आदिवासियों को हिन्दू बनाने के कुत्सित प्रयास पर विफरा आदिवासी समाज

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  • विशद कुमार

जब से झारखंड अलग राज्य हुआ है और भाजपा समर्थित सरकार रही है, तब से देश के कारपोरेट घरानों की वक्र दृष्टि झारखंड की खनिज संपदाओं आदिवासियों की दावेदारी जल, जंगल,जमीन पर रही है। यही वजह है कि कारपोरेट पोषित संघ के कई घटक संगठन आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपनी घुसपैठ करके आदिवासियों को हिन्दू बनाने के प्रयास में जुटे हैं ताकि आदिवासियों की संख्या कम से कमतर हो जाये तथा वे कमजोर होकर बिखर जायें। जिससे उनके अधिकार सिमट कर रह जाएं, जिसके बाद उनके जल, जंगल, जमीन का दावा भी धाराशायी हो जाएगा और उनके जल, जंगल, जमीन पर कारपोरेट घरानों द्वारा कब्जा आसान हो जाएगा।

वर्षों से कर रहे हैं ट्राईबल कोड की मांग

इसी कड़ी में जब पिछले कई दिनों से देश के आदिवासी समुदाय का बुद्धिजीवी तबका 9 अगस्त को होने वाला विश्व आदिवासी दिवस की तैयारी में था, वहीं दूसरी तरफ आरएसएस व भाजपा के लोग देश के आदिवासी क्षेत्रों में जाकर पिछले 5 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा अयोध्या में किए जाने वाला भूमि पूजन के लिए आदिवासियों के पूजा स्थल से मिट्टी ले जाने के बहाने आदिवासियों को हिन्दू बनाने की प्रक्रिया में लगे रहे।

झारखंड में भाजपा में पुनर्वापसी के बाद पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी में पुन: हिन्दुत्व का प्रेत समा गया और पिछले 5 अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री द्वारा भूमि पूजन किये जाने को लेकर उत्साहित बाबूलाल मरांडी और उनके समथकों में रांची की मेयर आशा लकड़ा ने आदिवासियों का पूजा स्थल ‘सरना स्थल’ से मिट्टी लेकर 20 पाहनों (पुजारियों) को अयोध्या भेजा, जिसे लेकर राज्य के आदिवासी समाज में आक्रोश देखा गया, उनके भीतर कई तरह की प्रतिक्रियाएं हुई हैं।

 इन प्रतिक्रियाओं में गुमला जिला आदिवासी छात्र संघ के संयोजक अनुप टोप्पो ने बाबूलाल मरांडी के बयान ‘रग—रग में है राम’ पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ”यह कोई आस्था नहीं है, बल्कि यह उनका राजनीतिक प्रपंच है।” टोप्पो कहते हैं कि ”कितनी अजीब बात है कि बाबूलाल मरांडी का वास्ता राम से तो है, मगर आदिवासियों से नहीं।”

 रांची के पिठोरिया में केंद्रीय सरना समिति की एक बैठक में समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि ”आरएसएस और भाजपा से जुड़े आदिवासी नेताओं द्वारा सरना स्थल की मिट्टी ले जाना आदिवासी समाज के साथ विश्वासघात है। दरअसल कारपोरेट पोषित भाजपा का नेतृत्व नहीं चाहता कि आदिवासियों का अलग धर्म कोड बने। ‘सरना स्थल’ से मिट्टी लेकर पाहनों द्वारा अयोध्या भेजा जाना आदिवासी समाज को हिन्दू धर्म में विलय का षडयंत्र है।”

आदिवासी जन परिषद के अध्यक्ष प्रेम शाही मुंडा कहते हैं कि ”विहिप हो, आरएसएस या भाजपा, वे पहले आदिवासियों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए अलग धर्म कोड लागू कराए। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि उनका असली मकसद है आदिवासियों को हिन्दू में विलय करना, जिससे उन्हें झारखंड को लूटने की छुट मिल जाए।”

आदिवासी समन्वय समिति के अरविंद उरांव कहते हैं कि ”आदिवासी समाज को बांटने के लिए कभी ‘सरना—सनातन एक है’ तो कभी ‘सरना—ईसाई भाई—भाई’ का नारा देकर आदिवासियों की धार्मिक—सांस्कृतिक पहचान को समूल नष्ट करने की नापाक कोशिश की जा रही है। ताकि उनको आदिवासियत परम्परा से बेदखल किया जा सके, जिससे उनके जल, जंगल, जमीन पर कब्जा करने का रास्ता आसान हो जाए।”

बता दें कि आदिवासी छात्र संघ द्वारा राज्य के कई भागों में उन आदिवासी नेताओं का पुतला दहन किया गया जो आरएसएस या भाजपा से जुड़े हैं।

इस विरोध के बीच बंधन तिग्गा ने बयान दिया है कि रांची मेयर आशा लकड़ा या पूर्व विधायक गंगोत्री कुजूर खुद को वानर या शुद्र कह सकती हैं, आदिवासी समाज को नहीं।वे लोग आरएसएस और विहिप के मानसिक गुलाम हैं, जो भाजपा की दलाली कर रहे हैं। गंगोत्री कुजूर द्वारा चान्हों के सरना स्थल से जो स्वयं में पवित्र है, वहां ब्राम्हण से शुद्ध करा कर मिट्टी लेना अपत्तिजनक है। यह पाहनों के साथ ही पूरे आदिवासी समाज का भी अपमान है।”

वे आगे कहते हैं कि ”यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हर सरना स्थल में प्रत्येक तीन साल में पाहन द्वारा बछिया की बलि दी जाती है।”

हो समाज के योगो पुर्ती कहते हैं कि ”संघ, विहिप, भाजपा  पूंजीपतियों द्वारा पोषित हैं। इनके द्वारा आदिवासियों की धार्मिक—सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने की कोशिश के पीछे असली मकसद उनके जल, जंगल, जमीन से बेदखल करके उसपर कारपोरेट को सौंपने की तैयारी के निहित है।”

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