वो तो बस मज़दूर है मज़दूर … नूर फातमा की कविता

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………………….वो मज़दूर हैं मज़दूर……………।।
क्या लिख़ूं
बस ये सोंचती हूँ
उनकी बातें
जो अपनी दूनिया में
मस्त मगन थे
थोड़ी ही सही भूख अपनी
वो मिटा पाते थे
मोटी ही सही वो रोटियां खाते थे
क्या लिख़ूं
अब वो भुखे मर रहें हैं
पैदल चलने पर मजबूर
कहीं पटरियों पर कुचले जा रहे है
तो कहीं गाडियों से
कहीं राह पर,कहीं सडकों पर
वो मर रहे हैं
क्या लिखूं
उनका कसूर क्या है
वो मज़दूर है मज़दूर
ईमारतें, फ़ैक्ट्रीयाँ, सडकें और पुल
मस्जिद, मन्दिर, गुरुद्वारे और गिरजाघर
और भी बहुत कुछ,न जाने क्या-क्या
यही तो बनाते हैं
क्या लिखुं
ये मज़दूर है भुखे भी रहते है
ताने भी सहते है
और मरते हैं बे मौत
वो मज़दूर है मज़दूर
इनसान कहा है वो
वो तो मज़दूर है मज़दूर
कया लिख़ूं
उन्हें जीने का हक़ कहां
वो तपती धूप, पथरीली ज़मीन
सब बरदाश्त करते हैं
वो इनसान कहां है
बरसते पानी, धमकती आंधी, कडकती बिजली
सभी कुछ बरदाश्त करते हैं
क्या लिख़ूं
सदियों से वो ज़ुल्म सहते आयें हैं
दौर कोई भी हो निशाने पर वो ही
ज़माना बदला, सोंच बदली,लोग बदले
पर नहीं बदले उनके हालत
वो मज़दूर है मज़दूर
क्या लिख़ूं
इन हालात को देखकर नूर
तुम भी खामोश हो
क्या तुम्हारे अन्दर का भी
अब इनसान मर गया
कुछ करो,कुछ तो करो
उठो अब बस
वरना इन हालात के हाथों
सभी मारे जायेंग
क्या लिख़ूं

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