निराश-हताश युवा पीढ़ी और पूंजीवाद

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हमारे युवाओं के बीच शिक्षा, रोजगार, पारिवारिक सामाजिक संबंधों आदि को लेकर एक निराशा और हतासा दिखती है। परंतु यह एक व्यवस्थाजन्य स्थिति है। इसका समाधान भी व्यवस्था से लड़कर ही निकलेगा, xनिराशा में डूबकर नहीं। इस लड़ाई में हम सब की हिस्सेदारी आवश्यक है। जिस व्यवस्था ने इनसे शिक्षा और रोजगार के अवसर छीने हैं, जिसने इनके जीवन के लिए आवश्यक सारी सुविधाओं को क्रमशः इनसे दूर किया है, जीवन को मुश्किल बनाया है, उन्हें उस रूप में वापस पाना मुश्किल है।
पूंजीवाद अपने कल्याणकारी स्वरूप का चोला उतार, नवउदारवाद का रुख इख्तियार कर लिया है। अपने कल्याणकारी राज्य की अवस्था में इसने मेहनतकशों के साथ अतिरिक्त मूल्य का एक हिस्सा साझा किया था। परंतु यह उसके लिए आवश्यक था। एक तो विश्व के तेज हो रहे समाजवादी आंदोलनों और समाजवादी राज्यों की स्थापना से पूंजीवाद समाजवाद के भूत से भयभीत हो रहा था। अतः पूंजीवाद एक तरीके से मेहनतकशों को घूस देकर समाजवादी आंदोलनों से भटकाने की कोशिश कर रहा था। पूरा पूर्वी यूरोप और एशिया का बड़ा भाग समाजवादी व्यवस्था के अंदर था या फिर समाजवादी आंदोलनों को मजबूत कर रहा था, वहीं पूंजीवाद खुद को बचाने के षड्यंत्र में व्यस्त था।
दूसरी तरफ अपने कल्याणकारी अवस्था में आने को इसलिए भी मजबूर था क्योंकि पूंजीवाद के विकास के लिए आवश्यक आर्थिक सामाजिक आधारभूत संरचना के विकास में राज्य की भूमिका आवश्यक थी। यूरोप और अमेरिका में पूंजीवाद के विकास और अतिरिक्त मूल्य के दोहन के लिए पूरी दुनिया से मानव संसाधनों को इनके बाजारों में जगह मिल रही थी। वहीं सामंती और औपनिवेशिक व्यवस्था से गुजरता हुआ दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा पूंजीवाद के विकास के निचले पायदान पर खड़े थे और इनमे संस्थागत और ढांचागत विकास की बहुत बड़ी जरूरत थी। वही तकनीकी विकास के आरंभिक अवस्था में मानवीय संसाधनों के विकास और दोहन की बहुत बड़ी गुंजाइश थी, हरेक देश के अंदर भी और अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी।
अतः इस दौर में, जिसे पूंजीवाद का स्वर्णिम काल कहा जाता है, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीकी, प्रशासनिक, वित्तीय, नौकरशाही, वैज्ञानिक, आदि क्षेत्र में मानव संसाधनों के तेज विकास हुआ और राज्य ने इन सभी क्षेत्रों में खास भूमिका निभाई। इसी कारण बहुत सारे पूंजीवादी देशों में भी लोगों में समाजवाद का भ्रम पैदा हुआ और कई पूंजीवादी सेवकों को भी समाजवादी उपाधियों से नवाजा गया। खास बात यह है कि विकास के इस क्रम में लगभग सारे ही देशों में समाजवादी आंदोलन मजबूत हो रहे थे। मेहनतकशों और बुद्धिजीवियों में समाजवादी आंदोलनों के प्रति एक स्वीकारोक्ति थी। कोई भी बुद्धिजीवी अपनी पहचान समाजवादी के रूप में रखकर गर्वानवित होता था। छात्र आंदोलनों में जुझारूपन था। कोई भी पूंजीवादी संसदीय पार्टी भी समाजवाद को नकारने की हिम्मत नहीं जुटा सकता था। इसी का परिणाम संविधान के 42 वें संशोधन के रूप में सामने आया जिसके तहत संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द को उद्धृत किया गया। सच है कि यह कोरा पाखंड था। पर समाजवादी विचारधारा की लोकप्रियता के कारण यह करना पड़ा।
यह वह दौर था जब शिक्षा के हर संकाय में विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों में शिक्षकों को बड़ी संख्या में नियुक्तियां होती रही। यही बात सभी स्तरों पर विद्यालयों, तकनीकी संस्थाओं, सभी तरह के सरकारी विभागों आदि में हुआ। युवाओं में शिक्षा को लेकर आशावाद अपने ऊफान पर था।
तकनीकी विकास का अर्थ यह होता है कि उच्चतर तकनीकों के कारण मानवीय मानसिक और शारीरिक श्रम की आवश्यकता कम होगी, श्रम की उत्पादकता में तेजी से विकास होगा और प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय उत्पाद की अधिकता के कारण प्रति व्यक्ति sram के घंटे काम होंगे और जीवन स्तर में तेजी से विकास होगा। परंतु यह तब होगा जब सामाजिक उत्पाद का सामान वितरण होगा और सामाजिक संसाधनों का इस्तेमाल मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए होगा। परंतु पूंजीवाद, जो केवल मुनाफे और अतिरेक के सिद्धांत पर काम करता है, अपने अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने की ही हर तरह के जुगत में व्यस्त रहता है। अब अतिरिक्त मूल्य दो तरह से बढ़ाया जा सकता है। मजदूरी के स्तर को कम से कम रखकर, अतिरिक्त मूल्य को अधिक से अधिक बढ़ाना, जिसे निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य कहते हैं। अथवा तकनीकी के ज्यादा से ज्यादा उपयोग के द्वारा उत्पादन की गति को बढ़ाकर प्रति श्रम के घंटे अतिरिक्त मूल्य के सृजन की रफ्तार को तेज करना। अर्थात दोनो ही स्थिति में श्रमशक्ति के उत्पाद उत्पाद पर ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण और पूंजीवादी संपन्नता के बीच सामाजिक विपन्नता को बनाए रखना और इसे बढ़ावा देना।
इस प्रक्रिया में वैसे तो श्रमशक्ति का शोषण तेज होता गया, परंतु मुनाफे की दर गिरती रही। कारण यह है कि तकनीकी विकास के साथ कुल लागत में श्रमशक्ति के इस्तेमाल की आनुपातिक कमी (नियत पूंजी की तुलना में परिवर्तनशील पूंजी के काम इस्तेमाल) के कारण अतिरिक्त मूल्य के निर्माण की दर लगातार गिरती रही और पूंजीवाद अतिरिक्त मूल्य के सृजन में श्रमशक्ति के “एकाधिकार” और शरमशक्ति के सम्मुख पूंजी के अंतर्विरोध में उलझा जूझता रहा। इसी जद्दोजहद में मानव विरोधी पूंजी पक्षीय सुधार करता गया। हरेक सुधार इसे श्रमशक्ति की तुलना में पूंजी की अतिरिक्त मूल्य के सृजन में स्पष्ट निरर्थकता के अंतर्विरोध से ज्यादा से ज्यादा रूबरू कराता गया। पूंजीवाद का संकट गहराता गया। हरेक अगला संकट ज्यादा से ज्यादा गहरा होता गया और पूंजीवाद का ज्यादा से ज्यादा निर्मम और संवेदनहीन नग्न चेहरा सामने आता गया।
तो ऐसी स्थिति में अब पूंजीवाद के पास मानवता को देने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह। बल्कि अब यह खुद की उपलब्धियों को ही खाकर खुद को दीर्घजीवी बनाने के विभ्रम, मृगतृष्णा के पीछे भाग रहा है।
सवाल यह नहीं है कि पूंजीवाद कब तक जिंदा रहेगा। निष्कर्ष यह है कि पूंजीवाद अपनी सार्थक जिंदगी जी चुका। यह जितना अधिक जीवित रहेगा मानव जीवन के लिए नित नए संकट पैदा करता जाएगा। जब कहा जाता है कि भूख के सूचकांक पर बारात और फिसलता जा रहा है, तो अर्थ यह है कि कृपण पूंजीवाद मानवता को न्यूनतम जीवनोपयोगी समान भी देने को तैयार नहीं। जलवायु परिवर्तन, महामारी, अकाल, भुखमरी, प्राकृतिक विनाश आदि कोई स्वाभाविक घटनाएं नहीं हैं। वरन ये पूंजीवाद के निरर्थक और विनाशकारी उपस्थिति के विनाशकारी प्रभाव हैं।
तो ऐसे में यह मानवता के भविष्य को खत्म करने के अलावा कुछ कर ही नहीं सकता। युवाओं की समस्या यह है कि नवउदारवादी सिद्धांतों के तेज भोंपू बुद्धिजीवियों और मीडिया ने इन्हें कितने ही सब्जबाग दिखाए। भविष्य के कितने ही सपने दिखाए। जबकि धीरे धीरे यह उनके भविष्य के लिए आवश्यक साधनों को छीनता गया। सामाजिक साधनों पर पूंजीपतियों के नियंत्रण को मजबूत कर शिक्षा और रोजगार की परिस्थितियों को युवाओं के प्रतिकूल करता गया। इसका असर सामाजिक विकास के हर पहलू पर स्पष्ट दिख रहा है। शिक्षा, रोजगार, जीवन की गुणवत्ता, जीवन को परिस्थितियों में तेज गिरावट होती जा रही है। सामाजिक आर्थिक दायरे ज्यादा से ज्यादा तंग होते जा रहे हैं। ऐसे में चारो ओर मध्यम वर्ग में निराशा और हताशा लाजमी है। मेहनतकश वर्ग तो पहले ही तबाह था।
सवाल यह है कि समाधान क्या है। क्या पूंजीवाद निराश हताश युवा वर्ग को कोई बेहतर परिस्थितियां मुहैय्या कराने के लिए सक्षम है? क्या पूंजीवाद वापस अपने कल्याणकारी राज्य की स्थिति में वापस लौट सकता है? क्या युवा वर्ग के लिए इसमें कोई आशा का संचार करना संभव है?
इतिहास कभी खुद को दुहराता नहीं, वरन हर समय यह खुद को नए रूप में पेश करता है। अगर इतिहास की धारा प्रगतिशील होती है तो यह मानवता को बेहतर स्थितियां प्रदान करता है। अगर इसकी धारा प्रतिगामी हो जाए तो यह मानवता को विनाश के गर्त में गिराने की परिस्थितियां पैदा कर देता है।
इस प्रतिगामी धारा को पहचानना आज मेहनतकशों और युवाओं के लिए आवश्यक है। इस प्रतिगामी धारा को बदलने की जवाबदेही मेहनतकशों और युवाओं को उठानी होगी।
लेनिन के दिशानिर्देश “क्या करें” करें का अनुकरण करने की खास जरूरत है। इसी से समाज के विकास को सही दिशा मिलेगी।

विद्यानंद चौधरी

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