लॉकडाउन के साइड इफेक्ट्सः इलाज के अभाव में कुत्ते के काटने से मौत

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विशद कुमार
आज कोरोना एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। लेकिन कोरोना संक्रमण की आड़ में दूसरी वजहों से हो रही मौंतों को नजरअंदाज कर दिये जाएं यह मानवीय संवेदना के विपरीत ही होगी। लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार गरीबों और पहले से पीड़ित बीमार लोगों पर पड़ी है। इसी लॉकडाउन की वजह से लातेहार जिलान्तर्गत महुआडाँड़ के सोहरपाठ निवासी 24 वर्षीय इन्दरजीत कंवर की असमय मौत हो गई। लोहरदगा जिला के सेन्हा प्रखण्ड के अन्तर्गत बूटी ग्राम निवासी अर्जुन भगत गंभीर कैंसर से पीड़ित हैं, उनका ईलाज टाटा मेमोरियल अस्पताल मुम्बई से चल रहा है। पिछले 45 दिनों के इस लॉकडाउन की वजह से वे नियमित चेक अप कराने भी नहीं जा पाये हैं और अब तो दवाइयां भी नहीं ले पा रहे हैं। इधर पलामू जिले के मनातू थाना के विभिन्न गाँवों के आदिम जनजाति परहिया समुदाय के करीब आधे दर्जन लोग गंभीर टी0 बी0 बिमारी से ग्रसित हैं। उनका भी समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। और भी कई बीमार लोगों का लॉकडाउन की वजह समुचित इलाज नहीं होने की खबरें विभिन्न समाचार माध्यमों से सामने आती रही हैं। यह भी सत्य है कि कई ऐसी पीड़ादायी घटनाएँ भी हैं जो कई वजहों से सामने नहीं आ पा रही हैं।
अपने नौजवान बेटे इन्दरजीत की मौत के संबंध में उनके पिता रामनाथ कंवर ने आँसू बहाते हुए बताया कि जनता कर्फ्यू के दिन अर्थात 22 मार्च को एक पागल कुत्ते ने उनके बेटे सहित 3 अन्य लोगों को काट खाया था। अगले दिन वे इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, महुआटाँड़ गये थे। लेकिन अनुमण्डल स्तरीय इस अस्पताल में भी एंटी रैबिज इंजेक्शन उपलब्ध नहीं होने के कारण बेटे को इंजेक्शन नहीं दिलवा सके। वहाँ कार्यरत चिकित्सकों ने गुमला जिलान्तर्गत डुमरी अस्पताल ले जाकर इलाज कराने की सलाह दी। अगले दिन देशव्यापी तालाबन्दी के कारण कहीं जाना संभव नहीं था। और तब से लेकर लगातार लॉकडाउन की अवधि बढ़ती रही।


6 मई को मृतक इन्दरजीत में कुत्ते काटने के संक्रमण दिखाई देने लग गये थे। उसे किसी तरह महुआडाँड़ के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। वहाँ तुरन्त उसे स्लाइन चढ़ाया जाने लगा। लेकिन उसकी हालत जब और खराब होने लगी तो चिकित्सकों ने उसे सरकारी अस्पताल भेज दिया। सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों ने भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सदर अस्पताल लातेहार भेज दिया। जहाँ 7 मई को बेहत्तर इलाज के लिए उसे रिम्स, राँची रेफर कर दिया गया। लेकिन रिम्स में कोरोना इलाज को छोड़कर दूसरे सभी तरह के इलाज बन्द होने के कारण उसे भर्ती नहीं लिया गया। वहाँ किसी ने उन्हें बताया कि पुराना थाना, राँची के पास एक अस्पताल है जहाँ ऐसे लोगों का ईलाज किया जाता है। वहाँ उसे कुछ इंजेक्शन दिये गये लेकिन स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि वहाँ के चिकित्सकों ने भी जवाब दे दिया और कहा कि आपलोग इन्हें कोलकाता ले जाइए, वहीं उसका इलाज हो सकता है। लेकिन तब तक पिता का धैर्य जवाब दे चुका था। उसकी आर्थिक हालत भी ऐसी नहीं थी कि उसे लेकर कोलकाता जैसे बड़े शहर में ले जाकर उसका इलाज कराये।
चारों तरफ से निराश वह अपने बेटे को घर आ गया। जहाँ परिवार के लोग असहाय होकर अपने नौजवान बेटे की अंतिम साँस लेने तक भगवान से बेटे के जीवन की दुआ माँगते रहे, जड़ी—बुटी का इलाज कराते रहे। अन्ततः शनिवार 9 मई की रात्रि साढे़ 9 बजे इन्दरजीत अपने परिवार से सदा के लिए बिछड़ गया। उसकी मृत्यु की खबर से पूरे गाँव के लोग बहुत भयभीत हैं। क्योंकि गाँव के अन्य तीन नाबालिग बच्चे क्रमशः 4 वर्षीय सुद्धी कृति, 6 वर्षीय गायत्री कुमार और 7 वर्षीया अनिता कुमारी को भी उस पागल कुत्ते ने काटा था।
नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज बताते हैं कि सूचना के बावजूद भी स्वास्थ्य प्रशासन इस दिशा में गंभीर नहीं है। अब तक भी अस्पताल में ऐंटी रैबिज इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है। बच्चों के अभिभावक जो थोड़े आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे निजी मेडिकल दुकान से एक इंजेक्शन के लिए 500 रूपये देकर इलाज करवा रहे हैं। उन्हें कहा गया है कि उनको नियमित रूप से 5 सूई लेने होंगे। जिनके माता पिता गरीब हैं उनको अब भी जड़ी बूटी के इलाज से संतोष करना पड़ रहा है। जेम्स हेरेंज कहते हैं कि सरकार को चाहिए कि वह अपने प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य अधिकार को सुनिश्चित करे।

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