जो दस लोगों के झारखंड में भूख से हुई मौत का जिक्र किया, इसमें अगर हम देखते हैं तो पूरा का पूरा सिस्टम फेल्योर है।
भूख से मौत के प्रत्यक्ष कारण
इसके कारण में यदि हम जाते हैं, प्रत्यक्ष रूप से जो कारण दिखता है, वह यही दिखता है कि वह 70 वर्ष की गढ़वा की चाहे सोमरिया देवी हो, या फिर रामगढ़ की 72 वर्षीय उपासी देवी हो, इनको न तो वृद्धावस्था पेंशन मिल रहा था, न तो इनके पास राशन कार्ड था। उसी तरह से निमनी के घर वालों का भी राशन कार्ड नहीं था। भूखल घासी के घर वालों का भी राशन कार्ड नहीं था। शिवचरण को भी राशन कार्ड नहीं था। तो जो जरूरतमंद हैं उनतक न राशन कार्ड है, न वृद्धावस्था पेंशन है, न विकलांगता पेंशन है, मतलब इन लोगों को कुछ नहीं मिल रहा है। उन्हीं लोगों को जनकल्याणकारी योजनाओं का फायदा मिल रहा है, जिसके पास सारा कुछ है।
आप अगर ग्रामीण इलाके में जाएंगे, आप देखेंगे, झारखंड के ग्रामीण इलाकों की बात कर रहा हूं मैं, तो आप देखेंगे कि एक पूरे के पूरे गांव में किसी को भी प्रधानमंत्री आवास योजना या इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत मकान नहीं है। एक पूरे के पूरे गांव में आपको एक भी चापाकल देखने को नहीं मिलेगा। अगर आप पूरे के पूरे गांव घुमेंगे, तो ऐसे-ऐसे गांव मिलेंगे, मनिका गांव की ही बात ले लें, जिसकी बात हो रही है, जहां की निमनी कुमारी थी तो वहां पर 35 लोगों के घरों में राशन कार्ड नहीं था। आप भूखल घासी के गांव की बात कीजिएगा वहां पर बहुत लोगों का राशन कार्ड नहीं था। लेकिन जब एक व्यक्ति की मौत होती है, उसके बाद यह सिस्टम जो पूरा का पूरा सड़ चुका है, इस अपनी सड़ांध को ढकने के लिए सिस्टम द्वारा रातोंरात वहां नल, राशन कार्ड वगैरह वगैरह बन जाता है। लेकिन उससे पहले फाइलों में उनके राशन कार्ड का अप्लीकेशन सड़ रहा होता है, लेकिन उनको राशन कार्ड नहीं मिलता है।
दोस्तों
उपर से दिखने वाला जो प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाला कारण है, भूख से हो रही मौंतों का यही है कि जो भी जनकल्याणकारी योजनाएं, मैं इसे तथाकथित जनकल्याणकारी योजनाएं कहूंगा, जो सरकार ने बनाई है, यहां की जो पूरी लूट-खसोट की सिस्टम है, उसको बनाए रखने के लिए, वह पूरी तरह से झारखंड के अंदर फेल दिखता है, जिसके कारण ही यहां पर भूख से मौतें हो रही है। और इसकी जिम्मेवारी पूरी तरह से कहा जाए तो प्रत्यक्ष रूप से, सरकार की जिम्मेवारी बनती है, लोगोें की भूख से मौत नहीं हो। लोगों ने आपको चुना है, आप चुने हुए लोग है।
हंगर इंडेक्स में पहला स्थान रखने वाला खनिज संपदा से सम्पन्न है झारखंड
झारखंड के अंदर अगर हम विस्तृत कारण में जाएंगे तो देखेंगे झारखंड जो है यह मिनरल्स से भरा हुआ है, यह खनिज पदार्थ से भरा हुआ है। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा, इसी झारखंड में हर साल 19 हजार बच्चे जन्म के कुछ देर बाद ही मर जाते हैं। हर साल मां के गर्भ से निकलने के बाद प्रति हजार 23 बच्चे तुरंत ही मर जाते हैं। इसी झारखंड में हर वर्ष पौने दो लाख बच्चे पांच साल से कम उम्र में मर जाते हैं। यह झारखंड की नियति है। नीति आयोग ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसमें आप देखेंगे कि झारखंड का जो स्थान है, वह हंगर इंडेक्स में प्रथम स्थान है। इंडिया में झारखंड का हंगर इंडेक्स में पहला स्थान है। इस तरह की स्थिति है झारखंड की, जहां पर कि भरपूर खनिज पदार्थ है, जहां पर कि कोयला हो, सोना हो, चांदी हो।
मतलब कि जिस राज्य में किसी भी चीज की कमी नहीं हो, लेकिन वहां के लोग हंगर इंडेक्स में पहले स्थान पर हैं। वहां के लोग नीति आयोग के द्वारा जारी रिपोर्ट में ही यहां की जो गरीबी रेखा का राष्ट्रीय मानक है, उसी गरीबी रेखा के नीचे यहां के 37 प्रतिशत लोग हैं। आखिर क्यों?
खनिज पदार्थो पर पूंजीपतियों का कब्जा
जब झारखंड में तमाम कुछ है, मिनरल्स है, कोयला है, अभ्रक है, खनिज है, सोना है, चांदी है, सब से भरा हुआ है तो फिर इस राज्य के 37 प्रतिशत से ज्यादा लोग क्यों गरीबी रेखा से नीचे हैं? इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है, कि उस खनिज पदार्थ पर यहां के जो स्थानीय निवासी हैं, उनका कोई हक नहीं है। वो सारे के सारे यहां पूंजीपतियों को दे दिया गया है। प्राइवेट कम्पनियों को दे दिया जा रहा है, लीज पर दे दिया जा रहा है। अभी कोयला के निजीकरण की बात सरकार कर रही है। लेकिन जिसके घर में, हमारे घर में कोयला है, हमारे घर में सोना है, हमारे घर में चांदी है, लेकिन उसपर हमारा हक नहीं है। गरीबी रेखा में हंगर इंडेक्स मे सबसे टाॅप पर झारखंड के रहने का कारण यही है। कोई भी सरकार यही करती है। पिछली सरकार थी वह लगातार पूंजीपतियों के साथ एमओयू साइन कर रही थी। वे ओने-पौने दाम पर उनको जमीनें उपलब्ध करवा रही थी, यहां का जो पूरा का पूरा खनिज पदार्थ है, उसको लूटने की खुली छूट दे दी थी। अभी हेमंत सोरेन की सरकार आई है, यह पहले भी सरकार में रहे हैं। लेकिन संविधान जो आदिवासियों को हक देता है, पांचवें अनुसूची में हक है, जिसके जमीन के नीचे जो भी मिनरल्स है, उसपर ग्रामवासियों का हक है। उसपर उस जमीन के मालिक का हक है, लेकिन यहां पर उन जमीन मालिकों का हक छीन लिया गया है।
सबसे बड़ा स्टील प्लांट इसी झारखंड में है बोकारो में, लेकिन उस बोकारो स्टील प्लांट से लाखों लोग विस्थापित है। आज भी लोग बीमारी, गंदा पानी, लाल पानी पीने को अभिशप्त है, लगातार उन्हें बीमारियां हो रही हैं। अभी जो धूल का मौसम है, तेज हवा चल रहा है, उनके घर में जाएंगे, तो घुटना भर आपको धूल में रहना पड़ेगा। इनकी जिंदगी की कीमत पर जो यहां कम्पनियां लग रही है उसका फायदा कौन ले रहा है? देशी-विदेशी पूंजीपति, मल्टीनेशनल कम्पनियां, यहां की सरकार! और उसका घाटा किसको हो रहा है? यहां के जो स्थानीय लोग हैं उनको। स्थानीय लोग घाटे में जा रहे हैं। वे अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। मैं रामगढ़ में रहता हूं, रामगढ़ के छावनी परिषद् में ही, अगर यहां का पानी पीएंगे, तो पूरा लाल मिलेगा। क्योंकि बगल में ही एक बारूद की फैक्टरी है।
नवजातों की मौत का कारण
ये तमाम जो इंडस्ट्री है, छोटे से लेकर बड़े तक इंडस्ट्री! उसका कोई भी फायदा यहां के लोगों को जो झारखंड के स्थानीय आदिवासी हैं, मूलवासी हैं, उनको नहीं मिल पा रहा है। इसलिए ये हंगर इंडेक्स में टाॅप पर हैं। 37 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, वही हंगर इंडेक्स राष्ट्रीय मानक में जिसे मैं तो मानता भी नहीं हूं, से नीचे है। झारखंड में प्रति वर्ष 2 लाख बच्चे महज कुछ महीने में मर जाते हैं, जन्म लेने के तुरंत बाद, उनके मरने का कारण क्या है? यह मैं नहीं कहता हूं, यह सरकार की रिपोर्ट कह रही है। सरकार की रिपोर्ट कह रही है, उन बच्चे के मरने का कारण मां का कुपोषण है। खनन वाले इलाके में वायु प्रदूषण है, असुरक्षित वातावरण है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण है और इसके साथ बच्चों को पौष्टिक आहार ना मिलना। इसकी गारंटी कौन करेगा कि जो गर्भवती महिलाएं हैं, वो कुपोषण से पीड़ित नहीं हो? मैं आपको कहता हूं आप झारखंड आइए, झारखंड के ग्रामीण इलाके में घूमकर देखिए, 90 प्रतिशत महिलाएं, आदिवासी-मूलवासी महिलाएं आपको एनीमिया की शिकार मिलेंगी। उनको एनीमिया है, क्यों?
क्योंकि उनको जो पौष्टिक आहार मिलना चाहिए, नहीं मिलता है। स्वच्छता का भी अभाव है। आप झारखंड के किसी भी जंगली इलाके में जाइए, चाहे नोवामुंडी का इलाका हो, चाहे गिरिडीह का इलाका हो, चाहे बोकारो का इलाका हो, चाहे धनबाद का इलाका हो, पूरे का पूरे लोग एक असुरक्षित वातावरण में रहने को मजबूर है, अभिशप्त हैं। लगातार वायु प्रदूषण से लोगों की जान जा रही है।
सरकार का हाथ पूंजीपतियों के साथ
सरकार अपने जनता की सुरक्षा के बजाय, जनता को भूख से मरने से बचाने के बजाय, वे यहां पूंजीपतियों को लूट की खुली छूट दे रही है। मैं कहना चाहता हूं दोस्तों! सरकार चाहे बीजेपी की हो, चाहे कांग्रेस की हो, मुख्यमंत्री चाहे गैर-आदिवासी हो, चाहे आदिवासी हो, लेकिन आदिवासियों की जिंदगी में, यहां के मूलवासियों की जिंदगी में कोई सुधार नहीं हुआ है। ऐसा नहीं है कि हेमंत सोरेन की सरकार बने पांच महीने हुए है, मैं अभी बोल रहा हूं, ये पहले भी मुख्यमंत्री रहे हैं, भाजपा के साथ भी मिलकर गठबंधन बनाकर कुर्सी संभाली है, कांग्रेस के साथ भी संभाल रहे हैं। पहले भी इनके राज्य में ऐसा कोई भी रिवोल्युशनरी कार्य नहीं हुआ कि यहां कि जो जनता है, पांचवी अनुसूची में जो लोग रह रहे हैं, उन लोगों को अधिकार मिल जाए। आज भी यहां के स्कूलों में बच्चों की जगह सीआरपीएफ के लोग भरे हुए हैं। झारखंड के सैकड़ों स्कूलों में सीआरपीएफ के कैंप हैं। सोचिए आप कि वहां के बच्चे कैसे पढ़ाई करेंगे, जहां पर सीआरपीएफ के फौज का पहरा हो? नहीं पढ़ पाएंगे। और आप कहते हैं कि झारखंड पिछड़ा हुआ है। झारखंड को पिछड़ा एक सोची-समझी साजिश के तहत बनाया गया है। क्योंकि यहां मिनरल्स हैं, यहां पर सोना है, यहां पर चांदी हैं, और यहां पर बहुत सारी चीजें हैं, जिससे देशी-विदेशी पूंजीपतियों को फायदा है। अगर यहां के लोग पढ़ लेंगे, यहां के लोग अगर अपने हक अधिकार के लिए जग जाएंगे, तो वे कहेंगे कि तुमने पांचवी अनुसूची में जो हमें हक दिया है, तो पांचवीं अनुसूची को लागू करो। हम अपने क्षेत्र में किसी भी बाहरी लोगों को घुसने नहीं देंगे। ये भी लोग कहेंगे। और इस भूख से हो रही मौत के प्रत्यक्ष रूप से जो दिखने वाले कारण हैं, उसके अलावा जो नहीं दिखने वाले, अप्रत्यक्ष रूप से कारण है, मूल कारण यही है।
इनका स्थायी समाधान
भूख से हो रही मौतों के समाधान की अगर बात करें, तो इसका समाधन भी वही है। उसका समाधान मात्र और मात्र वही है कि यहां के आदिवासियों, मूलवासियों को यहां के जो स्थानीय लोग हैं, आप उनको यहां के जमीन के नीचे जो भी खनिज पदार्थ हैं, उसका मालिक घोषित कीजिए। घोषित कीजिए कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं करेगा। आप घोषित कीजिए कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में कुछ भी सरकारी कार्यक्रम हो या कोई भी कार्यक्रम हो, तो अपने ग्रामसभा की अनुमति से ही लागू होगा, जो कि संविधान में उसको मिला हुआ हक है। आपको इस चीज को लागू करना होगा।
दोस्तों,
मैं यही कहना चाह रहा हूं कि अगर आप झारखंड में भूख से हो रही मौत की समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं, तो आपको यहां की जो मिनरल्स हैं, उसपर यहां के आदिवासियों-मूलवासियों का कब्जा देना होगा। पांचवीं अनुसूची में जो अधिकार वर्णित है, उन अधिकार को उनको देना होगा तभी और यहां पर जो भी कम्पनियां लग रही हैं, खनन कर रही हैं, उसमें उनको पार्टनर बनाइए। आपको यहां के मूलवासियों-आदिवासियों को जिसकी जमीन है उसको पार्टनर बनाना होगा, यदि छोटी-सी भी इंडस्ट्री लगाते हैं। यहां के लोगों को रोजगार दीजिए। आपको जानकर आश्चर्य होगा, यहां जितनी भी बड़ी-बड़ी कम्पनियां हैं, उसमें लोकल को रोजगार नहीं है। अगर स्थानीय लोगों को रोजगार रहता, तो लोग बाहर क्यों जाते? आप जान रहे हैं, लाॅकडाउन का समय है और खुद सरकार घोषणा कर रही है, कि यहां के नौ लाख लोग प्रवासी मजदूर हैं। जो कि झारखंड से बाहर काम कर रहे हैं। आप सोचिए, जिस राज्य में कोयला हो,ं सोना हो, अभ्रक हो, जिस राज्य में ढेर सारी खनिज पदार्थ हो, उस राज्य के नौ लाख लोग बाहर काम करने क्यों जाएंगे? यह सोचने वाली बात है दोस्तों! कि आखिर जिस राज्य में इतने सारे संसाधन हो, इतने सारे प्राकृतिक संसाधन से भरपूर जो राज्य है, उस राज्य के लोग बाहर काम करने क्यों जाएंगे?
इसका एक मात्र कारण यही है कि यहां जितनी भी कम्पनियां हैं, वहां स्थानीय लोगोें को रोजगार नहीं है।
समाधान का एकमात्र रास्ता
दोस्तों,
इस झारखंड में लगातार भूखमरी से जो मौतें हो रही है, उसमें मेरी जो स्पष्ट समझदारी है, इसके समाधान का रास्ता सिर्फ और सिर्फ यही है यहां के तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के स्थानीय लोगों का कब्जा हो। यहां जो भी एमओयू किये गये हैं, उस सबको रद्द करें। क्यों करें हम एमओयू? एमओयू का मतलब हुआ मेमोरंडम आॅफ अंडरस्टेंडिंग। इन्होंने बहुत बड़े-बड़े पूंजिपतियों, देशी-विदेशी पूंजीपतियों के साथ सैकड़ों एमओयू किया है। उन तमाम एमओयू को हेमंत सोरेन रद्द करें। और हेमत सोरेन एक आदिवासी मुख्यमंत्री है, तो उन्हें आदिवासियों-मूलवासियों की भूख से जो मौंते हो रही है, अब तक 10 मौतें हुई है। इसमें एक भी मौत उच्च जाति के लोगों की नहीं हुई है। ये सारी मौतें दलित और आदिवासी की हो रही हैं। यहां के मूलवासी-आदिवासी की हुई है। और दूसरी बात जो है एकदम इम्पोर्टेंट बात है कि जमीन पर मालिकाना हक। यहां पर झारखंड के अंदर में आप देखेंगे, गांव में जब जाएंगे, तो बहुत सारे लोग जो हैं, वे भूमिहीन है। लेकिन पिछली सरकार ने यहां पर लैंड बैंक बनाने का काम किया। मतलब उसमें जो भी गैरमजरूआ जमीन थी, ंजो भी जंगल की जमीन थी और भी कुछ ऐसी जमीनों को लेकर इन्होंने लैंड बैंक बनाया था और इन्होंने पूरी दुनिया के सामने कहा था, हमारे पास बहुत जमीन है और आप आइए, हम आपको जमीन उपलब्ध कराएंगे और आप कम्पनी खोलिए।
हम कहना चाहते हैं कि सबसे पहले जो लैंड बैंक है, उसकी सारी जमीनों को यहां के जो भूमिहीन लोग हैं, उन लोगों में बांट देना होगा। उनके बीच बांटना चाहिए। जो यहां भूमि का असमान वितरण है, उस वितरण को आपको सुधारना होगा। यहां पर भूमि सुधार करना होगा। जो भी गैरमजरूआ जमीन है, सरकारी जमीन है, वनभूमि है उसको आप ग्रामीणों के बीच बांटिए, उनके पास जमीन दीजिए, उनके पास जमीनें रहेंगी, तो यहां का जो जमीन है यहां की जो मिट्टी है, वह सोना उगल सकती है, वे फसल उपजा लेंगे। उन नौ लाख लोगों को झारखंड से बाहर दूसरी जगह काम करने के लिए, फटकार सुनने के लिए नहीं जाना पड़ेगा। अगर उनके पास जमीन होगी।
झारखंड की जुझारू पृष्ठभूमि
साथियों,
आप जानते हैं, आज से पहले यहां झारखंड के अंदर भी काफी जमींदारी प्रथा थी, और अभी जो मंत्री है हेमंत सोरेन इनके पिता शिबू सोरेन ने भी उन जमींदारों, साहूकारों के खिलाफ काफी आंदोलन किया था। जमींदारों को मारकर भगाया गया था और भी बहुत सारे लोग थे उसमें, एमसीसी के भी लोग थे, माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर के लोग। उन्होंने भी जमींदारों के खिलाफ बहुत बड़े-बड़े आंदोलन किये। आज जब मैं झारखंड के आदिवासी इलाके में जाता हूं, गया हूं, और जब बात होती है लगातार, तब लोग बताते हैं, जो बूढ़े-बुजुर्ग थे, वे बताते थे आज से 20 साल पहले हमलोगों के पास जमीनें नहीं थी, हमारे बगल में जंगल होता था, लेकिन जो फोरेस्टर था, जंगल विभाग का अधिकारी था, वह घोड़ा पर चढ़कर आता था और उसके घोड़े का जो नाल होता था, उसकी टाप की आवाज सुनकर हमलोग भाग जाते थे। हमलोगों को सूखी लकड़ी काटने की मनाही थी, लेकिन जब यहां पर एमसीसी का मूवमेंट शुरू हुआ, शिबू सोरेन का मूवमेंट शुरू हुआ, तो उन लोगों ने काफी जमींदारों के खिलाफ मूवमेंट किया। जमीन पर कब्जा किया और फिर उन जमीनों को यहां के लोगों को दिया। आप झारखंड के ग्रामीण इलाकों में जाएंगे तो वे बताएंगे, कि किस तरह से यहां जमींदारों के खिलाफ मूवमेंट हुआ? अभी भी बहुत सारे इलाकों में जाएंगे, तो लोग कहेंगे कि ये पार्टी की जमीन है और ये उन्होंनेे लोगों को उपजाने के लिए दिया है। बहुत सारी जमीनों के पास लोगों को पट्टा नहीं मिलेगा। क्योंकि पार्टी ने अभी के दौर में भाकपा (माओवादी), जो पहले एमसीसी हुआ करती थी, झारखंड के अंदर उन्होंने उन्हें जमीनें दी है। तो जमीनों का एक बड़ा मूवमेंट उस समय एमसीसी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के लोगों ने किया है।
जमींदारों को मार भगाने का काम किया गया था। लेकिन बाद के दौर में हम देखते हैं कि जब शिबू सोरेन संसदीय राजनीति में जाते है,ं उसके बाद जब वे मंत्री बनते हैं, पैसा कमाना शुरू करते हैं और उसके बाद एमसीसी पर प्रतिबंध लगता है। सीपीआई माओइस्ट पर प्रतिबंध लगता है, और जहां-जहां माओइस्ट कमजोर होते हैं, वहां-वहां फिर से जमींदार उन जमीनों को जहां से उन्हें मारकर भगाया गया है, उन जमीनों पर फिर वे लोग आकर कब्जा करते हैं और ओने-पौने दाम पर वे जमीन बेचना शुरू करते हैं। वे जमीन बेचने लगते हैं। तो आज के स्थिति में वही सारी जमीनें जो कभी एमसीसी ने कब्जा करके ग्रामीणों के बीच बांटी थी, जेएमएम ने कब्जा करके ग्रामीणों के बीच बांटी थी, उन सारी जमीनों को अभी जमींदार लोग भी औने-पौने दाम में बेच रहे हैं। और कहीं पर जो गैरमजरूआ जमीन थी, उन सभी जमीनों को मिलाकर लैंड बैंक बना दिया।
दोस्तों,
क्रांतिकारी भूमि सुधार की सख्त जरूरत
मेरे कहने का मतलब यह था कि अभी भी झारखंड के अंदर भूमि का असमान वितरण है। लोगों के पास जमीन नहीं है। यहां पर बहुत ज्यादा भूमि सुधार की जरूरत है, कि गरीबों के बीच भूमि का वितरण हो, लैंड बैंक में पड़ी जमीन पूंजीपतियों के लिए नीलाम न हो, बल्कि जो गरीब हैं, जिनके पास जमीन नहीं है, भूमिहीन हैं उन लोगों में जमीन को बांट दिया जाए। यहां के जिस जमीन के अंदर में मिनरल्स निकल रहे हैं, उनपर वहां के स्थानीय लोगों का कब्जा हो, उनका हक हो और साथ ही साथ यहां लगने वाले हरेक फैक्टरी में यहां के लोगों का प्रतिनिधित्व ज्यादा हो। तभी जाकर हम इस भूखमरी जैसी समस्या से निजात पा पाएंगे। और खास करके जो झारखंड हंगर इंडेक्स पर टाॅप पर है, उस टाॅप से भी नीचे जा सकते हैं हम। यह एक परमानेंट सोल्यूशन है। हमें यह करना है। अब बात है कि क्या हेमंत सोरेन में या इस तरह की सरकारों में यह करने का माद्दा है। क्या वे यह माद्दा रखते हैं, यह सोचने वाली बात है। चाहे कोई सरकार हो, भाजपा की हो, कांग्रेस की हो, जेएमएम की हो, जीवीएम की हो, क्या ये इस तरह का क्रांतिकारी कदम उठा पाएगी? क्या ये कभी इस तरह का ऐलान कर सकती है कि आपके जमीनों के अंदर जो खनिज पदार्थ है उसके मालिक आप है? क्या ये कह सकती है कि जो लैंड बैंक में जमीनें हैं, हम उन्हें गरीबों के बीच बांट देंगे? क्या यह सकती है कि जो भी जमींदार है जिसके पास अभी भी 200, 400 बीघा जमीन है, उसपर भी हम कब्जा करके ग्रामीणों के बीच में बांट देंगे? क्या आपको लगता है? नहीं। मेरा यह साफ मानना है कि कोई भी सरकार, इस तथाकथित लोकतंत्र की कोई भी सरकार इस तरह का कदम नहीं उठा सकती। वे कभी भी नहीं कहेगी। लेकिन अगर कहेगी तो बहुत खुशी मिलेगी मुझे, जब मेरी यह बात गलत साबित हो जाए। अगर ये इस तरह का क्रांतिकारी कदम उठा दे, अगर ये कहे कि हां मिनरल्स आपका है, जिसके जमीन के नीचे हैं, उसके असली मालिक आदिवासी-मूलवासी है, लेकिन ये करेगी नहीं।
खुद उठने की जरूरत
इसलिए हमें इस सरकार के भरोसे बैठे रहने की भी जरूरत नहीं है। हमें लड़ना होगा। हमें लड़ना होगा अपने हक अधिकार के लिए, हमें लड़ना होगा अपने परंपरागत अधिकार के लिए, झारखंड के लोगों को, झारखंड के आदिवासियों को, झारखंड के मूलवासियों को अपने जल-जंगल-जमीन के परंपरागत अधिकार जो उन्हें मिले हैं, पूर्वजों के अधिकार है, जो उन्होंने काफी कुर्बानी देकर हासिल किया है, उस कुर्बानी के इतिहास को उन्हें भूलना नहीं होगा। उन्हें उस कुर्बानी के इतिहास को याद रखना होगा, और और भी ज्यादा कुर्बानी के लिए आने वाले समय में तैयार रहना होगा। जिस तरह सरकारें कोयला का निजीकरण कर रही है, इसी तरह से गोड्डा के अंदर अडाणी को जमीन पिछली सरकार ने दी थी, पिछली सरकार ने किस तरह से ढेर सारे, सैकड़ों एमओयू किये थे, आपने देखा है कि यहां किस तरह से जिंदल से ले करके तमाम पूंजीपतियों वेदांता तक को जमीनें दी गयी है। अगर हेमंत सोरेन वास्तविक में चाहते हैं कि झारखंड के अंदर भूख से मौत खत्म हो जाए, तो उन्हें इन तमाम एमओयू को रद्द करना होगा। पिछली सरकार में आवाज उठा रहे थे कि एमओयू गलत है, उसे रद्द करना चाहिए, आप आज खुद सरकार में हैं, उन्हें यह रद्द करना होगा। अगर वे चाहते हैं कि भूख से मौत खत्म हो जाए लोग पढ़े लिखें, तो उन्हें स्कूलों से सारे सीआरपीएफ कैंप को हटाना चाहिए। उन्हें स्कूलों में वहां पढ़ाई का माहौल बनाना होगा। उन्हें लोगों को शिक्षित करना होगा। उन्हें लोगों को अपने हक अधिकार के प्रति जागरूक करना होगा। और अगर सरकार यह नहीं करती है, तो इसका बीड़ा हम लोगों को उठाना होगा। पत्रकारों को उठाना होगा, बुद्धिजीवियों को उठाना होगा, यहां तक कि मजदूर संगठनों को उठाना होगा, यहां के छात्रों को उठाना होगा, यहां के युवाओं को उठाना होगा, यहां की महिलाओं को उठाना होगा। उन्हें इन सवालों को उठाना होगा और उन्हें इन सवालों को उठाकर सरकार से जवाब तलब करना होगा। सरकार से लड़ना होगा। और किसी भी कीमत पर जो उन्होंने बहुत ही लड़ झगड़ के कठिन संघर्ष के जरिये जो जंगलों पर परंपरागत अधिकार अभी बना हुआ है, सरकार उन्हें छीनने का प्रयास अपनी लठैत सीआरपीएफ के जरिये कर रही है, जो अक्सर सुनने को मिलती है। झारखंड के एक जिला में आपको दस-दस, पंद्रह-पंद्रह सीआरपीएफ के कैंप मिलेंगे जंगलों के इलाके में उस कैंप की क्या जरूरत है। वह कैंप सिर्फ और सिर्फ इसलिए है कि वहां जो मिनरल्स की लूट है, खनिज पदार्थ की लूट है जो इन्होंने ही, सरकार ने देशी विदेशी पूंजीपतियों को दिया है और उसके खिलाफ जो आदिवासियों का विद्रोह पनप रहा है, वह विद्रोह नहीं पनप सके। उस विद्रोह को दबाया जा सके। उस विद्रोह को कुचला जा सके। ये सीआरपीएफ के कैंप जो गांवो जंगलों में, हरेक जिला में 10-10 बनाए हुए हैं, उन सीआरपीएफ का सिर्फ वही काम है। आपने देखा अभी हाल फिलहाल इस हेमंत सोरेन केे सरकार में भी कि किस तरह से एक आम आदिवासी की सीआरपीएफ ने गोली मारकर हत्या कर दी, और जब मामला उठा तो कहा कि मुझे लगा कि माओवादी है। इसलिए मैंने गोली चला दिया। मैं कहता हूं कोई आदमी भाग रहा है देखकर आपको, आपका दहशत इतना है, जंगल के इलाके में, आपको देखकर लोग भागेगा ही। आप भागते हुए लोगों को देखकर गोली मार दीजिएगा सीने में, या पकड़कर आप उससे पूछताछ कीजिएगा।
दोस्तों
तो झारखंड में भूख से मौंते तभी रूकेगी जब यहां जल-जंगल-जमीनें बचाने की लड़ाई और तेज होगी। यहां के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को और बढ़ाया जाएगा। यहां के गांवों में जनता का राज कायम होगा। गांव गांव में जो लोगों का अधिकार है, पुराने जमाने से आदिवासियों का जो चला आ रहा अधिकार है, उन अधिकार की पुनरावृति होगी, यहां के आदिवासियों-मूलवासियों का हक उनके जमीन पर होगा, मिनरल्स पर होगा। नहीं ंतो भूख से हो रही मौत को रोक पाना संभव नहीं है। एक बात मैं लास्ट में कहना चाहूंगा कि भूख से जो लोग व्यथित होते हैं, उनके आक्रोश, उनका गुस्से और उनके अंदर जो चल रहा होता है, उसका थाह पाना आदमी के बस की बात नहीं है। और भूखा आदमी कुछ भी कर सकता है। भूखा आदमी किसी बड़ी से बड़ी सत्ता से टकरा सकता है। हमें उन भूखे लोगो को झारखंड में जो 37 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे हैं, हंगर इंडेक्स पर टाॅप पर है, तो हमें ऐेसे लोगों को एकताबद्ध करने की जरूरत है। और उनकी भूख को उनका जो भूख है, उस भूख को उनके जल-जंगल-जमीन की रखवाली की व्यवस्था की भूख में तब्दील करना होगा। उन्हें बताना होगा, समझाना होगा अपने बच्चे की भूख से मौत तभी नहीं होगी, जबकि जल-जंगल-जमीन पर आपका अधिकार रहेगा। जब आपकी जमीन के अंदर जो मिनरल्स हैं, उसपर आपका अधिकार होगा। यह बताने की जरूरत है, यह कहने की जरूरत है। और जब गांव-गांव में ग्रामीणों की सत्ता होगी, जब गांव-गांव में लोगों की सत्ता कायम होगी, तभी जाकर लोगों का भूख से हो रही मौत से निजात पाया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ के आत्मनिर्भर लोग
आप यह बात जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में, मध्य भारत के जंगलों में जनताना सरकार चल रही है। जनता की अपनी सरकार है। वहां पर एक भी भूख से मौत की खबरें नहीं आ रही है। यह मैं नहीं कह रहा हूं। यह इंटरनेट में पड़ी हुई बहुत सारी डाॅक्यूमेंट कह रही है, बहुत सारे लोगोें ने किताब लिखा है लोग लिखते हैं। कवि वरवर राव जो जेल में बंद हैं, वह भी एक जगह बोल रहे थे कि आज तक एक भी किसान ने मध्य भारत के दण्डकारण्य में आत्महत्या नहीं की। वहां भूख से मौत नहीं होती है, क्योंकि वहां भूमि का समान वितरण है। वहां पर लोग खुद अपनी सत्ता चला रहे हैं। हर जगह झारखंड में भी खास करके जहां पर मिनरल्स है, जहां पर खनिज है, तो वहां भूख से हो रही मौत को रोकने के लिए हमें जमीन पर खासकर जल-जंगल-जमीन पर आदिवासी-मूलवासी की पुस्तैनी अधिकार जो है, उस अधिकार को मजबूत करना होगा, जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई को और भी मजबूत करना होगा और भी तेज करना होगा।
भूख से हो रही मौत के बारे में एक बहुत ही मार्मिक कविता लिखी है बंग्ला देश के एक कवि रफीक आजाद थे, आपलोगों ने भी कविता पढ़ी होगी। मैं उस कविता को आपलोगों को अंतिम में सुनाना चाहता हूं कि भूखे लोेगों का कोई भी कानून कोई भी न्याय नहीं होता। अगर उनके पेट में भूख है, तो वह मानचित्र को भी चबा सकता है, सरकार को भी चबा सकता है। कविता मैं सुनाता हूं और उसके बाद अपनी बात खत्म करूंगा। यह कविता है-
भात दे हरामजादे
बहुत भूखा हूं
पेट के भीतर लगी है आग
शरीर की समस्त क्रियाओं से उपर
अनुभूत हो रही है हर क्षण सर्वग्रासी भूख
अनावृष्टि जिस तरह चैत के खेतों में फैलाती है तपन
उसी तरह भूख की ज्वाला से जल रही है देह
दोनों शाम दो मुट्ठी मिले भात तो
और मांग नहीं है।
लोग तो बहुत कुछ मांग रहे हैं
बाड़ी, गाड़ी, पैसा किसी को चाहिए यश
मेरी मांग बहुत छोटी है,
जल रहा है पेट मुझे भात चाहिए
ठंडा हो या गरम, महीन हो या मोटा
राशन का लाल चावल, वह भी चलेगा
दोनों शाम दो मुट्ठी मिले तो
छोड़ सकता हूं अन्य सभी मांगें
अतिरिक्त लोभ नहीं है, यौन क्षुधा भी नहीं है।
नहीं चाहिए नाभी से नीचे की साड़ी में लिपटी हुई गुड़िया
जिसे चाहिए उसे दे दो
याद रखो
मुझे उसकी जरूरत नहीं है
यदि मिटा सकते नहीं मेरी यह छोटी मांग
तो तुम्हारे संपूर्ण राज्य में मचा दूंगा उथल पुथल
भूखों के लिए नहीं होते हित-अहित, न्याय-अन्याय
सामने जो कुछ मिलेगा, निगलता चला जाउंगा निर्विचार
कुछ भी नहीं छोड़ूंगा शेष
यदि तुम भी मिल गये सामने राक्षसी मेरी भूख के लिए
बन जाओगे उपादेह आहार
सर्वग्रासी हो उठे अगर सामान्य भूख
परिणाम भयावह होते है इसे याद रखना
दृष्ट से द्रष्टा तक की धारावाहिकता को खाने के बाद
क्रमशः खाउंगा पेड़-पौधे, नदी-नाले
गंाव कस्बे फुटपाथ रास्ते
पथचारी नितम्ब प्रधान नारी
झंडे के साथ खाद्य मंत्री और मंत्री के साथ गाड़ी
मेरी भूख की ज्वाला से कोई नहीं बचेगा।
भात दे हरामजादे
नहीं तो खा जाउंगा तेरा मानचित्र!
दोस्तों इस कविता के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं।
धन्यवाद्

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