विलुप्त होती परहिया जनजातिः सरकारी घोषणाओं के बीच जमीनी हकीकत

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गए टीबी का इलाज कराने, इलाज नहीं हुआ तो 70किमी पैदल ही लौट गए घर

· विशद कुमार

कोरोना जंग से लड़ाई में पूरे देश में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा हुई, जिसे 3 मई तक बढ़ाया गया जो अब 17 मई तक बढ़ गया है। देश के करोड़ों गरीब—मजदूर, रोजगार और भूख को लेकर भयभीत हैं। एक तरफ सरकार किसी को भूख से नहीं मरने देगी, की घोषणा पर घोषणा कर रही है। वहीं झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों की स्थिति यह है कि जो लोग लकड़ी, दतुवन वगैरह शहरों में बेचकर व मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे, वे आज सरकारी बाबुओं के रहमो—करम पर आश्रित हैं।

बता दें कि राज्य के पलामू जिले में कई आदिवासी समुुदायों के बीच रहती है परहिया जनजाति। करीब 20 लाख जनसंख्या वाले पलामू में परहिया जनजातियों की जनसंख्या लगभग 5 हजार है। वहीं जिला मुख्यालय से करीब 70 कि.मी. दूर है मनातु प्रखंड, जहां इनकी आबादी है 441, जिनमें से 150 परिवारों के पास राशनकार्ड तक नहीं है। इनके घरोंं को देखकर प्रधानमंत्री आवास योजना की असली तस्वीर समझ आ जाती है।

बता दें कि मनातु प्रखंड स्थित डूमरी पंचायत का दलदलिया, सिकनी (फटरिया टोला), केदला (कोहबरिया टोला), में आदिम जनजाति परहिया समुदायों के केदल गाँव निवासी सकेन्दर परहिया, डुमरी पंचायत के दलदलिया टोला के सोमर परहिया, डुमरी पंचायत का दलदलिया टोला के विदेश परिहिया, धुमखर के अनिल परहिया और भूईनया के सुरेश परहिया सहित 6 लोग काफी दिनों से टी.बी. रोग से पीड़ित हैं। लेकिन जब इन सभी के मुंह से लगभग 20 दिन पहले खून आने लगा तो गांव के लोगों ने उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल मनातु में भर्ती कराया। मगर यहां इनकी इलाज नहीं की गई तथा इन्हें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने को कहा गया। जब इन्हें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, जो कि वहां से करीब 70 किमी दूर है, तो बीमारों को डांटकर भगा दिया गया। मरता क्या नहीं करता, गांव के कुछ लोगों ने एक अप्रैल को इन्हें मोटरसाईकिल से पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल ले जाने के क्रम में रास्ते में मोटरसाइकिल चालकों को कई बार रूकना पड़ा क्योंकि ये इतने कमजोर हो चुके थे कि मोटरसाइकिल में बैठने में भी असमर्थ थे। पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल में भर्ती कराने के बाद मरीजों की जांच मेडिकल अस्पताल के लैब में न कराकर बाहर के निजी लैब में भेज दिया गया। उतना ही नहीं इनको मेडिकल अस्पताल से दवा न देकर बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी गई। अस्पताल के चिकित्सकों व कर्मचारियों की संवेदनहीनता का अलम यह रहा कि इन्होंने मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया। जबकि गांव के लोग इन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर गांव वापस आ गए थे। स्थिति यह हुई कि भर्ती हुए लोगों को लगा कि यहां इनका कुछ नहीं होने वाला है तो ये लोग 2अप्रैल को पैदल ही अपने गांव लौट चले। बीमार कमजोर ये लोग 70—75 किमी पैदल चलकर तीन दिन बाद किसी तरह अपने घर आ पाए।

अभी इनकी स्थित काफी गंभीर हो गयी है। इस बावत जब पलामू के सिविल सर्जन डा. जॉन केनेडी से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनका मोबाइल काफी समय तक नाट रिचेबल बताता रहा अत: बात नहीे हो सकी।

मालूम हो कि यह आदिम जनजाति समुदाय विलुप्त होने के कगार पर है। इनके बारे जो सरकारी घोषणाएं आए दिन होती वे सब डपोरशंखी साबित हो रही हैं।

यह जनजाति भोजन के समुचित अभाव में कुपोषण के कारण कई बीमारियों से ग्रसित रहने को मजबूर है, खासकर पुरूषों में टीबी और महिलाओं में एनेमिया का प्रभाव काफी है।

एनसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार बताते हैं कि ”परहिया जनजाति की आजीविका का एकमात्र साधन जंगल ही रहा है। क्योंकि इनकी निर्भरता कृषि आधारित कभी नहीं रही। जहां एक तरफ इनको जंगलों से कई तरह की जीवनोपयोगी जड़ी—बुटी (कंदा, गेठी वगैरह), संतुलित आहार के तौर पर कई तरह की सागों से पोषक तत्त्व मिलते रहे हैं। वहीं अपनी अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए ये लोग बांस से टोकरी वगैरह बनाकर बेचते रहे हैं। अब जब जंगल कटने लगे हैं, वन अधिनियम के तहत जंगल से बांस वगैरह काटने की मनाही है, ऐसे में जंगलों से इन्हें मिलने वाला पोषक तत्त्व नहीं मिल पा रहा है और ये कई बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं।”

बता दें कि जहां परहिया जनजाति के पुरूष वर्ग टीबी के शिकार हैं वहीं महिलाओं में एनिमिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। विदित हो कि एनिमिया खून में आयरन की कमी से होती है। जिसे दूर करने के लिए आयरन की गोली जरूरी होती है। लेकिन सरकारी योजनाओं की उपेक्षा के शिकार इन परहिया जनजाति में मातृ व शिशु मृत्यु दर बढ़ा है। इस बावत शोधार्थी ‘वन उत्पादकता संस्थान’ रांची के स्वयं विद् बताते हैं कि ”आयरन की कमी को दूर करने में खपड़ा साग काफी सहायक होता है। अत: झारखंड में यह साग पायी जाती है जिसे इस जनजाति के हर परिवार के घर के आस—पास में भी पैदा किया जा सकता है।”

बताते चले कि झारखंड जो आदिवासी बहुल राज्य है, जहां 24 जिलों में कुल 260 प्रखंड हैं, जिनमें से 168 प्रखण्डों में खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले, झारखण्ड सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डाकिया योजना के तहत 35 किलो का खाद्यान्न पैकेट बनाकर इन प्रखंडों के गांवों में आदिम जनजातियों के घर तक वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी दी गई है, जिसकी जवाबदेही सरकारी डीलर के तौर पर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को दी गई है। मगर इन परहिया समूदायों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है।

मिथिलेश कुमार बताते हैं कि इन्हें डाकिया योजना का लाभ मिलना तो दूर यहां जो कार्डधारी हैं उन्हें भी अगस्त 2019 का राशन नहीं मिला है।

विदित हो कि पलामू जिले के डालटनगंज सदर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के बिन्हुआ टोला में करीब 35 आदिम जनजाति परहिया परिवार रहता है।

इस टोला के परहिया परिवारों को एम0 ओ0 द्वारा अप्रैल एवं मई 2020 का खाद्यान्न मुहैया कराना था, लेकिन लाभुकों को सिर्फ एक माह का राशन दिया गया, जबकि उनके कार्ड में जून 2020 तक राशन की मात्रा दर्ज कर दी गई है। इसकी जानकारी वहां के लोगों कों तब हुई, जब झारखंड नरेगा वाच के राज्य इकाइ की टीम वहां जाकर यह जानने की कोशिश की कि उन्हें सरकारी सुविधा का लाभ मिल रहा है या नहीं?

टीम द्वारा जब एक-एक कार्ड की जांच की गई, तो राशन चोरी के कई अन्य मामले भी सामने आए। यहां दो ऐसे आदिम जनजाति परिवार मिले जिनके नाम से दो-दो राशन कार्ड बने हैं, जबकि इन्हें एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। मनोहर बैगा, पिता गिरवर बैगा के नाम से 2 राशन कार्ड बनाया गया है जिसकी संख्या 202005051112 व 202005574268 है। जबकि लाभुक को एक कार्ड से खाद्यान्न दी जा रही है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार दूसरे कार्ड से प्रत्येक माह राशन का उठाव किया जा रहा है। इसी प्रकार कार्ड सं0 — 202005574126 है, जो अन्छू परहिया के नाम से है, जबकि वह बहुत पहले ही हो मर चुका है। इस मामले का सबसे भ्रष्टतम और शर्मनाक पहलू यह है कि उसके नाम से भी हर माह 35 किलो का राशन उठाव किया जा रहा है।

दूसरी तरफ बसन्ती कुअंर जिसकी कार्ड सं0 — 20200557426863 है, को कार्ड रहने के बावजूद उसे अप्रैल 2018 के बाद से खाद्यान्न वितरित नहीं किया गया है, जबकि इसके कार्ड में भी ऑनलाइन रिकॉर्ड बताता है कि उसे नियमित राशन वितरित किया गया है।

जब डालटनगंज सदर प्रखंड के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से इन आदिम जनजातियों के अनाज वितरण में गड़बडी के मामले पर जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि आदिम जनजाति को डाकिया योजना के तहत मिलने वाले अनाज के लिए कोई दुकानदार नियुक्त नहीं है। इसे प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी ही देखते हैं। मतलब कि वे खुद इसे देखते हैं।

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