क्या फासिस्टों-एनजीओ जगत की पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों को वैधता प्रदान करना दुरुस्त है?

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गुजरी सदी के नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में मुंबई में प्रो. जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने भाजपा को राष्ट्रीय बुर्जुआ बताते हुए शिवसेना के मुखपत्र में लिखना शुरू किया। बताने की जरूरत नहीं कि प्रोफेसर दीक्षित मार्क्सवादी थे और मुर्दाघर जैसे चर्चित उपन्यास को लिख चुके थे।
आज के दौर में पूँजीपति के जब दलाल या राष्ट्रीय होने की बात चले तो पक्का समझिए कि साम्राज्यवाद की साजिश की थ्योरी बस आने ही वाली है या उमड़-घुमड़ रही है। पंजाब वाला हमारा साथी सुखविंदर तो यहाँ तक मज़ाक करता था कि किसान की भैंस अगर दूध न दे तो एनडीआर कैंप को उसमें भी साम्राज्यवाद की साजिश नजर आती है।
बस भूमिका बहुत हुई, आइए अब मूल बात को पॉजिटिवली रख देते हैं जो कि ओपन एंडेड है। चाहूँगा कि बिरादरी के लोग उस पर इनसाइट प्रदान करें। क्या किसी ऐसे जन-बुद्धिजीवी को टैक्टिक्स के तहत सांप्रदायिक फासिस्टों की पत्र-पत्रिकाओं में लिखना चाहिए जो भारत को पूँजीवादी समाज मानता हो। इस बात को जावेद अख्तर के आज तक के मंच पर आने तक विस्तारित किया जा सकता है। हिंदी के सारे अखबार फासिस्टों के लिए टूल का काम कर रहे हैं तो उनमें लिखने को लेकर भी यही सवाल बनता है।
मेरे दिमाग में यह सवाल आया कहाँ से आइए आपको इसकी पृष्ठभूमि बताता हूँ। फॉरवर्ड प्रेस के प्रमोद रंजन ने एक आर्टिकल अनुवाद करने के लिए भेजा तो पत्रिका के कांटेंट पर मेरी नज़र गई। पत्रिका का मालिक ईसाई है और अस्मिता-विमर्शियों को भरपूर स्पेस दे रहा है, मेरे डिडक्टिव लॉजिक ने यह बोला हो न हो एनजीओ का चक्कर है। आगे चलकर जब प्रमोद रंजन का अपने मालिक से कांट्राडिक्शन तीखा हुआ तो पब्लिक डोमेन में यह बात आ भी गई कि दरअसल वे एनजीओ की ही पत्रिका में संपादक थे।
अदालत जाकर अपने ब्राह्मणत्व को खारिज कराने वाले रामू दुबे माने रामू सिद्धार्थ ने भी फॉरवर्ड प्रेस में काम किया और दुर्दांत दलित-हितैषी बने, बने हुए हैं और अंबेडकर को दंडनायक-महानायक और न जाने कौन-कौन सा नायक मानते हैं। क्या रामू इतने नादान हैं कि वैश्विक धन्नासेठ एनजीओ जगत के लिए अपनी थैली क्यों खोले रहते हैं और अस्मिता-विमर्श यथास्थितिवादियों की कितनी सेवा करता है, यह उन्हें पता ही न हो? बस नए लोगों की जानकारी के लिए बताते चलें कि रामू सीएलआई को पूर्णकालिक कार्यकर्ता रह चुके हैं।
चलिए बात को आगे बढ़ाते हैं। पूँजी और श्रम के बीच के प्रधान अंतरविरोध पर पर्दा डालने के लिए जाति-जेंडर जैसे मुद्दों के अलावा भी खंडीकरण करने वाले बहुतेरे मुद्दों पर एनजीओ-जगत खूब सक्रिय है, इनमें एक सवाल पर्यावरण का भी है। औद्योगिक दुर्घटनाओं में घायल होने वाले मज़दूरों पर भी एक एनजीओ काम कर रहा है, जिसकी जानकारी साथी Mukesh Aseem के मार्फत मुझे मिली। बाल-विवाह, दहेज प्रथा, सैनिटरी पैड, लड़कियों की शिक्षा जैसे मुद्दों पर एनजीओ की दुनिया की तलछल ही धमाचौकड़ी मचाए रहती है। एनजीओ जगत की सरगर्मियों के अनगनित शेड्स हैं, थोड़े से जो ध्यान में आए उनका उल्लेख कर दिया।
अब हम सीधे-सीधे प्रश्न को रख देते हैं। वित्तीय पूँजी की अंतिम विजय के प्रचारक, पूँजीवाद को ही मनुष्यता की अंतिम मंजिल बताने वाले उत्तर-आधुनिक विमर्शी और विखंडनवादी ढेर सारी पत्रिकाएं भी निकालते हैं, वेबसाइटें चलाते हैं, जिनमें मार्क्सवाद के जानने वाले, कतारों से भागे बुद्धिजीवी नेतृत्वकारी पदों पर काम करते हैं। क्या ऐसी पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर लिखना चाहिए?
मेरी स्पष्ट और दो-टूक राय है कि अगर आप पर्यावरण प्रदूषण, नदी-जल प्रदूषण आदि-आदि की समस्या को 400 रुपये की दिहाड़ी की समस्या से नहीं जोड़ते या आपको ऐसा करने की अनुमति नहीं होती तो आपको एनजीओ-जगत द्वारा संचालित किसी भी मंच पर लिखना-बोलना नहीं चाहिए वर्ना आप उन्हें वैधता प्रदान कर रहे होंगे और अपने ध्येय के साथ गद्दारी भी कर रहे होंगे।
उत्तर-आधुनिकतावादी करते क्या हैं? पहले तो अतिशय उदार होकर आपको मंच प्रदान करेंगे ताकि आपको भ्रम हो कि आप मानवता के पक्ष में मुखर होकर आवाज उठा रहे हैं और उनका फायदा पता है क्या होता है? लेखक-कांट्रीब्यूटर के जो फ्रेंड्स-फॉलोअर होते हैं उस मंच को वैधता प्रदान करने का काम अनायास करने लगते हैं। इस तरह से अनजाने में ही आप उनकी राह के हमराही बन जाते हैं। मंगलेश डबराल अगर अभय दुबे से पुरानी परिचिति के आधार पर सीएसडीएस की पत्रिका में अपनी कविताएं छपने को भेजते तो फोर्ड फाउंडेशन के असल दानदाता के कुकर्मों पर पर्दा डालने का काम न करते, अवश्य करते।
सर्वहारा क्रांतियों से मज़दूर वर्ग ने जितना सीखा है, शोषकों ने उससे बहुत ज्यादा सीखा है तभी तो प्राइम-कांट्राडिक्शन की अवधारणा को धूमिल करने के लिए अपने एजेंटों का जाल बिछा रखा है।
बनारस जैसी पिद्दी सी जगह में, जहाँ पर फैक्टरी इलाका वस्तुतः नाममात्र का है, एनजीओ के इतने कार्यकर्ता हैं कि आप दाँतों तले उंगलियाँ दबाने के लिए बाध्य होंगे। यहाँ के जंतर-मंतर यानि कि शास्त्री-घाट पर वित्तीय-पूँजी के यही एजेंट अहर्निश धमाचौकड़ी मचाया करते हैं और कोई भी धरना-प्रदर्शन या जुलूस इनकी भागीदारी के बिना मुकम्मल ही नहीं होता। मज़दूर वर्ग के गद्दार झोला उठाए इनकी कतारों में ट्रोजन-हार्स की माफिक छुपे रहते हैं। जिनके बारे में भ्रम होता है कि ये जनता के आदमी हैं थोड़ी सी पड़ताल करने पर पता चलता है कि अरे यह तो इससे-उससे वजीफा पाते हैं।
साथियो, हाँ हमें शुद्धतावादी होना पड़ेगा, अपने उसूलों को व्यवहार में उतारने को लेकर सजग रहना होगा, मध्यवर्गीय उदारतावाद बहुत ही खतरनाक है, कम से कम राजनीतिक जीवन में।
कामता प्रसाद

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