चंद्रभूषण की कविताः बाबा का ढाबा

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मुंह अंधेरे दोनों भट्ठियां सुलगाकर
बुड्ढे-बुढ़िया का काम में जुट जाना
अढ़ाई सौ रुपये का किलो भर पनीर
जो सब्जी में एक ही दिन चल पाएगा
इतने ही रुपयों की आटे की बोरी
चावल, बेसन, तेल-मसाला, सब्जियां
जिनका चलना, न चलना ग्राहक पर है
जो बीमारी के हल्ले में गया तो लौटा नहीं
इतना सब लगाकर तीसरे पहर तक
कुल सत्तर रुपया कमा पाने के बाद
अगर कोई भूले से भी हाल पूछ ले
तो रोने के सिवा बूढ़ा क्या कर पाएगा?
ऐसा रोना हमने पहले भी देखा है भाई
चार साल पहले नोटबंदी की कतार में
अपना पैसा निकालने से पहले ही
शटर गिर जाने से टूटा एक बूढ़ा फौजी
सब कुछ के बाद आखिर हैं तो हम मनुष्य
जैसे-तैसे ये दृश्य हम तक पहुंचते हैं
तो दुखी जन की कुछ मदद हो जाती है
लेकिन दुख का कहां कुछ बिगड़ता है?
ढाबे वाले बाबा अपने ग्राहक कटने से रोए
नोटबंदी वाले अपना पैसा न निकाल पाने से
इतनी दूर तक सोचना हमसे नहीं हो पाता
सो दुख देने वालों को साफ बरी कर देते हैं
दृश्यों में लटपटाए रहना अब हमारा जीवन है
रोते हुए बाबे जब-तब दुखी कर देते हैं
तो कुछ ले-देकर हम अपना कष्ट काट लेते हैं
तुगलकी हुकूमतें लोगों को दुखी न करें
ऐसी बातें सुनना भी कब का बंद कर चुके हैं
ये हुकूमतें असल में उन्हीं के नचाए नाचती हैं
जो भांत-भांत के दृश्य दिखाकर हमें नचा रहे हैं
कोई ऐसा कहे तो हम उसपर चढ़ ही जाएंगे
तो फिर आओ तनिक देर और देखते हैं
बॉर्डर पर दनदनाते टैंक, गड़गड़ाते जहाज
कुछ रिया के ‘खड़यंत्र’ सुशांत के खिलाफ
कुछ अंगना के विरुद्ध कंगना की गर्जना
कुछ ट्विटर पर गाली कुछ इंस्टा पर बिंस्टा
चाहे जैसा भी हो मीडिया, काम तो कर रहा है
आखिर इसके ही दम पर बाबा आज खुश हैं
उनके ढाबे के आगे सौ ग्राहकों की कतार है!

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