डा. नूर फ़ात्मा “नूर” मुग़लसराय- वाराणसी द्वारा लिखी गई गज़लें

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ज़िन्दगी इक हुबाब है सचमुच
शायर / जनाब आसी यूसुफ़पुरी साहब

हुस्न जब बेनक़ाब है सचमुच
इश्क़ भी कामयाब है सचमुच

उनके आने से सज गई महफ़िल
ज़िंदगी इक शबाब है सचमुच

जब भी देखा तो दिल पुकार उठा
उनका चेहरा गुलाब है सचमुच

ऐसा महसूस भी हुआ है मुझे
ज़िंदगी इक किताब है सचमुच

क्या भरोसा करू किसी पल का
ज़ीस्त मिस्ले हुबाब है सचमुच

ये सफ़र भी गुज़र गया तन्हा
उनसे मिलना सराब है सचमुच

इस करोना से ज़िंदगी सब की
बन गई इक अज़ाब है सचमुच

ऐसे हालात बन गए है अब
हर अम्ल बेहिसाब है सचमुच

किस से बोलूँ किसे क़िताब करू
हर तरफ़ ही अज़ाब है सचमुच

बेटियाँ,बहने हो रही है हलाक
कारें हैवाँ जनाब है सचमुच

नफ़रतों का निज़ाम क़ायम है
कैसा ये इंतिख़ाब है सचमुच

ये समझता नहीं है” नूर “कोई
कौन सा अब निसाब है सचमुच

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लाला रूख, सीमी बदन, गुंचा दहन का वारिस
तुमको बनना है अगर अपने चमन का वारिस

बन के दिखलाओ हक़िक़त मे जहाँ वालो को
नाज़िशे इल्मो अदब,अहले सुखन का वारिस

उनकी दिखलाई हुई राह पे चल कर दिखलाओ
कहते है खुद को जो गाँधी के वतन का वारिस

आँखों ही आँखों मे ये रात गुज़र जाएगी
कौन अब होगा मेरे रंज़ो मिहन का वारिस

जान जो दे दे मगर दीन का सौदा न करे
है हक़ीक़त मे वही तिशना दहन का वारिस

शायरे गंगो जमन, वो भी न दुनिया मे रहे
जिनको कहते थे सभी गंगो जमन का वारिस

जिसकी पहचान दरिन्दो ने मिटा डाली थी
न मिला कोई भी उस लाशे कुहन का वारिस

रो के ये शाह की हमशीर ने र्कबल मे कहा
न रहा अब कोई मज़लूम बहन का वारिस

हाले दिल अपना किसे नूर सुना पाएगी
लूट गया ज़ुल्म के हाथो से चमन का वारिस।

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