लव यू कोई खास व्यक्ति ही बोल सकता है, गैर बोल दे तो जहमत

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भारत के लड़के-लड़कियाँ अभी “I love you” का मतलब सिर्फ लड़की-लड़के के मध्य सेक्स की भूख वाला प्यार ही समझ पाते हैं इसलिए किसी के लव यू बोलने से अमुक कंफ्यूज रहता है। भारतीय परिवेश में लव यू एक गाली की तरह है। लव यू कोई खाश व्यक्ति ही बोल सकता है, गैर बोल दे तो जहमत।

हम इतने समझदार तो हो चुके हैं कि कोई हमें आई लव यू बोल कर चला जाय तो हम उसके प्रति आसक्त नहीं होते हैं और न ही रात की नींद खराब करते हैं। हाँ, हम किसी को आई लव यू नहीं बोलते हैं क्योंकि न जाने अगला व्यक्ति उतना समझदार है कि नहीं कि वह यह समझ सके कि मैं उसके मानवीय व्यक्तित्व को प्यार बोल रहा हूँ न कि उसके व्यक्तिगत दैहिक प्रभुत्व से आकर्षित हैं। वैसे हमें समाज को उस स्तर तक ले चलने के लिए तैयार करना है। हमें अपने स्वयं के अंदर से विकृतियों को निकालते रहना होगा।

किसी से कोई उम्मीद न पालिए कि वह सचमुच आप से स्वार्थरहित प्रेम करेगा। आप समाज को इस लायक बनाइए कि लोग सचमुच प्रेम करें।

मैं तो किसी से वासनापूर्ण प्रेम की इच्छा नहीं रखता हूँ लेकिन मुझे बहुत लोग मिले, बिल्कुल सच्चे मन से समर्पित करने वाले लोग मिले और सच्चे मन से वासनिक प्रेम प्रस्तुत किया लेकिन उस दैहिक सच्चे प्रेम को कितने लोगों से स्थापित किया जाना उचित है? यह सोचकर वास्तविक दैहिक प्रेम को नकारना ही उचित प्रतीत हुआ।

प्यार संबंधों का आकर्षण है जो सारे प्राणियों में होता है लेकिन एक प्रेम वह होता है जो परिवार से अतिरिक्त एक स्त्री और एक पुरुष आपस में एकाकार हो जाना चाहता है अर्थात दोनों को एक दूसरे के शरीर को भोगने की कामना घनीभूत हो उठती है जिसे प्रेमी जोड़े प्रेम कहते हैं जबकि वह उनकी एक खाश चेहरे और शरीर को भोगने की महती आकांशा होती है, वह प्रेम बिल्कुल नहीं है। जो प्रेम नहीं करते वे ही प्रेम की बात करते हैं। जो प्रेम को समझते ही नहीं, वे ही प्रेम में वफादारी की बात करते हैं। प्रेम में लोग पाना चाहते हैं। कितना स्वार्थी होते हैं। प्रेम पाने का नाम नहीं है। प्रेम अपनाने का नाम नहीं है। प्रेम स्वार्थ का नाम नहीं है। प्रेम उत्सर्ग है। प्रेम लुटाने का नाम है।

खैर, आधुनिक प्रेम को ही यदि हम प्रेम मान लें, तो भी, प्रेमी युगल को वफादारी के साथ जुड़कर रहना चाहिए लेकिन प्रेमी युगलों के प्रेम-विच्छेद अधिक दिखते हैं, धोखे अधिक दिखते हैं, खाया-पिया और चल दिए। लड़की विक्षिप्त हो जाती है। आधुनिक और पुरुषवादी समझ के अनुसार स्त्री को लगता है जैसे उसका सब कुछ लूट गया जबकि इस भोगलिप्सा में स्त्री-पुरुष दोनों की इन्द्रियाँ समाविष्ट हुई हैं। यदि गंदी हुई माना जाय, तो न सिर्फ स्त्री अंग गन्दा हुआ है, पुरुष अंग भी गंदा हुआ है। दोनों बराबर हैं लेकिन फिर भी स्त्री को लगता है उसकी इज्जत चली गई तथा समाज भी स्त्री को ही भ्रष्ट मान लेता है। आखिर पुरुष की भी इज्जत तो गई है, इसे क्यों नहीं मानते और क्यों नहीं मनवाते?

मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति विशेष से चिढ़कर पूरी कौम को और कौम से चिढ़कर उसके सदस्यों से प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। आप जानते है कि आप को एक पुरुष से उसकी आदत, संस्कार, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, व्यवहार, विचार से नफरत हो सकती है लेकिन वहीं दूसरी तरह दूसरे पुरुष के उन्हीं समान गुणों की वजह से उससे प्यार भी होता है। एक पुरुष शत्रु है तो दूसरा पुरुष मित्र है। पुरुष प्रधानता एक सत्ता है। उस सत्ता के अवगुणों की वजह से दुनिया के सभी पुरुष निंदनीय नहीं हो सकते हैं। यदि दुनिया के सभी पुरुष गंदे हैं, तो आखिर अपने पिता, अपना भाई, अपना पुत्र, प्यारा कैसे हो जाता है। यदि दुनिया के सभी पुरुष बुरे हैं तो तो उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए। मुझे लगता है सबसे पहला आक्रमण सबसे कमजोर पर होता है। इस लिहाज से पुत्र सबसे कमजोर है। सबसे पहले स्त्रियों को उसकी हत्या कर देनी चाहिए। फिर  पिता, फिर भाई और मौका मिलते ही पति की हत्या कर देनी चाहिए। यदि सभी स्त्रियाँ ऐसा करने की योजना बना लें, तो सारे पुरुषों की हत्या करके पुरुष प्रधानता जा बदला लिया जा सकता है।

अजीब हैं स्त्रियाँ; प्रेम करने के लिए भी पुरुष चाहिए और कोसने के लिए भी पुरुष चाहिए। पुरुष की हरकतों से परेशान स्त्रियाँ पुरुषों को फाँसी दिए जाने की सिफारिश भी करती हैं और दूसरी तरह कम से कम एक पुत्र को जन्म की आकांक्षा भी रखती हैं। यह विरोधाभाष कितनी बड़ी विडंबना है।

युवा पीढ़ी दूसरों के अनुभव से अपनी मंजिल नहीं तय करना चाहती है। लता जी का एक गीत है:

जो हमको नसीहत देते हैं वो अपना जमाना देख चुके।

हम पर भी जवानी आई है हम अपना जमाना क्यूँ छोड़ें।।

इस आलेख से आप के मन में समुद्र की खामोश हलचलों का एक अंदाजा लगता है। यह यदि प्रेम का घोषणा-पत्र है, तो यह एक आत्महत्या के तरफ उठे कदम का अंदेशा-पत्र भी है। हमें अपने प्रामाणिक अनुभव की सच्चाई और वेदना समाज के युवक-युवतियों के सामने रखना ही चाहिए क्योंकि कुछ तो अनुसरण करेंगे ही। मुझे लगता है आप ने “लेडी चैटरली का प्रेमी” पढ़ा होगा? दूसरी खूबसूरत पुस्तक “मेरी प्रेम कहानी-इजाडोरा डंकन” जरूर पढ़ डालिए। आप को अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने में परिपक्वता आएगी। जिंदगी और प्रेम के लिए फ़ैज़ साहब की इन पंक्तियों से बेहतर और कुछ नहीं है:

अभी भी दिलकश है तेरा हुश्न मगर क्या कीजै

और भी दुख हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा

राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग..।

प्रेम बुरा नहीं है किंतु प्रेम में सब कुछ लुटा देना भी ठीक नहीं है। प्रेम दुनिया को सुंदर बनाता है न कि बरबाद करता है। प्रेम का अर्थ किसी से प्रेम करना है तो अति उत्तम लेकिन प्रेम का अर्थ किसी व्यक्ति के शरीर को पाना है, तो बुद्धिमत्ता का कोई अर्थ नहीं, समझो हम दुनिया के सबसे अहमक आदमी से भी अधिक अहमक हैं।

जिस दिन आप ठान लेते हैं कि दुनिया बदल देनी है उस दिन दुनिया बदलनी शुरू हो जाती है और जिस दिन दुनिया बदलने के लिए आप लोगों को तैयार करने लगते हैं उस दिन दुनिया का बदलाब रफ्तार पकड़ लेता है। जिस दिन रफ्तार का मसौदा तय कर लेते हैं उस दिन बदलाव के लिए फ़तह हासिल कर लेते हैं और जिस दिन आप बदलाव की तस्वीर पेश कर ले जाते हैं उस दिन बेहतर दुनिया की हक़ीक़त पर लोगों में विश्वास जन्म ले लेता है। अब सवाल मुँह खाए खड़ा हो जाता है कि जिसने दुनिया को बदलने की इच्छा ज़ाहिर की है, जिसने लोगों को बदलाव का संदेश दिया है, जिसने हक़ीक़त का ख़्वाब भरा है, क्या वह किसी मसीहा का इंतजार कर रहा है अथवा वह खुद मसीहा बन कर नेतृत्व का बीड़ा उठाएगा? दूसरों के सम्मुख प्रश्न करने वाले अथवा दूसरों के सम्मुख समस्याएँ गिनाने वाले यदि प्रश्नों और समस्याओं का समाधान लेकर जनता के मध्य उतर पड़ें, तो मंजिल मिल सकती है।

दुनिया के दुख से अधिकतर लोग परिचित हैं; हाँ जरूर, दुख के कारणों से लोग नहीं परिचित हैं। जागरूक लोगों को समस्याओं के कारणों के साथ उसके हल की योजना लेकर लोगों के सम्मुख प्रस्तुत होना चाहिए। लोग अपनी ही समस्या से परेशान हैं, उन्हें औरों की समस्याओं का ध्यान ही नहीं रहता है। आप जब उनकी समस्या की गहराई में जाएँगे, तो साथ में अपनी समस्या भी उसमें जोड़ लीजिएगा। जब आप गैर की समस्या से जुड़कर उसका मित्र बन जाते हैं, तो वह स्वयं आप की समस्या के साथ जुड़कर आप की हर बातों का साक्षी बन जाता है और आप का कारवां बड़ा होता चला जाता है।

किसी भी हालत में लोगों को मूर्ख कहना तर्क संगत नहीं है और न ही नैतिक; क्योंकि, जैसे ही आप लोगों को मूर्ख कहते हैं वैसे ही वह आप से दूर हो जाता है और शत्रु बन बैठता है। दरअसल, जिन्हें आप मूर्ख कह रहे हैं, वे सामाजिक और राजनीतिक साजिशों के शिकार लोग हैं। उन्हें सत्य समझने ही नहीं दिया जा रहा है। वे ही तो आप की मित्र शक्तियाँ हैं। उनसे ही तो प्यार करना है। उन्हें ही तो मित्र बनाना है।

और बुद्धिमान वह है जो ऐसे ही सामान्य लोगों को अपने कारवां में शामिल कर सकते का ज्ञान, कौशल और हिम्मत रखता है। ऐसी बुद्धि का क्या अर्थ कि हमारे बोलने मात्र से लोग हमसे कन्नी काटने लगें या हमें अहमी समझने लगे।

इतिहास साक्षी है कि हर उस क्रांतिकारी को प्रताड़ित होना पड़ता है जो लोगों का भला चाहते हैं और उनके लिए लड़ते हैं, यहाँ तक कि फाँसी के फंदे तक को चूमना पड़ता है। माता रमाबाई दुख सहते-सहते ही चल बसीं। माता सावित्री बाई फुले ने अपनी ही अबोध जनता के लिए अपार कष्ट उठाए। बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर जनता के लिए दुख उठाए और उन्हीं के लिए रोए लेकिन जनता की भलाई के लिए कार्य बंद नहीं किया और न ही उन्हें जिम्मेदार ठहराया। भगत सिंह को कौन नहीं जानता।

दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है-जैसी उक्तियाँ सत्य हैं और हमारी ऊर्जा भी हैं । हमें ख़ुद समस्या नहीं बनना चाहिए बल्कि समस्याओं का हल बनकर जनता के सम्मुख चट्टान की तरह खड़ा होना चाहिए। किसी बहुत बड़े विद्वान ने कहा था, दुनिया के विद्वानों ने दुनिया (दुखों) की तरह-तरह से व्याख्या की है; सवाल है दुनिया को बदलने की।

आर डी आनंद
26.02.2021

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