हर चुनाव बुनियादी तौर पर सत्ता और लोकतंत्र के बीच एक संघर्ष है!

0
765

फैसला हमें करना है कि सत्ता लोकतंत्र के मातहत होगी या लोकतंत्र सत्ता के रहमोंकरम पर होगा!

………………………………………………………………………………………………………………………………………………

 

साथियों,

हमारे प्रदेश सहित देश के पांच राज्यों में  चुनाव हो रहा है। हवाई मुद्दों, हवाई आरोपों-प्रत्यारोपों का बाजार गर्म है और अब तो प्रचार को भी हवाई माध्यमों (डिजिटल) तक सीमित कर दिया है। वास्तविक जीवन के वास्तविक दुख-दर्द के सवालों पर आभासी दुनिया में द्वंद होगा और नतीजों को आसमानी फैसले की तरह हम सभी के मत्थे मढ़ दिया जाएगा। यह आभासी दुनिया उन्हीं के द्वारा संचालित और नियंत्रित है, जिनकी आमदनी कोविड महामारी के दौरान बेहिसाब बढ़ी है और आगे भी बढ़ती रहेगी। आम मतदाता तो उस भीड़ का हिस्सा बना दिया गया है जिसकी आमदनी और जीवन को महामारी और नई टैक्स प्रणाली का दीमक लगातार खोखला कर रहा है। ऐसे में चुनाव में हम सभी के वास्तविक सवालों का सिरे से गायब होना कोई अनहोनी नहीं है। हमारे सवालों का गायब होना स्वयं हम सभी का राजनीति के मैदान से गायब होना है। हमारे गायब होने का नतीजा लोकतंत्र का निष्प्राण होना है।  निष्प्राण होते लोकतंत्र में प्राण संचार कैसे किया जाए और इस संघर्ष के मैदान में हमारी वापसी कैसे हो, यह हम सभी के लिए सबसे जरूरी सवाल है।

इस मायने में चुनावी संघर्ष एक जरूरी वैचारिक संघर्ष भी है। चुनाव में मीडिया द्वारा तरजीह प्राप्त राजनीतिक पार्टियां हम सभी को मुफ्त अनाज से लेकर स्कूटर, लैपटॉप और कैश, सब्सिडी तक देने की बातें कर रही हैं लेकिन वह कितना लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार हैं इसे हमें जरूर देखना चाहिए। सवाल तो यह है कि तमाम तथाकथित उच्च-कोटि के आर्थिक नीतियों और टैक्स वसूली के बावजूद आबादी के बड़े हिस्से (दो तिहाई) को सरकारी दान खाते पर निर्भर होना पड़ता है क्यों नहीं इनकी आमदनी उस गति से बढ़ती है जैसे आबादी के ऊपरी 10% लोगों की या क्यों आबादी के बड़े हिस्से की आमदनी लगातार घटती जा रही है और जीवन की असुरक्षा बढ़ती जा रही है? इस विरोधाभास की जटिलताओं को हम चाहे जितना ही कम समझते हो लेकिन इसकी आंच तो हर क्षण महसूस करते हैं। क्या इस अग्नि परीक्षा से मुक्ति पाने की कोई राजनीति हो सकती है? क्या धर्म या जाति के आधार पर संगठित की जाने वाली राजनीति इन प्रश्नों का समाधान कर सकती है या वह मुख्य प्रश्नों को अदृश्य बना देती है? समाज में जाति-धर्म आदि के आधार पर विभाजन बना रहे इसमें समाज का हित है या किन्हीं अन्य ताकतों का?

यहां पर महत्वपूर्ण गुत्थी समाज और सत्ता के बीच के संबंधों को लेकर है, आमतौर पर दोनों को एक-दूसरे का पूरक मान लिया जाता है। जबकि सच यह है कि एक की कमजोरी दूसरे की ताकत होती है। बिना समाज को विभाजित किए या उसकी स्वतंत्र पहल कदमी को कुंद किए सत्ता ताकतवर हो ही नहीं सकती। इसलिए यदि हमें सत्ता की निरंकुशता और मनमानेपन पर लगाम लगाना हो तो हमें समाज को मजबूत बनाना होगा। यह मजबूती समाज की सामाजिकता और एकजुटता को धर्म-जाति की संकीर्णता  से ऊपर उठकर ही हासिल किया जा सकता है । अपनी संकीर्णता से ऊपर उठना स्वयं हमारा अपना  काम है। एक मनुष्य के रूप में अपनी पहचान को यदि हम खुद ही महत्व नहीं देंगे तो एक मानवीय समाज कैसे बनाएंगे ? मनुष्य और मनुष्यता को प्रभावी बनाने की प्रक्रिया में प्रभावी लोकतंत्र की जमीन तैयार होती है। यहां पर प्रश्न यह है कि समाज की सामाजिकता और स्वतंत्र पहल-कदमी की राह की अन्य बाधाएँ क्या हैं और उसके समाधान के लिए हमारी कोशिशें क्या हैं? जन- विरोधी राजनीति का विकल्प राजनीतिक प्रश्न से अधिक एक सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रश्न है। जिस दिन समाज अपने पैरों पर मानवीय आधार पर खड़ा होगा उस दिन जन-विरोधी सरकारें वैसाखी पर चलने लगेंगी। वास्तविक विकल्प हमारे समाज और स्वयं हमारे भीतर है और हम उसे बाहर इस पार्टी या उस पार्टी में ढूंढ रहे हैं। नागरिकों की आजादी और गरिमा को बंधक बनाने वाली राजनीति का विकल्प राजनीति के परे जाकर समस्याओं को देखने में निहित है। ये तमाम पार्टियां सत्ता का विस्तार हैं और पूंजीवादी-कॉरपोरेटी लूट के पैसों से पलती-बढ़ती है और इस लूट को किसी न किसी आवरण में बनाए रखने की योजनाबद्ध कार्रवाई है। जो पार्टियां इसमें भागीदार नहीं है आज राजनीति के अखाड़े में उनकी क्या हैसियत है, यह किसी से छिपा नहीं है।

यहां पर इस बात को समझना भी जरूरी है कि सत्ता अपनी तमाम योजनाओं को जिन संस्थाओं के मार्फत अमलीजामा पहनाती है उन संस्थाओं की नागरिक समाज के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती। नौकरशाही, पुलिस, न्यायपालिका, योजना, वित्त आदि के समक्ष एक आम नागरिक की क्या हैसियत है? हमे हर बात के लिए उनकी इजाजत लेनी पड़ती है। ऐसे में लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाता है? अब तो विपक्ष के निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी इनके सामने कोई हैसियत नहीं है। इन सवालों का समाधान किए बिना हमारा समाज आगे कैसे बढ़ेगा? विकास की तमाम योजनाओं, चर्चाओं में क्या यह सवाल जरूरी नहीं हैं?

देश की हुकूमत का यह दावा है कि उनके प्रयासों से नया भारत बन रहा है। यह एक हद तक सच भी है क्योंकि अब देश के सारे उद्योगों, वित्तीय संस्थानों, उत्पादन, वितरण को समाज के मालिकाने से निकालकर निजी धन-कुबेरों के मालिकाने में लाया जा रहा है। जहां तक इन जगहों पर कार्यरत श्रमिकों-कर्मचारियों का सवाल है उनकी सारी सामाजिक, कानूनी सुरक्षा खत्म करके ठेका-संविदा श्रमिकों के रूप में धन-कुबेरों का गुलाम बनाया जा रहा है? यही योजना किसानों और देश की खेती-बारी के लिए भी है। कारपोरेटों को खेती-बारी का भी मालिकाना देने की कोशिशें जारी हैं। वह तो किसानों की राजनीतिक जागरूकता और मजबूत सामाजिकता के कारण इस योजना पर थोड़ा लगाम लगाया गया है लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। यह ठीक है कि पुराने भारत से देश के नागरिकों, किसानों, श्रमिकों, युवाओं, महिलाओं को बहुत सी शिकायतें हैं लेकिन नए भारत में शिकायत करना ही सबसे बड़ा अपराध है, राजद्रोह है। वास्तव में पुरानी व्यवस्था में कहने के लिए ही सामाजिक मालिकाना था। सारे फैसलों पर नियंत्रण तो कॉरपोरेटों और भ्रष्ट नेताओं की पैरोकारी करने वाले नौकरशाहों का था। इसी से इन उद्योगों की कार्यकुशलता घटती चली गई और बेहतर कार्य कुशलता के नाम पर यह पूरी सामाजिक संपदा पूंजीपतियों को गिफ्ट की जा रही है।ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों ने भी इन सवालों को आमतौर पर गंभीरता से नहीं लिया और आज नतीजे के तौर पर नए भारत में हमारे लिए कोई सम्मानजनक जगह नहीं बची।

सवाल यह है कि वास्तविक समाज जिसकी उत्पादक और रचनात्मक सक्रियता से ही सामाजिक जीवन रूप ग्रहण करता है उसके नए भारत का नक्शा क्या होगा? और यह कैसे जमीन पर उतरेगा? वास्तव में जब हम सामाजिक मालिकाने का शब्द इस्तेमाल करते हैं तो मालिकाना शब्द अपना अर्थ खोकर बराबरी और सहयोग का रूप ले लेती है। यदि ऐसा नहीं है तो मालिकाना शब्द से पैदा हुई मानसिकता हर नागरिक को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देती है और हम समाज से भीड़ में बदल जाते हैं और यही कॉर्पोरेटी सत्ता और उसके बाजार की इच्छा है। भीड़ को हांकने के लिए हमेशा एक तानाशाह या नायक की जरूरत होगी, लोकतंत्र की नहीं। आज यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा कि हमें लोकतंत्र की कितनी जरूरत है और हम उसे लाने के लिए क्या करने को तैयार हैं? श्रमिक, किसान, युवा आंदोलन के झंडे पर पहले मुद्दे के तौर पर लोकतंत्र और सामाजिक मालिकाना कब लिखा जाएगा? यहीं पर इस बात को ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि कोई भी मनुष्य दूसरे मनुष्य की कमाई बढ़ाने का साधन नहीं हो सकता, सभी मनुष्यों की मानवीय जरूरतों का एक जैसा महत्व है और इसे पूरी समानता के आधार पर पूरा किया जाना ही लोकतंत्र का बुनियादी गुण है। इसी के साथ यह भी समझना होगा कि हम इस प्रकृति और प्राणी-जगत के मालिक नहीं हैं और हमारी स्वार्थी एवं संवेदनहीन गतिविधियों से इसे कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। हमारा अस्तित्व इन सभी के साथ एक मानवीय संबंधों के रूप में ही संभव है। अगर यह मिटता है तो हम भी नहीं बचेंगे। कॉरपोरेट और उनके बाजार के लिए यह सब सिर्फ एक कच्चा माल है लेकिन हमारी नजर में यह समग्र जीवन है।

आज की चुनावी राजनीति में धर्म और जाति पर सबसे अधिक चर्चा है और परोक्षतः यह बात स्थापित की जाती है कि विभिन्न धर्मों और जातियों के लोगों के हित और सम्मान एक-दूसरे के विरोधी हैं और एक धर्म-जाति के लोगों के हित और सम्मान एक हैं चाहे राजा हो या रंक? जिस धर्म-जाति के लोगों की संख्या अधिक हो उसे दूसरे को दबाकर रखने का प्राकृतिक अधिकार है। अपने धर्म-जाति का सबसे बुरा आदमी नायक और दूसरे का भला और नेक आदमी खलनायक? यह बातें हम सभी के रोजमर्रा के जीवन से कहां तक मेल खाती हैं? क्या हम सामाजिक जीवन की हर जरूरत को धर्म-जाति के चश्मे से देखकर पूरा कर पाएंगे? क्या हम वास्तव में धर्म-जाति के नाम पर बाड़ा बंदी चाहते हैं? झगड़े और अशांति चाहते हैं? या इससे ऊपर उठकर आपसी सहयोग और सामंजस्य हमारे जीवन की वास्तविक जरूरत है। तो फिर यह सामाजिक बंटवारे किसके द्वारा पाले-पोसे जाते हैं और वह कौन से लोग हैं जिन्हें इसका ठोस लाभ मिलता है? यदि हमें ऐसी ताकतों के निरंकुश अंकुश से खुद को मुक्त करना है तो क्या एक-दूसरे के साथ सहयोग और एक-दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमे स्वयं नहीं लेनी पड़ेगी? ऐसा हर व्यक्ति जो सामाजिक जीवन की वैचारिक विविधता, वैचारिक आजादी और विविध प्रकार की रचनात्मकता के विरोध में है वास्तव में वह जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा होता है। मानव-समाज और प्रकृति का सारा सौंदर्य और ऊर्जा उसकी विविधता में है। इस विविधता के साथ आगे बढ़ने की प्रक्रिया ही लोकतंत्र और स्वायत्तता है। राजनीतिक संघर्षों में जब बदले की भावना, छल, अनैतिकता और हर तरह की दुर्भावना यदि चरम पर पहुंच गई हो तो हमें समझना चाहिए कि पूरे समाज को सामाजिक जीवन का नेतृत्व अपने हाथ में लेने का वक्त आ गया है, शांतिपूर्ण सामाजिक-क्रांति का समय आ गया है। सामाजिक जीवन की स्वायत्तता और सर्वोच्चता की अभिव्यक्ति के लिए स्वयं को नए तरह के संघों में संगठित करना होगा। हम इस लिए बेबस है क्योंकि हमारे पास राजनीतिक संगठन तो बहुत है लेकिन वास्तविक सामाजिक संगठन नहीं है। जो सामाजिक संगठन है भी तो वे राजनीतिक संगठनों के दुमछल्ले के तौर पर है। हमें इसे ठीक करना होगा। आभासी जगत के मोहपाश से निकल कर वास्तविक जीवन से संबंध, संवाद बनाना होगा।

वैसे तो मौजूदा हुकूमत के विकास योजनाओं के विनाशकारी प्रभावों की तहसील से चर्चा की जा सकती है यह प्रभाव सिर्फ आर्थिक दायरे के ही नहीं बल्कि सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय आदि जीवन के हर पहलू से संबंधित हैं। यह सारे काम और नीतियां लोकतंत्र को लगातार निष्क्रिय और पंगु बनाने के कार्य से जुड़े हैं। आज लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ कर इतना छोटा हो गया है कि हम सभी की आजादी और मनुष्यता अत्यधिक खतरे में है। तो सबसे अहम सवाल तो इस खोई हुई आजादी और मनुष्यता को वापस पाने का है। इसके साथ ही इनकी जगह जिस भी राजनीतिक पार्टी की हुकूमत कायम हो हमें उसके भरोसे बैठने की जगह अपनी स्वयं की योजनाओं पर साझा समझ बनाकर आगे बढ़ने की जरूरत है ताकि लोकतंत्र के दायरे और प्रभाव का विस्तार हो।

वास्तव में सरकारों की सबसे बड़ी समस्या नियमित अंतराल पर होने वाले चुनाव होते हैं और किस चुनाव में लोकतंत्र का पलड़ा भारी हो जाए और सत्ता का पलड़ा कमजोर पड़ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। सरकारों का वश चले तो एक बार  जीतने के बाद वे कभी भी चुनाव में ना जाएं लेकिन यह बड़े पैमाने पर जनता के दमन की मांग करता है जो आज के दौर में संभव नहीं है। दूसरा रास्ता मीडिया, चुनावी मशीनरी, चुनाव बांड, जांच एजेंसियां, गुंडा-वाहिनियां, धर्मांधता, जातीय उन्माद और देशभक्ति का मुखौटा आदि का दुरुपयोग। हमारे समाज को इन हमलों से बचते हुए लोकतंत्र और सामाजिकता के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना होगा।

हमारा दायित्व है चुनाव के दौर में फर्जी बहसों, आंकड़ों, नफरत और हिंसा के कार्यक्रमों में ना उलझते हुए लोकतंत्र की समझ और इसकी जरूरत का प्रचार-प्रसार करना ताकि इस संघर्ष में लोकतंत्र का पलड़ा भारी हो। इसी में हमारी सारी समस्याओं का और हमारे समाज की स्वायत्तता के प्रश्नों का समाधान निहित है। सत्ता को लोकतंत्र के मातहती में लाए बिना हमारे सम्मान और मनुष्यता की बहाली संभव नहीं होगी, ज्ञान-विज्ञान का विकास नहीं होगा, अभाव और दरिद्रता नहीं मिटेगी, सभी के लिए सुखी और मुक्त जीवन का सपना साकार नहीं होगा।

आइए मिलकर इन प्रश्नों पर रचनात्मक विचार-संवाद शुरू करें और अपने समाज, देश और पूरी मानवता को आगे ले जाने के लिए जिम्मेदारी लेकर काम करें। यदि यह समाज हमारा है तो उसके सुख-दुख भी हमारे हैं और इसे सुंदर बनाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।

 

इतिहास का एक जरूरी सबक उम्मीद है और समाज को सुंदर बनाने वालों की जीत है।

………………………………………………………………………………………………………………………………………………

 

पी सिन्हा, नरेश कुमार, वीरेंद्र त्रिपाठी, लता राय, राम कृष्ण, शिवाजी राय, के के शुक्ला, होमेंद्र मिश्र, ज्योति राय, रामकिशोर, राधे श्याम यादव

31 जनवरी, 2022

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here