धर्म के भाव ऊँचे हैं : एक अध्ययन

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ये किसी तानाशाह के पदचाप हैं

वरिष्ठ मार्क्सवादी/आम्बेडकरवादी चिंतक आर डी आनंद सर के कविता-संग्रह “धर्म के भाव ऊँचे हैं” में 106 कविताएँ हैं। यह काव्य-संग्रह 127 पृष्ठों की खूबसूरत पुस्तक है। यह संग्रह परिकल्पना प्रकाशन, सुभाष चौक, दिल्ली से प्रकाशक श्री शिवानंद तिवारी द्वारा 2018 में प्रकाशित किया गया है। पुस्तक की प्रस्तावना “कविता समय की अभिव्यक्ति है” स्वयं आर डी आनंद सर ने ही लिखा है। इस पुस्तक की कविताओं की गंभीरता आनंद सर के प्रस्तावना के प्रारम्भिक पंक्तियों से लगाया जा सकता है, “कविता अपने समय की परिस्थितियों के अंतर्विरोधों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। सपने देखने का अर्थ है समाज के हित में चिंतन करना, जनविरोधी परिस्थितियों को बदलने की चेष्ठा करना। जो सत्ता के मंसूबे को समझता है, वह सत्ताधारियों के आँख का काँटा बना रहता है।”
“धर्म के भाव ऊँचे हैं” की कविताएँ न अतुकांत कविताएँ हैं, न अकविता हैं, न गद्यात्मक कविताएँ हैं, न दोहाहैं और न ग़ज़ल हैं। इस संग्रह की सभी कविताएँ शेर की शक्ल में हैं लेकिन कोई भी शेर नहीं हैं क्योंकि शेर के लिए ग़ज़ल विधा के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है जबकि आनंद सर ने रदीफ़, क़ाफ़िया और वज़्न का बिल्कुल कहीं भी ध्यान नहीं रखा है। मैं उनकी इन कविताओं के प्रति कोई एक निश्चित राय नहीं क़ायम कर पा रही थी इसलिए मैंने आनंद सर से पूँछा कि सर आप को ग़ज़ल का भी ज्ञान है, फिर आप ने उसका अनुपालन क्यों नहीं किया? उन्होंने बहुत स्पष्ट जवाब दिया कि “धर्म के भाव ऊँचे है” की कविताएँ अभी तक लिखी गई हिंदी क्षेत्र की किसी भी विधा और तौर-तरीको से भिन्न हैं। यह मेरा एक अलग तरह का नया प्रयोग है। मैंने एक स्टैन्जे से सभी दूसरे स्टैज़ों को बिल्कुल स्वतंत्र रखा है। इस स्वतंत्रता के खयाल ने मुझे एक नए प्रयोग के लिए प्रेरित किया क्योंकि ऐसी विधा के माध्यम से मैं बहुत ही स्वतंत्र रूप से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, दार्शनिक, क्रान्तिकारी, आम्बेडकरवादी, मार्क्सवादी, ब्राह्मणवादी, दलितवादी, आतंकवादी अवस्थितियों और युद्ध, युयुत्सा, प्रेम, नफरत और प्रतिक्रिया के विभिन्न आयामों, विचारों, दृष्टियों, दृष्टिकोणों, भावों, दर्शनों को आसानी से समाविष्ट कर सकूँगा।” इस संग्रह की उनकी पहली कविता “पब्लिक की बेवकूफियाँ तलाशो” 12 अगस्त 2017 को लिखी गई है तथा आखिरी कविता “ठगा सा” 29 मार्च 2018 को लिखा गया है। शेष सभी कविताएँ इन्हीं तारीखों के मध्य लिखी गई हैं।
सभी कविताएँ लगभग 7 माह के बीच लिखी गई हैं। इन कविताओं को आनंद सर ने अपने गंभीर बीमारी, बाईपास सर्जरी,  गॉलब्लेडर के अचानक फटने के बाद गॉलब्लेडर की टिपीकल सर्जरी और क्रिटिकल शुगर के इलाज के दौरान मेदांता हॉस्पिटल गुड़गाँव में ऑन बेड लिखा है। मैं जब आनंद सर के बीमारी की गंभीरता को सोचती हूँ तो सिहर उठती हूँ लेकिन जब उनके विराट मस्तिष्क की चेतना और समाज के प्रति उनके समर्पण को ख़्याल करती हूँ, तो ऐसे व्यक्ति के पुनीत कर्तव्यों के प्रति गर्व से भर उठता है। इन कविताओं में आनंद सर के सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक चिंतन की बारीक अनुभूतियों का चिंतन व्यापक रूप से परिलक्षित होता है। उनकी कविताओं की एक छोटी सी समीक्षा उनके साहित्यिक योगदान के लिए बहुत कम है। इस संग्रह के एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य और प्रत्येक स्टैन्ज़ा गागर में सागर हैं। उनका एक-एक स्टैन्ज़ा सामाजिक और राजनीतिक समाज और सत्ता के द्वंद्व और अंतर्विरोधों के महाजाल का मनोवैज्ञानिक और परफेक्ट क्रान्तिकारी अध्ययनों के जटिल अनुभूति का सामुच्य है। जब मैं स्टैन्ज़ा को पढ़ती हूँ, तो एक पृष्ठिभूमि दिखाई देने लगती है। जब मैं पृष्ठिभूमि की बारीकियों में उतरती हूँ, तो एक वर्ग की हजार चालाकियों को देखने में सक्षम होती हूँ। उस समय मैं आनंद सर के मन बोध में तरंगित व्यवस्था और सत्ता वर्ण के कलुषित व्याधियों और विकृत परियोजनाओं को पढ़ती हूँ, तो पता चलता है कि एक सच्चा चिंतक और क्रान्तिकारी के मन में कितना बड़ा दुख छिपा होता है और कैसे वह क्रान्तिकारी मसौदे के लिए चिंतित रहकर प्रयास करता है। इस संग्रह की कविताओं को लिखकर आनंद सर ने गंभीर जोखिम भरा कार्य किया है।
मैं आनंद सर के कविताओं की समीक्षा के माध्यम से जिस हक़ीक़त की व्याख्या लिखने की हिम्मत कर रही हूँ, वह व्याख्या न सिर्फ आनंद सर की कविताओं की व्याख्या है बल्कि उनके द्वारा सांकेतिक सत्ता वर्ग के धृतराष्ट्रों और उनके सौ पुत्रों-दुर्योधन, दु:शासन, दु:सह, दु:शल, जलसंघ, सम, सह, विंद, अनुविंद, दुर्धर्ष, सुबाहु, दुषप्रधर्षण, दुर्मशर्ण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, विकर्ण, शल, सत्वान, सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मद, दुर्विगाह, विवित्सु, विक्टानन्द, ऊर्णनाभ, सुनाभ, नन्द, उपनंद, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोबाहु, महाबाहु, चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बालाकि, बलवर्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधर, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृंदारक, द्दणवर्मा, द्रढ़क्षत्र, सोमकिर्ती, अनूदर, दढ़संघ, जरासंघ, सत्यसंघ, सद्सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढहस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्च, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, उग्रशायी, कवचि, क्रथन, कुण्डी, भीमविक्र, धनुर्धर, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, दृढकर्मा, दृढथाश्र्य, अनाध्रश्य, कुण्डभेदी, विरवि, चित्रकुण्डल, प्रधम, अमाप्रमाथि, दीर्घरोमा, सुवीर्यवान, दीर्घबाहु, सुजात, कनकध्वज, कुण्डाशी, विरज तथा युयुत्सु से भी लाखों गुना खतरनाक खलनायकों का न सिर्फ कच्चा चिट्ठा और उनके विस्तृत छद्मों के गुणसूत्रों की मति और गति की व्याख्या है।
असहिष्णुता बर्बर युग की आहट है।
लोग क्लोरोफॉर्म सूँघ रहे हैं।।
फेकन्यूज की इंडस्ट्री में सिर्फ कार्बन बनता है।
सोसल मीडिया के पाठक उसे अपने मुँह पर पोत लेते हैं।।
गौरी लंकेश ने फैक्ट्री वर्कर्स को नंगे देख लिया था।
उन्हें तीन तलाक सीने पर बर्दाश्त करना ही पड़ा।
ध्रुव राठी, प्रतीक सिन्हा, हॉक्स स्लेयर, बूम और चेक।
फेकन्यूज की सच्चाई उजागर कर रहे हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 69)
वरिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक आर डी आनंद सर के संग्रह की पहली कविता “पब्लिक की बेवकूफियाँ तलाशो” को पढ़ते हुए आँखों के सामने सत्ता के वर्चस्ववादी नज़रिए का खौफ़नाक मंजर कौंधने लगता है। मुझे टॉलस्टॉय का वह प्रमुख वैचारिक कथन याद आने लगता है कि सत्ता की हुकूमत जनता की अज्ञानता में निहित होता है। सत्ता वर्ग शासक वर्ग है। शासक वर्ग हमेशा अपने स्थायित्व के लिए जनता पर कुछ वर्जनाएँ थोपता है। सत्ता वर्ग हमेशा वर्चस्ववादी होता है। एमिल बर्न्स ने सत्ता वर्ग के चरित्र का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि हर समय में एक सत्ता वर्ग हुआ करता है और वह अपने सुख/सुविधा/शासन के लिए सत्ता वर्ग के पक्ष में नियम/नियमावली तैयार करता है। यह समाज मालिक-दास, सामंत-प्रजा, ब्राह्मण-दलित, मालिक-मजदूर, शोषक-शोषित, पूँजीपति-श्रमिक के रूप में हमेशा दो वर्गों में विभाजित रहा है। इसमें एक शासक वर्ग होता है और दूसरा शोषित वर्ग।
शासक अपने पक्ष में नियम बनाता है और बहुसंख्य जनता से विभिन्न युगों में युग अनुरूप काम लेता रहता है। ऋग्वैदिक समय में वर्चस्ववादियों ने अपने स्वार्थ के लिए बौद्धिक जालसाज़ी किया और अपने वर्चस्व के लिए एक जनता का निर्माण किया। कालांतर में, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दिखाई पड़ने लगे। ब्राह्मण वर्चस्ववादी हो उठा। उसने सारे नियम, कानून, सुख, सुविधा, शिक्षा, धन, संपत्ति और जमीन अपने नाम कर लिए तथा सेवा के लिए शूद्र और दास बनाया। ये शूद्र सामंती युग में भी उन्हीं वर्चस्ववादियों के खेत मजदूर और सेवक बने रहे। पूँजीवादी युग में परिस्थितियाँ बदलीं लेकिन जातिप्रथा और सामंती परिस्थितियाँ लगभग वैसी ही बनी रहीं, फिर भी शूद्र जातियों को विकास का अवसर मिला और वे विकसित हुईं। विकसित हुए शूद्र जातियों के अनेक सदस्य स्वाभिमानी होने लगे। शूद्र जातियों का नाम बदला और वे शूद्र से दलित कहलाने लगे। कुछ आदिवासी कहलाते हैं। कुछ मूलनिवासी कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत की अन्य जातियों की स्थिति भी यथावत नहीं रही। सवर्ण जातियों के अनेक सदस्य तथा शूद्र जातियों के अनेक सछूत सदस्य भी भूमिहीन, अशिक्षित और गरीब हो गए। वर्तमान में भारत में बेरोजगारों की संख्या अत्यधिक बढ़ गई है। शिक्षित युवा बेरोजगारों की संख्या लगभग 35 करोड़ तक पहुँच गया है। कुल सरकारी नौकरियों की संख्या लगभग 2.75 करोड़ है। संगठित रोजगारों की संख्या 5 प्रतिशत और असंगठित रोजगार की संख्या 95 प्रतिशत है।
2008 में आर्थिक मंदी के समय लगभग 30 लाख लोग बेरोजगार हुए थे। कोबिद-19 के प्रभाव के चलते हुए लॉकडाउन के समय में, निजी क्षेत्र के एक प्रमुख थिंक टैंक का कहना है कि लॉकडाउन के चलते भारत में अप्रैल में 12 करोड़ 20 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं। कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए सरकार ने 40 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की है। इसके चलते 130 करोड़ आबादी वाले देश में कई उद्यम बंद हो गए हैं। इसके चलते 3 मई को समाप्त हुए सप्ताह में देश में बेरोजगारी दर 27.1% पर पहुंच गई। सेंटर फॉर मॉनिटारिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के सर्वें में यह बात कही गई है। जब हर जातियों के मध्य एक शोषित वर्ग निरंतर और तीव्र गति से बढ़ने लगा है। ऐसी स्थिति में विभिन्न जातियों के शोषित वर्गों की एकता संगठित होने के अवसर बनने की संभावना बढ़ जाती है इसलिए सत्ता प्रतिष्ठान का थिंक टैंक शोषित वर्गों के एकता के विरुद्ध चिंतन तीव्र कर देता है। इस कविता में वर्चस्ववादी सत्ता के थिंक टैंक के प्रतिनिधि का बौद्धिक निरूपण करते हुए आनंद सर ने लिखा है कि सत्ता का चिंतन एक व्यक्ति विशेष द्वारा अभिव्यक्त होता है। वर्तमान दौर में सत्ताओं के चिंतन में ऋग्वैदिक समय का नकली विचार जोरों पर है। जिस तरह से अडोर्नो ने अपने “सांस्कृतिक उद्योग” नामक पुस्तक में समाज में व्याप्त संस्कृति के बनने में एक अदृश्य उद्योग की बात बताते हैं, ठीक उसी के विपरीत आज फेक इंडस्ट्री में लगे हुए किराए के बहुरुपिए फेक विचार बनाने और अदृश्य संस्कृति की तरह अदृश्य विचार को जनता में एक जनमत की तरह प्रचारित और प्रसारित कर रहे हैं।
इस कविता में आनंद सर ने उस फेक इंडस्ट्री के नायक के फेक विचार और वर्चस्ववादी विचारों के मूल सिद्धांत को अपनी कविता में लिखा है। वे बिल्कुल साफ लिखते हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान के चिंतक हमेशा एकमत रहते हैं कि जिस जनता के सहारे शासन करना गया और जिस जनता पर शासन करना है, उसे हर हालत में अशिक्षित और बुद्धिहीन होना चाहिए। यह तो उनकी एक महत्वपूर्ण योजना है। वर्चस्ववादी सत्ता के चिंतकों का मत है कि जनता की बेवकूफियाँ तलाशना अत्यंत जरूरी कार्य है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि मैं जानता की उन बेवकूफियों की बात बताऊँ जिसे ताड़ते रहते हैं, वह है जनता के मध्य जातीय विसंगतियाँ। वर्गों के मध्य जातीय अंतर है। इस अंतर की खाई को नित्य बढ़ाना सत्ता वर्ग का कार्य है। सवर्ण वर्ण के शोषित वर्ग को दलित वर्ण के शोषित वर्ग से अलग रखने के लिए सवर्ण को मंदिर, धर्म, राम, कृष्ण, श्रेष्ठताबोध प्रदान किया जाता रहता है। दलितों को ब्राह्मणों/क्षत्रियों के प्रति घोर वैमनस्य की मानसिकता पैदा करता फेक इंडस्ट्री के चिंतकों का कार्य है। दलितों के द्वारा ब्राह्मणों को कोसना, गाली देना, नफरत करना तथा नकार की वैमस्यपूर्ण भावना से ओतप्रोत रहने के लिए संगठन, नेता, कार्यनीति और कार्यपद्धति तैयार करना उसके आईटी सेल का बेसिक काम है। इसकी प्रतिक्रिया से सवर्ण जातियाँ दलितों से घोर नफरत करने के लिए बाध्य होती हैं और दलितों के विरुद्ध ब्राह्मण मानसिकता और संगठन को मजबूत करती हैं। इस तरह से पैदा हुए वैमनस्य एक दूसरे को नजदीक आने से रोकते हैं एवं जातीय वोट ध्रुवीकरण में सहयोग करते हैं। ऐसी मानसिकताएँ दलितों में दलित मेधाओं के अन्वेषण और उन पर प्रभावकारी फेक चिंतन के आरोपण से संभव हो जाता है। आम्बेडकर साहब के विभिन्न दृष्टिकोण के अदृश्य छद्म वैचारिक पोषण के कुशल व्यवहार और प्रयोग से भी दलित अपने विशेष क्रान्तिकारी पथ से भटकता है। फेसबुक, व्हाट्सअप, इंटग्राम, ट्वीटर, यूट्यूब इत्यादि सोसल मीडिया पर करोड़ों लोग फेक न्यूज और व्यूज के गुलाम हैं। सत्ता अपने अन्वेषण, संशोधन और प्रयोग में सफल है।
आनंद सर की कविता “पब्लिक की बेवकूफियाँ तलाशों” की चंद पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:
पब्लिक की हर बेवकूफियाँ  तलाशों।
उनकी  कमज़ोरियाँ  हमारी  जीत  हैं।।
कान में उनके मशबरा देकर आया हूँ।
दंगे गोया क्या हुआ ये हमारी मीत हैं।।
मार्क्सवादी साहित्यकार आर डी आनंद सर की कविताओं का संदेश बहुत व्यापक है। वे कविताओं के माध्यम से कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार हमला हो रहा है। प्रगतिशील चिंतको/लेखको/बुद्धिजीवियों/क्रान्तिकारियों के सम्मुख यह एक त्रासद स्थिति है। ऐसे चिंतकों पर मानसिक दबाव बराबर बना हुआ है। जब भी देश का अवाम सत्ता के ज्याजातियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करने की कोशिश करता है और गोलबंद होता है, सरकार उन्हें नक्सली, माओवादी, आतंकवादी कहना प्रारम्भ कर देती है। इधर सत्ता संस्थान के वर्चस्ववादियों ने शहर के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और लेखकों को अर्बन नक्सल कहना प्रारम्भ कर दिया है। वे यदि हथियारबन्द जंगली नक्सली हैं तो शहर के ये बुद्धिजीवी और सत्ता संस्थानों के जनविरोधी नीतियों का विरोध करने वाले न्यायप्रिय लोग शहरी नक्सली की श्रेणी में सुमार किए जा रहे हैं। ये किसी तानाशाह के पदचाप हैं। यह एक तरह की घुड़की/धमकी है जिससे प्रगतिशील चेतना के लोग अपने घरों में छिपे बैठे रहें, सरकारी जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध अथवा सरकार के छद्म आतंक के विरुद्ध आवाज न उठाएँ। डाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश, गोंजाल्विस, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुंबड़े, गौतम नवलखा जैसे बहुत सारे चिंतको/लेखकों को प्रताड़ित कर और कुछ की हत्या से यह संदेश प्रसारित होता है कि यदि अन्य कोई बुद्धिजीवी क्रान्तिकारी/हिम्मती बनने की कोशिश करेगा, तो उसकी दशा यही होगी। आनंद सर की कविता “कुछ भी लिख देता है” में व्यवस्था के प्रबंधकों के विचार और उनकी धमकी बहुत स्पष्ट हैं।
वह कुछ भी लिख देता है।
कलबुर्गी  से नहीं  डरा है।।
समझा  दो  उसको  मुँह न खोले।
नींद की गोलियाँ खत्म हो गई हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 18)
इसी कविता की अगली पंक्तियों में दलितों के ऊपर व्यवस्था की दृष्टि का खुलासा है। अक्सर, यह देखा जा रहा है कि हिंदुत्ववादी सरकार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। उनकी दृष्टि में मुसलमान आतंकवादी जातियाँ है और दलित शूद्र यानी सेवक जातियाँ हैं। वे दलितों के शिक्षा और रोजगार से कुपित हैं। वे चाहते हैं कि दलित आज भी उनकी गुलामी स्वीकार करे और निरंतर सवर्णों की सेवा करता रहे लेकिन लोकतंत्र में यह सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है इसलिए वे संविधान में लगातार संशोधन कर रहे हैं। फिर भी दलितों को गुलाम बनाया जाना मुमकिन नहीं दिख रहा है इसलिए हिंदूवादी सरकारें और उनके कट्टर अनुयायियों ने मनुस्मृति को संविधान के रूप में लागू किए जाने का प्रस्ताव पास कर दिया है। अब उनका पूरा प्रयास है कि राजकीय तानाशाही के द्वारा मनुस्मृति को लागू कर दिया जाय। अब हिंदुत्ववादी ताकतें दलितों तक कुछ अज़ीब से संदेश प्रेषित व प्रचारित कर रही हैं। दलित अक्सर कहता है कि मुझे हरिजन न कहो, चमार न कहो, शुद्र न कहो, दलित न कहो। इस प्रतिक्रिया में सवर्णवादी मानसिकता के पुजारियों में प्रतिक्रिया का रोष बढ़ता जा रहा है। वे अनेक स्थानों और परिस्थितियों में अनाप/सनाप उच्चारण कर दलितों को डरवा/धमाका रहे हैं। उनके धमकियों में कुछ अजीब स्वाद है जिसे आनंद सर की उक्त कविता की इन पंक्तियों में महसूस किया जा सकता है।
अब  तुम्हें  शूद  नहीं कहूँगा बे।
एक अन्छोला बाँस ले आया हूँ।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 18)
वैश्वीकरण की स्थिति में साम्राज्यवादी ताकतें बहुत ही हौसले में मुखर हो चुकी हैं। पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद ने नस्लवादी/जातिवादी/धार्मिक सरकारों को स्थापित करने की सफल कोशिश है। इन नस्लवादी सरकारों को मनमानी करने की खुली छूट देकर पूँजी और मुनाफे की रक्षा और बढ़ोत्तरी के लिए उन्हें उदारीकरण की नीति अपनाने के लिए पूरी तरह से दबाव बना लिया है। दुनिया की सरकारें पूँजीवाद के गिरफ्त में हैं। कहा जाता है कि सरकार पूँजीपतियों की प्रबंधन समिति हुआ करती है और प्रधानमंत्री पूँजीपतियों के उस प्रबंधन समिति का अध्यक्ष होता है। पूँजीपतियों ने अनेक हथकण्डों के बावजूद भी सर्वहारा/दलित/शोषित/उत्पीड़ित वर्ग एक साथ खड़ा हो सकता है इसलिए वह सरकारों को जातिवाद/धर्मवाद/सांप्रदायिकता/क्षेत्रवाद/भाषावाद/आतंकवाद/बलात्कार आदि को प्रायोजित करवाने की खुली छूट देता है ताकि उसके मुनाफे में कोई लगाम न लगे और उसकी पूँजी बेपनाह बढ़ती रहे। इन तमाम हथियारों में पूँजीपतियों को जाति और धर्म ही जनता को आपस में बाँटने का उपयुक्त हथियार लगा। दुनिया में उपलब्ध किसी भी नशे का नशा कुछ देर में उतर जाता है, यह बात पूँजीपति समझ चुका है इसलिए श्रमिक वर्ग को वर्गीय अवधारणा के अंतर्गत एक होकर पूँजीपतियों के विरुद्ध न खड़े हो सकें, को रोकने के लिए सबसे कारगर नशा “धर्म” को धार्मिक जुनून/उन्माद के रूप में जनता की मानसिक अवचेतनाओं में आत्मभूत कराने के लिए राजनैतिक रूप से उनकी नशों में इंजेक्ट करवाया जाता है।
आनंद सर के कविता की इन पंक्तियों के दूरंदेशी संदेश को ग्रहण किया जा सकता है :
दारू का नशा कम हो गया है।
इसलिए  धर्म के भाव ऊँचे हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 18)
प्रबुद्ध कवि/विचारक आर डी आनंद सर के इस संग्रह की सभी कविताएँ सूक्तियाँ हैं, स्त्रोत हैं, श्लोक हैं और मंत्र हैं। बस इनका पक्ष और कथ्य बदला है। कल ये वर्चस्ववादियों के पक्ष और हित में थी, आज ये शोषितों/उत्पीड़ितों के हक/हुक़ूक़ की बात कर रही हैं। आनंद सर की ये कविताएँ बिहारी की कविताओं की तरह बहुत ही मारक और सघन हैं। कविताओं के शब्दों और उनसे उत्पन्न भवार्थों की कल्पना के संसार और छद्म के रूप और दृष्टियों का बहुत सटीक संधि और समास तैयार किया है। उनके सभी बन्दों में गुण-संधि का वृहद संसार समाहित है। मेरी यह व्याख्या किसी को जबर्दश्ती की प्रसंशा लग सकती है लेकिन यहाँ तनिक भर भी व्यक्तिगत प्रभाव की अभिप्रेरणा वश कुछ भी नहीं लिख रही हूँ। उनकी कविताओं की जो वास्तविक विशेषता है, मात्र उसी की विवेचना का सार्थक प्रयास कर रही हूँ।
उनकी कविता “लाठी लाओ” में राजनीतिक परिस्थितियों को अपने अनुसार संचालित करने वाले और जरूरत पड़ने पर अपनी शक्लोसूरत तथा विवेक की मर्यादा को बदलने में माहिर और मर्मज्ञ शातिर नेताओं के चरित्र का रूपांकन है। कविताओं की हर संज्ञाएँ एक रूपक हैं। कविताओं की क्रियाओं का भाव किसी सत्य का प्रतिरूप है। कविताओं के प्रत्यक्ष अर्थ साधारण एक नरेशन हैं, वास्तविक अर्थ कथाओं के अनुवाद में छिपे होते हैं। धार्मिक व्यक्ति कहता है कि श्लोक के उच्चारण का वास्तविक अर्थ और उससे ध्वनित ऊर्जा में बारीक अंतर होता है। श्लोक के वास्तविक अर्थ उसके प्रभाव में अंतर्निहित होते हैं, ठीक उसी तरह आनंद सर की इन मारक कविताओं के अर्थ की वास्तविकता उपमेय में उपमान को स्थापित करने के बाद पता चलता है। कहा जाना उचित होगा कि व्यक्ति का समाजिक स्तर देश के आर्थिक उद्देश्यों से उत्पन्न राजनीतिक व्यवस्था के संचालकों के वर्ग-विभाजित चिंतन और उसके प्रयोगों पर सुनिश्चित करता है। जैसा कि आनंद सर की मार्क्सवादी अवधारणा की समझ रही है और मैं भी उनके सत्य के सापेक्ष ही उनके विचार का निरूपण करने की पूरी सत्यनिष्ठा से कोशिश कर रही हूँ, वह यह कि शासक वर्ग हमेशा जनता जे विरुद्ध जनमत तैयार करने और जनता में सफलता पूर्वक अपने वर्ग हित में प्रचार करने की कोशिश करता है बल्कि सत्ता संस्थान और उसके अंगों तथा महत्वपूर्ण हस्तियों के मेधाओं का भरपूर प्रायोग करता है। आनंद सर की कविता “लाठी लाओ” की निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त शब्द “रेत”, “घड़ियाल”, “आँखे”, “समन्दर” और “नहाना” प्रतीक हैं, रूपक हैं, किसी अन्य वस्तुओं व स्थितियों का अनुवाद हैं। “रेत” यहाँ “पब्लिक प्लेस” है जहाँ बैठने से कोई शक नहीं करेगा तथा शिकार भ्रम में आकर शिकारी के उपयुक्त निशाने व स्थान पर जा सकता है। “घड़ियाल” का अर्थ “शिकारी” है लेकिन समाज और राजनीति के अर्थ में जाति और धर्म के सापेक्ष कार्य करने वाला वर्चस्ववादी नेता है। “आँख” उसकी “वर्चस्ववादी दृष्टि” है। “समन्दर” शासक वर्ग द्वारा “प्रत्यारोपित संवाद” है जिसे वह वोट की राजनीति के लिए अदृश्य उद्योग के मार्फत फेक न्यूज और व्यूज को जनता के मध्य में डालता है जिससे जनता विमर्श में फँस कर मुख्य लक्ष्य से भटकते हुए जाति/धर्म/सम्प्रदाय की मानसिकता में विभक्त रहे और कदापि वर्गीय एकता न बने।
दूसरे रूप में यह कहा जाना श्रेश्कर होगा कि भारतीय प्रभु वर्ग सभी जातियों को एक दूसरे के विरुद्ध कर आसानी से शासन करता रहता है और पूँजीपति का मुनाफा व उद्योग बाधित नहीं होता है। अवलोकनार्थ कविता का वह अंश प्रस्तुत कर रही हूँ।
रेत पर घड़ियाल आँखें लगाए बैठा है।
समन्दर  में  नहाना  अब ठीक नहीं है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 19)
वर्चस्ववादी राजनीति और पहचान की राजनीति में नायक की स्थापना के बिना सफलता की गारंटी बहुत मुश्किल से सुनिश्चित हो पाती है। दोनों ही स्थितियों में नायक पहचान कामन तथ्य है। दक्षिणपंथी राजनीति में वर्चस्ववाद को स्थापित करने जे लिए एक तानाशाह सख्शियत की जरूरत होती है लेकिन वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा नियंत्रित चुनाव प्रणाली से पहचान में आता है किंतु कुछ जातिवादी व क्षेत्रीय पार्टियों में लोकतांत्रिक चुनाव की प्रक्रिया को त्याग कर प्रारम्भ से ही स्थापित नेता को सर्वेसर्वा जाना व माना जाता है। वह अधिनायकवादी होता है। वह केवल और केवल पहचान की राजनीति का हिस्सा होता है। चूँकि भारत में अधिकांश हिन्दू निवास करते हैं इसलिए हिंदूवादी शाक्तियाँ बहुत अरसे से ही भारत को हिन्दू राष्ट्र मानते आए हैं। अब यह अलग बात है कि विभिन्न संगठनों और मान्यताओं के चलते हिंदुओं की बहुमत नहीं बन पाई जिससे कि वे भारत को एक हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देते लेकिन बहुत दिनों से ताक में रहने वाले हिंदूवादी शाक्तियों ने सत्ता में बहुमत हासिल किया और अब वे इस फिराक में हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दें। इसके लिए उन्हें एक सर्वगुण सम्पन्न तानाशाही प्रवृत्ति का नेता चाहिए था जिससे जनता भयभीत भी रहे, सो मिल गया। आज संगठन से अधिक नेता की पहचान से वर्चस्व कायम है। यह भी एक तरह से पहचान की राजनीति है। आज नायक स्थापित हो चुका है। आज डर स्थापित हो चुका है। आज जनता निरीह है।

आनंद सर की कविता “नायक स्थापित है” में उसी वस्तुपरिस्थिति का संकेत है:

नायक  स्थापित  हो चुका है।
नई पौध पतिंगा बन जाएगा।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 20)
प्रबुद्ध चिंतक आर डी आनंद सर की कविता “ये नया संस्करण है” में प्रयोगशाला शब्द का प्रयोग हुआ है। अमूमन इस संग्रह की सारी कविता
ओं में यह देखने को मिलेगा कि कुछ प्रायोजित है। इसका अर्थ है कि किसी कारखाने में कुछ निर्मित हो रहा है। कारखाना सिर्फ वस्तुओं के निर्माण के लिए होता है लेकिन यहाँ कारखाना शब्द एक रूपक है जहाँ विचारों का निर्माण किया जाता है और प्रयोगशाला इसलिए कि उस विचार का परीक्षण उस कारखाने में होता है। सवाल यह है कि “नया संस्करण” और “खूबसूरत मंत्र” क्या है तथा “डर की।प्रयोगशाला” का क्या अर्थ है? पूँजीवादी व्यवस्था में कोई भी सरकार आए,  किस की भी सरकार आए लेकिन उसका नियंत्रण पूँजीपति वर्ग ही करता है। पूँजीपति अपने विचार से सरकार के रुप, रंग और योजनाएँ बनाती है तथा उसका प्रचार करवाती है। आज़ादी के बाद अमूमन कांग्रेस ने शासन किया। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दसक में कांग्रेस की मूल वर्चस्ववादी भारतीय जनता पार्टी शासन में आई। निश्चित ही बीजेपी कांग्रेस से भिन्न नहीं है लेकिन बीजेपी कांग्रेस की तरह हिंदुत्व के मामले में उदार नहीं है। कांग्रेस ने कभी भी हिंदुत्व का विरोध नहीं किया और सर्वधर्म समभाव के दृष्टिकोण के साथ सब को साथ मिलाकर शासन किया किन्तु बीजेपी शुद्ध हिंदूवादी पार्टी है, यह हिंदुत्व की बात सीधे करती है। इसने नए सिद्धांत, नए तरीके, नई जनता नई तरह तैयार किया। पूँजीपतियों को लगा कि यह और ऐसा हथियार अधिक समय के लिए उनको सुकून देगा। उन्होंने बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति में दखल न देकर प्रश्रय दिया। हिंदुत्व की इस राजनीति के लिए एक अधिनायकवादी दबंग नायक और उसके पहचान की जरूरत थी, वह मिल गया। हिंदुत्व की राजनीति के लिए सहिष्णुतावादी सिद्धांत की जरूरत खत्म हो गई। उदारता की जगह को अदृश्य डर ने लिया। वर्ग की जगह को धर्म ने लिया। कथनी और करनी में विशेष अंतर हो गया। सत्य की अवधारणा बदल गई। सब कुछ उलटा-पुलटा हो गया। आज व्यक्ति अपने पक्ष में नहीं है बल्कि वह जाति, धर्म और ईश्वर को श्रेष्ठ मानता हुआ प्रायोजित राजनीति के छद्म में उलझकर वर्चस्ववादियों के चन्द संभ्रांतों के पक्ष में जीने/मरने लगा है। दूसरी तरह की जनता, वह जो स्वयं को हिंदू नहीं मानती है, वह जो स्वयं को प्रगतिशील कहते हैं, वह जो मार्क्सवादी हैं, वह जो आम्बेडकरवादी हैं, जो मुसलमान हैं, जो आदिवासी हैं, ये सभी अधिनायकवादी पहचान के स्थापित नेतृत्व से डरते हैं। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। आज आंदोलन की आज़ादी नहीं है। आज वैश्वीकरण के नेताओं और साम्राज्यवादियों ने मिलकर कुछ नई नैतिक वर्जनाओं को तैयार किया है जिसकी आड़ में श्रमिक/दलित/उत्पीड़ित वर्गों के जनविरोधी सरकारी नीतियों के विरुद्ध किए जाने वाले आंदोलनों को रोक दिया। आनंद सर ने अपनी उक्त कविता में पूँजीपति और वर्चस्ववादी राजनीति के नेताओं के महागठबंधक बेनकाब किया गया। उसी की बानगी इस बन्ध में है।
नया  संस्करण  है  ये  खूबसूरत  मंत्र।
डर की प्रयोगशाला में तैयार हुआ है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 23)
शासक वर्ग हमेशा समाज में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य के उद्देश्य में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन निरंतर करता रहता है। पूँजीपतियों का उद्देश्य होता है कि जनता किसी भी तरह व्यवस्था के विरुद्ध एक न हो पाए। चूँकि, सरकार पूँजीपतियों के गठबंधन का समूह है इसलिए पूँजीपति हमेशा यह ख़याल रखता है कि जनमत तब तक सरकार के विरुद्ध न तैयार हो पाए, जब तक सरकार पूँजीपतियों के लिए एक दुधारू गाय के रूप में परिपूर्ण रहती है। पूँजीपतियों का थिंक टैंक सरकार को आगाह करता रहता है कि जनता उसके बारे में क्या राय कायम कर रही है तथा सरकार को जनता में जनमत तैयार करने के लिए क्या-क्या परियोजाएँ वितरित करे। सरकार डरती है कि कहीं जनता विरोधी पार्टी को न जिता दे और वह गद्दी पर उतर जाय तथा पूँजीपति डरता है कि जनता शिक्षा और रोजगार के बहाने जनता एक न हो जाय और पूँजीपतियों के मुनाफ़े के विरुद्ध खड़ी होने लगे। सर्वहारा और पूँजीपतियों में समानांतर और निरंतर द्वंद्व है। पूँजीपति और वर्चस्ववादी सवर्ण निरंतर अपना एक गुप्त अनुभाग लगाए रखता है कि वे जनता के सभी आपसी असफलताओं के द्वंद्व को तलाशें। जनता के द्वंद्व को उभारने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के चिंतक अनेक झूठ को सत्य की तरह जनता के मध्य फेंकते रहते हैं। आज तो सोसाल मीडिया, अहमी बुद्धिजीवियों, ईर्ष्यालु नागरिकों और प्रायोजित मेधाओं के माध्यम से झूठ को फैलाना बिल्कुल आसान सा है। आनंद सर लिखते हैं कि पूँजीपतियों ने अपने समिति और पदाधिकारियों द्वारा जनता की मानसिकता का पता कर लिया है इसलिए वे अपने फेक सेल्स को उसके प्रचार/प्रसार के लिए रुपए को निवेश को बढ़ा देने की इजाज़त दे देते हैं। आनंद सर के कविता “ब्रांड अम्बेसडर धांसू होना चाहिए” में सत्ता प्रतिष्ठान के जनमत के विरुद्ध बौद्धिक कर्म और सक्रियता दिखाई पड़ती है। आप भी देखें।
जनता   की  मूर्खता  का  पता   लगा   लिया   है।
विज्ञापन      में      पैसे       और      लगा       दो।।
मार्क्स   के   दर्शन   से   मत   डरो   पाण्डेय  जी।
इनका    नेता     बहुत     ही   आराम – तलब   है।।
जयश्रीराम कॉमरेड! यह क्रान्ति का समय नहीं है।
क्रान्तिकारी  शाक्तियाँ  बुद्धिहीन और नासमझ हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 28)
विज्ञान की नई शाखा का अन्वेषण हो चुका है। उसे स्थापित भी कर दिया गया है। विज्ञान की यह शाखा झूठ की खेती कर रहा है। इसके वैज्ञानिक और डॉक्टर्स अपने-अपने प्रयोगशालाओं में नई-नई विधियों नए-नए उपकरणों के साथ शगूफ़ों को इजाद कर रहे हैं। यह है झूठ की मॉडर्न खेती। मनुष्य के पंद्रह सौ क्यूबिक आयतन वाले प्रमस्तिष्क को बंजर बनाए जाने के लिए उन्हें रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत है। डॉक्टरेट में टैक्नोलॉजी की उत्कृष्ट अवस्था का अध्ययन किया जाएगा जिससे कम श्रम और कम लागत पर अत्यधिक मुनाफा हो। जब तक अत्यधिक मुनाफा नहीं होगा, पूँजीपतियों के पास अकूत पूँजी नहीं इकट्ठा होगी, तब तक देश के अनेक संसाधनों की आपूर्ति के लिए धन और साधन आखिर कैसे जुटाया जा सकेगा। पूँजीपति ही तो वह आखिरी इंसान है जो देश और मानवता को जिंदा रख रहा है। ऐसी उन्नति के लिए जनता का दिमाग बंजर होना चाहिए, नहीं तो जनता और उसके समाजवादी नेता जनता को अकर्मण्यता का पाठ पढ़ा कर पूँजीपतियों और सरकार के विरुद्ध न्यूसेंस और अवरोध खड़ा कर देते हैं। आनंद सर कहते हैं कि इस तरह सोचते और इसका प्रचार करते हुए पूँजीपतियों का महागठबंधन मार्क्सवाद, मार्क्सवादियों और कम्युनिस्टों का स्वयं भी विरोध तैयार करते हैं, सरकार से भी उन पर आतंकवादी और राष्ट्रद्रोही होने का तोहमत लगाते हैं। दलितों को ब्राह्मणवाद के नाम पर सवर्णों का विरोधी बनाते हैं, गाली दिलवाते हैं, कोसवाते हैं और प्रतिक्रिया करवाते हैं। सवर्णों से उनकी प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया करवाते हैं। कहीं दलित स्त्री का बलात्कार होता है, तो कहीं हत्याएँ। जनता आपसी द्वेष, रंजिश, ईर्ष्या, वैमनस्य, अहमान्यताओं में पीड़ित रहती है। छद्म का प्रयोग और प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है कि झूठ सत्य लगने लगा है, जानवर का गोबर और मूत्र विज्ञान का सर्वोत्तम मेडिसिन मान लिया गया है। आनंद सर ने “मीनकैफ स्त्रोत गुणसूत्र” का जिक्र अपनी कविता में किया है। यह मीनकैफ हिटलर की आत्मकथा है। स्त्रोत उसके नस्लवादी विचार हैं और गुणसूत्र उसकी वर्चस्ववादी मानसिकता का खुराफ़ाती दिमाग है जो अपने स्वार्थ के लिए झूठ और छल-छद्म की अनवरत खेती करता रहता है। आज भारतीय संस्करण में भी वह मीनकैफ स्त्रोत के गुणसूत्र स्पष्ट दिखाई पड़ रहे हैं। “सफेद झूठ की खेती” नामक कविता में झूठ के इस यथार्थ की कल्पना की जा सकती है।
विज्ञान की नई शाखा का आगमन हो चुका है।
सनकों को प्रतिबिम्बित होते देखा जा सकता है।।
सफेद झूठ की खेती मॉडर्न तरीके से होगी।
आश्वासन आपूर्ति शगूफों की प्रयोगशालाएँ तैयार हैं।।
पंचगव्य काऊपैथी का उत्कृष्ट प्रोडक्ट है।
मीनकैफ स्त्रोत गुणसूत्रों की चर्चा करते हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 45)
श्री बाल गंगाधर तिलक का नाम हम सभी जानते हैं। वह एक विद्वान ब्राह्मण थे। वह कट्टर ब्राह्मणवादी भी थे। वह दलित विरोधी भी थे। वह दलितों के विरुद्ध चिन्तनशील रहते थे। वे ब्राह्मणों/क्षत्रियों को श्रेष्ठ और आर्य सिद्ध करने के लिए एक आर्य प्रजाति जा सिद्धांत ही तैयार कर दिया तथा सभी सावर्णों को उत्तर आर्कटिक प्रदेश का मूलनिवासी घोषित कर दिया। उनकी नकल करते हुए ऐतिहासिक तथ्यों को नज़रअन्दाज़ करते हए विदेशी इतिहासकारों के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू तक ने भी तिलक के आर्य सिद्धांत को सत्य घोषित करते हुए लिखा कि आर्य विदेशी मूल के हैं, आर्य एक प्रजाति है, आर्य श्रेष्ठ हैं। दुर्भाग्य से दलितों के बहुसंख्य भी इसी सिद्धांत का अनुसरण किया। डॉ. आम्बेडकर के सिद्धांत को दलितों ने नकार दिया। डॉ. आम्बेडकर साहब आर्य को न कोई प्रजाति मानते हैं और न आर्य आक्रमण के सिद्धांत को ही मानते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक “शूद्र कौन थे” वाङ्गमय, खण्ड-13 में लिखते हैं कि आर्य एक भाषा है, आर्य भाषा को बोलने वाले सभी लोग आर्य कहलाए। आर्य न विदेशी हैं न कभी भारत अथवा मूलनिवासियों पर आक्रमण ही किया था। ब्राह्मण/क्षत्रिय भी भारत के मूल निवासी हैं। शूद्र भी आर्य है। दुर्भाग्य यह है दलित स्वयं को मूलनिवासी मानता है और सवर्णों को विदेशी, आर्य और श्रेष्ठ। आनंद सर ने इसी बात को अपनी कविता में ब्राह्मणों के मुँख से कहलवाया है।
मैं शुद्धरक्त आर्य हूँ मेरा डीएनए प्रमाण है।
मैने अपने प्रचारक लगा रखे हैं।।
मैं नस्लवादी हूँ फासिस्ट भी हूँ।
जितना मर्जी हो, कमज़र्फ़ों! चिल्ला लो।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 36)
सत्ता के वर्चस्ववादियों का एक अलग ही सूचना प्रौद्योगिकी सेल होता है, जो फेक न्यूज और व्यूज गढ़ता तथा प्रसारित करता है। अवाम इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ रहता है। अवाम कहता है- कोऊ होय नृप हमें का हानी, चेरी छोड़ि न होइबै रानी। वह छल-छद्म और कुटिनीतियों से नावाकिफ होता है। वह अपने दुखों को दुशासनों के दुष्कर्मों का परिणाम नहीं समझता है बल्कि वह समझता है कि उसके दुखों का कारण उसके पूर्वजन्मों के पाप है। वह करनी और फल में विश्वास करता है। आम जनता दो तरह की हो चुकी है। एक सदियों से उसकी गुलाम रही है जो अब पढ़-लिख कर नस्लवादियों के हर विचार और क्रिया को छद्म समझता है तथा उसमें उनके प्रति नकार का भाव हमेशा उपस्थित रहता है। दूसरी जनता वह है जो पहली जनता की ही तरह गरीब, उत्पीड़ित, अशिक्षित, बेरोजगार और सर्वहारा है लेकिन जाति और धर्म के जनून, आस्था और नशे में नस्लवादियों के हर शब्द को अपना भाग्य मानता है। पदार्थ और भाव का द्वंद्व व्यवहारिक रूप से दलित और सवर्ण, प्रगतिशील और पुरातनपंथियों के मध्य देखा जा सकता है। जिस तरह से नस्लवादियों के समुदाय में एक विज्ञान विरोधी फेक व्यूज ग्रुप क्रियाशील रहता है, उसी तरह क्रान्तिकारी समुदायों व संगठनों में एक प्रगतिशील और विज्ञान सम्मत ग्रुप भी सक्रिय रहता है। फेक व्यूज ग्रुप का कार्य है जनता और प्रगतिशीलों के उद्देश्य, विचार और क्रियाओं को समझना तथा उसको निष्प्रभावी बनाने के लिए झूठ को सत्य की तरह मनों में बैठा देना है। प्रगतिशील और विज्ञान को आधार मानने वाले वर्चस्ववादियों के हर झूठ को समझने की निरंतर चेष्ठा करता है। आनंद सर की कविताओं के अध्ययन से इतने बारीक द्वंद्व निकलकर सामने आते हैं। आनंद सर की कविताएँ कहती हैं कि नस्लवादी जब यह कहता है कि वह आ रहा है, तो निश्चित ही उसका अर्थ है, वह जा रहा है। जब वह प्रकाश की बात करे तो समझो हम घोर अँधेरे से घिरने वाले हैं। आनंद सर ने अपनी इस कविता में उनके द्वारा घोषित “तमसोमाँज्योतिर्गमय” को “ग्रहण” का पर्याय माना है और उनके “वसुधैवकुटुम्बकम” का अर्थ अलगाववाद कहा है। आनंद सर कहते हैं कि नस्लवादी जब इश्क, मोहब्बत और खुदा की बात करता है, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमारी बस्तियों से सुकून खत्म होने वाला है या फिर हमारी बस्तियाँ जलने वाली हैं। उनके हर प्यार का मतलब नफरत है।
तमसोमाँज्योतिर्गमय जब भी पुकारते हो।
सोने जैसी धरती पर ग्रहण लग जाता है।।
वसुधैवकुटुम्बकम वैश्वीकरण के प्रयास है।
मजलूमों की कोई दुनिया नहीं होती।।
जिसका पैगाम-ए-इश्क व मोहब्बत खुदा है।
वह बस्ती-बस्ती काँटे ही बोता है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 39)
सरकार जब आई थी तो इसने कहा था कि अच्छे दिन जरूर आएँगे लेकिन समय गवाह है कि अच्छे दिन नहीं आए बल्कि अच्छे दिन के नाम पर जनता ने बहुत बुरे दिन देख डाले हैं। आनंद सर की कविता “आलोचना बर्दाश्त नहीं” की इन पंक्तियों से देश के नेताओं की हक़ीक़त/व्यवहार/संस्कृति को खूब अच्छे ढंग से समझा जा सकता है।
हिटलर का नारा था ‘गुड टाइम विल कम’।
उसने झूठ बोल कर सत्ता हासिल किया था।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 48)
देश की जनता सुख चाहती है, सद्बुद्धि चाहती है, भला व्यवहार और सुंदर संस्कृति चाहती है। जनता चाहती है कि जाति और धर्म के बवाले खत्म हो जाँय। जनता सतयुग चाहती है। जनता भाईचारा चाहती है। जनता लोकतंत्र चाहती है। जनता समाजवाद चाहती है। जनता शिक्षा और रोजगार चाहती है। जनता प्रेम चाहती है। दुःखद है, जनता जो कुछ भी चाहती है, सब कुछ उसका उलटा हो रहा है। जमाना पुरातन से नवीनतम की तरफ, अज्ञानता से ज्ञान की तरफ, भाव से विज्ञान की तरफ बढ़ रहा है। इस लिहाज से मनुष्य को सद्बुद्धि वाला होना चाहिए लेकिन मनुष्य है कि वह आज भी दूसरे मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता है बल्कि उसको भ्रमित करता है, उसको धोखा देता है, उसकी हत्या करता है। बड़ी बिडम्बना है कि मनुष्य सभी सुविधाओं को मुट्ठी भर हाथों में साफ़ियों-सदियों के लिए इकट्ठा रख लेना चाहता है जबकि वह जानता है कि उसकी उम्र 60/65 से अधिक नहीं है। वह यह भी जानता है कि अरबों/खरबों रुपए उसके उपभोग से बहुत अधिक हैं और उस धन की कोई भी समुचित उपयोगिता नहीं है। वह सारा धन उसके लिए बंजर है लेकिन नहीं, वह संपत्ति और संसाधनों के लिए झूठ बोलता है और झूठ बोलने में माहिर कला का स्वामी बनता है। यह जनता बहुत भोली है। इसे भूल जाने की आदत है। इसी का फायदा यह नपुंसक वर्ग उठाता है।
वह झूठ को सच बताने की कला में माहिर है।
जनता को डाइमेंशिया हो गया है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 48)
ईश्वरवादी ईश्वर को इसलिए नहीं मानता है कि उसे राजगद्दी चाहिए, धन चाहिए, मिल/कारखाने चाहिए, बेटी/बेटा चाहिए, मंत्री का पद चाहिए, बिल्कुल नहीं। वह ईश्वर को इसलिए मानता है कि जब परिवार को चलाने के लिए एक मालिक चाहिए, समाज को चलाने के लिए एक मालिक चाहिए, एक देश को चलाने के लिए एक मालिक चाहिए तो निश्चित इस संसार को चलाने के लिए एक मालिक जरूर होगा। सच्चे ईश्वरवादियों की आस्था प्रबल होती है। वह बिना ईश्वर के संसार और सार्वभौम की कल्पना नहीं कर सकता है। वह ढ़ेर सारे सवालों के लिए विज्ञान का सहारा नहीं लेता है और न विज्ञान को परफेक्ट मानता है। वह मानता है कि विज्ञान का संचालन भी ईश्वर ही करता है। वह मानता है कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है लेकिन धूर्त ईश्वरवादी ईश्वर को बिल्कुल नहीं मानते हैं। वे धर्म और ईश्वर को मात्र दुकान और धन्धा समझते हैं। वे जानते हैं कि ईश्वर नहीं है। सार्वभौम प्रकृति, प्रदार्थ और प्रक्रिया का योग है। पदार्थ और प्रक्रिया किंचिद अलग नहीं हो सकते हैं। पदार्थ, प्रक्रिया, ऊर्जा, स्पेस, दिक, काल, रूप, आकर और परिवर्तन एक दूसरे में अंतर्निहित हैं। पदार्थ में जो प्रक्रिया घटित होती है, वही रासायनिक प्रक्रिया है। उसी रासायनिक प्रक्रिया के कारण यह संसार अस्तित्व में है। जन्म और मृत्यु उसी के कारण है। मनुष्य और चिंतन उसी का फल है। मनुष्य के विचार परिस्थितियों के संघात से उत्पन्न होते हैं। देवी, देवता, भूत, प्रेत, आत्मा, पुनर्जन्म इत्यादि भौतिक परिस्थितियों और परिघटनाओं से उत्पन्न हुए हैं। मनुष्य का मस्तिष्क एक अन्वेषक है। उसने समय-समय पर परिस्थितियों के सम्मुख एक आकृति गढ़ ली और उसे ही शक्तिमान मान लिया लेकिन आज का चालाक मानव जो नस्लवादी हो उठा और वर्चस्व की राजनीति करने लगा, वह जानता सब है लेकिन अपनी और कौम के सुख के लिए न जाने कितने झूठ गढ़ डाले और न जाने कितने झूठ बोल डाले। वह अभी भी सत्य लगने वाला झूठ बोलता रहता है। वह वर्ग जितना बड़ा झूठ बोलता गया, उतना ही बड़ा अहमी भी है। आनंद सर की कविता “हम प्रभु वर्ग हैं” कि पंक्तियाँ आप को सत्य महसूस करने पर विवश कर सकती हैं।
ईश्वर के नियमों में हस्तक्षेप ठीक नहीं है।
नहीं तो हम प्रभु वर्ग विध्वंस रोक सकते हैं।।
रेल हादसा क्या चीज है जानेमन।
हम मंत्रों से आतंकवाद रोक सकते हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 37)
मुखबिर बहुत ही शालीन शातिर है। मुहल्ले में बहुत भावुक, नादान, चरित्रवान और ईमानदार बना रहता है। यह उसका छद्म है। ऐसा उसको ट्रेनिंग दी जाती है। दरअसल, सत्ता वर्ग उसे मुखबिर के रुप में पालता है। उसे जनता का सरकारी राडार कहा जा सकता है। मैं जब भी घर से निकलती हूँ तो आनंद सर की कविताओं को याद रखते हुए उतनी सतर्क प्रकृति के मार से नहीं रहती हूँ जितनी पड़ोसी और गाँव वालों के चुगलखोरी से सावधान रहती हूँ। एक दिन आनंद सर कह रहे थे कि मैं मास्क रोग के डर से परेशान होकर उतना नहीं लगाता हूँ जितना पड़ोसियों के चुगली से डर कर लगता हूँ। रोग का इलाज है किंतु मुहल्ले, पड़ोसी और गाँव वालों के शक और चुगली का इलाज नहीं है। एक दिन किसी ने पुलिस के नंबर पर शिकायत डाल दी कि अमुक करोना पॉजिटिव है। छापा पड़ा। पुलिस और डॉक्टर इसे उठा ले गए। घर को घेर दिया गया और करोना पॉजिटिव के बाँस से घेरा बना दिया गया। अन्य पड़ोसी डर गए। लोग उनसे मिलना, हालचाल पूँछना बन्द कर दिए। यह वर्ग-चरित्र का मामला है। ये नस्लवादी सरकार के चमचे हैं। ये चमचे बहुत ही खतरनाक होते हैं। जिनसे बिल्कुल सावधान रहने की जरूरत है। ऐसे ही लोग डाभोलकर के हत्याओं की साजिश रचते हैं। ऐसे ही लोग गौरी लंकेश को मरवाते हैं। “काली साया” कविता के अंश पर गौर फरमाइए।
वह जो तुम्हारी गली में निहत्था घूमता है।
उसको तुम्हारे मस्तिष्क का रडार दे दिया गया है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 64)
जिस काली साया का जिक्र आनंद सर अपनी कविताओं में करते हैं, आखिर वह काली साया क्यों है? क्योंकि राष्ट्रभक्त देशद्रोहियों को एकपल भी बर्दाश्त नहीं करना चाहता है। यहाँ राष्ट्रभक्त और देशद्रोहियों की परिभाषा पर बहस हो सकती है लेकिन कोई भी विमर्श बेमानी है क्योंकि कोई भी विमर्श अच्छे लोगों के मध्य फलदायी हो सकती है लेकिन जब विमर्शकर्ता खुद ही देशप्रेम के नाम पर देशद्रोही हों तो क्या मायने है कि सत्य पर बहस करने की। हिटलर को अपनी आलोचना पसंद नहीं थी, वह अपने अलोचकों को बर्दाश्त नहीं करता था। वह अपने धर्म और नस्ल के विरुद्ध बोलने वालों को नहीं बख्शता था। ऐसे लोगों को वह देश का दुश्मन मानता था। हालाँकि, यह देशप्रेम और देशद्रोही का फार्मूला देश हित का फार्मूला नहीं है बल्कि वर्चस्व का मामला है। अलोकतांत्रिक क्रूर शासक अपने विपक्षियों को अपना विरोधी मानता है और अपने विरोधियों को देशद्रोही घोषित कर देता है। जिन्हें एकमत से देशद्रोही घोषित कर दिया जाय, वे लोग न्यूसेंसों द्वारा देरसबेर रास्ते से हटा दिए जाते हैं। इस गंभीरता को आनंद सर की कविता “आलोचना बर्दाश्त नहीं” में देखा जा सकता है।
वह अपने विरोधियों को देशद्रोही कहता है।
मजदूर आंदोलनों को कुचल दिया जाएगा।।
धर्म विशेष के लोग देश के दुश्मन हैं।
हिटलर को आलोचना बर्दाश्त नहीं थी।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 48)
वह आखिर कैसा शासन है जहाँ विपक्षियों की आलोचनाएँ बर्दाश्त नहीं जाती हैं? जरूर वह अलोकतांत्रिक और तानाशाही शासन है। वह क्रूर शासन है। ऐसे शासन में शुभ से अधिक अशुभ का बोलबाला है। अन्याय और अत्याचार अपने चरमसीमा पर पहुँच गया है। इस कविता के शब्द और तासीर मुक्तिबोध के कलात्मकता और भय के काल्पनिक संसार जैसा है लेकिन वहाँ फेंटेसी के सहारे सत्य का उद्घाटन किया गया था जबकि यहाँ सत्य की ही फेंटेसी बनाई गई है लेकिन कवि की कल्पना इस समय का सत्य है। आज जितनी भी शोभा यात्रा या किसी भी जयकारे की भीड़ सड़कों पर उतरती है, जनता उस भीड़ से आतंकित रहती है। सभी अपने मनों में मनाते हैं कि यह बला जल्दी खत्म हो। हर तरफ़ धार्मिक जुलूस अपने जुनून में प्रजाति के विजय का उद्घोष करती हुई नज़र आ रही है। जब किसी पार्टी का जुलूस निकलता है तो ऐसा आभास होता है जैसे वह किसी देश व प्रजाति पर आक्रमण करने जा रहा है। जब भी कोई रैली निकलती है, मजाल क्या कि किसी आम आदमी की गाड़ी उन्मादी जुलूस को ओवरटेक कर ले। किसी ने ऐसा करने का साहस किया तो उसकी पिटाई, संभवतः हत्या भी सुनिश्चित है। मॉब्लिंचिंग की स्थिति और आतंक का मंज़र आँखों में खौफ़ बनकर तैरता है। एक अशुभ दिन/रात सिर पर बैठा हुआ अशुभ की चेतावनी से मन खिन्न रखता है। आनंद सर की कविता “मृत्युदल बढ़ रहा है” पढ़कर हत्यारों और मौत के खौफ से परिचित हुआ जा सकता है।
मृत्युदल बढ़ रहा है अपनी शोभा यात्रा के साथ।
कवि! लेखक! चिंतक! तुम्हारे मुंडेर पर गिद्ध बैठा है।।
वह मांस न खाने की बड़ी सफाई देता है।
यह तुम्हें जिंदा खाने की शिफारिश है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 38)
वरिष्ठ मार्क्सवादी/आम्बेडकरवादी चिंतक आर डी आनंद सर अपनी पुस्तकों और भाषणों में लिखते और कहते रहते हैं कि चिंतक/लेखक/बुद्धिजीवी होने का तभी कोई सार्थक मतलब है जब वह अपने ज्ञान को व्यवहार में भी प्रयोग करे/उतारे। आनंद सर ने मुझे एमिल बर्न्स की एक पुस्तक “मार्क्सवाद क्या है” पढ़ने के लिए दिया था और बहुत ही विनीत भाव से दबाव डालकर पढ़वाया था। उस पुस्तक का एक चेप्टर है ‘गाइड टू एक्शन” जिसमें लिखा है कि दुनिया के दार्शनिकों ने दुनिया की विभिन्न तरह से व्याख्या की है जबकि यह जानने की जरूरत है दुनिया को कैसे बदला जाय। आनंद सर हमेशा दुनिया को बदलने/व्यवस्था को बदलने/ब्राह्मणवाद को खत्म करने/क्रान्ति करने की तरकीबों की खोज प्रस्तुत करते रहते हैं। वे कहते हैं सिर्फ लेखक बनकर क्या होगा, हमें एक क्रान्तिकारी एक्टिविस्ट के रुप में निरंतर कार्य करते रहने की जरूरत है। परिवर्तन में ही जीवन है अथवा जीवन का मतलब परिवर्तन में ही है। यथास्थितिवादी होने का अर्थ है मृत्यु। जब आनंद सर यह बताते हैं तो यह भी स्पष्ट करते हैं कि देश की परिस्थिति क्या है, हम किसी व्यवस्था में रह रहे हैं और हमें क्या करना है। वे अपने लेखों और कविताओं में लिखते हैं कि डॉ. आम्बेडकर साहब ने कहा है कि भारत में हमारे दो दुश्मन हैं-ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद। हमें इन दोनों दुश्मनों से साथ-साथ लड़ना है इसलिए उन्होंने दलित और श्रमिक वर्ग को मार्क्स-एंगेल्स के कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र को अनिवार्य और निरंतर पढ़ने की सलाह दी है। आनंद सर लिखते हैं कि हम दोहरी व्यवस्था में जी रहे हैं। यहाँ हमे स्वयं समझना पड़ेगा कि समानांतर जब दो व्यवस्था चलती हैं तो भी एक व्यवस्था मुख्य और दूसरी व्यवस्था गौड़ होती है। भारत में ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद दोनों हैं तो इसमें में कौन मुख्य है। दलितों और आम्बेडकरवादियों का मानना है कि ब्राह्मणवाद मुख्य है लेकिन वामपंथी और मार्क्सवादी पूँजीवाद को ही मुख्य मानते हैं बल्कि पूरी दुनिया की व्यवस्था को पूँजीवादी व्यवस्था माना जाता है। पूँजीवाद अपने अंतर्गत अनेक व्यवस्थाओं को समाहित किए हुए उनको मुख्य दिखाते हुए अपने उत्पादन और पूँजी को अक्षुण रखता है। भारत में पूँजीवाद ब्राह्मणवाद को उसी तरह अगुआ मानकर राजगद्दी सौंप दिया है जिस तरह से ब्राह्मण क्षत्रियों को देश की शासन सत्ता सौंप कर उन्हें राजगद्दी पर बैठकर सारी संपत्तियों और संसाधनों का मालिक बना रहता है बल्कि ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित करके अपने तलवे भी चटवाता है। आनंद सर कहते हैं कि ब्राह्मणवाद पूँजीवाद का संभ्रात नौकर है।
हम  दोहरी  व्यवस्था  में जी रहे हैं।
जातियाँ पूँजीपतियों की सेवक हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 22)
मार्क्सवादी चिंतक आर डी आनंद कहते हैं कि अब जातियों के मायने और अस्तित्व बदल गए हैं। सवर्ण जातियों की स्थिति संभ्रांत जरूर है, इनके पास संपत्ति और संसाधन जरूर हैं, ये सवर्ण मानसिकता के श्रेष्ठ स्थिति में जरूर हैं, ये अपने को वर्चस्ववादी होने का गुमान जरूर पाल रखे हैं लेकिन ये पूँजीपतियों के दास हैं। पूँजीवाद जब चाहे सवर्णों की स्थिति को छिन्न/भिन्न कर दे, इन्हें सामान्य स्थिति में पहुँचा दे लेकिन पूँजीपतियों को एक दबंग दास चाहिए, ऐसा दास जिसके सभी दास हो। इससे पूँजीपतियों को अलग से कोई संरक्षण नहीं करना पड़ता है बल्कि सवर्ण अपने वर्चस्ववादी होने के अहमान्यताओं के चलते और धन संपन्नता की स्थिति में अपनी गुलामी भूलकर अमानुष होने के हद तक पूँजीपतियों का हित रक्षक बना रहता है। भारत में जातियों का अस्तित्व मात्र इस कारण बना हुआ है कि पूँजीपतियों के मुनाफे के विरुद्ध श्रमिक वर्ग एक न होने पाए। श्रमिक वर्ग जब जातियों में बँटा रहेगा तो पूँजीपति निश्चिंत रहेगा इसलिए आनंद सर कहते हैं कि जातियों की स्थिति अलगाववादी है।
जातियों के अब मायने बदल गए हैं।
ये  सिर्फ  साधन  हैं अलगाववाद के।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 22)
प्रकृति का विकासवाद अंधा होता है। प्रकृति को यह नहीं ज्ञात होता है कि जिस जीव को उसने जन्म दिया है, वह विकसित होकर जीवहत्या करेगा अथवा जीवप्रेम। प्रकृति के आँगन में शाकाहारी भी विकसित हुए और मांसाहारी भी। इस सार्वभौम का सबसे उत्कृष्ट जीव मनुष्य आज भी विकासशील है लेकिन यह हत्यारा भी है प्रेमी भी, यह चोर भी है शाह भी, यह सद्चरित्र भी है दुष्चरित्र भी। मनुष्य की प्रवृत्ति अस्थाई है। मनुष्य जानवरों की प्रवृत्ति का बिल्कुल नहीं है। जानवरों में यह स्पष्ट है कि वह मरकहा हो सकता है लेकिन मुझे मारकर खाएगा नहीं। कुछ जीवों से बिल्कुल निश्चिंत रहा जा सकता है कि वह खतरनाक हो सकता है, मार सकता है, घायल कर सकता है लेकिन उसका उद्देश्य हत्या कदापि नहीं है। कुछ जानवरों की प्रवृत्ति ही है कि वे हत्या ही कर देंगे व जान से ही मार देंगे। ऐसी स्थिति में पूर्व ही विदित होता है कि अमुक की प्रकृति और प्रवृत्ति क्या है लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति बिल्कुल नहीं पता चल पाती है। वही मनुष्य श्रमिक होने पर निरीह और शोषित रहता है तथा अच्छा व्यवहार करता है किन्तु अवसर मिल जाने पर यदि वह किसी उद्योग का मालिक बन जाय तो निश्चित श्रमिकों का शोषण करने लगेगा बल्कि उसकी प्रवृत्ति हत्यारी हो जाती है। एक सामान्य सज्जन व्यक्ति के राजनीति में आने पर दुर्जन बन जाने की पूरी संभावना होती है। मनुष्य धन संचय, पोस्ट संवर्धन और संसाधनों की प्राप्ति के लालच में हद से ज्यादा गिर जाता है। अच्छा से अच्छा मनुष्य बुरा से बुरा कुमानव बन जाता है। वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए लगता है कि आम मनुष्य भेंड़/बकरी से अधिक कुछ नहीं रह गया है। मनुष्य संचय की प्रवृत्ति के चलते खुंखार हो गया है। लालची मानव हत्याएँ प्रायोजित करने लगा है। अब डर लगता है कि मनुष्य किसी भी समय किसी निरीह की हत्या कर सकता है। ऐसी परिस्थिति के अंदेशे में आनंद सर ने ऐसी कविता का सृजन किया होगा जिसमें उन्होंने हत्यारों से सुरक्षित रहने के लिए सावधान रहने और हथियार रखने का सलाह दिया है।
सप्लीमेंट में कुछ औजार जरूरी है।
न  जाने  कब  वो  हत्यारा हो जाय।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 23)
मार्क्सवादी चिंतक आर डी आनंद सर मूलतः क्रान्तिकारी स्प्रिट के व्यक्ति हैं। जैसा कि उनके लेखों और भाषणों से आप परिचित होंगे कि वे कथनी और करनी में समरूपता चाहते हैं। जो लोग आनंद सर से मिले हैं वे जानते हैं कि आनंद सर बहुत ही जमीनी व्यक्ति हैं। वे जैसा सोचते हैं वैसा लिखते हैं और जैसा लिखते हैं वैसा करते भी हैं। उनकी समझ है कि देश के नेता चाहे जिस भी पार्टी के हों, सब का मूल चरित्र एक है। अक्सर, आनंद सर बोलते/लिखते हैं कि भारत की सभी पार्टियाँ दक्षिणपंथी हैं। सभी बुर्जुआ मानसिकतावादी हैं सभी औपनिवेशिक ख़यालों की हैं। सभी पूँजीवाद में विश्वास रखती हैं। सभी किसी न किसी धर्म और जाति में विश्वास रखते हैं। सभी पार्टियों के नेता एक दूसरे की बुराई/टाँग खिंचाई करते रहते हैं लेकिन व्यक्तिगत रूप से वे एक दूसरे के बहुत प्रिय होते हैं। संसदीय लोकतंत्र में सभी पार्टियों के राजनीतिक नेताओं की पृष्ठिभूमि एक होती है, चरित्र एक होता है, समझ एक होती है। सभी नेता जाति आधारित राजनीति में विश्वास करते हैं। सभी नेता जातियों के वोट का ध्रुवीकरण करते हैं। सभी नेता अपने कार्यकर्ताओं से दूसरे कार्यकर्ताओं पर तोहमत लगाते हैं, लड़ाते हैं और गाली दिलवाते हैं। सभी नेता विपरीत जातियों की बुराई करते हैं। यह सब जातीय जनता के ध्रुवीकरण और वोट को केंद्रित करने के लिए किया जाता है। सभी पार्टी ने नेता इस बात पर सहमत होते हैं कि जनता में शिक्षा का प्रतिशत अधिक नहीं होना चाहिए, यहाँ तक कि दलित नेता भी मनुवादी है। वह भी चाहता है कि सभी दलित शिक्षित न हों, सभी कार्यकर्ता क्रान्तिकारी न हों। यदि दलित जनता शिक्षित और क्रान्तिकारी हो गई तो दलित वर्चस्ववाद को नेस्तानाबूत कर सकती है, दलित नेताओं के चालाकी को एक्सपोज कर सकती है और 27 करोड़ निरक्षा और भूमिहीन दलितों के शिक्षा और रोजगर के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर सकती है इसलिए सभी जातियों और सभी पार्टियों के नेता मिलकर देश की जनता को निरीह बनाए रखने का प्रयास करते हैं। आनंद सर कहते हैं कि ये देश के नेता नेता नहीं लुटेरे हैं, ये लोकतंत्र की बारीक से बारीक कमियों को जानते हैं। इन नेताओं से किसी भी तरह की उम्मीद बेमानी है, अपने आप को धोखे में रखना है। एक आंदोलन का निर्माण ही समस्याओं से निजात दिलवा सकता है। इन नेताओं पर रहम करने की जरूरत नहीं है और न इनके रहमोकरम पर रहने की जरूरत है। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में ही हमारी जीत है। वर्ग-संघर्ष के दौरान इन नेताओं की एक ही दवा है कि इन्हें जेल में डाल दिया जाय।
सवाल  मत  कर  मुल्क के रहबरों से।
ये रहजन हैं हर सवाल से वाकिफ़ हैं।।
इनकी  सिला  है  जिन्दां  की सलाखें।
ये व्यवस्था के लूपहोल से वाकिफ़ हैं।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 24)
हमारा समाज वर्ग-विभाजित समाज है। हम वर्गों में बँटे हैं। वर्ग धर्मों और जातियों में बँटा है। वर्ग-विभाजित समाज में दो वर्ग हैं-एक शोषक और दूसरा शोषित। दूसरे रुप में-एक पूँजीपति और दूसरा मजदूर। पूँजीपतियों की कोई जाति नहीं होती है। यदि जाति होती है तो वह उनके उद्देय में कोई बाधा नहीं डालती है। वहाँ एक पूँजीपति दूसरे पूँजीपति से शादी-ब्याह बिना किसी पूर्वाग्रह के करते रहते हैं लेकिन श्रमिक/शोषित वर्ग में जातियाँ उनके उद्देश्य की प्राप्ति में बहुत बड़ी बाधक हैं। भारत में जातिप्रथा और श्रमिकों का शोषण खत्म करने के लिए हर जातियों के दलितों/शोषितों/सर्वहाराओं को सभी जातीय अस्मिताओं/ऊँचनीच/भेदभाव/छुआछूत/धार्मिक अन्धविश्वास त्यागकर एक उद्देश्य, एक संगठन, एक विचार और एक प्रयास से वर्चस्ववादियों और पूँजीपतियों के विरुद्ध अंतिम लड़ाई लड़नी पड़ेगी। इसे ही व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई कहते हैं। आनंद सर का विचार है कि इस लड़ाई के लिए नेतृत्व बहुत ही प्रतिभाशाली होना चाहिए। यहाँ सत्य की अवधारणा बहुत ही सापेक्ष है। उसको समझना और जनता को समझाना बहुत बड़ी कला है। कहा गया है कि मनुष्य को संगठित करने की कला दुनिया की सबसे बड़ी और कठिन कला है लेकिन बिना इस कला में माहिर हुए किसी भी देश में व्यवस्था परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
सत्य की अवधारणा बहुत सापेक्ष है।
ब्रांड  अम्बेसडर  धांसू होना चाहिए।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 28)
आनंद सर कहते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन क्रान्ति के बिना संभव नहीं है। क्रान्ति बिना क्रान्तिकारी सिद्धांत के संभव नहीं है। क्रान्तिकारी सिद्धांत के लिए क्रान्तिकारी पार्टी चाहिए। क्रान्तिकारी पार्टी में क्रान्तिकारी लोग होने चाहिए। क्रान्तिकारी लोगों को बलिदानी होना चाहिए। आनंद सर कहते हैं कि ब्रह्मामवादी लोग हमेशा से वर्चस्ववादी थे। वे अपने वर्चस्व के लिए झूठ का प्रतिपादन करते हैं। झूठ को स्थापित करने के लिए उनके बलिदानी संकल्प के कार्यकर्ता होते हैं। ब्राह्मणवाद ने अपनी व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने के लिए बहुत कुछ दाँव पर लगाया है और बहुत कुछ दाँव पर लगाए रखते हैं। वह जातिवादी है। उसके जातिवाद से उसके पूरे समुदाय को फायदा होता है लेकिन वह रोने को उत्सर्ग करने के लिए यह नहीं सोचता है कि बलिदान मेरा होगा और सुखी सभी रहेंगे। वे हमेशा अपने वर्ण की सुरक्षा और दीर्घजीवी होने के लिए सब कुछ त्यागने, यहाँ तक कि जीवन को भी त्यागने के लिए तैयार रहते हैं। आनंद सर नस्लवादियों के दृढ़ संकल्प और बलिदान का उदाहरण क्रान्तिकारियाँ को सुनाते हैं। वे कहते हैं कि आखिर हम कैसे क्रान्तिकारी हैं कि न हम उद्देश्य के लिए, न सिद्धांत के लिए, न क्रान्ति के लिए दृढ़ संकल्प करते हैं और न बलिदान के लिए तैयार रहते हैं जबकि बिना बलिदान के लिए नस्ल वादियों को परास्त नहीं किया जा सकता है इसीलिए वे आम्बेडकरवादियों/मार्क्सवादियों/क्रांतिकारियों को डरपोक और कायर कहते हैं। आनंद सर का मानना है कि क्रांतिकारियों को हर हाल में जातिवादियों/ब्राह्मणवादियों/नस्लवादियों/वर्चस्ववादियों से तेज/बलिदानी/दृढ़संकल्पी और दुश्मनों के लिए अत्यंत खतरनाक होना चाहिए।
वह  नस्लवादी  है  मरने के  लिए तैयार रहता है।
तुम तो क्रान्तिकारी हो, डरपोक-कायर कहीं के।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 28)
दुर्भाग्य यह है कि ब्राह्मणवादियों के विरुद्ध दलित और वामपंथी भी अस्मितावादी हो गया है। ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दलित भी ब्राह्मणवादी हो गया है। ब्राह्मण ब्राह्मणों के लिए अस्मितावादी/जातिवादी/ब्राह्मणवादी/वर्चस्ववादी बना रहता है, तो दलित दलितों के लिए अस्मितावादी/जातिवादी/दलितवादी/वर्चस्ववादी बना रहता है, जबकि जरूरत है कि ब्राह्मणवाद को खत्म करने के लिए दलित जातियों को जातीय अस्मिताओं से बाहर आ जाना चाहिए लेकिन दलित है कि दिमाग में पट्टी बाँध लिया है। ऐसा लगता है जैसे दलित किसी ऐसे खोह में घुस गया है जहाँ अँधेरा ही अँधेरा है। दलितों को दिशाबोध नहीं है और न काले/गोरे में कोई अंतर समझ पा रहा है।
तुम्हें अस्मिताओं ने घेर लिया है।
तुम बन्द नाव और काली नदी में हो।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 35)
प्रबुद्ध चिंतक आर डी आनंद सर पर दलितों का आरोप है कि वे  मार्क्सवादी हैं और आर डी आनंद सर भी कहते हैं कि वे विशुद्ध मार्क्सवादी हैं लेकिन यह भी एक सच है कि वे बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर को एक अच्छा विचारक मानते हैं और कहते हैं कोई भी दलित जितना आम्बेडकरवादी है, मैं उससे कम आम्बेडकरवादी नहीं हूँ। दलित न जाने किस तरह का आम्बेडकरवादी बनता है लेकिन आनंद सर बहुत स्पष्ट रुप से अपने आम्बेडकरवाद की व्याख्या करते हुए कहते हैं, “जातिप्रथा, गैर-बराबरी, ऊँचनीच, छुआछूत, भेदभाव, भाग्य-भगवान, भूतप्रेत, तंत्रमंत्र आदि का उन्मूलन, समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, लोकतंत्र और राजकीय समाजवाद की स्थापना का नाम आम्बेडकरवाद है।” आनंद सर कहते हैं कि यह सब प्राप्त करने के लिए एक क्रान्तिकारी संगठन चाहिए। संसदीय लोकतंत्र डॉ. आम्बेडकर को बहुत ही प्रिय था लेकिन वे स्वयं लिखते हैं कि संसदीय लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक समानता प्रदान करता है, शेष सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के लिए समाजवाद से ही प्राप्त हो सकता है। उनका मत है कि समाजवाद को क्रान्ति और तानाशाही से नहीं प्राप्त किया जाना चाहिए बल्कि राज्य के द्वारा संविधान में विहित किया जाना चाहिए इसलिए डॉ. आम्बेडकर ने इसे “समाजवाद” न कहकर “राजकीय समाजवाद” कहा है। आज़ादी के 72 साल बाद भी दलितों ने इस संविधान में राजकीय समाजवाद विहित किए जाने का कोई प्रयास नहीं किया। हो सकता है कि दलितों को यह इंतजार हो कि जिस दिन वे सम्पूर्ण बहुमत प्राप्त कर संसद और विधान सभाओं पर कब्ज़ा कर लेंगे, उस दिन संविधान में संशोधन कर राजकीय समाजवाद लागू कर लेंगे। यदि दलित ऐसा सोचता है तो उसका सोचना कोई बेईमानी नहीं है लेकिन यह दिवास्वप्न है, न ऐसा कभी हुआ है और न कभी होगा। यह भी हो सकता है कि डॉ. आम्बेडकर ने समाजवाद स्थापित किए जाने के लिए मार्क्स की क्रान्ति के माध्यम को इसलिए इनकार किया था कि मार्क्सवादी क्रान्ति में खून एक अनिवार्य परिघटना है तथा सर्वहारा की तानाशाही के चलते व्यक्ति की स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी। दलितों ने ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद पर विजय प्राप्त करने के लिए अभी तक कोई क्रान्तिकारी सिद्धांत और क्रान्तिकारी पार्टी नहीं बनाई है और न ही कोई संविधान को प्रस्तावित किया है। दलित बाबा साहब के संविधान के मूल ड्राफ़्ट “राज्य और अल्पसंख्यक” पर भी कोई कार्य योजना नहीं तैयार किया है। जब दलितों ने न क्रान्तिकारी उद्देश्य तैयार किया है, न क्रान्तिकारी पार्टी बनाई है, न क्रान्तिकारी रणनीति/रणकौशल सुनिश्चित किया है, न वैचारिक एकता पर एकमत हैं, न लोकतांत्रिक केंद्रीयता तय हुआ है और न जनवादी केन्द्रीयता पर कोई बात हुई है, तो भला वह किस तरह परिवर्तन की बात करता है। आखिर व्यवस्था परिवर्तन के बाद व्यवस्था की शक्ल तो तय होनी चाहिए लेकिन दलितों ने यह विजन तैयार ही नहीं किया। आनंद सर के फेसबुक को मैं देखती रहती हूँ, पर पर आनंद सर के ऐसे सवालों पर आम्बेडकरवादी साथी ऐसे भड़क उठता है जैसे आनंद सर ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो अथवा बाबा साहब का विरोध कर दिया हो। दलित साथियों को आनंद सर जब भी क्रान्ति की बात के लिए कंविंश करना चाहते हैं तो दलित उनसे नाराज हो जाता है। दलित/आम्बेडकरवादी आनंद सर के हर सलाह को मार्क्सवाद मान बैठता है जबकि आनंद सर बाबा साहब के विचारों को व्यवहारिक जामा पहनाने की बात करते हैं। आनंद सर जब भी दलितों को मार्क्सवाद का अध्ययन करने को कहते हैं अथवा कम्युनिस्ट बन जाने को कहते हैं, तो दलित/आम्बेडकरवादी उनकी बातों को जड़बुद्धि की तरह सोचता है कि जैसे आनंद सर यह कह रहे हों कि दलितों को ब्राह्मणों के अधीन हो जाना चाहिए, उसका गुलाम हो जाना चाहिए अथवा बाबा साहब के उद्देश्यों पर कुठाराघात कर रहे हैं। दरअसल, आनंद सर हमेशा यह कहते हैं कि ब्राह्मणवादी मार्क्सवादियों को मार्क्सवादी मानने की जरूरत नहीं है, न ही तथाकथित मार्क्सवादियों को मार्क्सवाद समझने की भूल करना चाहिए और न ही उनसे मार्क्सवाद सीखने की जरूरत है। आनंद सर कहते हैं कि दलितों को मार्क्सवाद का अध्ययन जरूर करना चाहिए और बिल्कुल स्वतंत्र रूप से करना चाहिए। मार्क्सवाद एक क्रान्तिकारी दर्शन है। मार्क्सवाद वह विज्ञान है जो मनुष्य के विचार, व्यवहार तथा व्यवस्था के मूलभूत कारकों का अध्ययन करता है। मार्क्सवाद द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद का जनक है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पदार्थ की प्रक्रियाओं के अध्ययन का विज्ञान है तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद पदार्थ की प्रक्रियाओं के आधार पर समाज की प्रक्रियाओं के अध्ययन का विज्ञान है। मार्क्सवाद व्यवस्था परिवर्तन का गाइड है। मार्क्सवाद समाजवाद और साम्यवाद के संविधान को सुनिश्चित करने का विज्ञान भी है। मार्क्सवाद सर्वहारा संस्कृति को सुनिश्चित और विकसित करने का विज्ञान है। मार्क्सवाद वह विज्ञान है जो जातिप्रथा को खत्म करने का वैज्ञानिक रास्ता सुझाता है। मार्क्सवाद किसी भी तरह के नस्लवाद का आधार खत्म करने का दिशा निर्देश तय करता है। आनंद सर जोर देकर कहते हैं मार्क्सवाद ही वह विज्ञान है जो बाबा साहब के सैद्धांतिक और व्यवहारिक सपनों को पूरा कर सकता है।
तुम मार्क्सवाद पढ़ लो।
आम्बेडकर का सपना पूरा हो जाएगा।।
तुम कम्युनिस्ट हो जाओ।
ब्राह्मणवाद की चूलें हिल जाएँगी।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 29)
हम सामाजिक प्राणी हैं। हम बहुत कुछ समाज से सीखते हैं। समकालीन साहित्य के यथार्थवादी समय में भी वीर रस, सृंगार रस, और सूफी मत की कविताएँ लिखते मिल जाते हैं। आज भी लोग गीत लिखते हैं। तुक, ताल, लय, छंद, मात्रा, तग़ज़्ज़ुल का बहुत ध्यान रखा जाता है। आज भी दोहा, सोरठा, चौपाइयाँ और गज़लें लिखी जा रही हैं। गज़लों में फाईलुन, फाउलुन, वज़्न, बहर, दीर्घ और ह्रास को ध्यान में रखा जाता है। सच है कि साहित्य की विधाएँ अपने नियमों का अनुपालन चाहती हैं लेकिन सभी से यह आग्रह पाल रखना न सिर्फ ठीक नहीं है बल्कि जड़ता भी है। जब वर्तमान समय शातिर राजनीति से भरा हुआ हो तो हमें ग़ज़ल के वज़्न और तग़ज़्ज़ुल में बँधकर क्रान्ति के कथ्य, सत्य और जोश को नहीं छिड़ देना चाहिए। आज समय बहुत ही टेक्निकल और हाईटेक है। हाईटेक समय की शब्दावलियाँ टेढ़ी हैं। आज रीतिकालीन काव्य की जरूरत नहीं है। आज क्रान्ति की जरूरत है। आज हमें भूख और रोटी की बात सता रही है। जब कोई माशूक़ की याद की गज़लें सुनाता है, तो जहन क्रोध से भर उठता है। आनंद सर इन लाइनों में उनके विचार , समय और क्रोध को देखा जा सकता है।
मुझे ग़ज़ल मत सुनाया करो।
नहीं तो मैं संगीन पेट में खुसेड दूँगा।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 34)
इसी तरह आनंद सर उन लोगों पर भी क्रोध करते हुए दिखाई देते हैं जो हमारी भूख हमारी रोटी से खेलते हैं। यहाँ रोटी से खेलना एक मुहबरा भी है। रोटी से कौन खेलता है जिसका पेट भरा होता है और रोटी उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती है। यह वह वर्ग है जो सम्पन्न है, धन्नासेठ है, पूँजीपति वर्ग है, शोषक है, बुर्ज़ुआ मंत्रिमंडल का सदस्य है। उन्हें देश की सवा अरब आबादी के भूख और आवश्यकता का ख्याल नहीं है। इन्हें लोगों के शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य का ख्याल नहीं है। इन्हें क्लबघर चाहिए। इन्हें पीज़ा और बर्गर चाहिए। इन्हें स्वमिंग पूल और अर्धनग्न खिलाड़ी स्त्रियाँ चाहिए। ऐसे समाज और व्यक्तियों पर आनंद सर का खरीद देखने योग्य है। दरअसल, यह क्रोध कम शोषितों के प्रति प्यार अधिक है। अवाम के प्रति वफादारी और प्रेम ही आनंद सर में क्रोध का वर्गीकरण करता है। कविता में प्रकट हुआ यह क्रोध ही क्रान्ति की चिंगारी है। यह क्रोध जनता में पनपना चाहिए।
तुम रोटी खेलते हो, मैं रोटी खाता हूँ।
मेरा मन करता है तुम्हें चक्की में पीस दूँ।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 34)
बुद्ध को सभी जानते हैं। बुद्ध न सिर्फ तत्वों की विवेचना करते हैं बल्कि जनता के हालात को भी जानते हैं। बुद्ध अपने समय के राजाओं/सामन्तों/जनता के हालात और उनके कारणों को भी समझते थे। आनंद सर बुद्ध का निरूपण कर वर्तमान में बुद्ध जितना प्रबुद्ध व्यक्ति की कामना करते हैं। वर्तमान में कोई बुद्ध आज की हालात पर तफसिरा करे और परिणाम निकाले तो वह अपने व्याहारिक खोज में “चौदह वर्ष का बुद्ध भ्रमण” और ज्ञान की खोज को अपने में जोड़ लेगा। वह बुद्ध के उपदेश को संगठन के निर्माण की आवश्यकता में लगाएगा। आनंद सर ने कविता में “मोबाइल” और “रिवाल्वर” को समय की जरूरत के हिसाब से आवश्यक माना है। यदि आज कोई बुद्ध पैदा हो तो वह अष्टांगिक मार्ग में सिर्फ आठ वस्तुओं से काम नहीं चलाएगा। वह चीवर पहनकर समाज में सिर्फ उपदेश देने की बात नहीं करेंगे बल्कि वह अधिकतम को क्रान्तिकारी बनाएँगे और व्यवस्था में सुधार की बात नहीं करेंगे बल्कि बिगड़ी हुई व्यवस्था को परिवर्तित कर एक नई सुंदर व्यवस्था के निर्माण में कई बात करेंगे। मोबाइल और रिवाल्वर समय का अपडेशन है। भिक्षु और भन्ते के स्थान कोई क्रान्तिकारी ग्रहण करेगा और क्रांतिकारियों के लिए मोबाइल और रिवाल्वर जरूरी सामग्री होगी। समाज नए बुद्ध के पैदा होने से ही बदलेगा।
बुद्ध वर्तमान का हाल जानना चाहते हैं।
बुद्ध को मोबाइल और रिवाल्वर चाहिए।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 40)
एक क्रान्तिकारी मार्क्सवादी के बतौर आर डी आनंद सर अपनी कविता में दलित बुद्धिजीवियों/चिंतकों/नेताओं के बारे में संकेत करते है कि यह समय व्यवस्था परिवर्तन का समय है लेकिन दलित व्यवस्था परिवर्तन में न लगाकर सत्ता प्राप्ति और सत्ता संचालन में लग गया है। दलितों को लगता है जैसे सत्ता प्राप्ति से ही व्यवस्था बदलेगी। दरअसल, आनंद सर का मानना है कि दलितों का मत है कि सत्ता परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है। दलित व्यवस्था परिवर्तन का मतलब संविधान में कुछ मौलिक सुधार भर समझता है। दलितों को संविधान में जबर्दश्त आस्था है। वह संविधान को बिल्कुल बदलना नहीं चाहता है बल्कि यदि दलितों को फुलफ्लेज्ड बहुमत मिल जाय तो वह सिर्फ अनुपातिक प्रतिनिधित्व/डायवर्सिटी ही लागू करेगा, वह उत्पादन के उद्देश्य और संसाधनों पर बिल्कुल हमला नहीं करेगा। हालाँकि, यह परिकल्पना सचमुच एक कल्पना है, यह यथार्थ परिघटना कभी नहीं हो सकता है। आनंद सर कहते हैं कि इस समय अधिकांश दलित पढ़ा/लिखा है, बहुलांश नौकरी में भी है। शिक्षा और संसाधनों से परिपूर्ण इतने दलित हैं जो व्यवस्था परिवर्तन का नेतृत्व कर सकते हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जब दलितों को क्रान्ति के लिए कमर कस लेना चाहिए, तब दलित सत्ता में भागीदारी कर के दलितों के मुख्य उद्देश्य को छोड़ दे रहा है। इस कविता में आनंद सर की यही चिंता प्रकट होती है।
जब व्यवस्था परिवर्तन का समय आया।
तो हम सत्ता संभालने चल पड़े।।
अरे! यही तो वक्त है सिर पर प्रहार करने का।
हम गलत ही पैर पर निशाना लगा बैठे।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 49)
वरिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक आर डी आनंद सर का मानना है कि दलितों/आम्बेडकरवादियों को प्रगतिशीलता, मार्क्सवाद, कम्युनिज्म, प्रगतिशील सवर्ण लेखक और प्रगतिशील और मार्क्सवादी सवर्ण से बहुत चिढ़ है। दलितों की अवचेतना में आत्मभूत हो गया है कि कोई भी सवर्ण प्रगतिशील हो ही नहीं सकता है। वे सिर्फ आम्बेडकरवादियों को ही प्रगतिशील मानते हैं। उनकी प्रगतिशीलता की परिभाषा में ब्राह्मणवाद विरोध के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। दलित विज्ञान को मानता है लेकिन उसकी सोच वैज्ञानिक नहीं है। दलितों की प्रगतिशीलता सवर्णों को कोसने में है, गरियाने में है, प्रतिक्रिया करने में है, आर्य कहने में है, श्रेष्ठ कहने में है, उनकी बुराई करने में है तथा नकार, विरोध, प्रतिरोध, प्रतिशोध में है जबकि दलितों की प्रगतिशीलता उनके सांगठनिक और वैज्ञानिक रूप से ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी प्रयास में है।
उसको गरियाने में तुम्हें वैसे सुख मिलता है।
जैसे संसर्ग के बाद उन्मुक्त पुरुष को।।
इसलिए मैं बार-बार टोकता हूँ।
अपना वीर्य संभाल के रखो।।
प्रत्यारोपित करो उसमें अपना शुक्राणु।
वह कँगूरे की नींव कमजोर कर देगा।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 57)
संत कबीर साहब ने क्रांतिकारियों से कहा था कि, कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ,जो  घर  फूँके  आपुनो  चले  हमरो  साथ। उसी तरह आनंद जी भी क्रांतिकारियों के आह्वान करते हुए इस दुनिया को फूंक देने की सिफारिश करते हैं। वे कहते हैं जब यह गंदी दुनिया जल जाएगी, तब एक नए संसार और अच्छे लोगों का सृजन होगा। उनका मानना है कि जब तक बुरी व्यवस्था रहेगी तब तक बुरे लोग रहेंगे, तब तक किसी भी तरह का सुधार संभव नज़र नहीं आता है। वह एक तरह से बुर्जुआ व्यवस्था को फूँकने की बात कर रहे हैं, एक तरह से क्रान्ति की अनिवार्यता की बात कर रहे हैं। आनंद जी पूँजीवादी/ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवादी व्यवस्था के निर्माण की बात कह रहे हैं। उनके विचार उनकी कविता में देखा जा सकता है।
आओ हम सब मिलकर इस दुनिया को फूंक दें।
जो दुनिया बनेगी कमीनेपन से अनभिज्ञ होगी।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 66)
भारत मूलतः जातियों और धर्मों का देश है। साम्प्रदायिक दंगों का कारण जाति, धर्म, देवी, देवता, मंदिर, मस्जिद इत्यादि है। छूआछूत व ऊँचनीच की भावना साम्प्रदायिकता को फैलाती है। भारत के विविध राजनीतिक दल चुनाव के समय वोटो की राजनीति से साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन देते है। प्रशासनिक अक्षामता और सरकार तथा प्रशासन की उदासीनता के कारण भी कभी-कभी साम्पद्रायिक दंगे हो जाते है। साम्प्रदायिक दंगों का एक अलग इतिहास है। व्यापक अर्थ में सांप्रदायिकता का अर्थ एक व्यक्ति का अपने समुदाय के प्रति मज़बूत लगाव से होता है। सांप्रदायिकता एक विचारधारा है जिसके अनुसार कोई समाज भिन्न-भिन्न हितों से युक्त विभिन्न धार्मिक समुदायों में विभाजित होता है। राजनीतिक दर्शन के रूप में सांप्रदायिकता की जड़ें भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता में मौजूद हैं। भारत में सांप्रदायिकता का प्रयोग सदैव ही धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर समुदायों के बीच सांप्रदायिक घृणा और हिंसा के आधार पर विभाजन, मतभेद और तनाव पैदा करने के लिये एक राजनीतिक प्रचार उपकरण के रूप में किया गया है। सांप्रदायिक हिंसा एक ऐसी घटना है जिसमें दो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोग नफरत और दुश्मनी की भावना से लामबंद होते हैं और एक-दूसरे पर हमला करते हैं। वर्ष 1949 में भारत के विभाजन ने बड़े पैमाने पर रक्तपात और हिंसा देखी। इसके पश्चात् वर्ष 1961 तक देश में कोई बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई, किंतु वर्ष 1961 में ही जबलपुर दंगे हुए जो कि देश के लिये एक बड़ा सांप्रदायिक झटका था। 1960 के दशक में विशेष रूप से भारत के पूर्वी भाग – राउरकेला (वर्ष 1964), जमशेदपुर (वर्ष 1965) और रांची (वर्ष 1967) में सांप्रदायिक दंगों की एक श्रृंखला शुरू हुई, जिनमें तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बसाया जा रहा था। सितंबर 1969 में अहमदाबाद में हुए दंगों ने राष्ट्र की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया। इन दंगों का स्पष्ट कारण यह था कि जनसंघ, ​​इंदिरा गांधी के वामपंथी ज़ोर का विरोध करने के लिये मुसलमानों के भारतीयकरण पर एक प्रस्ताव पारित कर रहा था। अप्रैल 1974 में मुंबई के वर्ली इलाके में जब मुंबई पुलिस ने दलित पैंथर्स की एक रैली को रोकने की कोशिश की तो वहाँ हिंसा शुरू हो गई, जिसने समय के साथ भीषण रूप धारण कर लिया। अक्तूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् सिख विरोधी दंगे भड़क उठे, जिसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश और भारत के अन्य हिस्सों में तकरीबन 4000 से अधिक सिख मारे गए। 1985 में शाह बानो विवाद और बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद 80 के दशक में सांप्रदायिकता को तीव्र करने के लिये शक्तिशाली उपकरण बन गए। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को दक्षिणपंथी दलों द्वारा ध्वस्त किये जाने के पश्चात् देश में सांप्रदायिक दंगे अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए। वर्ष 2002 में गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में लगी आग में कई कार सेवकों की मौत हो गई, जिसके कारण देश में गुजरात दंगों की शुरुआत हुई और लगभग 1000 से अधिक लोग मारे गए। सितंबर 2013 में उत्तर प्रदेश में हाल के इतिहास की सबसे भयानक हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं, जब मुज़फ्फरनगर ज़िले में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच मतभेद ने सांप्रदायिकता का रूप ले लिया। वर्ष 2015 से देश में माॅब लिंचिंग की घटनाएँ काफी तेज़ी से बढ़ी हैं और आँकड़ों के अनुसार इसके कारण अब तक 90 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। दिल्ली में हुए हालिया सांप्रदायिक दंगों ने एक बार पुनः देश में विभिन्न धर्मों के बीच गहराती जा रही खाई को उजागर किया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्रबिंदु में हुए दंगों में 50 से अधिक लोग मारे गए हैं। उपर्युक्त सभी आँकड़े गूगल से लिए गए हैं।
जब भी दंगा होता है मैं समझ जाता हूँ।
राजनीति में कोई नया दलाल घुस गया है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 86)
वरिष्ठ मार्क्सवादी चिन्तक आर डी आनंद सर का यह बहुत बारीक विश्लेषण है कि भारत में एक तरफ, एक धर्म और जाति के लोग दूसरे जाति और धर्म के लोगों से नफरत करते हुए लड़ते हैं; तो दूसरी तरफ, दलित जातियाँ अपनी उपजातियों के मध्य तनाव की स्थिति में रहती हैं। राजनीति हमें जातियों और धर्मों में बाँटकर रखता है। विडंबना देखिए कि दलित जातियाँ जहाँ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आम्बेडकरवादी सिद्धांतों के आधार पर लड़ना चाहती हैं, वहीं वे चमार, पासी, कोरी, धोबी, धानुक, वाल्मीकि इत्यादि की पहचान के लिए अपने-अपने महापुरुष खोज रहे हैं। यहाँ तक कि डॉ. आम्बेडकर के नाम पर दलितों में जो एकीकरण की सहमति बनी थी, वह भी अब साम्प्रदायिकता और ब्राह्मणवादी राजनीति की शिकार हुई है। बाँटो और राज करो में निपुड़ होते भारतीय राजनयिकों ने सभी जातियों के मेधाओं को गिरफ्त में लिया है। आज क्रान्ति के नाम पर वर्गीय एकता में बँधने की बात कौन कहे, बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर के नाम पर भी दलित जातियों में वैचारिक एकता व चिंतन की एकरूपता नहीं बन पा रही है। कोई बौद्ध धर्म अपनाने को आम्बेडकरवाद कहता है, कोई बसपा के राजनीतिक प्रयासों को आम्बेडकरवाद कहता है, कोई बहुजन मुक्ति पार्टी-मेश्राम को सही आम्बेडकरवाद कहता है। अजीब सा द्वंद्व दलितों में है। चलो, वैचारिक भिन्नता तक तो ठीक है लेकिन एक आम्बेडकरवादी का यदि दूसरे आम्बेडकरवादी से विचार न मिला, तो वे दोनों आपस में एक दूसरे को आम्बेडकरवाद विरोधी कहते हैं। ऐसे आम्बेडकरवादी आपस में एक दूसरे को दुश्मन मानकर आपस में लड़ते हैं। इन दलितों को इतनी समझ नहीं है कि हर ब्राह्मणवाद विरोधी दलित आम्बेडकरवादी है, भले ही उसके विचार डॉ. आम्बेडकर साहब पर एक न हों अथवा एकमत न हो। सभी ब्राह्मणवाद विरोधी दलित आपस में मित्र हैं। इस बात को दलितों को गाँठ बाँध कर रखना चाहिए। यहाँ तक कि कोई गैर-दलित भी यदि वह मार्क्सवादी है और ब्राह्मणवाद का विरोध करता है, तो वह भी दलितों की मित्र शक्तियों में है और कोई दलित जो मार्क्सवादी है, वह तो निश्चित रूप से ब्राह्मणवाद विरोधी होगा ही, वह कभी भी ब्राह्मणवाद का समर्थक नहीं हो सकता है लेकिन आम्बेडकरवादी दलित मार्क्सवादी दलित से तो इस कदर चिढ़ता है जैसे वह डॉ. आम्बेडकर और दलितों का सबसे बड़ा दुश्मन है, जबकि मार्क्सवादी दलित डॉ. आम्बेडकर को तो मानता ही है, साथ ही साथ वह वर्गीय एकता के लिए प्रयास करता है। दलित मार्क्सवादियों की यह सोच कि सवर्णों में भी प्रगतिशील और मार्क्सवादी होते हैं जो पूरी ईमानदारी से जातिप्रथा और पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं अथवा दलितों के साथ मिलकर संघर्ष करेंगे जैसे विचार से दलित बुद्धिजीवी इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता है और ऐसे चिंतन वाले दलित मार्क्सवादियों से नफरत करता हुआ अमित्र मान लेता है। आनंद सर कहना चाहते हैं कि यदि दलित इसी तरह अपने मित्र शक्तियों से लड़ता हुआ उसे अमित्र कर देगा तो न तो वह ब्राह्मणवाद को खत्म कर पाएगा और न पूँजीवाद को ही खत्म कर पाएगा। आखिर, फिर दलित किस तरह डॉ. आम्बेडकर के सपनों को पूरा करेगा? आनंद सर अपनी इस कविता में दलितों की समझ और अंतर्विरोध को स्पष्ट करते हुए राजनीति के दुष्चक्र में न फँसने की सलाह देते हैं।
यहाँ सारे खेल खतरनाक हैं।
कभी हिन्दू के नाम पर कभी मुसलमान के विरोध में।।
दलित एक बीमारी है।
लोगों को रंगे महफ़िल डराकर रखा गया है।।
सफीना इस कदर थोड़ो डूबता है।
तुम बेवफा हो तुम्हें अपनी कद्र पता ही नहीं।।
तुम्हें इंक़लाब किसने सिखाया है।
तुम को जब देखो अपनों से ही लड़ते रहते हो।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 80)
प्रबुद्ध चिंतक आर डी आनंद सर दलित आम्बेडकरवादियों को अस्मितावाद से उबरने का निवेदन करते हैं। यह सही है कि भारत के हर अस्मितावादी मार्क्सवाद को विदेशी चिंतन कहकर भारत में न लागू होने वाला सिद्धांत बताता है। आरएसएस के सभी धुरंधर खिलाड़ी मार्क्सवाद को आतंकवाद की श्रेणी में रखते हैं और मार्क्सवादियों को देशद्रोही कहते हुए उनका और मार्क्सवाद का विरोध करते हैं। दलित भी कहता है कि मार्क्सवाद विदेशी दर्शन है, यह भारत की जातीय व्यवस्था को न समझता है और न खत्म ही कर सकता है। दलित कहता है, मार्क्सवाद एक आर्थिक दर्शन है और वर्ग-संघर्ष की बात करता है जबकि भारत में धार्मिक जड़ता है और यहाँ जातियाँ अस्तित्व में हैं, वर्ग बना ही नहीं है। मार्क्स यदि भारत में पैदा हुआ होता तो वह वर्ग की बात न करता बल्कि जाति की बात करता और पूँजीवाद के विरुद्ध वर्ग-संघर्ष की घोषणा न करके दलित जातियों को ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ने को प्राथमिकता देता। दलित मत है कि भारत में अभी तक वर्ग बना ही नहीं है। ब्राह्मणों और दलितों में एक विचित्र समानुपात है कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं लेकिन दोनों मार्क्सवाद को अपना शत्रु मानते हैं। परम्परावादी ब्राह्मण मार्क्सवाद को अपना शत्रु मानता है तो बात समझ में आती है कि वह अस्मितावादी है, जातिवादी है, वर्चस्ववादी है और नस्लवादी है। मार्क्सवाद नस्लवाद का उतना ही विरोधी है जितना पूँजीवाद का क्योंकि मार्क्सवाद मनुष्य के द्वारा मनुष्य के हर तरह के शोषण के खात्मे का सिद्धांत है लेकिन दलित तो आम्बेडकरवाद के रास्ते से ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद का विरोधी है, वह आखिर क्रान्तिकारी सिद्धांत का विरोध क्यों करता है? इससे प्रतीत होता है कि इसके प्रणेता और नेता अस्मितावाद को खत्म नहीं करना चाहते हैं बल्कि अस्मितावादी बन कर ब्राह्मणों के शीर्ष पर बैठना चाहते हैं। सच तो यह है कि अस्मितावाद भी दूसरी तरह से ब्राह्मणवाद ही है। आनंद सर की कविता पढ़कर निश्चित आप को एक अलग अंदाज और विचार से गुजरना पड़ेगा।
अस्मितावादियों के लिए कम्युनिज्म भूत है।
कहीं दलित अस्मितावाद का शिकार तो नहीं।।
ब्राह्मणवादी कम्युनिस्टों को देशद्रोही कहते हैं।
दलित हमें फिर ब्राह्मणवादी क्यों कहता है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 53)
वरिष्ठ चिंतक आर डी आनंद सर का मानना है कि अस्मितावाद बिल्कुल उतना ही ख़तरनाक है जितना खतरनाक नस्लवाद, जातिवाद, वर्चस्ववाद और ब्राह्मणवाद है। अब नस्लवाद अपने चरमसीमा की तरफ बढ़ रहा है। नस्लवाद अब खुल कर हमलावर हो चुका है। अब उसे किसी बात, नियम, कानून, विचार, संगठन, संघर्ष, आंदोलन और क्रान्ति का भय नहीं रह गया है। उसने सम्पूर्ण रूप से हमें जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, राष्ट्र, अस्मिता आदि में बाँट दिया है। हम बहुत संकीर्ण हो चुके हैं। अब दुर्दिन हमारे सिर पर बैठ गया है। फिर भी, अभी भी समय है। अभी भी कुछ क्रान्तिकारी संगठन हैं। अभी भी कुछ क्रान्तिकारी लोग हैं। हमें यह समझना होगा कि यदि हम अभी भी अलग-अलग अस्मिताओं में बँटे रहेंगे, तो वे हमें अलग-अलग पराजित कर शासन करेंगे। आनंद सर अपने इस कविता के माध्यम से सभी को यह संदेश देना उचित समझते हैं कि अगर कुछ नहीं तो हमें अवसरवादियों को चिन्हित कर उन्हें नंगा करना चाहिए, हमें नस्लवादियों पर चिल्लाना चाहिए। सारे नियम/कानून/कोर्ट/कचहरी/जज या तो बिक चुके हैं या डरवा दिए गए हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस। जिसका हूरा उसका कूरा। यदि हम सुरक्षित रहना चाहते हैं, यदि हम संघर्ष में जीतना चाहते हैं, तो हमें हिटलर के सम्मुख स्टानिल को खड़ा करना पड़ेगा।
दुर्दिन के सिर पर काल बैठ गया है।
अब समय विकराल होगा।
चिल्लाओ! चिल्लाओ! जोर-जोर चिल्लाओ।
सब को बताओ कि वह हथियार उठा चुका है।।
सबसे पहले संभावनाएँ काटी जाएँगी।
फिर काटी जाएँगी टहनियाँ।।
लताएँ, भंभोले और गूमें काटे जाएँगे।
लँगड़े, लूले और अन्धे सब काटे जाएँगे।।
जितना बड़बड़ा सको बड़बड़ाओ।
अवसरवादियों पर नस्लवादियों पर।।
ताज की क्षय हो ताजपोशी होने वाली है।
कोई स्टालिन पैदा कर सको तो करो।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 52)
आज देश की राजनीति बहुत गंदी हो चुकी है। चाहे आम्बेडकरवादी हों अथवा मार्क्सवादी, यदि सचमुच इस गंदगी में नहीं रहना चाहते हैं तथा दलितों/सर्वहाराओं/उत्पीड़ितों/मजदूरों/मजलूमों को इस गंदगी से निकालता चाहते हैं/शोषण से मुक्त होना चाहते हैं, तो गोबरैले नेताओं को राजनीति से च्युत करें। जिन्हें कंदराओं और गुफ़ाओं में बैठकर तथाकथित ईश्वर के अस्तित्व में खुश को समाहित कर लेना चाहिए अथवा मंदिरों में बैठकर ईश्वर स्तुति में खुद को लीन कर लेना चाहिए अथवा मानव कल्याण हेतु ईश वंदना में खुश को समर्पित कर देना चाहिए, वे हथियारबन्द जनता को डरवा कर सन्यासी बने बैठे हैं, साथ ही साथ सभी दबंग बाबा और सन्यासी शासन करने की इच्छा से राजनीति में प्रवेश ले चुके हैं। जनता को उनका इरादा और अपना भविष्य देखना/समझना चाहिए। एक सन्यासी यदि शासन कर सकता है तो आम आदमी अपनी सुरक्षा में हथियार क्यों नहीं रख सकता है। समय बदल रहा है। बदलते समय का सत्य बदल गया है।  देश, राजनीति और जनता को दासत्व से बचाना है तो जनता को संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए। आनंद सर की कविता का निहितार्थ क्रान्ति है, उसे उनकी कविताओं की ऊर्जा में महसूस किया जा सकता है।
गोबरैले उल्टे पाँव देश को धकेल रहे हैं।
हर इज्जतदार गुह के ढ़ेले से डर रहा है।।
सन्यासी और बाबा यदि राजनीति में आ रहे हैं।
तो तुम्हें भी हथियार उठा लेना चाहिए।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 72)
वरिष्ठ मार्क्सवादी कवि/आलोचक आर डी आनंद सर का यह कविता संग्रह एक अलग किस्म का कविता संग्रह है। इसे मैंने पूर्व ही बता दिया है। इसके एक-एक शब्द में क्रान्ति का दर्शन है। यह संग्रह दो तरह की कविताओं से परिपूर्ण है-एक तो, भारतीय राजनीति के सबसे बुरे दिनों का जिक्र है जिसमें जनता के दुर्दिनों की व्याख्या है, दलितों का मनुस्मृति भय पुनर्जीवित हो उठा है, आरक्षण की नाव डूबती नज़र आ रही है, श्रमिकों के विरुद्ध नए ट्रेड यूनियन कानून पारित हो रहे हैं, जनविरोधी कानून पास हो रहे हैं, शिक्षानीति बरबाद किया जा रहा है, रोजगार घटा दिया जा रहा है, सारे सरकारी संस्थान निजी हाथों में बेंचे जा रहे हैं, बीमा-बैंकिंग का निजीकरण हो रहा है। दूसरी तरफ, जनता को जाति और धर्म में बाँटा जा रहा है। आनंद सर ने जहाँ देश के सामाजिक, राजनीतिक और भौतिक परिस्थितियों के द्वंद्व को स्पष्ट किया है, वहीं दलित/सर्वहारा/श्रमिक/मजलूमों के अस्मिताओं में बँटे होने के कारण को भी स्पष्ट करने की पूरी कोशिश की है। इस संग्रह को पढ़कर एक नई तरह की अनुभूति होती है। ये कविताएँ दलित और सर्वहारा को एक अलग तरह का चोट देती हैं और वर्चस्ववादियों तथा पूँजीपतियों को उस तरह की चोट पहुँचाती हैं जैसे गुलेल से निकला हुआ पत्थर किसी के कनपटी पर लग जाय। आनंद सर के इन शब्दों से उनके कविताओं के हुनर का पता लगाया जा सकता है।
शब्दों को नाजुक बनाने का हुनर क्या सीखें।
इन्हें तो तीर-तलवारों की तरह चुभना है।।
अदब, मिज़ाज, रवानीयत पालतू कुत्ते हैं।
मेरे शब्द गली के कुत्तों की तरह भौंकते हैं।।
मेरे गज़लों की इत्तदा रश्क-ए-कमर नहीं है।
इससे सनसनाते ढेलों की चोट लगती है।।
(धर्म के भाव ऊँचे हैं, पेज 65)
प्रबुद्ध मार्क्सवादी चिन्तक और कवि आर डी आनंद सर के कई कविता-संग्रहों का मूल्यांकन करते हुए मैंने उनकी ढ़ेर सारी कविताएँ पढ़ी हैं। मैं इतमिनान से कह सकती हूँ कि आनंद सर की सभी कविताएँ समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। यह सच है कि हम आज जिस दौर में जी रहे हैं, वह बहुत कठिन दौर है। साहित्य की भाषा में इस दौर को समकालीन कविता का दौर कहा जाता है। समकालीन कविताओं/कहानियों का यह दौर बहुत लम्बा खिंचा। 1965/70 के बाद से आज तक समकालीन साहित्य का समय माना जाता है। समकालीन साहित्य ने अपने प्लाट में हर तरह के यथार्थ को समाहित किया। ऐसा नहीं कि प्रेम पर लिखी कविताएँ समकालीन कविताओं के कैनवास की कविताएँ नहीं है, बिल्कुल हैं लेकिन रीतिकालीन रुझानों की कविताएँ समकालीन कविताओं की श्रेणी में नहीं हैं बल्कि प्रेम की वे कविताएँ समकालीन कविताएँ हैं जो प्रेम के यथार्थ रूपों का विन्यास करती हैं।
समकालीन कविताएँ कहती हैं कि हमारे समय में आतंक का साया व्याप्त हैं। एक तरफ़ स्त्रियाँ बलात्कार की शिकार हो रही हैं, तो दूसरी तरफ नारीवादी स्त्रियाँ बिल्कुल उन्मुक्त होने की जद्दोजहद कर रही हैं। दलित जातियाँ सवर्ण जातियों के विरुद्ध खड़ी होकर उनके वर्चस्ववादी मानसिकता और झूठे साहित्य को चैलेंज कर रही हैं। वहीं प्रत्येक जातियों को उनकी अस्मिताओं में घेर कर उनके जातिवाद को बिल्कुल पक्का बनाए रखने का पुरजोर प्रयास भी किया जा रहा है। पूँजीवादी लोकतंत्र को जहाँ जनता का लोकतंत्र बनाया जाना सुनिश्चत था, वहीं इस संविधान में इतने संशोधन कर दिए जा रहे हैं जिससे संसदीय लोकतंत्र का यह वृहद संविधान बूढ़े शेर की तरह अक्षम हो जाय। आरएसएस और उसके वर्चस्ववादी अनुसांगिक संगठनों द्वारा विकृत किए गए संविधान के स्थान पर मनुस्मृति को लागू किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। जनता जनता नहीं रह गई है बल्कि कट्टर जातीय इकाई में तब्दील हो गई है। जनता की दृष्टि को नज़रबंद कर दिया जा रहा है। जादूगर जो दिखाएगा, जनता वही देखेगी। आम्बेडकर को मात्र चमारों के नेता के रूप में रूपांतरित करने की मुहिम छेड़ दी गई है। मार्क्सवाद को विदेशी दर्शन के रूप में अकर्मण्य घोषित किया जा रहा है।
मार्क्सवाद को आतंकवादी दर्शन कह कर पूरी तरह से बदनाम किया जा रहा है। प्रगतिशील चेतना के व्यक्तियों को छद्म बताकर उनका विरोध तैयार किया जा रहा है। जनता मित्र शक्तियों को शत्रु मानकर शत्रुओं के उद्देश्य को पूरा कर रही है। जनमत ऐसा तैयार किया जा रहा है कि जनता स्व विरोध में क्रियाशील रहकर वास्तविकता से कोसों दूर रहे। कभी मंदिर कभी मस्जिद, कभी राम कभी अल्लाह, कहीं शाहीनबाग कहीं तीन तलाक, कहीं प्रवासी कहीं एनआरसी, कभी नोटबन्दी कभी लॉकडाउन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, अच्छे दिन आने वाले हैं, मंदिर निर्माण होने वाला है, स्मार्ट सिटी बनने वाली है, बुलेट ट्रेन चलेगी, काला धन वापस आएगा, हिन्दू राष्ट्र घोषित होगा, बुर्काप्रथा बन्द होगा, पाकिस्तान को करारा जवाब दिया जाएगा, चीन का सामान खरीदना बन्द करो, पुलवामा, कश्मीर, सीमा विवाद, रोजी, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, टेक्नोलॉजी इत्यादि मुद्दे हमारे समकालीन मुद्दे हैं। समकालीन कहानी/कविताओं में इन्हीं परिस्थितियों का वर्णन किया जा रहा है। आनंद सर ने अपनी कविताओं में राजनीतिक चालाकियाँ और पूँजीपतियों की योजनाओं को अपनी कविता का विषय बनाया है। राजनीतिक चालाकियों में जहाँ एक तरफ आरएसएस की सवर्ण जातिवादी मानसिकता और उसका छद्म है, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण जातिवाद के विरुद्ध दलित जातिवाद के विचार, योजनाएँ और प्रतिबद्धताएँ हैं। समाज में सवर्णों की आपसी एकता और दलितों के आपसी अंतर्विरोध भी आनंद सर की कविताओं में व्यंजित हैं। आनंद सर ने अपनी कविताओं के प्रतिमान को पारम्परिकता के विरुद्ध निर्मित किया है। आनंद सर की कविताओं के सौंदर्य शब्दों के जुझारू संघर्ष में परिलक्षित होते हैं। उनकी कविताएँ हर तरह के ज्याज्यातियों के विरुद्ध आंदोलन में निर्माण में विश्वास रखती हैं। आनंद सर समकालीन साहित्य के एक अच्छे लेखक और कवि हैं और इनकी कविताओं में जबर्दश्त विभिन्नता, क्रान्तिकारी सौंदर्य, क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा, क्रान्ति की ठोस समझ, युयुत्सा, जुझारूपन और लड़ाकूपन है।
संदीपा दीक्षित
मया बाजार, फैज़ाबाद

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