पश्चिमी पूँजीवादी देशों को खूब छका रहा है चीन

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हमारा ध्यान रूस-यूक्रेन में लगाकर रात के अंधेरे में नैंसी पेलोसी मानवाधिकार, लोकतंत्र और न्याय स्थापित करने ताईवान की ज़मीन पर उतर गईं हैं।इस शताब्दी में पश्चिमी पूंजीवादी देशों का भय देखिए।नैंसी कह रही हैं- पश्चिम जवाब देगा!’ बाइडन कह रहे हैं- चीन आग से खेल रहा है।
माओ त्से तुंग ने जो ‘socialism with Chinese characteristics’ कहा था; हो सकता चीन के संदर्भ में वह आज पूरी तरह ठीक न लगता हो।वैश्विक, एशियाई और फिर भारतीय परिस्थितियों में चीन के बदलती आर्थिक संरचना का अध्ययन करना होगा; ख़ास तौर पर यहाँ वामपंथ को। लेकिन चीन ने इन्हीं पूंजीवादी देशों से इनकी production mode लेकर इन्हीं के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया है।मामला सिर्फ़ अमेरिका के बाज़ार हथियाने भर का नहीं है।बाज़ार में गला काट प्रतियोगिता को लेकर अमेरिका अमूमन किसी देश से परेशान नहीं होता।
यदि चीन भी सिर्फ़ उस बाज़ारू प्रतियोगिता में शामिल है तो अमेरिका इतना खलबलया क्यों है?अमेरिका और ब्रिटेन कह रहे हैं कि चीन पश्चिमी देशों के लिए ख़तरा है और वहां की बड़ी आर्थिक विश्लेषण करने वाली संस्थाएं FBI और MI5 तेज़ी से बैठकें कर रही हैं।अमेरिका की सक्रियता एशिया को लेकर बेहद तेज़ हुई है।पूंजीवादी मीडिया तो ख़ैर लम्बे समय से मैन्युपुलेशन में लगी ही है।
इधर दिक्कत ये हो गई है कि चीन में ग़रीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या लगभग ख़त्म हो गई है। पूरे विश्व मे महंगाई का ग्राफ़ बढ़ रहा है सिवाय चीन के।अचल संपत्ति को पुश्तैनी रखने पर भी रोक है। उधर कुछ ही महीने पहले ज़ी जिन पिंग ने स्पष्ट घोषणा की है कि उनके यहाँ फ्री मार्किट पॉलिसी (जो राज्य के शिकंजे में ही था) के कारण अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। इंस्ट्रीयल मार्किट विकसित हो गया है अतः अब इसका वितरण समाजवादी नमूने से होगा।
इससे मार्किट से लेकर पश्चिमी पूंजीवादी देशों की नाक में दम हो रखा है। करें भी तो क्या करें!! अंततः बुनियादी आर्थिक ढांचे को अपने दायरे में लाकर चीन ये बातें कर रहा है।
इसीलिए बाइडन कह रहे हैं- चीन विश्व बाजार के उसूलों के ख़िलाफ़ वक्तव्य दे रहा है! श्रमिको का दोहन कर रहा है और मानवाधिकार तथा लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है।
खुल्ला खेल फ़र्रूख़ाबादी और अमानवीय बाज़ार नीति वाले मानवाधिकार और लोकतंत्र का मुखौटा सबसे पहले लेकर आते हैं।
अमेरिका ताईवान में लोकतंत्र और मानवाधिकार स्थापित करने पहुंच गया है। इससे पहले वह 1977 में ताईवान गया था।
अमेरिका जब लोकतंत्र और मानवीयता पर चिंता करे तो समझ लेना चाहिए कि वह आगे क्या क्या कर सकता है।
डॉ. वंदना चौबे

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