(हिन्दी दिवस पर) हिंदी-हिंदी खेलने के दिन आ गए !

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जय प्रकाश मिश्र

अभी पितर पक्ष खत्म भी नहीं हुआ है कि हिंदी का भी आज से पितर पक्ष शुरू हो गया। हिंदी का पितर पक्ष  यानी हिंदी-हिंदी खेलने का पक्ष। यह खेल कहीं हिंदी सप्ताह के रूप में तो कहीं हिंदी पखवारा के रूप में खेला जाएगा। मंचीय कवि कविता पिलाने के लिए तैयार हो चुके हैं। हिंदी का ठेका लिए हिंदी के विद्वान नीरस भाषण के लिए लंगोट बांध चुके हैं। आज से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में घिसे-पीटे  आलेखों का दौर भी शुरू हो जाएगा। लेकिन यह सब  उन हिंदी प्रदेशों में ही होगा, जहां के बच्चे भी मां के गर्भ में ही हिंदी सीख कर जन्म लेते हैं। गैर हिंदी प्रदेशों में ओम शांति ओम। वास्तव में ऐसे आयोजन तो वहां होने चाहिए। अब और नहीं, यह तमाशा बंद होना चाहिए। हिंदी का विकास तो खूब हुआ और निरंतर हो ही रहा है। क्या लगता है, हिंदी इस तरह के खेल-तमाशे से समृद्ध हो रही है? कदापि नहीं। हिंदी को पूरे भारत में संपर्क भाषा के रूप में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों ने ही स्थापित कर दी थी। हिंदी को देश-विदेश में ख्याति दिलाने में हिंदी सिनेमा की भी बहुत बड़ी भूमिका है। गीता प्रेस, गोरखपुर ने भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई है। रोजी-रोटी की तलाश में निकले प्रवासी मजदूरों की भूमिका को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। इसमें व्यापारियों का भी योगदान रहा है। हिंदी के विकास में  गैर हिंदी भाषियों ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। गैर हिंदी प्रदेशों में हिंदी का विरोध राजनीतिक कारणों से है।  गैर हिंदी भाषिओं में हिंदी को लेकर यदि पूर्वाग्रह है तो उसके लिए हिंदी भाषी भी कम दोषी नहीं हैं। हिंदी भाषियों को जन्म के साथ ही तोहफा के रूप में  बिना किसी प्रयास के हिंदी मिल जाती है। विदेशी भाषा अंग्रेजी को लेकर हिंदी भाषियों में जो ललक होती है, वैसी ललक गैर हिंदी भारतीय भाषाओं के प्रति क्यों नहीं होती? जिंदगी हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान जैसे अटपटे नारे में बिता देते हैं, परंतु कभी बंगला, मराठी, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आदि एक भी भारतीय भाषा सीखने की चेष्टा तक नहीं करते। अगर चेष्टा हुई रहती तो गैर हिंदी भाषियों को भी संतोष होता। जबकि ये सारी भारतीय भाषाएं हिंदी की सगी बहनें हैं। बहरहाल, हिंदी दिवस की औपचारिक शुभकामनाएं स्वीकार कीजिए। लॉकडाउन के कारण इस वर्ष गया में पूर्वजों को अर्पण-तर्पण करने से वंचित हिंदी प्रेमी हिंदी के पुरखों का ही अर्पण-तर्पण कर संतोष कर सकते हैं।
प्रस्तुति- विशद कुमार

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