महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी बना  फर्जीबाड़ा का सेफ जोन

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विशद कुमार

  महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के कुलाधिपति पदमश्री डॉ. महेश शर्मा ने कुलपति प्रो. संजीव शर्मा की अवैध नियुक्ति और निरंकुश भ्रष्टाचारअनैतिकता के खिलाफ राष्ट्रपति और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र भेजकर उनके खिलाफ समुचित कार्रवाई करने की गुहार लगाई है। वे पहले भी इसे लेकर राष्ट्रपति को पत्र लिख चुके हैं।  

डॉ. महेश शर्मा ने दूसरी बार फिर 9 जुलाई को विश्वविद्यालय के विजीटर अर्थात माननीय राष्ट्रपति से गांधी के नाम पर स्थापित मोतिहारी के केंद्रीय विश्वविद्यालय के भ्रष् और अवैध कुलपति प्रो. संजीव शर्मा के अनैतिक और नियम विरुद्ध कृत्यों के खिलाफ मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अभी तक समुचित कार्रवाई करने की शिकायत की है। उन्होंने माननीय राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वे तत्काल इस विश्वविद्यालय के मामले में हस्तक्षेप करें क्योंकि उनके त्वरित आदेश के दो महीने बाद भी मंत्रालय कुलपति को बचाने में लगा है। उन्होंने कार्यकारी परिषद के एक सदस् के हवाले से राष्ट्रपति को पुन: सूचित किया है कि कुलपति द्वारा विश्वविद्यालय के विभिन् नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है। इन्होंने वर्तमान कुलपति प्रो. संजीव शर्मा की नियुक्ति को भी पूर्व कुलपति प्रो. अरविन्द अग्रवाल की नियुक्ति की ही तर्ज पर भ्रामक तथ्यों के आलोक में अवैध ठहराया है। वर्तमान कुलपति द्वारा अपने कार्यकाल में की गई नियुक्तियों में हुई धांधलियों का भी डॉ. महेश शर्मा ने जिक्र किया है। इसके साथसाथ विश्वविद्यालय की स्थापना के सालों बाद भी तमाम उच् पदों, जैसे कुलसचिव, वित् अधिकारी और परीक्षा नियंत्रक आदि के पदों को साजिशन खाली रखे जाने को लेकर इन्होंने एतराज जताया है। इन्होंने प्रो. संजीव शर्मा को गांधी के सिद्धांतों के खिलाफ काम करने वाला बताते हुए इनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। ध्यातव् है कि कुलाधिपति महेश शर्मा द्वारा इससे पूर्व दिनांक 11 मई, 2020 को भी इस संदर्भ में माननीय राष्ट्रपति को पत्र लिखा जा चुका है, जिसमें उन्होंने कुलपति की बर्खास्तगी और जाँच की माँग की थी।

            8 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रोफेसर किरण घई द्वारा भी माननीय मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय को विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा की निरंकुशता एवं भ्रष्टाचार समेत उनके द्वारा की जा रही व्यापक अनियमितताओं के खिलाफ एक पत्र लिखा गया है। उन्होंने लिखा है कि कुलपति द्वारा विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठकों में भ्रामक सूचनाएँ दी जाती हैं और तथ् प्रस्तुत नहीं किए जाते। आरोप में विश्वविद्यालय के विशेष कार्य अधिकारी पद्माकर मिश्रा की भी इसमें संलग्नता का जिक्र किया गया है। उन्होंने बताया है कि कार्यकारी परिषद की 17वीं और 18 वीं बैठकों में वे परिषद के अधिकारों के खुले उल्लंघन के स्वयं नामित सदस् के रूप में साक्षी रहे हैं। चयन समिति के सदस्यों के नाम प्रस्तावित करने का अधिकार गोपनीयता के नाम पर कुलपति द्वारा अपनी मुट्ठी में गलत ढंग से रखने के जिस कुत्सित प्रयास का उल्लेख आपने किया है उसके गवाह मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक् सचिव  चंद्र शेखर कुमार और यूजीसी के जितेंद्र त्रिपाठी भी रहे हैं। अनाधिकृत ढंग से प्रति कुलपति की नियुक्ति किए जाने की भी उन्होंने शिकायत की है। आपने वर्तमान कुलपति की नियुक्तियों में हुए भ्रष्टाचार और भाईभतीजावाद पर भी अपना असंतोष शिकायत के साथ माननीय मंत्री को लिखा है। इस संदर्भ में शिक्षकों समेत स्थानीय लोगों द्वारा की गई असंख् शिकायतों का भी संज्ञान लेने का मंत्री जी से अनुरोध किया है। ज्ञात हो कि मंत्री महोदय को लिखने से पहले कुलपति को भी इन्होंने 4 जुलाई को एक ईमेल किया था जिसमें इन्होंने 30 जून, 2020 को आयोजित कार्यकारी परिषद की 18 वीं बैठक में कुलपति द्वारा की गई तानाशाही और राष्ट्रगान की मर्यादा के दुरुपयोग का जिक्र किया था। इन्होंने कुलपति द्वारा अवैध ढंग से वित् समिति के दो सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी उसी ईमेल में अपनी क्षुब्धता भी जाहिर की थी। प्रति कुलपति की अवैध नियुक्ति का भी उन्होंने इसमें जिक्र किया था।  

     जिस प्रकार कुलपति प्रो. संजीव शर्मा के खिलाफ लगातार विभिन् लोगों द्वारा शिकायतें की जा रही हैं और स्वयं सत्ता पक्ष से जुड़े वरिष् लोग भी इन शिकायतों के पक्ष में खुद मंत्रालय और माननीय राष्ट्रपति को पत्र लिख रहे हैं, उसे देखते हुए कुलपति संजीव शर्मा के अनैतिक और भ्रष् कृत्यों के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा कदम उठाया जाना अपेक्षित था। किंतु मंत्रालय का इन आरोपों पर राष्ट्रपति की पूर्व दखल के बाद भी चुप्पी साधे रहना सत्ता में ऊपर बैठे लोगों तक की इसमें मिलीभगत का संकेत करता है। सबसे महत्वपूर्ण इस संपूर्ण प्रकरण में यह है कि प्रोफेसर संजीव शर्मा के खिलाफ उनकी कुलपति पद पर नियुक्ति को लेकर गंभीर आरोप हैं, जैसे कि उनके पास अपेक्षित शैक्षणिक अनुभव होना, अपने आवेदन के साथ जालसाजी भरा विजिलेंस क्लियरेंस नत्थी करना आदि। यहाँ तक कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में प्रवक्ता पद पर इनकी स्थायी नियुक्ति भी विवादास्पद बताई जा रही है।

 

बताते चलें कि 27 जून 2020 को भी स्थानीय प्रतिष्टित लोगों ने भी केंद्र सरकार से संजीव शर्मा को अविलंब हटाने की मांग थी।

पत्र में कहा गयाथा कि महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए चंपारण की जनता दिल्ली तक लड़ाई लड़ कर स्थापित करवाई थी, मगर जाने किसकी बुरी नज़र लग गई और विश्वविद्यालय स्थापित होने के पहले हीं विवादों का केंद्र बन गया। पहले कुलपति अरविंद अग्रवाल की फर्जी डिग्री पकड़े जाने और तमाम तरह के घोटाले जैसे शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक पदों पे की गई अवैध नियुक्तियाँ और कई करोड़ के वितीय अनियमितता का उजागर CAG के द्वारा किया गया। विश्विद्यालय के शिक्षकों और स्थानीय लोगों के  लंबे धरना प्रदर्शन के बाद अरविंद अग्रवाल से मुक्ति मिली। तब स्थानीय लोग ये सोच रहे थे कि अब कोई अच्छे व्यक्तित्व और ईमानदार छवि के शिक्षाविद को कुलपति बनाया जायेगा। मगर दूसरे कुलपति संजीव शर्मा अरविंद अग्रवाल से दस कदम आगे निकल गए। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ संदीप पहल ने प्रमाण के साथ आरोप लगाया है कि संजीव शर्मा की मेरठ विश्वविद्यालय में लेक्चर के पद पर नियुक्ति से लेकर रीडर और प्रोफेसर पद पर पदोन्नति सब अवैध है। संजीव शर्मा पर करोड़ों के घोटाले का आरोप है, जिसमें मेरठ मेडिकल थाने में IPC की धारा 420, 467, 468 और 120B के तहत मुकदमा दर्ज है। साथ ही मेरठ मेडिकल थाने में इनकी प्रोफेसर पद की पदोन्नति पर विजिलेंस में केस दर्ज है जिसको ये छिपाकर फर्जी तरीके से कुलपति बने हैं।

बताना जरूरी होगा कि 11 मई 2020 को विश्विद्यालय के कुलाधिपति और गांधीवादी पदमश्री डॉ महेश शर्मा ने माननीय राष्ट्रपति महोदय और सचिव मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र भेज कर संजीव शर्मा को कुलपति पद से हटाने की मांग किये थी। साथ हीं इनके सभी कुकृतियों की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की थी।

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्विद्यालय के पूर्व अधिशासी परिषद के सदस्य प्रोफेसर कर्मात्मा पांडेय ने भी कहा कि यह गाँधी जी के कर्मभूमि के लिए दुर्भाग्यपूर्ण  बात है कि महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ऐसेऐसे कुलपतियों की नियुक्ति हो रही है जो संविधान से इतर कार्य करते हैं। शिक्षा का परिमाणात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तर से विश्वविद्यालय परिवार को छला गया है।

बिहार विश्विद्यालय के वरीय  प्रोफेसर रत्नेश कुमार आनन्द ने कहा है कि ज्यों ज्यों शिक्षा का मूल्य बढ़ता जा रहा है त्यों त्यों महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रो संजीव शर्मा के नेतृत्व में शिक्षा का स्तर नीचे गिरता जा रहा है, मानो जैसे विधिसंगत कार्य करना इनकी कार्यप्रणाली में नहीं है। वे कहते हैं कि कुलाधिपति जी ने महामहिम राष्ट्रपति जी को इनके निलंबन के लिए पत्र लिखा है वह बिल्कुल जायज है। जल्द से जल्द ऐसे फर्जी लोगों से विश्विद्यालय मुक्त होना चाहिए और उनके सभी कुकृतियों के लिए दंडित करना चाहिए।

सारण के शिक्षाविद और गांधीवादी शिक्षक श्रत्नेश्वरी शर्मा ने कहा  कि इस प्रदेश एवं इस जिले के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। विश्वविद्यालय में शिक्षा का मूल्य उसकी प्रभाविता, शिक्षण, नैतिकता से तय होती है। जिस विश्वविद्यालय में संविधान के नियमों का पालन होता हो, वहां किस तरह की व्यवस्था होगी? स्वत: समझा जाना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इस विषय पर जल्द से जल्द संज्ञान लेते हुए छात्र कल्याण को देखते हुए कुलपति को निलंबित करना चाहिए।

चंपारण के वरिष्ठ पत्रकार सह गांधी जी के विभिन्न संस्थाओं में अहम भूमिका निभाने वाले चंद्र भूषण पांडेय ने कहा कि इस ऐतिहासिक चंपारण का नाम समस्त भारतवर्ष के शिक्षा जगत में विश्वविद्यालय में फर्जी कुलपति के नाम से कलंकित हो रहा है। जहां विश्वविद्यालय में गुणात्मक छलांग लगानी चाहिए थी वहीं इस विश्वविद्यालय में फर्जी नियुक्ति, फर्जी प्रमोशन, फर्जी कार्यकारी परिषद, फर्जी शैक्षणिक परिषद के निर्माण दोगुनी छलाँग लगा रही है। पूरे जिले में माहौल गर्म है बच्चे वहां पढ़ना नहीं चाहते हैं, जल्द से जल्द कुलपति को बर्खास्त किया जाए।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्विद्यालय के कुलपतियों का विवाद एवं उनकी खुद की कुलपति पद पर नियुक्ति एवं उनके द्वारा किये गए शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक पदों पर की गई नियुक्तियां और पद्दोन्नतियां हमेशा से विवाद के घेरे में रहती आई है। 

जून 2018 में विश्विद्यालय के पहले कुलपति अरविन्द अग्रवाल की जर्मनी की फर्जी पीएचडी डिग्री की साया और उनके द्वारा किये गये नियुक्तियों पर एमएचआरडी, यूजीसी और सेंट्रल विजिलेंस कमिशन की जाँच अभी लम्बित थी। तबतक दूसरे कुलपति प्रोफेसर संजीव शर्मा फर्जीवाड़े के बल पर एमएचआरडी और राष्ट्रपति भवन कार्यालय को गुमराह करके अप्रैल 2019 में कुलपति का पद ग्रहण किया। 27 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट दिल्ली के अधिवक्ता डॉ संदीप पहल ने एमएचआरडी के सचिव को प्रोफेसर संजीव शर्मा पर विजिलेंस जाँच की तथ्य छुपाकर अवैध तरीके से कुलपति पद हासिल करने की शिकायत सबूतों के आधार पर ईमेल के द्वारा किया था। डॉ पहल कुलपति शर्मा की चौधरी चरण सिंह विश्विद्यालय में प्रोफेसर के पद पर किये गए अवैध पदोन्नति, महिला शोध छात्रा को शराब पीकर अश्लील बातें करना एवं मानसिक उत्पीड़न से लेकर संजीव शर्मा पर फर्जी सर्टिफिकेट बनाने के आरोप में सही पाने पर विश्विद्यालय के एक्सक्यूटिव कौंसिल द्वारा उनके ऊपर डिस्प्लीनरी कमिटी बनायीं गयी थी। 

बता दें कि डॉ डॉ संदीप पहल ने अपने शिकायत संख्या 4 में कुलपति संजीव शर्मा पर महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्विद्यालय में किये गए 60 से अधिक शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक पदों पर की गई नियुक्तियां और पद्दोन्नतियां को सरकार के विभिन्न नियमों का उलंघन करने के कारण अवैध बताया था जो निम्नलिखित है:- ”नियमतः विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय की एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल, विषय विशेषज्ञों के नाम की अनुशंसा और अनुमोदन करती है। यहीविषय विशेषज्ञशिक्षकों के साक्षात्कार पैनल के सदस्य होते हैं। कुलपति संजीव कुमार शर्मा ने बिना महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्विद्यालय के एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल के अनुमति के अपने पूर्व परिचित और नजदीकी व्यक्तियों को साक्षात्कार पैनल का सदस्य बनाया जो कि गैरकानूनी है। कुलपति संजीव शर्मा ने अपने पद का दुरुपयोग कर शिक्षकों की नियुक्ति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों की भी अवहेलना की है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 2001 और 2015 में इस संबंध में जारी अधिसूचना में कहा गया है कि शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की नियुक्ति / पदोन्नति में विश्विद्यालय के कुलपति अपने इमरजेंसी  शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं तथा साथ ही विश्वविद्यालय कोर्ट ,अकेडमिक कॉउन्सिल और एक्सक्यूटिव कॉन्सिल आदि को दरकिनार नहीं करने को कहा गया है। महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्विद्यालय, मोतिहारी के पूर्व कुलपति अरविन्द अग्रवाल  के द्वारा नियुक्त किये गए एसोसिएट प्रोफेसर जिनके ऊपर UGC से लेकर राष्ट्रीय सतर्कत्ता आयोग में शिकायतें दर्ज हैं, उनके ऊपर समुचित करवाई के आदेश को दरकिनार कर अवैध तरीके से उन्हें पदोन्नति दी गई ताकि वे वर्तमान कुलपति के भ्रष्टाचार का हिस्सा बन सकें। इस प्रकार इनके द्वारा की गई शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की नियुक्तियां / प्रमोशन अवैध है और इन अवैध नियुक्तियों को आनन फानन में 3 दिसंबर, 2019 को एक अवैध और गैर क़ानूनी एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल की बैठक आयोजित करके मंजूरी दी गयी। कुलपति महोदय को अपनी फर्जीवाड़े को ढकने के लिए इतनी जल्दीबाजी थी कि शिक्षकों की बिना वरीयता सूची निर्धारित किये ही फर्जी तरीके से एक्सक्यूटिव कौंसिल बना दिया गया साथ ही माननीय राष्ट्रपति द्वारा बाहरी सदस्यों के नाम अनुमोदित करने के पहले ही और विश्विद्यालय के माननीय कोर्ट सदस्यों में से 2 सदस्यों को एक्सक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों में शामिल किये बिना ही महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्विद्यालय के एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल की बैठक कर दी गयी।

एमएचआरडी के अपर सचिव श्री एस के विश्वास  के 5 फरवरी 2020 को डॉ पहल के इस शिकायत के जवाब में संजीव शर्मा ने लिखा है की यह शिकायतकर्ता के अज्ञान पर आधारित है।  सत्य यह है की एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल ने अपनी दिनांक 21 मई 2019 की 14वीं बैठक के संकल्प संख्या 14. 03 के माध्यम से कुलपति को साक्षात्कार पैनल के सदस्य नामित करने हेतु अधिकृत किया था। विश्विद्यालय की समस्त कार्यवाही अधिनियम, परिनियमावली तथा विधिक व्यवस्थाओं के अनुरूप संचालित की जा रही है। जबकि एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल की   14 वीं बैठक के  मिनट्स ऑफ मीटिंग में एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल द्वारा साक्षत्कार के लिए विषय विशेषज्ञ को साक्षत्कार में बुलाने की मंजूरी दी। विश्विद्यालय के ऑर्डिनेंस नंबर 15 के पारा 17 में स्पष्ट लिखा है कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी एक्ट के statute 12(2) (ii) के अनुसार  एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल ही अपॉइंटमेंट का आर्डर देगी। क्योंकि एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल ही केंद्रीय विश्विद्यालयों की सर्वोच्च बॉडी होती है। साथ ही एमएचआरडी के  द्वारा निर्गत किये गए पत्र 2001 और 2015 में इस संबंध में जारी अधिसूचना में कहा गया है कि शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की नियुक्ति / पदोन्नति में विश्विद्यालय के कुलपति अपने इमरजेंसी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। मगर नटवर लाल कुलपति ने बिना एक्सक्यूटिव कौंसिल के अप्रूवल के ही अपने इमरजेंसी शक्तियों का इस्तेमाल कर 60 से अधिक अवैध नियुक्तियां की और एमएचआरडी द्वारा पूछे जाने पर उनको गुमराह भी किया और साजिशन एमएचआरडी के पूछे जाने पर केवल साक्षत्कार कमिटी का जिक्र किया और अवैध तरीके से किये गए  फाइनल अप्रूवल को छुपा लिया। इस तरह से ये साहब तमाम फर्जीवाड़े करके भी विश्विद्यालय की समस्त कार्यवाही अधिनियम, परिनियमावली तथा विधिक व्यवस्थाओं के अनुरूप संचालित करने की दुहाई दे रहे हैं। समाजसेवी आलोक राज ने संजीव शर्मा द्वारा एक्सक्यूटिव कॉउन्सिल के मिनट्स् में छेड़छाड़ करने की आशंका भी जताई है। अब देखना ये है की कोरोना जैसे महामारी में लोग घरों में बैठकर बीमारी दूर करने की आशा लगाए हैं। मगर संजीव शर्मा जैसे कोरोना वाइरस जाने  कितने काबिल और योग्य उम्मीदवारों की योग्यता और काबिलियत को 25 सालों से लॉक डाउन किये हुए हैं, उनके ऊपर सरकार कब तक करवाई करती है?

 

 

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