‘सय्यद सिब्ते हसन’ की पुस्तक ‘मूसा से मार्क्स तक’ पर संगोष्ठी आयोजित

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22 अक्टूबर को ‘ दिल्ली में अंजुमन- तरक्की ए – उर्दू ( हिन्द) के सहयोग से ‘ प्रगतिशील लेखक संघ’ दिल्ली ने ‘ उर्दूघर’ में ‘ सोशलिज्म के इतिहास’ पर ‘ मशहूर पाकिस्तानी विचारक ‘सय्यद सिब्ते हसन’ की पुस्तक ‘मूसा से मार्क्स तक’ के उर्दू से हिन्दी अनुवाद पर विचार-विमर्श करने के लिए एक गोष्ठी का आयोजन किया। इस गोष्ठी की सबसे बड़ी बात यह थी कि, इसमें इस पुस्तक के अनुवादक डाक्टर ‘ फिदा हुसैन’ भी आजमगढ़ से पधारे थे। उन्होंने अपनी बात रखते हुए पुस्तक के लेखक का जीवन संघर्ष, उसकी वैचारिक यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि नयी पीढ़ी को सिब्ते हसन जी के बारे में बहुत कम ही जानकारी है, लेकिन वे एक प्रतिबद्ध लेखक, विचारक और ऐक्टिविस्ट थे। वे आजीवन समाजवाद के लिए संघर्षरत रहे। उन्हें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने पाकिस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करने के लिए भेजा। उस समय भारत और पाकिस्तान में प्रगतिशील साहित्य उपलब्ध नहीं था, उसे चोरी-छिपे रूस से लाया जाता था और साइक्लो इस्टाइल करकेे बाँटा जाता था, इसलिए नयी पीढ़ी को विचारधारा से अवगत कराने के लिए उन्होंने यह पुस्तक लिखी। इसके अलावा भी उनकी इन विषयों पर उर्दू में अनेक पुस्तकें हैं, उन्हें भी हिन्दी में लाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। ‘गार्गी प्रकाशन’ के संचालक, अनुवादक और एक्टिविस्ट दिगम्बर जी ने भी आज के दौर पर बात रखते हुए बताया कि आज जनभाषा साहित्य लिखना बहुत जरूरी है। उन्होंने अफ्रीकी उपन्यासकारों और लेखकों का उदाहरण देते हुए बताया कि जब तक ये लोग अंग्रेजी में लिखते रहे, सरकारों को इनसे कोई ख़तरा नहीं था, लेकिन जैसे ही इन्होंने अफ्रीकी भाषाओं में लिखना शुरू किया, तब उनकी गिरफ्तारियाँ होने लगीं तथा उनकी किताबें ज़ब्त की जाने लगीं।

सिब्ते हसन ने भी अंग्रेजी में न लिखकर उर्दू में लिखा, जिससेे उनका साहित्य आमजन तक पहुँच सके। अर्जुमंद आरा (अध्यक्ष प्रलेस दिल्ली) ने पुस्तक के बारे में बहुत महत्वपूर्ण और दिलचस्प बातें बताईं, प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ के बारे में, या ‘यूटोपिया’ के बारे में बहुत सहज और सरल ढंग से बतलाया है या उन ‘ग्रीक नाटकों’ के बारे में, जिनमें औरतों की आज़ादी तथा संपत्ति के समान बटवारे की बातें हज़ारों साल पहले ही कही गई थीं, जिन्हें बाद में आधुनिक साम्यवाद ने भी अपनाया। विश्व की महान सभ्यताएँ; जिसमें भारत की सिन्धु घाटी, दजला फरात, सुमेरियन तथा चीनी सभ्यताएँ कैसे फली-फूलीं तथा विकसित हुईं और कैसे उन्होंने कला, साहित्य तथा स्थापत्य कला(नगर निर्माण) में महत्वपूर्ण महारत हासिल की थी? जिसका हम आज भी लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात बताई कि ‘मूसा’ ने अपने कबीले में कुछ बहुत प्रगतिशील और नैतिक मूल्यों की बातें की हैं, जैसे सूरज अस्त होने से पहले ही मज़दूरों को मज़दूरी दे देनी चाहिए या अपने गुलामों को सात साल बाद आज़ाद कर देना चाहिए। हज़ार साल बाद इस्लाम तथा इसाई धर्मों ने भी इन बातों को अपनाया। इस संवाद की अध्यक्षता करते हुए भूतपूर्व पुलिस अधिकारी तथा लेखक विभूति नारायण राय ने इस कठिन समय में प्रगतिशील सोच के लोगों के बीच एकता की बात की तथा सभी का आह्वान किया कि आपस में मिल-बैठकर विचारों के आदान-प्रदान की संस्कृति को विकसित किया जाए। इस विमर्श का संचालन फरहत रिज़वी ने किया। इसमें भारी संख्या में छात्रों, नौजवानों और बुद्धजीवियों ने भागीदारी की तथा उर्दूघर के संचालकों ने भी इस तरह के आयोजन लगातार करने के लिए पूरा सहयोग देने का वादा किया।

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