प्रेमचंद और तुलसीदास

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प्रेमचंद और तुलसीदास–दोनों का तुलनात्मक दृष्टि से विचार करना बड़ा अजीब लगता है। एक भक्ति काल के सबसे  बड़े  और सर्वश्रेष्ठ राम भक्ति का जन-जन में प्रचार प्रसार करने वाले भक्त कवि और दूसरे आधुनिक हिंदी साहित्य के कीर्ति स्तंभ युग प्रवर्तक साहित्यकार । दोनों ने अपने- अपने ढंग से  भाव ,  विचार और संवेदना  की अभिव्यंजना की है। दोनों का चिंतन विराट है। दोनों मानवतावादी चिंतक हैं और अपने युगबोध को प्रकट करते हैं।
 दोनों को ही अपने जीवन में  कटु अनुभवों को झेलना पड़ा था। तुलसी पर भी बहुत कुछ लिखा गया और प्रेमचंद पर भी । दोनों ही समाज में बदलाव और सुधार की परिकल्पना करते हैं। तुलसीदास रामराज्य लाने का राम के माध्यम से अनुग्रह करते हैं उनका यह आग्रह भारतीय धर्म और संस्कृति से ओतप्रोत है। उसे कहते हैं जिसे धारण किया जाए। अथवा जो हमारे लिए धारणीय चीज है वही है धर्म। कहना नहीं होगा कि प्रेमचंद ने भी 31 जुलाई 1880 को जन्म लेकर भारत की धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए निरंतर और सतत प्रयत्नशील रहे। किसान हो या मजदूर, अनपढ़ हो या शिक्षित, नौकरी पेशा से जुड़े लोग हों या बेरोजगार– सबों के प्रति प्रेमचंद के मन में अपार श्रद्धा का भाव है। उनमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं है। उन्हें किसी चीज की आकांक्षा नहीं है। ना धन की आकांक्षा ना कीर्ति की आकांक्षा। लेकिन एक चीज है जो लगातार प्रेमचंद को परेशान किए हुए हैं और वह है भारत को स्वतंत्र देखना। तत्कालीन पूंजीवादी व्यवस्था अथवा जमीदारी प्रथा ने जिस तरह से आम आदमी को तबाह और परेशान कर के रख दिया  था उससे प्रेमचंद बुरी तरह आहत थे। नारी के प्रति भी प्रेमचंद में अपार श्रद्धा का भाग देखने को मिलता है जिस तरह हमारे भक्त कवि तुलसीदास के काव्य में। तुलसीदास जी ने लिखा —
कत बिधि सृजि नारी जग माहीं ।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।।
 तो प्रेमचंद  के विचार हमें “प्रेमचंद घर में” शीर्षक पुस्तक में  इस तरह देखने को मिलता है–
“उनके दिल में स्त्री जाति के प्रति श्रद्धा थी। वह स्त्रियों को पुरुष से बड़ा समझते थे।”
 मूलतः प्रेमचंद गांधी युग  के एक ऐसे कथाकार थे जिन्होंने गांधीजी के आदर्शों को अपनी रचनाओं के केंद्र बिंदु में रखा। अपनी कहानी को पुरानी राह से निकालकर नई राह की ओर प्रवृत्त किया। लेकिन यथार्थ की भूमि पर अपने प्रगतिशील जीवन मूल्यों के साथ। इनकी कहानियों में इतनी विविधता, कितने विविध पात्र और इतनी सारी विभिन्न परिस्थितियां हैं कि इनके साहित्य को पढ़ते ही मन मुग्ध हो उठता है। प्रेमचंद स्पष्ट कहते हैं कि ‘उनके लिए घटना का कोई स्वतंत्र महत्व नहीं है। उनका महत्व केवल पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करने की दृष्टि से ही है– बिल्कुल उसी तरह जैसे शालिग्राम भगवान स्वतंत्र रूप से केवल पत्थर का एक गोल टुकड़ा है लेकिन भक्त और उपासक की श्रद्धा से प्रतिष्ठित होकर वह देवोपम गरिमा को प्राप्त हो जाता है अर्थात वह प्रतिष्ठित होकर देवता बन जाता है। सच्चाई यह है कि गल्प का आधार घटना नहीं, बल्कि अनुभूति है और वही अनुभूति हमें विशेष और सार्थक रचना के लिए प्रेरित करती है।’ यही कारण है कि सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ रामविलास शर्मा ने कहा था– ‘प्रेमचंद की कहानियों की विविधता विभिन्न पात्रों का भारी जमाव आश्चर्यजनक है। उनकी कहानियों की विषय वस्तु में जितनी विविधता है उतनी कम कथा कारों के यहां मिलेगी ।  उनके  चरित्र- चित्रण की यह बहुत बड़ी सफलता है कि  थोड़ी देर के संपर्क से ही  उनके पात्र बहुत दिनों के परिचित  जैसे लगने लगते हैं  और  कहानी खत्म देने पर भी पाठक को बहुत दिनों तक याद रहते हैं ।’
 सच तो यह है कि उनकी कहानी पूस की रात हो या पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी हो या ईदगाह– प्रायः सभी कहानियों में जीवन का एक ऐसा सच्चा अनुभव है जो हमें बहुत देर तक सोचने के लिए विवश कर देता है। इसी तरह गुल्ली- डंडा, बूढ़ी काकी, सद्गति, शतरंज के खिलाड़ी और दो बैलों की कथा आदि ऐसी कहानियां है जिसके माध्यम से हम आज उस समय के समाज और व्यक्ति के स्वभाव के साथ-साथ समाज में चली आ रही परंपरा का भी अवलोकन करते हैं। सच पूछा जाए तो प्रेमचंद की कहानियां ना सिर्फ चर्चित रही हैं बल्कि पीढ़ियों के जेहन में घर भी कर गई हैं। समय-समय पर दूरदर्शन धारावाहिक के माध्यम से प्रेमचंद की कहानियों का दर्शन होता रहा है, यह अच्छी बात है।  किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि उनके विभिन्न साहित्य को लगातार दिखलाया जाना चाहिए।
पंडित विनय कुमार

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