ट्विटर के मुकाबले फेसबुक अधिक लोकतांत्रिक है

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ट्विटर पर अब ब्लू टिक के पैसे देने होंगे। यानी प्रामाणिकता खरीदनी होगी। यह खरीदी हुई प्रामाणिकता कितनी प्रामाणिक होगी, वह एक अलग सवाल है। लेकिन इसी से ख्याल आया, फेसबुक भी है तो एक कंपनी ही, जाहिर है बुनियादी कसौटियां एक ही हैं, इसलिए कई तरह की गफलत दोनों में दिखती हैं और बहुत सारी नहीं दिखने दी जातीं। बहरहाल, दोनों के स्वरूप में मूलभूत भिन्नता भी मौजूद है। इसकी वजह से हममें से भी बहुतों को, जो दोनों जगह मौजूद हैं, कोई एक मंच ज्यादा और दूसरा कम भाता है।
अपनी बात कहूं, जो बिल्कुल व्यक्तिगत और उतनी ही सब्जेक्टिव भी है (इसलिए चाहूंगा कि आप सब अपने अनुभव और निष्कर्ष भी बताएं ताकि पता चले मेरा ऑब्जर्वेशन कितना सही या गलत है), तो
– ट्विटर सिलेब्रिटीज का मंच है और फेसबुक आम लोगों का।
– ट्विटर आपको फॉलोवर मुहैया कराता है, जबकि फेसबुक फ्रेंड्स बनाता है।
– बड़े लोगों के पास ज्यादा वक्त नहीं होता, तो वे टिप देकर अपने अनुयायियों को कृतार्थ करते हैं। उन्हें ज्यादा स्पेस नहीं चाहिए (अपवाद नियम की पुष्टि करते हैं)। फेसबुक पर इतमीनान से बात होती है। ज्ञान देने के बजाय आप साझा करते हैं अपने विचार, अनुभव, अपने दोस्तों के साथ।
– जो अनुयायी बनाना मंजूर कर लेते हैं, उन्हें सिर्फ अच्छा गुरु बनना होता है। अनुयायी जैसा भी हो, गुरु के संसर्ग में रहकर उनके गुण ग्रहण करता रहेगा। सो किसी और टेस्ट की जरूरत नहीं। बस अनुयायी बनने की इच्छा काफी है। तो, जो चाहे आपको फॉलो करने लगता है। फेसबुक में दोस्ती होती है, जो जाहिर है एकतरफा नहीं हो सकती। सो, एक तरफ इच्छा हुई तो वह नॉक करता है, आपकी इजाजत हो तभी आपकी दुनिया में प्रवेश करता है। इस लिहाज से न्यूनतम सहमति दोनों तरफ जरूरी होती है। जाहिर है यह संबंधों का ज्यादा लोकतांत्रिक स्वरूप है।
– फेसबुक पर संबंध ज्यादा बराबरी की जमीन पर बनते हैं, ट्विटर पर बराबरी की कोई जमीन ही नहीं उपलब्ध होती। वहां हायरार्की वाला ही रिश्ता बनता है आप और आपके फॉलोवर।
यह अलग बात है कि दोनों मंचों पर ट्रोल अनियंत्रित हैं और पूरी ताकत से गंध मचाते हुए उसे नरक बनाने में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते।
प्रणव प्रियदर्शी की फेसबुक वॉल से

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