माँ ! (लंबी कविता)

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मां ! तुम हो इसीलिए हम हैं

 सृष्टि की इस धरा पर
जहाँ केवल नारी के  संबंध में यह कहा गया :
नार! तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नगर पग तल में ।
पीयूष स्रोत -सी बहा करो,
 जीवन के सुंदर समतल में।
 वही नारी “तोड़ती पत्थर” में भी देखने को मिली
 और वही नारी नागार्जुन की कविता में–
“किशोरियों की कोकिल कंठी तान में”
 भी आती रही।
 नारी मनोरंजन के वस्तु स्वीकृत की गई
और पूजनीय भी।
धरती के विभिन्न भागों और विभिन्न कालों में
उनके रूप  बदलते तो गए —
नए-नए ग्रंथ रचे गए उन्हीं पर
उन्हीं के जीवन चरित्र और उनके सारस्वत अवदान पर।
 इसीलिए मेरी मां कभी मेरी अपनी मां नहीं रही
मैंने उन्हें हर  हर बार
उपेक्षा भरी नजरों से देखा
बार-बार उन्हें अनेकानेक यातनाएं भी तो दीं
 मैंने उन्हें परेशान भी कम नहीं किया —
कमजोर तो वो सबसे ज्यादा समझी गईं।
 मेरी मां, जो सबसे पहले जागती रही,
 बुखार से तपते सिर को सबसे ज्यादा
 उसी ने सहलाया ।
 उसी ने अनेक तरह से ढांढस भी बंधाए
 कितना कर्ज है—
 हां! हां ! मां का कर्ज–
 जो कभी चुकता नहीं हो सकता
 अनेक जन्मों के बाद भी —
 कितनी याद आती है मां !
 उसका स्नेहिल संस्पर्श
 उसकी मीठी बोली–
कुछ हिदायतें देने का
  तिक्त और  मधुर वाणी
 अब कहां सुनने को मिलेगी ?
 देर रात घर आने पर उनका समझाना
 जेठ की दुपहरी में अचानक बाहर निकलना
 किसी से लड़ाई- झगड़े होने पर
अद्भुत और सहज तरीके से सुलझाना
रोकना’ डांटना और  मना करना —
 वह समय और वह परिस्थितियां
 जो आज हमारे जेहन में क़ैद हैं।
 क्या वे दिन फिर आएंगे ?
मां ने कितना संभाला है हमें
हमारी पत्नी और हमारे बच्चों को
 हमारे रिश्ते – नाते और  जीवन के लोक- व्यवहार को
 कितनी तपती मन:स्थिति में
 सबको संभाला होगा ?
इतना झेला होगा जीवन के सत्य को ?
 परंपरा से प्राप्त अंधविश्वास को भी ?
 पुरुषवादी सत्ता के चले आ रहे दंश को —
 मां अब नहीं है —
 लेकिन मेरे सामने —
कितनी माँएं हैं  —
अभी भी मौजूद इस धरा पर —
 अनंत काल तक  मौजूद रहेंगी —
 ये भी मेरी मां हैं
हमें इनका भी आदर और सत्कार करना है
मां के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते
विभिन्न रूपों में भी वे हमारी पथ प्रदर्शिका है।
 हमें इस बात को कभी भूलना नहीं होगा
  ——————-कभी भूलना नहीं होगा!!
पंडित विनय कुमार 
शीतला नगर रोड नंबर 3
पोस्ट गुलजार 
अगमकुआँ 
पटना 
बिहार 
मोबाइल  9334504100
7991156839
9801778998

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