आठवीं किस्तः मानवीय सत्व को वैयक्तिक अस्तित्व का साधन मात्र बना देता है अलगाव

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लेखकः एरिक फ्रॉम

अनुवादः प्रणव एन

जैसा कि मैंने पहले कहा है, मार्क्स मानते थे कि श्रम का अलगाव हालांकि इतिहास के हर दौर में होता है, लेकिन पूंजीवादी समाज में यह चरम पर पहुंच जाता है और यह भी कि श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा अलगावग्रस्त रहता है। यह मान्यता इस विचार पर आधारित थी कि कार्य के निर्देशन में कोई दखल न रखने वाला मजदूर, जिस मशीन पर काम करता है उसके एक हिस्से के रूप में नियुक्त किया जाता है और पूंजी पर अपनी निर्भरता के चलते खुद भी एक वस्तु में तब्दील हो जाता है। इसलिए मार्क्स के मुताबिक ‘निजी पूंजी से, गुलामी से समाज की मुक्ति का सवाल श्रमिकों की मुक्ति का राजनीतिक स्वरूप अख्तियार करता है। इस अर्थ में नहीं कि उसमें केवल श्रमिकों की मुक्ति की बात होती है, इस अर्थ में कि इस मुक्ति में संपूर्ण मनुष्यता की मुक्ति शामिल रहती है। क्योंकि श्रमिकों के उत्पादन से संबंधों में हर तरह की मानवीय गुलामी शामिल रहती है और तरह-तरह की गुलामियां इसी रिश्ते का या तो संशोधित रूप होती हैं या फिर नतीजा।‘

एक बार फिर रेखांकित करना होगा कि मार्क्स का उद्देश्य श्रमिक वर्ग की मुक्ति तक सीमित नहीं था। उनका उद्देश्य सभी मनुष्यों की अलगावरहित यानी स्वतंत्र गतिविधियों की वापसी के जरिए मनुष्य मात्र की मुक्ति था। उनका लक्ष्य एक ऐसे समाज की वापसी था जिसके केंद्र में वस्तुओं का उत्पादन नहीं बल्कि मनुष्य हो, जिसमें इंसान पंगु अपरूपता का एक उदाहरण भर बन कर नहीं रह जाता बल्कि उसका व्यक्तित्व पूर्ण विकसित होता है।’ श्रम के अलगावग्रस्त उत्पाद की मार्क्स की अवधारणा ‘पूंजी’ में विकसित एक मूल प्रस्थापना में प्रकट होती है जिसे वह ‘उत्पादों की अंधभक्ति’ कहते हैं। पूंजीवादी उत्पादन व्यक्तियों के बीच के संबंधों को वस्तुओं के गुणों में तब्दील कर देता है और यह तब्दीली पूंजीवादी उत्पादन में उत्पादों की प्रकृति निर्मित करती है। ‘जिस उत्पादन प्रणाली में भौतिक संपत्ति श्रमिकों के विकास की जरूरतें पूरी करने के लिए नहीं होतीं बल्कि श्रमिकों का अस्तित्व मौजूदा मूल्यों के विस्तार की जरूरत पूरी करने मात्र के लिए होता हो, उसमें इसके अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता।

जैसे कि धर्म में व्यक्ति अपने ही दिमाग के उत्पादों द्वारा शासित होता है वैसे ही पूंजीवाद में वह अपने ही हाथों के उत्पादों द्वारा शासित होता है।’ ‘कमजोर इंसानों को मशीनों में तब्दील करने के उद्देश्य से मशीनरी को इंसानों की कमजोरियों के अनुरूप ढाला जाता है।’

मनुष्य के उत्पादन में श्रम का अलगाव हथकरघों के जरिए उत्पादन के दौर के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है। ‘हथकरघों से उत्पादन में श्रमिक औजार का इस्तेमाल करता है, जबकि फैक्ट्री में मशीन उसका इस्तेमाल करती है। वहां श्रम के औजार में गति उसके पास से शुरू होती है, यहां खुद उसे मशीन की गति का अनुसरण करना होता है। हथकरघों से उत्पादन में श्रमिक एक जीवंत क्रियाविधि का हिस्सा होते हैं जबकि फैक्ट्रियों में एक यांत्रिक क्रियाविधि होती है जो श्रमिकों से पूरी तरह स्वतंत्र होती है। वे इस मृत क्रियाविधि का जीवित हिस्सा भर होते हैं।’ मार्क्स को समझने के लिए यह देखना बेहद अहम है कि कैसे अलगाव की अवधारणा उनके विचारों के केंद्र में थी और लगातार बनी रही न केवल युवा मार्क्स के विचारों में जिन्होंने ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ लिखी बल्कि ‘परिपक्व’ मार्क्स के विचारों में भी जिन्होंने ‘पूंजी’ लिखी। पहले ही दिए जा चुके उदाहरणों के अलावा नीचे दिए जा रहे दो उद्धरण जिनमें से एक पांडुलिपियां से लिया गया है और दूसरा पूंजी से, इस निरंतरता को बिल्कुल स्पष्ट कर देंगेः

‘यह तथ्य सीधे तौर पर संकेत करता है कि श्रम द्वारा उत्पादित वस्तु यानी श्रम का उत्पाद अब एक अजनबी जीव के रूप में उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है, एक ऐसी ताकत के रूप में जो अपने उत्पादनकर्ता से पूरी तरह स्वतंत्र होती है। श्रम का उत्पाद ऐसा श्रम होता है जो वस्तु के रूप में साकार होता है और शारीरिक स्वरूप अख्तियार कर लेता है। यह उत्पाद श्रम का पदार्थीकरण होता है। कार्य का प्रदर्शन उसका पदार्थीकरण भी होता है। पॉलिटिकल इकोनॉमी के क्षेत्र में कार्य का प्रदर्शन वर्करों को दूषित करने वाले कारक के रूप में आता है, पदार्थीकरण एक हानि के रूप में, पदार्थों की गुलामी के रूप में और विनियोग (ऐप्रोप्रिएशन)  अलगाव के रूप में आता है।’ 

मार्क्स ने ‘पूंजी’ में यह लिखा है : ‘’पूंजीवादी व्यवस्था में श्रम की सामाजिक उत्पादकता बढ़ाने के सारे तरीके वैयक्तिक रूप में श्रमिक की कीमत पर ही संभव होते हैं। उत्पादन बढ़ाने के सारे तरीके आखिरकार खुद को उत्पादकों के शोषण और उन पर दबदबे के साधन के रूप में तब्दील कर लेते हैं। वे श्रमिक को मनुष्य का एक अंश मात्र बना कर रख देते हैं, उसे मशीन के एक हिस्से के स्तर तक ला देते हैं, उसके कार्य में आनंद का नामो-निशान न रहने देते हुए इसे एक घृणित जाल में बदल डालते हैं; वे उसमें से श्रम प्रक्रिया की बौद्धिक संभावनाओं को उसी अनुपात में अलग कर देते हैं जिस अनुपात में विज्ञान एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में इस प्रक्रिया में सम्मिलित रहता है।’’

एक बार फिर, युवा मार्क्स की नजरों ने भी अलगाव बढ़ाने में निजी संपत्ति (बेशक उपयोग की वस्तुओं के रूप में नहीं बल्कि श्रम को खरीदने वाली पूंजी के रूप में) की भूमिका को साफ-साफ देख लिया था। उन्होंने लिखा, ‘इसलिए निजी संपत्ति अलगावग्रस्त श्रम का उत्पाद है, प्रकृति और खुद से श्रमिक के बाहरी रिश्ते का अनिवार्य परिणाम है। इस प्रकार निजी संपत्ति अलगावग्रस्त श्रम, अलगावग्रस्त मनुष्य, अलगावग्रस्त जिंदगी की अवधारणा के विश्लेषण से हासिल होती है।’

न केवल वस्तुओं का संसार मनुष्य का शासक बन जाता है बल्कि उसी के द्वारा निर्मित सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां भी उसकी मालिक बन जाती हैं। ‘जिसे खुद हमने बनाया है उसकी यह परिणति कि वह हमारे सामने एक अलग ताकत बन कर खड़ी हो जाए, हमारी अपेक्षाओं को अंगूठा दिखाते हुए बेकाबू होती चली जाए, हमारी गणनाओं को बेकार कर दे, अब तक के ऐतिहासिक विकास का एक मुख्य कारक है।’ अलगावग्रस्त मनुष्य जो खुद को प्रकृति का स्वामी समझ रहा होता है, वस्तुओं और परिस्थितियों का गुलाम बन चुका होता है, उस दुनिया का शक्तिहीन हिस्सा जो उसकी अपनी ही शक्तियों की जड़ अभिव्यक्ति होता है।

मार्क्स के मुताबिक कार्य की प्रक्रिया में कार्य के उत्पाद से तथा परिस्थितियों से होने वाला अलगाव व्यक्ति के खुद अपने आप से, अन्य मनुष्यों से और प्रकृति से होने वाले अलगावों से अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ है। ‘अपने श्रम के उत्पाद से, अपनी जीवन गतिविधियों से और अपने प्रजातीय जीवन से होने वाले मनुष्य के अलगाव का सीधा नतीजा यह होता है कि वह दूसरे मनुष्यों से कट जाता है। जब मनुष्य खुद का विरोध करता है तो वह अन्य मनुष्यों का भी विरोध करता है। अपने कार्य के साथ, कार्य के उत्पाद के साथ और अपने आप के साथ मनुष्य का जैसा रिश्ता होता है, ठीक वैसा ही रिश्ता उसका अन्य लोगों के साथ, उनके श्रम के साथ और उस श्रम के उत्पाद के साथ भी हो जाता है। आम तौर पर यह कहने का कि मनुष्य अपने प्रजातीय जीवन से कट चुका है, मतलब यह होता है कि हर मनुष्य दूसरों से अलगावग्रस्त हो चुका है और इन दूसरों में से हरेक मानवीय जीवन से अलगावग्रस्त हो चुका है।’

अलगावग्रस्त मनुष्य सिर्फ अन्य मनुष्य से ही कटा नहीं होता, वह इंसानियत के सत्व से भी कट जाता है, प्रजातीय अस्तित्व से प्राकृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं से भी अलगावग्रस्त हो जाता है। मानवीय सत्व से यह अलगाव इंसान को उस अस्तित्वात्मक अहंमन्यता (एक्जिस्टेंशियल इगोटिज्म) की ओर ले जाता है जिसका वर्णन मार्क्स ने इस रूप में किया है कि इसमें इंसान का मानवीय सत्व उसके ‘वैयक्तिक अस्तित्व को बनाए ऱखने का एक साधन’ मात्र बन कर रह जाता है। यह (अलगावग्रस्त श्रम) मनुष्य का उसके अपने ही शरीर से, बाहरी प्रकृति से और उसके मानसिक जीवन से अलगाव कर देता है।’’

मार्क्स की अवधारणा यहां काण्ट के उस सिद्धांत तक पहुंच जाती है कि मनुष्य को हमेशा अपने आप में साध्य होना चाहिए, कभी किसी साध्य का साधन नहीं होना चाहिए। लेकिन वह इस सिद्धांत को इस बिंदु से और आगे ले जाते हैं, यह कहते हुए कि मनुष्य का मानवीय सत्व कभी भी उसके वैयक्तिक अस्तित्व का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। मार्क्स के विचार और कम्यूनिस्ट सर्वसत्तावाद के बीच का विरोध इससे ज्यादा मौलिक रूप में शायद ही कहीं प्रकट होता हो; मार्क्स कहते हैं, मनुष्य की इंसानियत उसके वैयक्तिक अस्तित्व का भी साधन नहीं बनाई जा सकती, फिर भला इसे राज्य, वर्ग या राष्ट्र के लिए साधन मानने या बताने का सवाल ही कहां उठता है?

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