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गाँधी जी और शास्त्री जी पर केंद्रित कविताओं का संकलन

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आज महात्मा गांधी जी और लालबहादुर शास्‍त्री जी की जयंती है। एक तरफ  गांधी जी ने भारतीयों के दिलों में अंग्रेजों खिलाफ  लड़ने का जज़्बा पैदा किया और साथ ही मनुष्य के अंदर पल रहे गलत विचारों को दूर करके समाज सेवा में लगने की प्रेरणा दी।वहीं दूसरी तरफ शास्त्री जी ने राजनीति में सादगी का नया प्रतिमान स्थापित किया।दोनों महान विभूतियों को सादर नमन करते हुए कुछ कविताओं का संकलन किया है।ये संकलन उनके योगदान को समर्पित है।

प्यारे बापू
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“हम सब के थे प्यारे बापू
सारे जग से न्यारे बापू
जगमग-जगमग तारे बापू
भारत के उजियारे बापू
लगते तो थे दुबले बापू
थे ताक़त के पुतले बापू
नहीं कभी डरते थे बापू
जो कहते करते थे बापू
सदा सत्य अपनाते बापू
सबको गले लगाते बापू
हम हैं एक सिखाते बापू
सच्ची राह दिखाते बापू
चरखा खादी लाए बापू
हैं आज़ादी लाए बापू
कभी न हिम्मत हारे बापू
आँखों के थे तारे बापू।”
-सियाराम शरण गुप्त

युगावतार गांधी

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“चल पड़े जिधर दो डग मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गये कोटि दृग उसी ओर,
जिसके शिर पर निज धरा हाथ
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गये उसी पर कोटि माथ;
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख;
तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना;
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,
युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार!
तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़
रचते रहते नित नई सृष्टि,
उठती नवजीवन की नींवें
ले नवचेतन की दिव्य-दृष्टि;
धर्माडंबर के खँडहर पर
कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर
निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!
बढ़ते ही जाते दिग्विजयी!
गढ़ते तुम अपना रामराज,
आत्माहुति के मणिमाणिक से
मढ़ते जननी का स्वर्णताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने
दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुँह से
ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़;
पिसती कराहती जगती के
प्राणों में भरते अभय दान,
अधमरे देखते हैं तुमको,
किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!
कँपता असत्य, कँपती मिथ्या,
बर्बरता कँपती है थरथर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट
कँपते, खिसके आते भू पर,
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित,
सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है,
उड़ता है तेरा ध्वज निशान!
हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खँडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!”
– सोहनलाल द्विवेदी

बापू !

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“ओ चिर-संयम की तपो मूर्ति !
तपो-व्योम के विभ्राट्
परिव्राजक सम्राट् !
दर्शन-गिरि-श्रृंग !
विश्व-वन्द्य बापू !
अब आओ,
आओ,
भारत को तुम्हारी आज
बेहद ज़रूरत है।
यह आर्यावर्त्त, महान साधना
औ चरित्र का महादेश
जिसे तुमने अपने
श्रम-सीकरों से सीचां था
असमय ही मुरझा गया
इस बाग़ के घेरे में
जीवन स्थिर, गतिहीन हो गया है
इसीलिए,
रंगीन क्यारियों में कीचड़ नज़र आता है
अस्तु, आओ
भानु रश्मियों से रञ्जित संदेश लिए तुम आओ
पंकज के पीले पराग में मृदु मधु बनकर आओ
हेम रंजिता भूमि-पटी पर प्रेम सुलिपि लिख जाओ
विश्व – बन्द्य बापू !
अब आओ !
और देखो-
‘रघुपति राघव राजा राम‘
की धरती पर
हिंसा का अकाण्ड
ताण्डव देखो,
देखो,
तुम्हारी अहिंसा-आस्था
और ईमान की गीता
आधुनिकता की रंगीन मधुशालाओं में
वेश्या बनकर
ठुमुक ठुमुक कर
नाच रही है
दो दानों की उम्मीद लिए
जिन्दगी सलाम बन गयी है
बेताज बादशाही मन की
हस्ती गुमनाम हो गई है
मजदूरी से घर की दुनिया
मरघट की शाम बन गई है
बापू !
तेरी कुर्बानी की
पालित-पोषित प्यारी बेटी
प्रौढ़ावस्था में इतस्ततः
बारूदी घेरे में निशि – दिन
प्राणों की रक्षा में आकुल
आखिरी साँस गिन रही है
अस्तु, अब
आओ, आओ,
विश्व – वंद्य बापू
अब आओ।।
भारत को तुम्हारी
आज बेहद ज़रुरत है !!”
-जगन्नाथ त्रिपाठी

गाँधी के प्रति
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“तुम शुद्ध बुद्ध की परम्परा में आये
मानव थे ऐसे, देख कि देव लजाये
भारत के ही क्यों, अखिल लोक के भ्राता
तुम आये बन दलितों के भाग्य विधाता!
तुम समता का संदेश सुनाने आये
भूले-भटकों को मार्ग दिखाने आये
पशु-बल की बर्बरता की दुर्दम आंधी
पथ से न तुम्हें निज डिगा सकी हे गाँधी!
जीवन का किसने गीत अनूठा गाया
इस मर्त्यलोक में किसने अमृत बहाया
गूँजती आज भी किसकी प्रोज्वल वाणी
कविता-सी सुन्दर सरल और कल्याणी!
हे स्थितप्रज्ञ, हे व्रती, तपस्वी त्यागी
हे अनासक्त, हे भक्त, विरक्त विरागी
हे सत्य-अहिंसा-साधक, हे सन्यासी
हे राम-नाम आराधक दृढ़ विश्वासी!
हे धीर-वीर-गंभीर, महामानव हे
हे प्रियदर्शन, जीवन दर्शन, अभिनव है
घन अंधकार में बन प्रकाश तुम आये
कवि कौन, तुम्हारे जो समग्र गुण गाये?”
– मुकुटधर पांडेय

 गाँधी!
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“एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय हिंसा,
कुटिल विज्ञान बल से हो समंवित,
धर्म, संस्‍कृति, सभ्‍यता पर डाल पर्दा,
विश्‍व के संहार का षड्यंत्र रचने में लगी थी,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था!
एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अन्‍याय ने पशु-बल सुरा पी-
उग्र, उद्धत, दंभ-उन्‍मद-
एक निर्बल, निरपराध, निरीह को
था कुचल डाला
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?
एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अधिकार, शोषण, स्‍वार्थ
हो निर्लज्‍ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्‍द्व
सद्य: जगे, संभले राष्‍ट्र में घुन-से लगे
जर्जर उसे करते रहे थे,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि मिलती न हिंसा को चुनौ‍ती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि अन्‍याय की ही जीत होती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
जाति स्‍वतंत्र होकर
यदि न अपने पाप धोती!”
– हरिवंशराय बच्‍चन

बापू
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“चरमोन्नत जग में जब कि आज विज्ञान ज्ञान,
बहु भौतिक साधन, यंत्र यान, वैभव महान,
सेवक हैं विद्युत वाष्प शक्ति: धन बल नितांत,
फिर क्यों जग में उत्पीड़न? जीवन यों अशांत?
मानव नें पाई देश काल पर जय निश्चय,
मानव के पास नहीं मानव का आज हृदय!
चर्वित उसका विज्ञान ज्ञान: वह नहीं पचित;
भौतिक मद से मानव आत्मा हो गई विजित!
है श्लाघ्य मनुज का भौतिक संचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमें विकास?
चाहिये विश्व को आज भाव का नवोन्मेष,
मानव उर में फिर मानवता का हो प्रवेश!
बापू! तुम पर हैं आज लगे जग के लोचन,
तुम खोल नहीं जाओगे मानव के बंधन?”
– सुमित्रानंदन पंत

गाँधी
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“देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
“जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !”
सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था ।
तब भी हम ने गाँधी के
तूफ़ान को ही देखा,
गाँधी को नहीं ।
वे तूफ़ान और गर्जन के
पीछे बसते थे ।
सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफ़ान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे ।
तूफ़ान मोटी नहीं,
महीन आवाज़ से उठता है ।
वह आवाज़
जो मोम के दीप के समान
एकान्त में जलती है
एकान्त में जलती है,
और बाज नहीं।
कबूतर के चाल से चलती है ।
गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाजों के भी बाज थे ।
क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।”
                      – रामधारी सिंह दिनकर
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि…
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“बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या भजते होते तुमको
ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे – ?
सर के बल खड़े हुए होते
हिंदी के इतने लेखक-कवि?
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो लोकमान्य से क्या तुमने
लोहा भी कभी लिया होता?
दक्खिन में हिंदी चलवाकर
लखते हिंदुस्तानी की छवि,
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या अवतार हुए होते
कुल के कुल कायथ बनियों के?
दुनिया के सबसे बड़े पुरुष
आदम, भेड़ों के होते भी!
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या पटेल, राजन, टंडन,
गोपालाचारी भी भजते- ?
भजता होता तुमको मैं औ´
मेरी प्यारी अल्लारक्खी !
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि !”
– सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

गांधी के चित्र को देखकर
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“दुख से दूर पहुँचकर गाँधी।
सुख से मौन खड़े हो
मरते-खपते इंसानों के
इस भारत में तुम्हीं बड़े हो
जीकर जीवन को अब जीना
नहीं सुलभ है हमको
मरकर जीवन को फिर जीना
सहज सुलभ है तुमको।”
– केदारनाथ अग्रवाल

 तीनों बंदर बापू के
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“बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के !
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के!
ज्ञानी निकले,ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!………
– नागार्जुन

तुम कागज पर लिखते हो
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“तुम काग़ज़ पर लिखते हो
वह सड़क झाड़ता है
तुम व्यापारी
वह धरती में बीज गाड़ता है ।
एक आदमी घड़ी बनाता
एक बनाता चप्पल
इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा
इसमें क्या बल ।
सूत कातते थे गाँधी जी
कपड़ा बुनते थे ,
और कपास जुलाहों के जैसा ही
धुनते थे
चुनते थे अनाज के कंकर
चक्की पीसते थे
आश्रम के अनाज याने
आश्रम में पिसते थे
जिल्द बाँध लेना पुस्तक की
उनको आता था
भंगी-काम सफाई से
नित करना भाता था ।
ऐसे थे गाँधी जी
ऐसा था उनका आश्रम
गाँधी जी के लेखे
पूजा के समान था श्रम ।
एक बार उत्साह-ग्रस्त
कोई वकील साहब
जब पहुँचे मिलने
बापूजी पीस रहे थे तब ।
बापूजी ने कहा – बैठिये
पीसेंगे मिलकर
जब वे झिझके
गाँधीजी ने कहा
और खिलकर
सेवा का हर काम
हमारा ईश्वर है भाई
बैठ गये वे दबसट में
पर अक्ल नहीं आई ।”
– भवानीप्रसाद मिश्र

 गांधीजी के जन्मदिन पर
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“मैं फिर जनम लूंगा
फिर मैं
इसी जगह आउंगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा ।
इस समूह में
इन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता !
पर इन आवाजों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा ।
मेरी तो आदत है
रोशनी जहाँ भी हो
उसे खोज लाऊँगा
कातरता, चु्प्पी या चीखें,
या हारे हुओं की खीज
जहाँ भी मिलेगी
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा ।
जीवन ने कई बार उकसाकर
मुझे अनुलंघ्य सागरों में फेंका है
अगन-भट्ठियों में झोंका है,
मैने वहाँ भी
ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किये
बचने के नहीं,
तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ?
तुम मुझकों दोषी ठहराओ
मैने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है
पर मैं गाऊँगा
चाहे इस प्रार्थना सभा में
तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ
मैं मर जाऊँगा
लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा
कल फिर आऊँगा ।”
– दुष्यंत कुमार

गांधीजी
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“गांधी जी
कहते थे–
‘अहिंसा’
और डंडा लेकर
पैदल घूमते थे ।”
– उदय प्रकाश

गांधी! 
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“आज हमारी श्वासों में जीवित है गांधी,
तम के परदे पर मन के ज्योतित है गांधी,
जिससे टकरा कर हारी पशुता की आँधी !
सिहर रही हैं गंगा, यमुना, झेलम, लूनी,
प्राची का यह लाल सबेरा लख कर ख़ूनी,
आज कमी लगती जग को पहले से दूनी !
पर, चमक रही है मानव आदर्शों की ज्वाला,
जिसको गांधी ने तन-मन के श्रम से पाला,
हर बार पराजित होगा युग का तम काला !
बुझ न सकेगी यह जन-जीवन की चिनगारी,
बढ़ती ही जाएगी इसकी आभा प्यारी,
निश्चय ही होगी वसुधा आलोकित सारी !”
– महेन्द्र भटनागर

महात्मा गांधी
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‎”कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!
दुनिया गो थी दुश्मन उसकी दुश्मन था जग सारा ।
आख़िर में जब देखा साधो वह जीता जग हारा ।।
कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!
सच्चाई के नूर से उस के मन में था उजियारा ।
बातिन में शक्ती ही शक्ती ज़ाहर में बेचारा ।।
कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!
बूढ़ा था या नए जनम में बंसी का मतवारा ।
मोहन नाम सही था पर साधो रूप वही था सारा ।।
कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!
भारत के आकाश पे वो है एक चमकता तारा ।
सचमुच ज्ञानी, सचमुच मोहन सचमुच प्यारा-प्यारा ।।
कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!”
– साग़र निज़ामी

अब भारत नया बनाएँगे,
हम वंशज गाँधी के
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“अब भारत नया बनाएँगे, हम वंशज गाँधी के
पुस्तक-अख़बार जलाएँगे, हम वंशज गाँधी के
जनता की पीर हुई बासी, क्या मिलना गाकर भी
बस वंशावलियां गाएँगे, हम वंशज गाँधी के
बापू की बेटी बिकी अगर, इसमें हम क्या कर लें
कुछ नारे नए सुझाएँगे, हम वंशज गाँधी के
खाली हाथों से शंका है, अपराध न हो जाए
इन हाथों को कटवाएँगे, हम वंशज गाँधी के
रथ यात्रा ऊँची कुर्सी की, जब-जब भी निकलेगी
पैरों में बिछते जाएँगे, हम वंशज गाँधी के।”
-ऋषभदेव शर्मा

 गांधी की विरासत
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“उसने कहा
बुरा मत देखो
और हमने आंखें
बंद कर लीं
धृतराष्ट्र तो अंधा था
हमने साबुत आंखों
के बावजूद पसंद किया
अंधे की तरह जीना
हम कुछ नहीं देखते
पता नहीं क्या
बुरा दिख जाये
हमारी आंखें बंद हैं
तो मन भला-चंगा है
हमारी कठौती में गंगा है
उसने कहा
बुरा मत सुनो
और हमने सुनना
बंद कर दिया
बहरे हो गय हमे
नहीं पहुंचतीं हम तक
अब किसी की चीखें
किसी पीड़ित की
व्याकुल पुकार
अत्याचार से दम
तोड़ते आदमी का
करुण आर्तनाद
विचलित नहीं करता हमें
उसने कहा
बुरा मत बोलो
मसीहे की बात
कैसे नहीं मानते हम
हम जो भी बोलते हैं
भला बोलते हैं
लोग न समझें तो
हमारा क्या दोष
गूंगे नहीं बन सकते हम
उसकी विरासत
संभालनी है हमें
आजादी बचानी है
लोकतंत्र जमाना है

बहुत भार है हमारे
नाजुक कंधों पर
निभाना तो पड़ेगा
बेजुबान होकर
कैसे रह सकेंगे
कभी अक्षरधाम
कभी कारगिल
कभी दांतेवाड़ा
बहादुरों के जनाजों पर
राष्ट्रगान गाना तो पड़ेगा

वह मसीहा था
बहुत समझदार
नेक और ईमानदार
उसका चौथा बंदर
कभी आया ही नहीं
हमसे यह कहने
कि कुछ करो भी
जनता के लिए
देश के लिए
फिर भी हम नहीं भूले
अपना करणीय
कर्म पथ से नहीं हटे
आइए कभी हमारे
गांव, हमारे शहर
कोई दिक्कत नहीं होगी
जहाज उतर सकता है
ट्रेन भी जाती है वहां से
जगमग, जगमग
जहां दिखे, समझना
हमारा घर आ गया
होटल हैं, स्कूल हैं
अस्पताल हैं
गांव में अब कहां
किस चीज का अकाल है
कर्मयोगी रहे हम
गांधी के सच्चे अनुयायी
सुख-संपदा तो यूं ही
बिन बुलाये चली आयी
सब बापू का है
सब बापू के नाम
उस महात्मा को प्रणाम।”
-सुभाष राय

जिंदा होने का सबूत
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थोड़ा उदास हूँ
कुछ अपने लिए
कुछ तुम्हारे लिए
कुछ दोस्तों के लिए
कुछ ज़माने के लिए
यह कहना कि मैं सिर्फ ज़माने के लिए
दुखी और उदास हूँ
एक धोखे के सिवा कुछ भी नहीं है
यह  कहते
उत्तर गाँधी तो कोई बात होती
लेकिन इन दिनों जब कहते हैं बहुत से लोग यही बात
तो काँटा-सा चुभता है कहीं
और बहने लगता है रक्त तेज और तेज और तेज
धमनियों की ताकत को पछाड़ते हुए
साधो!
रक्त वही नहीं है जो बहा दिया जाता है सड़कों पर
रक्त वह भी है
जो आँख से टपक पड़ता है
और सबूत दे जाता है जिंदा होने का।”
– जितेंद्र श्रीवास्तव

हम तेरे वारिस हैं बापू
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“बापू !
तुम्हारे देश में पैदा होने का
फ़र्ज़ निभा दिया
तुमने पत्थरों में देशभक्ति जगा दी थी
हमने देशभक्ति को पथरा दिया
तुमने बीसवीं सदी की राजनीति में
करुणा की नींव रखी तो हमने उसकी
ईंट से ईंट बजा दी
तुम गिराते रहे जो दीवारें
हमने उनको फिर से बनाया
और उनपर तुम्हारी हँसती हुई तस्वीर सजा दी।”
– विनय विश्वास

हत्या होगी 

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एक बार कहा उन्होंने
डेढ़ सौ साल जीना चाहता हूँ
फिर कहा, एक सौ बीस साल
फिर एक सौ दस और सौ साल पर आए
आगे चलकर नब्बे साल तक जीने की इच्छा जताई
वे अपनी उम्मीद की आयु कम करते गए धीरे-धीरे।
एक वक्त आया जब लोग जयंती मना रहे थे उनकी
उन्होंने कहा 79 का हो गया ,
अब जीने की अच्छा बची नहीं मुझमें
यह 2 अक्टूबर 1947 की सुबह थी।
वे देख रहे थे
लोग मुख्तलिफ थे, देश उनका न था
लोग वे नहीं जिनके लिए वे जिए और लड़े।
हत्यारे घूम रहे थे चारो तरफ
हालाँकि कहीं से हत्यारे नजर नहीं आते थे
वे सीधे-साधे सफेदपोश सरल लोग
खास तरह की मासूमियत दिखती उनके चेहरों पर
साथ-साथ आगे-पीछे चलते लोग।
वे देख रहे थे
इनमें से कोई एक हत्या करेगा उनकी
और दूसरे अनेक दूसरों की।
वे देख रहे थे
अहंसा की भभूत के भीतर
हिंसा की चिनगी सुलग रही थी।
देख लिया था उन्होंने
अहिंसक कोई न था
वह भी नहीं जिसका नाम लेकर वे जिए और मरे।
वे देख रहे थे
डेढ़ सौ साल बाद
जब उनकी जयंती मनाई जा रही थी डेढ़ सौवीं
वेैसे ही
सफेदपोश सीधे-साधे सरल लगते लोग
घूम रहे थे हर तरफ
वे कहीं से हत्यारे नहीं लगते थे न बलात्कारी
पर सबके भीतर मौजूद था एक हत्यारा
एक मर्द एक बलात्कारी मौजूद था।
बलात्कारियों की रक्षा करने वाले
अनेक दूसरे बलात्कारी थे उनसे बड़े
उनका संरक्षण करने वाला
पूरा तंत्र था बलात्कारियों और हत्यारों का
स्त्रयाँ जिन्हें प्रिय थी गोश्त की तरह
हत्या जिनका शगल था स्वाद की तरह
गाँधी देख रहे थे यह
अपनी हत्या के ठीक पहले
देख रहे थे
उनकी हत्या होगी बार-बार।
-राकेश रेणु

 गांधी मुझे मिला 

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“गांधी
मुझे मिला
गांधी चौक में
पीपल की छाँव तले
खोमचे के पीछे
ओटले पर खड़ा-खड़ा
अपनी नाक खुजाता
बिना चश्मा लगाए
कभी चाट
कभी फल
कभी चाय
कभी कपड़े
वगैरह बेचता हुआ
वह घिरा था
अपनों से
चेलों से
अनुयायियों से
नेताओं से और
पूंजीपतियों से
इनमें से कोई नहीं चाहता
कि गांधी
दिखाई दे
जनता को और
सार्थक करे चौक का नाम
क्योंकि इसके लिए
किसी न किसी को
करना होता जतन
और यदि कोई जतन होता तो,
घेरा कम होता
धरना अनशन वगैरह के लिए
जगह कम न पड़ती
इसलिए वे नहीं चाहते
कि घेरा कम हो
गांधी जनता को दिखे
भले ही लगाता रहे
गांधी!
खोमचा
रेहड़ी वगैरह वगैरह
और चिल्लाता रहे
”सेब पपड़ी चना चबेनावालाजी“।”
-असंगघोष

डर
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“इसी बात का डर था
कि भेड़िये भी
खोलकर बैठ जाएंगे
शब्दकोष और विश्वकोश
और तलाशेंगे
अनशन और उपवास का अर्थ….
इसी बात का डर था
कि भेड़िये भी
चढ़ाएंगे गुलाब की पंखुड़ियाँ
गांधी की समाधि पर……
इसी बात का डर था
कि भेड़िये भी गुनगुनाएंगे
गांधी का प्रिय भजन
वैष्णव जन तो तेणे कहिये…
डर इसी बात का था ।”
-मणि मोहन मेहता

पृथ्वी परिक्रमा …..पढ़ते हुए
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“पूरब ग़रीब है
पर नगदी को पकड़े है
पश्चिम उधारवादी है
पर  किस्तों पर इसकी धुरी है
पूरब में वर्जना की अति है
पश्चिम में खुलेपन की
स्पर्श खुले ख़ज़ाने  सा सहज
और गुह्य की खोज में सब परेशान
पूरबी गुह्य का आकर्षण
वासना के वेग सा क्षणिक नहीं
गुह्य को तोपना वर्जना की अति है
वेग को कसना ही यात्रा की मंज़िल
गाँधी की बातें अभी राख से ढकी हैं
चिंगारी को अमरत्व प्रदान है
राख को नहीं
यह कभी भी आग बन सकती है
इतिहास धधका, थंका जली
हिन्दुस्तान के असली संग्रालय ध्वस्त हुए
चीन ने इतिहास को रौंदा जिसकी चिन्दी
लंदन, अमेरिका समेटते फिर रहे हैं
भारत के हाथ सिर्फ दलाई लामा लगे।”
– यतीश कुमार

गान्ही बाबा
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गान्ही बाबा रहलैं एक
अंग्रेजन का देहलैं फेंक
अईसन चललैं आपन चाल
बदलल सत्ता बदलल काल
सच कै दामन अउर अहिंसा
ना हथियार ना कउनो पइसा
जात-पांत के तूरै खातिर
हिंदू-मुस्लिम जोरै खातिर
घुमलैं शहर-शहर औ गाँव
आपन प्रान लगउलैं दांव
आजदी वै भले देवउलैं
लेकिन नाहीं जसन मनउलैं
दंगा-आग बुझावत घूमिन
पद ना लइकै धरती चूमिन
एक दुष्ट रहल नाथू राम
आग लगाइब जेकर काम
धरम कै अंधा करम कै हीन
बापुक मारिस गोली तीन
हे राम कहि वै गिर गइलैं
पर मरि कै भी नाहीं मरलैं
दुनिया उन्हैं करै परनाम
गूँजै वनके चहुँ दिस नाम
चला पढ़ी कुछ जानी वन्हैं
बस सुनि कै ना मानी वन्हैं
अबहीं नाथुक वंसज जिन्दा
करा लैं गान्ही बाबक निंदा
अइसन गद्दारन का चीन्हौं
कंकर नाहीं मोतिन बीनौ।”
-आलोक कुमार मिश्र

लाल बहादुर शास्त्री

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“हाय गजब कैसी करी ये दुश्मन नें चाल।
ताशकन्द में उठ गया भारत माँ कौ लाल॥
भारत माँ कौ लाल वात मित्रन ने कीनी।
घर में लियौ बुलाय, धौंस बहुतेरी दीना॥
जबरन सन्धि कराया कै, दस्तखत लिये कराय।
हाय हमारौ शास्त्री, मुख न दिखायौ आय॥”
– नाथ कवि

लाल बहादुर शास्त्री
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“भारत-माँ के लाल बहादुर

शास्त्री जी तुम कहलाए।
सीधे-सादे छोटे-से थे
काम बड़े कर दिखलाए।
शांति तुम्हें प्यारी थी लेकिन
उससे भी प्यारा थी देश
युद्ध छिड़ा तो दिया तुम्ही ने
बढ़ते जाने का आदेश।
तुम ने जय बोली जवान की
जय किसान की भी बोले।
अच्छी पैदावार न हो तो
काम न कर सकती गोली।”
-बालस्वरूप राही
संकलन -नीरज कुमार मिश्र
(कविता कोश के साथ सभी कवियों का आभार )

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