भगवान का धन किस दिन आएगा देश के काम में!

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एच. एल. दुसाध
इस बात का इल्म एक बच्चे तक को हो चुका है कि कोरोना और इससे बचाव के लिए चल रहे लॉकडाउन ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को क्षत – विक्षत कर दिया है। इससे अर्थव्यवस्था के बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका को देखते हुये जर्मनी जैसे विकसित देश के वित्त-मंत्री थॉमस शेफार्ड ट्रेन के आगे कूदकर अत्महत्या कर चुके हैं। अर्थव्यवस्था पर इसके कुप्रभाओं का आंकलन करते हुए विश्व प्रसिद्ध पत्रिका ‘ इकोनॉमिस्ट’ लगातार चेताये जा रही है कि हम संभवतः मानव इतिहास की जीवित स्मृति में सबसे क्रूर आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहे हैं। अब जहां तक कोरोना का भारतीय अर्थव्यवस्था पड़ने वाले प्रभाव का सवाल है , इसमें कोई शक नहीं कि शेष विश्व के साथ भारत की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है। इसे देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एकाधिक बार दोहराया है, ‘देश आर्थिक लिहाज से आजादी के बाद सबसे आपातकालीन दौर में है।‘
आज लॉकडाउन मेँ उत्पादन ठप है, कहीं से भुगतान आ नहीं रहा है , माल रास्ते मेँ फंसा हुआ है। एक अध्ययन के मुताबिक इससे उद्योग जगत को रोजाना औसतन 40 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। कोरोना से जिस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था मुसीबत मेँ है, उसे देखते हुये प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम की ओर से कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मुसीबत से उबारने के लिए 14 लाख करोड़ रुपए के पैकेज देने की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में कोरोना से बचाव, उपचार और राहत के लिए धन जुटाने के लिए दुनिया की तमाम सरकारों की भांति भारत सरकार के भी पसीने छूट रहे हैं और धन जुटाना उसके लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गयी है। वित्तीय संसाधन तलाशने मेँ जुटी केंद्र और राज्य सरकारों ने सांसद और विधायक विकास निधि पर रोक लगाने और सांसद- विधायकों के वेतन मे 30 फीसद कटौती करने के बाद एक नया कदम उठाया है, जिसकी तीखी आलोचना हो रही है। और वह कदम है पहली जनवरी 2020 से जून 2021 तक सरकारी कर्मचारियों के मंहगाई भत्ता(डीए) और पेंशनरों की मंहगाई राहत(डीआर) पर रोक। ऐसा होने से एक से डेढ़ वर्ष मेँ सरकारी कर्मचारियों के वेतन में औसतन डेढ़ से दो लाख की कटौती कर ली जाएगी। इसे लेकर राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष और बुद्धिजीवी वर्ग सरकार की आलोचना मेँ मुखर है। इसे लेकर फेसबुक पर सुप्रसिद्ध पत्रकार महेंद्र यादव के इस पोस्ट – कोरोना काल में पुलिस, डॉक्टर और नर्सों ने ही सबसे ज्यादा संकट उठाया है और लोगों की सेवा की है। रेलवे वाले भी 48 के बजाय 60 घंटे की ड्यूटी कर रहे हैं।अब इसका इनाम देखिए, कि डीए की कटौती, वेतन, एरियर की कटौती जैसे सारे डंडे उन पर भी पड़ रहे हैं – को जिस पैमाने पर लाइक और शेयर मिला है, उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि कोरोना जनित समस्या से पार पाने के लिए सरकारों ने जिस तरह सरकारी कर्मचारियों के डीए को आय का स्रोत बनाया है, वह आम जन को रास नहीं आया है, क्योंकि इससे खुद कोरोना वारियर्स की जेब पर बुरा असर पड़ता दिख रहा है।
ऐसा नहीं कि सरकार को इस अप्रिय निर्णय से होने वाली आलोचना का इल्म नहीं होगा, होगा जरूर होगा! पर, सरकार के पास धन संग्रह के स्रोत सीमित हैं, लिहाजा कोरोना वारियर्स के जेबों पर हमला करने जैसा कठोर निर्णय लेना पड़ा। बहरहाल एक ऐसे समय में जबकि सरकार कोरोना जनित आर्थिक समस्या से पार के लिए उद्भ्रांत होकर धन संग्रह का स्रोत तलाश रही है,बेहतर होगा वह देवालयों में पड़े बेहिसाब धन के उपयोग की परिकल्पना करे। यह एक ऐसा स्रोत है जिसकी ओर भारत में कोरोना के पैर पसारने के साथ ही देश के प्रबुद्ध वर्ग ने सोशल मीडिया पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया था. खुद भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री हुकुमदेव नारायण यादव ने गत 31 मार्च को देश का ध्यान इस ओर अकर्षित करते हुए कहा था,’ इस समय राष्ट्र भयंकर संकट में है। राष्ट्र के नागरिक बचेंगे तभी सब कुछ बचेंगा। धार्मिक संस्थानों के पास अकूत धन है। उन्हें कोरोना संकट से पार पाने हेतु दान करने के लिये सामने आना चाहिए। धार्मिक संस्थानों के खाते में सरकार के बजट से कहीं ज्यादा धन आता है’।
वास्तव में सरकार अगर कोरोना जनित आर्थिक समस्या से पार पाने के लिए धन – संग्रह का स्रोत तलाश कर रही है तो इसमें विभिन्न धर्मों के देवालय , विशेषकर हिन्दू मंदिर सर्वाधिक प्रभावशाली स्रोत साबित हो सकते हैं। यह एक तथ्य है कि सदियों से भारत के जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का भारी हिस्सा देवालयों में जमा होता रहा है। इससे भारत का अधिकांश धन पूंजी में तब्दील होने के लिए तरसता रहा और यह धन जनहित व उत्पादन के काम में न लगकर, पुरोहित वर्ग के आमोद-प्रमोद में खर्च होता रहा है। देवालयों में धन जमा करने की जो विराट कीमत देश को अदा करनी पड़ी,उसकी मिसाल विश्व इतिहास में अन्यत्र मिलनी मुश्किल है।मध्य युग के जिन इस्लामी हमलावरों के कारण देश को कई सौ सालो तक पराधीनता का दंश झेलना पड़ा, उन्हें मुख्यतः हिन्दू मंदिरों ने ही आकर्षित किया था। उन लोगों को पता था कि जो लोग पुरोहितों को भूदेवता मानते हैं, उन्हों ने अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा मंदिरों में जमा कर रखा है, इसलिए उन्होंने हिन्दू मंदिरों को अपना पहला निशाना बनाया। इतिहास गवाह है कि विदेशी आक्रांता हमारे मंदिरों से हजारों भड़कस हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी ऊंटों और घोड़ों पर लादकर अपने मुल्क ले जाते रहे। किन्तु हमारे पुरोहित वर्ग नें इतिहास कोई सबक नहीं लिया। लोगों को लौकिक और पारलौकिक सुख सुलभ कराने का झांसा देकर भूदेवता अतीत की भांति ही आधुनिक भारत में हिन्दू मंदिरों को अपनी निजी जागीर और सोने की खान बना रखा है। हिन्दू मंदिरों मे किस पैमाने पर धन पड़ा है, इसका अनुमान 2018 में टॉप 10 मंदिरों की संपति के विषय मे छपी एक रिपोर्ट से पता चलता है।
उक्त रिपोर्ट में पहले नंबर पर रहा तिरुवनंतपुरम का पद्मनाभस्वामी मंदिर।यह केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है।यह मंदिर द्रविड़ शैली वास्तुकला में बनाया गया है जो दक्षिण भारत में प्रचलित है, मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। कुछ लोग यहां की संपत्ति का अनुमान लगाकर बताते हैं कि यहां 1 खरब डॉलर के मूल्य की संपत्ति है।संपत्ति के मामले दूसरे नंबर रहा तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर ! तिरुपति में स्थित वेंकटेश्वर मंदिर को तिरुमाला मंदिर भी कहते हैं। नवीनतम अनुमान के अनुसार तिरुमला मंदिर में स्वर्ण भंडार और 52 टन सोने के गहने (प्राचीन सोने के गहने और राजाओं द्वारा देय देवता और 1000 वर्ष से भी ब्रिटिश शासकों सहित) के 37,000 करोड़ रुपये के मूल्य हैं। प्रत्येक वर्ष यह तीर्थयात्रियों से हुंडी / दान बॉक्स में प्राप्त 3000 किलो सोने से राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ गोल्ड रिजर्व जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है। भक्तों के बीच बेहद पॉपुलर शिर्डी के साईबाबा का मंदिर तीसरे स्थान पर रहा ! साईं बाबा पर हर धर्म के लोग विश्‍वास करते हैं। यही वजह है के शिर्डी के साईं मंदिर में हजारों भक्‍त दर्शन के लिए आते हैं बड़ी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण और नकदी दान करते हैं। माना जाता है कि इनका सिंहासन 94 किलोग्राम सोने का बना है और यहां पर मात्र लोगों के द्वारा 100 मिलियन दान किया गया था। जम्मू जिले के कटरा के निकट स्थित वैष्णव देवी मंदिर संपत्ति के मामले में चौथे स्थान पर है । 5,200 फुट की ऊंचाई पर एक गुफा के अंदर स्थित इस मंदिर का राजस्व पिछले कुछ सालों से बढ़ गया है, क्योंकि तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ गई है। मंदिर में करीब 500 करोड़ की वार्षिक आय है। मुंबई का सिद्धि विनायक मंदिर गणपति बप्‍पा का सबसे लोकप्रिय मंदिर है जो कि मुबई में स्थित हे। वैसे तो इस मंदिर में भी दुनिया भर के भक्‍त आते हैं,किन्तु इस खास पहचान बॉलीवुड वालों के करण है। 100 करोड़ से अधिक की वार्षिक आय और 125 करोड़ की सावधि जमा के साथ, यह भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। मदुरै का मीनाक्षी मंदिर भी भारत के अमीर मंदिरों में से एक है। आसपास कई मंदिरों से घिरा होने के बाद भी इस मंदिर में हर दिन 20 हजार से ज्‍यादा लोग आते हैं। मीनाक्षी तिरुकल्यानम त्यौहार के दौरान यहां पर 10 दिन में 1 मिलियन से ज्‍यादा लोग आते हैं। यह त्‍योहार अप्रैल और मई के बीच मनाया जाता है। हर साल यह मंदिर 6 करोड़ की कमाई करता है। पुरी के भगवान जगन्नाथ को समर्पित जगन्नाथ मंदिर, जिसे दरिद्र नारायण के नाम से भी जाना जाता है, की नेट वर्थ 250 करोड़ रुपये वार्षिक आया 50 करोड़ रुपये है। 12 वीं शताब्दी के बाद से मंदिर में 18 बार हमला किया गया। उसके बाद से 7 चेंबर में से केवल 2 ही चेंबर पूजा और दर्शन के लिए खुले होते हैं।इस मंदिर में कितने किलो सोना हो सकता है कोई अनुमान नहीं है।वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, भी देश अमीर मंदिरों मे गिना जाता है। यहां पर वार्षिक दान 6 करोड़ से ज्‍यादा का होता है। यहां पर जो गुंबद बने हैं वो 2 सोने के प्‍लेट से बने हुए हैं। हर साल 2 लाख से अधिक श्रद्धालु दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ गुफा में भगवान शिव के पवित्र में हिमपात में श्रद्धांजलि देने के लिए जबरदस्त यात्रा करते हैं। इस मंदिर में भी खूब चढ़ावा किया जाता है। केरला के पेरियार टाइगर रिजर्व में स्थित सबरीमाला मंदिर, साल भर में लाखों तीर्थयात्रियों को अपने पास बुलाता है। लोग अपने पसंदीदा भगवान को करोड़ों का चढ़ावा भी करते हैं।साल 2013 में यहां पर चढ़ावे की राशि 203 करोड़ रुपए थी। यहां पर अकेले अरविना प्रसाद की बिक्री से 74.50 करोड़ की कमाई होती है। मनोरम पहाड़ियों के बीच स्थित इस मंदिर का दर्शन करने हर साल 100 मिलियन से ज्‍यादा श्रद्धालु आते हैं।
बहरहाल दौलतमंद मंदिरों की संख्या सिर्फ उपरोक्त मंदिरों तक सीमित नहीं है: दर्जनों ऐसे मंदिर हैं, जिनकी कमाई का फिगर देखकर आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। लेकिन लोगों को लौकिक और पारलौकिक सुख का झांसा देकर सिर्फ पंडे- पुरोहित ही हिन्दू मंदिरों को सोने की खान बनाने में सफल नहीं हुये; लोगों की आस्था का लाभ उठाकर कई माएं और बाबा अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने मे सफल हो गए। देश में ऐसे ढेरों बाबा हैं जिनकी संपत्ति औसतन हजार करोड़ के आसपास है। गत 17 अप्रैल, 2020 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में 8 बाबाओं- माताओं की संपत्ति का जो ब्योरा प्रकाशित हुआ है, वह एक शब्दों मे आश्चर्यजनक है।इस रिपोर्ट में 80 के दशक में भारत से कहीं अधिक, विदेशों में मशहूर दिवंगत महर्षि महेश योगी की संपत्ति 60, 000 करोड़ बताई गयी है, जबकि दूसरे नंबर पर काबिज योग गुरु बाबा रामदेव की संपत्ति 43, 000 करोड़ बताई गयी है। तीसरे नंबर पर दिवंगत सत्य साई बाबा हैं, जिनकी संपत्ति का आंकलन 40,000 करोड़ किया गया है। डेढ़ सौ से अधिक देशों में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ सीखा रहे श्री श्री रविशंकर की संपत्ति 1000 करोड़ बताई गयी है। इस रिपोर्ट में बलात्कार के आरोप में बंद आसाराम बापू की संपत्ति 10,000 करोड़ बताई गयी है। इन्हीं की तरह दौलतमंद बाबाओं में मोरारी बापू, निर्मल बाबा, गुरमीत राम रहीम का नाम है जिनकी दौलत का फिगर देखकर किसी भी व्यक्ति का सिर चकरा जाएगा। दौलतमंद सिर्फ बाबा ही नहीं माएं भी हैं। 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक माता अमृतानन्दमयी की संपत्ति 1500 करोड़ तो मुंबई के चिकूवाड़ी स्थित आलीशान बंगला में रहने वाली ग्लैमरस राधे की संपत्ति भी हजार करोड़ से ऊपर बताई जाती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दू मंदिरों और ब्रांडेड माएं- बाबाओं के पास अकूत दौलत है, किन्तु यह दौलत राष्ट्र के संकट में आज तक काम में नहीं आई है।पर, आज जबकि कोरोना के कारण देश ज्ञात इतिहास में सबसे बड़े आर्थिक संकट में फंस चुका है, सरकार का अत्याज्य कर्तव्य बनता है कि वह जिस कठोरता से सांसद- विधायकों के साथ राज्य कर्मचारियों की जेबों पर हमला की है, उससे ज्यादे कठोरता से मंदिरों और बाबाबों के पास पड़े भगवान के अकूत धन पर हमला बोले। आखिर भगवान का धन किस दिन देश के काम में आएगा। राष्ट्र- हित में भगवान के धन पर हमला बोलने का इससे बेहतर अवसर भी कभी इतिहास में उपलब्ध नहीं रहा। आज अदृश्य शत्रु कोरोना से निजात दिलाने में जिस तरह तमाम धर्म और बाबा- माएं व्यर्थ तथा डॉक्टर भगवान की भूमिका में अवतरित हुये हैं, उससे लोगों की उस आस्था में भारी गिरावट आई है, जिसका सद्व्यवहार कर मंदिरों और बाबाओं के आश्रमों में अकूत धन जमा हो गया है।ऐसे में सरकार अगर भगवान के धन पर हमला बोलती है, धर्माधिकारी उसे लेकर जनाक्रोश फैलाने में जरा भी सफल नहीं हो सकते। अतः एक ऐसे समय मे जबकि पूरी दुनिया में ‘ स्टेट पावर’ का नए सिरे से डंका बज रहा है, क्या मोदी सरकार भगवान के धन को आय का स्रोत बनाने के लिए सामने आएगी ?
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क: 9654816191)

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