हाथरस रेप काण्ड जैसी दूषित मानसिकता पर वैचारिक मंथन जरूरी

3
313
हाथरस (उत्तर प्रदेश) की 19 साल की एक लड़की के साथ गांव के ही सामंती-पूंजीवादी मानसिकता के गुंडों ने बीते 14 सितंबर को सामूहिक  बलात्कार किया। और यही नहीं उन दरिंदों ने उस लड़की के रीढ़ की हड्डी और गर्दन तक को तोड़ डाला। लड़की अपने साथ हुई घटना के बारे में किसी से कुछ बता ना सके, इसके लिए मीडिया सूत्रों से पता चला है कि उसकी जुबान को गर्दन मोड़ते समय क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।
यह घटना तब घटी, जब पीड़िता अपने माता और भाई के साथ खेत में घास काटने गई थी। भाई कुछ घास लेकर पहले ही घर आ गया था। पीड़िता की माँ लड़की से कुछ दूरी पर घास काट रही थी। उसी समय मौका देखकर, गांव के ही 4 लड़कों (हैवानों) ने उस लड़की को पीछे से दुपट्टे से मुंह दबाते हुए पास के बाजरे के खेत में ले जाकर सामूहिक बलात्कार किया, उसको जान से मारने की पूरी कोशिश की। अचेत पड़ी उस लड़की को मृत समझकर वे लोग वहां से भाग निकले। पीड़िता की मां अपनी बेटी को खोजते हुए घटनास्थल पर पहुंची तो देखा कि लड़की के शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था, उसके गुप्तांगों से खून भी आ रहे थे।उसकी मां उसे लेकर रोती-बिलखती, चिल्लाती हुई किसी तरह घर आई।
थाने में FIR लिखाने गए परिवार वालों से पुलिस ने पूरी नाइंसाफी की। पुलिस प्रशासन पीड़िता को रेप का नाटक करने का आरोप लगाते हुए हर गरीब-मजलूमों की तरह भगा दिया। घटना के 8 दिन बाद दवाब बढ़ने पर रिपोर्ट तो लिखा गया परंतु उसमें बलात्कार की धारा न लगाकर आपसी मार-पीट की धारा लगाई गई।पीड़िता की हालत बिगड़ने पर उसको नजदीकी अस्पताल में साधारण वार्ड में इलाज मुहैया कराया, फिर अलीगढ़ के अस्पताल में रखकर तब तक अच्छी  स्वास्थ्य सेवा से उस पीड़िता को  वंचित रखा गया जब तक कि उसकी हालत गंभीर नहीं हो गई। हालत  बिगड़ती  देख पीड़िता को सफदरजंग अस्पताल, दिल्ली में ले जाया गया। तब तक  काफी देर हो चुकी थी। इस वजह से 29 सितंबर सुबह 3:30 बजे रेप पीड़िता की मृत्यु सफदरजंग अस्पताल में हो गई।
 मरने से पहले उसने अपने साथ हुई सामूहिक बलात्कार की बात कही और आरोपियों का नाम लेकर अपना बयान दर्ज कराया था।और मरने से पहले किसी भी पीड़ित का आखिरी बयान( Dyeing declaration) ही दुनियाभर में सबसे ठोस और सच्चा सबूत माना जाता है। इसलिए इस घटना पर जरा भी शक करना और आरोपियों को बचाना भी क़ानूनन अपराध माना जायेगा। लेकिन बहुत सारे संगठन/व्यक्ति उन बलात्कारियों को बचाने के लिए झूठे तथ्यों/रिपोर्ट का सहारा लेकर जनता के एक हिस्से को बेशर्मी और बेहयाई से इस संवेदनशील मुद्दे से भटका रहे हैं।
 परिजनों का आरोप है कि गांव के सामंतों, पूंजी के मालिकों व राजनीतिक रसूखदारों के दबाव में आकर पुलिस प्रशासन व सरकार ने घटना को कई दिनों तक दबाए रखा। स्थानीय लोगों का कुछ दबाव बनने पर आरोपियों की गिरफ्तारी की गई।
29 सितंबर को पूरे देश में जब धरना प्रदर्शन, सड़क जाम और सफदरजंग अस्पताल के बाहर आंदोलन हो रहा था तब ही उसी समय पोस्टमार्टम रिपोर्ट में घटना ने एक नया मोड़ लिया। पुलिस प्रशासन ने बताया कि उस लड़की के साथ न तो बलात्कार किया गया और न ही उसकी जुबान काटी गई।  इस अजीब-व-गरीब बयान के बाद लोगों का गुस्सा स्वभाविक तौर पर बहुत बढ़ गया,आंदोलन शुरू हो गए।  पीड़िता की मौत के बाद परिजनों को उसके पार्थिव शरीर को देखने तक के लिए नहीं दिया गया।
30 सितंबर की रात को 2:30 बजे पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में तब्दील कर पुलिस ने सबूत को मिटाने के लिए शव को परिवार के सदस्यों के मर्जी के विरूद्ध व उसकी अनुपस्थिति में पेट्रोल छिड़ककर जला डाली। वहां पर मौजूद पत्रकार तनुश्री पांडे ने पुलिस प्रशासन पर सवाल किया तो उन्होंने कोई भी जवाब देने से मना कर दिया। पुलिसिया अत्याचारों को दिखाने वाली वीडियो ने व्यापक जनता को आंदोलित कर दिया। पीड़िता को अचानक इतनी जल्दी जला दिए जाने से जनता का शक और गुस्सा काफी ज्यादा बढ़ गया।
यूं तो बलात्कार की घटनाएं हर रोज कहीं न कहीं होती रहती है पर *हाथरस की इस घटना में बलात्कारियों को बचाने के लिए शासन-प्रशासन के आला अधिकारीगण पूरी कोशिश कर रहे हैं, पीड़ित परिवार को धमकाया-डराया जा रहा है। हाथरस के जिला पदाधिकारी खुद पीड़िता के पिता को बयान बदलने के लिए डरा, धमका रहा है। 25 लाख की सरकारी मुआवजा व एक सदस्य को नौकरी का लोभ देकर केस उठाने को कहा जा रहा है। परिवार से कई दिनों तक मीडिया व वकील तक को मिलने नहीं दिया गया। पीड़ित परिवार के घर में धारा 144 लगाई गई है लेकिन आरोपी के परिवार वाले खुले आम ग्राम सभा आयोजित कर आरोपियों को निर्दोष बता रहे हैं।देशभर से विरोध की आवाज बुलंद होने से सरकार ने पहले SIT फिर CBI जांच कराने का हुकुम दिया है।
पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि SIT और CBI भी इसी शासन प्रशासन का ही एक अभिन्न अंग है; मां की शिकायत मौसी से करने का कोई विशेष फायदा नहीं होता है। इस वजह से पीड़ित परिवार को सीबीआई जांच से भी न्याय मिलने की उम्मीद ना के बराबर है।
हाथरस के इस बलात्कार और हत्या काण्ड का विरोध अलग-अलग व्यक्ति, संगठन  और राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोण से कर रहे हैं। कुछ संगठन इसका जातिगत आधार पर विरोध कर रहे हैं तो कई इसे भाजपा विरोधी रूप प्रदान कर रहे हैं। हमें यह ख्याल रखना चाहिए कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को किसी भी धर्म, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय के लोग किसी भी धर्म, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय की लड़की से करते हैं। ऐसी घटनाएं प्रत्येक प्रांतों में एवं हर सरकार के शासन में होती रहती हैं। विडंबना इस बात की है कि बलात्कार जैसी मानवता विरोधी घटनाओं का विरोध भी जाति,धर्म,भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय और राजनीतिक पार्टी के शासन को देखकर किया जाता है। इससे भले ही बलात्कार की समस्या समाप्त हो या ना हो, पीड़िता को न्याय मिले या ना मिले पर धंधेबाज संगठन व पार्टियां अपना उल्लू सीधा करने में सफल हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं का विरोध व्यापक मेहनतकश जनता व छात्र-नौजवानों के द्वारा बलात्कार का तात्कालिक समाधान करने के लिए, इसके कारणों को जानते हुए इसका स्थाई समाधान करने के लिए करना चाहिए।
प्राय: लड़कियों का अकेले बाहर घूमने को या छोटे कपड़े पहनने को बलात्कार जैसे असामाजिक और अमानवीय कुकर्मों का कारण बताया जाता है और लड़कियों को ही दोषी करार दिया जाता है। लेकिन पूरा तन ढके लड़कियों और यहाँ तक कि मासूम बच्चियों तक के बलात्कार के मामले भी आए दिन काफी दिखाई पड़ते हैं, बलात्कार की घटनाएं घर के अंदर भी होती हैं, घर में भी लड़कियां सुरक्षित नहीं रहती हैं। तो निश्चित तौर पर बलात्कार का कारण लड़कियों का अकेले बाहर घूमना या छोटे कपड़े पहनना नहीं हो सकता है। और वहीं इस जघन्य अपराध की सजा बलात्कारियों को फांसी देना या सर क़लम करना या गोली मारना भी इसे रोक पाने में अक्षम है।
बेशक यह सारी सजाएं बलात्कार का तात्कालिक व आभाषी समाधान तो कर सकता है पर इसका स्थाई व वास्तविक समाधान नहीं कर सकता। इसका परिणाम हम सबके सामने है कि बलात्कार की घटनाएं कम होने के बजाय काफी बढ़ रही हैं। NCRB का सरकारी आंकड़ा कहता है कि भारत मे हर 15 मिनट पर लगभग एक महिला/लड़की के साथ बलात्कर होता है। अब तो बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने के बाद पीड़िता को जान से मारने की अमानवीय घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं।
विज्ञान हमें बताता है कि किसी भी बीमारी का वास्तविक कारण को पता किए बगैर व उसका जड़-मूल से नाश किए बगैर बीमारी का स्थाई व वास्तविक इलाज संभव नहीं है। इसलिए बलात्कार के वास्तविक समाधान को जानने के लिए वास्तविक  कारणों को ढूंढना अति आवश्यक है।
बलात्कार का प्रमुख कारण महिलाओं को उपभोग की एक वस्तु माना जाना है। आम या अन्य पके,मीठे,रसदार फल निश्चित तौर पर उपभोग की वस्तु है, इसे उपभोक्तावादी नजर से देखा जाना गलत नहीं है। लेकिन नारी कोई उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि वह भी एक इंसान है। वह भी प्यार, इज्जत, आजादी और बराबरी का हकदार है। लेकिन हमारे समाज में नारियों को इस विचारधारा से नहीं देखा जाता है; बल्कि उसे उपभोग की, ऐश व अय्याशी की वस्तु समझी जाती है। यह विचारधारा हमारे समाज में हजारों वर्षों से चली आ रही है। यह सामंती व्यवस्था की बुराई है। सामंती व्यवस्था में प्रत्येक वस्तु और सेवा का उत्पादन और वितरण उपभोग के लिए ही किया जाता था। सामंती अभिजात वर्ग के पुरुष लोग लड़कियों को स्वाधीनता, समानता का हक-अधिकार ना देकर, उसे घर की इज्जत समझकर, घर की चाहरदीवारी में उपभोग की सुंदर व मनमोहक वस्तु के रूप में पालन-पोषण करते थे।
 पूंजीवादी क्रांति ने सामंती व्यवस्था की कई बुराइयों का खात्मा तो जरूर कर दिया लेकिन महिलाओं के प्रति समाज का उपभोक्तावादी दृष्टिकोण को बनाए रखा। इस व्यवस्था ने उपभोग की वस्तु समझी जाने वाली लड़कियों को बिकाऊ वस्तु भी बना दिया। इस कारण महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानकर उसकी सेवा सुविधा को एक व्यापारिक गतिविधि बना दिया गया। पूंजीवादी, बाजारू व्यवस्था ने पैसे के आधार पर विभिन्न स्तरों में जिस्मफरोशी का धंधा धड़ल्ले से शुरू कर दिया। आज जिस्मफरोशी/वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्राप्त है। सुंदर लड़कियों की सहायता से कई कारोबारों में बेतहाशा मुनाफा कमाया जा रहा है। अश्लील फिल्मों व फूहड़ नाच गानों,घर परिवार, समाज मे रोज-ब-रोज दिए जा रहे महिलाविरोधी मजाकों,गालियों,बातचीत के माध्यम से युवा पीढ़ी सहित पूरे समाज के सदस्यों को इस रेप संस्कृति के दलदल में धकेला जा रहा है।
जहां एक तरफ भारत सहित पूरी दुनिया में पैसे के आधार पर शारीरिक संबंध स्थापित करने की कानूनी व्यवस्था है वहीं दूसरी तरफ हमारे प्राचीन मूल्यों पर आधारित भारतीय समाज में वयस्क लड़के-लड़कियों को प्रेम करने, विवाह करने और दोनों की रजामंदी से शारीरिक जरूरत को पूरा करने में कठोर बंदिशें हैं। जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, परंपरा, संस्कृति, समुदाय, आर्थिक हैसियत आदि सच्चे प्रेम के रास्ते में बहुत बड़ा बाधक बना हुआ है। दो लड़की-लड़कों का आपस में एक साथ बैठना, बात करना, दोस्ती स्वरूप एक दूजे का हाथ पकड़कर चलना आदि को शक की निगाहों से देखा जाता है,  उत्तर प्रदेश में संस्कृति के तथाकथित ठेकेदारों के द्वारा प्रेमी युगलों की पिटाई तक कर दी जाती है।
इस वजह से दो वयस्क लड़का-लड़की का सच्चा प्यार व स्वाभाविक मिलन असंभव हो जाता है। हमें यह ख्याल रखना चाहिए कि दोनों की रजामंदी से शारीरिक मिलन होना कोई गलत काम नहीं है; बल्कि शारीरिक मिलन की इच्छा होना प्राकृतिक बात है। लेकिन इस पर समाज की अत्यधिक बंदिशें व कट्टरता ही प्रेम करने और प्रेम विवाह करने के पथ का सबसे बड़ा बाधक है।
जहां एक तरफ वयस्क पुरुष-महिला का शारीरिक संबंध बनाना प्राकृतिक जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ सच्चा प्रेम व आपसी सहमति से संबंध बनाने में पाबंदी है और वहीं तीसरी तरफ पैसे के आधार पर संबंध बनाने की कानूनी व्यवस्था मौजूद है, ऐसे में शारीरिक संबंध स्थापित करना एक अति महत्वपूर्ण व मूल्यवान कार्य बन जाता है। ऐसी स्थिति में उच्च आर्थिक हैसियत वाले लोग बाजार से इस तथाकथित सेवा-सुविधा को खरीद कर अपनी प्यास बुझाने में सक्षम हो जाते हैं। घर-परिवार चलाने लायक आय करने वाले युवक विवाह कर लेते हैं।
 “लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था की अनिवार्य उपज – बेरोजगारी की मार झेल रहे युवा पीढ़ी न तो बाजार से इस सेवा-सुविधा को खरीद पाते हैं और न ही अपना परिवार बसा पाते हैं। इस वजह से बलात्कारियों में यही आवारा, बेरोजगार नौजवानों की संख्या सर्वाधिक है। इसका यह कदापि मतलब नहीं कि बलात्कार सिर्फ बेरोजगार युवा पीढ़ी ही करते हैं और नौकरी कर रहे या विभिन्न पेशा में शामिल प्रौढ़ लोग नहीं करते हैं। इसका मतलब यह है कि महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानने वाले सभी पूंजीवादी-पितृसत्तात्मक विचारधारा के लोग बलात्कार की संस्कृति से ग्रसित हैं और मौका पाने पर बलात्कार की घटना को अंजाम भी देते हैं।”
हमारे समाज में लड़कियों को पढ़ने-लिखने, आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-प्रगतिशील  सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होने व प्रगतिशील सामाजिक संगठनों में भागीदारी करने का बराबर का अधिकार प्राप्त नहीं है। इस वजह से लड़कियां शारीरिक, बौद्धिक व सांगठनिक रूप से कमजोर हो जाती हैं। फलत: छेड़खानी या उनका पीछा करने वालों से वह काफी डर जाती हैं और तथाकथित लोक-लाज के भय से चुप हो जाती है। यही डर बलात्कारियों का हौसला अफजाई करता है।
“महिलाओं के निजी अंगों में तथाकथित इज्जत/मर्यादा होने की पिछड़ी/सड़ी हुई सामंती मान्यताओं की वजह से कई अपराधी लड़कियों से बलात्कार पितृसत्तावादी सबक सिखाने और पारिवारिक, आर्थिक दुश्मनी निकालने के लिए भी करते हैं और इसी इज्जत के नाम पर लड़कियों के साथ हुई हिंसा/यौन हिंसा पर पीड़िता/परिवार/रिश्तेदार चुप्पी भी साध लेते हैं। समाज को इन अवैज्ञानिक और गलत मान्यताओं से मुक्त होना जरूरी है।”
बलात्कार जैसी घटनाओं की न्यायिक प्रक्रिया को विलंबित किया जाना, बलात्कार पीड़ित परिवार को सरकारी मुआवजा दिया जाना एवं  सत्ता व विभिन्न संगठनों के द्वारा धनाढ्य बलात्कारियों को बचाने की कोशिश करना बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा ही देते हैं। इस वजह से दिन-प्रतिदिन यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है।
  •  महिलाओं को उपभोग की वस्तु माना जाना।
  •  महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में विकसित कर उसका व्यापार-वाणिज्य करना।
  •  वयस्क लड़के-लड़कियों को सच्चा प्रेम करने, विवाह करने एवं आपसी सहमति से शारीरिक जरूरतों को पूरा करने नहीं दिया जाना‌।
  •  बढ़ती हुई आर्थिक संकट व बेरोजगारी के कारण परिवार बसाने में युवा पीढ़ी का सक्षम ना हो पाना।
  • लड़कियों का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना व सांगठनिक रूप से एकजुट ना रहना। 
  •  धनाढ्य बलात्कारियों को सत्ता व विभिन्न प्रतिगामी विचार के संगठनों के द्वारा बचाने की कोशिश किया जाना।
  • बलात्कार पीड़ित परिवार को सरकारी अनुदान दिया जाना।
  •  न्यायिक प्रक्रिया को विलंबित किया जाना। आदि।

हर प्रकार के नफरतों को मिटाकर सच्चा प्रेम व प्रेम विवाह को प्रोत्साहित करना होगा; महिला-पुरुष सभी को रोज़गार देकर आत्मनिर्भर बनाना होगा; फार्स्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना ज्यादा से ज्यादा करनी होगी;  बलात्कारियों की संपत्ति को सरकारी कब्जे में लेकर उससे पीड़ित परिवार को मुआवजा प्रदान करना होगा, अदालतों में पर्याप्त संख्या में जज व संबंधित कर्मचारियों की बहाली करनी होगी और संकटग्रस्त पूंजीवादी  सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को बदलकर  समतामूलक, शोषणविहीन नवीन समाज को बनाने के लिए संघर्ष करना होगा अर्थात् एक शब्द में कहे तो ‘इंकलाब’ लाना होगा।

विज्ञान हमें बताता है कि बीमारी के वास्तविक कारणों को दूर कर देने से
बीमारी भी क्रमशः समाप्त हो जाती है। बलात्कार के उपरोक्त कारणों से स्पष्ट है कि इस समस्या का वास्तविक और स्थाई समाधान करने के लिए हमें हमारे समाज से बचे-खुचे सामंती आधार पर चोट करनी होगी; नारियों को उपभोग की बिकाऊ वस्तु बनाने वाली पूंजीवादी पितृसत्तात्मक मानसिकता को चकनाचूर करना होगा
विद्यार्थी राहुल

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here