डिक्लास-डिकास्ट के फर्जी पद-बंध की जुमलेबाजी के बीच ऐक्टिविस्ट का कुबूलनामा

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दशकों तक किताबी कम्युनिस्ट बने रहने के बाद पिछले दिनों दुनिया को बदलने के वास्तविक जमीनी काम में लगा और इस प्रक्रिया में राजनीतिक समझ का धरातल उन्नत हुआ।
जिसकी नज़र में तनिक बेहतर होने-बनने की कामना रही है, इस बीच उसकी ओर से भी कई सवाल उछाले गए हैं। सार्वजनिक अंदाज में जवाब देना इसलिए जरूरी समझा कि यकीन दिला सकूँ कि सच कह रहा हूँ और कोई पैंतरेबाजी नहीं है। मैं संपत्ति-संबंधों से बंधा हुआ लेकिन बेहतर दुनिया का ख्वाब देखने वाला राजनीतिक कार्यकर्ता हूँ। बेहतर दुनिया से आशय ऐसी दुनिया से है, जहाँ पर निजी संपत्ति और मुनाफा अर्जित करने की व्यवस्था वाली दुनिया की तमाम कुरूपताएं नहीं हों। सब कुछ के केंद्र में मनुष्य हो, मुनाफा नहीं। अब जैसा कि मार्क्स ही कह गए हैं कि भौतिक विश्व मानव-मस्तिष्क में प्रतिबिंबित होता है और चिंतन के रूपों में ढल जाता है। तो जिस दुनिया में हम जीवन-यापन कर रहे हैं, उसकी परछाई तो बड़े अंशों में पड़ेगी ही। कदम-कदम पर माल-मुद्रा से जुड़े संबंध हमें प्रभावित करते रहते हैं। सामाजिक-आर्थिक हैसियत से मिलने वाला मान-अपमान भी हमारे अवचेतन में अपनी जगह बनाता रहता है। ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ हूँ, भाषा ज्ञान है, डालर में कमाई है, रसूखदार लोगों से परिचय है तो ये इनपुट भी मेरी चेतना का निर्माण करते ही होंगे।
वहीं दूसरी ओर, मानववादी हूँ तो 400 रुपये के दिहाड़ीदार से मोहब्बत भी है, गटर में डुबकी लगाने वाले सफाई-कर्मी से हमदर्दी है। मेरे हीरो मरने पर करोड़ों रुपये गाजे-बाजे के साथ पाने वाले बंदूकधारी नहीं वरन ब्वायलर फटने से मर जाने वाले मज़दूर हैं। नए मनुष्य का निर्माण कैसे होता है। मार्क्सवादी परंपरा के हिसाब से ऐक्टिविस्ट जब दुनिया को बदलने के लिए अपने वर्ग को गोलबंद करने की कवायद से जुड़ता है तो उसे जन का साथ मिलता है, उसका अकेलापन-अवसाद दूर होता है। वह जनता से सीखता है और उसे सिखाता है। तर्क-विवेक और मानववाद की जमीन पर खड़े होकर ऐक्टिविस्ट अपने व्यवहार को तय करता है। लॉजिक रूपी एसिड से समस्त विजातीय विचारों को जलाकर वैसा मनुष्य बनने की कोशिश की जाती है, जैसा मनुष्य निजी संपत्ति से रहित वाली दुनिया में होता होगा। लेकिन, ईमानदार से ईमानदार कोशिशों की अपनी स्पष्ट सीमाएं होती हैं क्योंकि रह तो हम ऐसी दुनिया में रहे हैं, जो निजी संपत्ति और मुनाफे पर आधारित है।
बीते दिनों मुझ पर निहायत जातिवादी, सांप्रदायिक, शातिर, लंपट और स्त्रीद्वेषी होने के आरोप लगे, हालांकि ये सारे तमगे पब्लिक डोमेन में नहीं दिए गए थे।
जिस उग्रता-तीव्रता से इन विशेषणों को चस्पा किया गया था, उसे देखकर कोई इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि नफरत बेहिसाब रही होगी पर ऐसा कत्तई नहीं था। मुझसे उम्मीद जरा अधिक ऊँचे प्लेन पर रहकर की जा रही थी। एक नज़र में ये विशेषण अलग-अलग मालूम पड़ सकते हैं पर इनमें आपस में सावयविक (आर्गेनिक) एकता है। इन विशेषणों को एक-एक कर लेते हैं और पूरी ईमानदारी और वस्तुपरकता के साथ अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। जाति के आधार पर क्रम-परंपरा को मानना और तदनुरूप व्यवहार करना जातिवाद है। मैं जातिवादी हूँ भी और नहीं भी। गँवई सेटअप में पंडितजी और बाबूसाहब न चाहते हुए भी विशेषाधिकार पा जाते हैं और शेष सभी उनसे कमतर होते हैं। हालांकि गुप्त मोहब्बत मेहनतकशों से अधिक है, फिर वे चाहे जिस जाति के हों। सांप्रदायिकता के विरोध में जान लगाकर फेसबुक पर लेखन किया है, मुसलमान-कम्युनिस्ट के संगम से पैदा होने की जहरबुझी कटूक्तियों को झेला है। लेकिन एक को दो में बाँटकर देखते हैं। निकट संबंधों में शादी-ब्याह की आलोचना के बहाने मुस्लिम-द्वेष का इजहार भी कर ही देता हूँ। जानवरों को रेतकर काटने के मुद्दे पर भी नफरत टपकने को आतुर रहती है। मैं शातिर हूँ, यह आरोप ठीक-ठीक किन अर्थों में लगाया गया था, मुझे पता नहीं। पर इसमें दम तो है। दंद-फंद में पारंगत हूँ। लेकिन किसी निर्बल के खिलाफ इसका उपयोग किया हो, करता हूँ मुझे याद नहीं पड़ता।
लंपट का शाब्दिक अर्थ होता है कि व्यक्ति किसी भी तरह के वैल्यू-सिस्टम को नहीं मानता। अगर मैं ऐसा होता तो मेरे इतने चाहने वाले नहीं होते। तो इस पर सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। और आखिर में आते हैं, स्त्री-द्वेष पर। तीन बेटियों का पिता हूँ और लगभग तीन दशक से कम्युनिस्टों के लिए दरी बिछाने का काम कर रहा हूँ। जाहिर है, स्त्री-द्वेष के मुद्दे पर कदम-कदम पर टकराया हूँ क्योंकि मेरे माता-पिता ने अपने पोतों के पक्ष में मुझसे जानलेवा संघर्ष किया है। बेटियों के हक़ में पुरुषवाद से रोम-रोम से नफरत की है। यहाँ पर एक को दो में बांटकर देखने की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि मैंने अपनी बेटियों को भी कंधे पर बैठाकर बड़ी शान से दौड़ लगाई है। स्त्री-द्वेषी होने का आरोप सिरे से खारिज। स्त्री को संरक्षिता नहीं बनाया जाना चाहिए, इससे सिद्धांत ही नहीं व्यवहार में भी मेरी सहमति है। बेटियों के आने-जाने के समय को लेकर कभी कोई टोंका-टाकी नहीं हुई।
अब अन्य बातों पर आने से पहले ऑब्सेशन (ललकजन्य-कुंठा) के महीन रूप पर बात कर लेते हैं। हम लोगों के एक बड़े प्यारे कॉमरेड हुआ करते थे। एक दफा संगठन के सचिव के नैकट्य-सामीप्य को प्राप्त करने को लेकर बड़े मार्के की बात कह गए थे। जिन्हें करीबी हासिल होती थी वे खुद को खुशनसीब मानें न मानें पर जो इससे वंचित रह जाते थे, उनके मन में कसक अवश्य होती थी। कृपया कसक वाली बात और उससे उपजी रिऐक्शंस को स्त्रीद्वेष वाली बात से कनेक्ट करने की भूल न करें। पैरा बदल चुका है।
कम्युनिस्ट परंपरा के हिसाब से मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन करके, जन-कार्रवाईयों में शामिल होकर, यूनिट सिस्टम का सदस्य बनकर आलोचना-आत्मालोचना की प्रक्रिया से गुजरकर और संपत्ति-संबंधों से दूर रहकर नए मनुष्य का निर्माण होता है। जो मनुष्य-विरोधी और अतार्किक विचार-सरणियों से ऊपर उठता जाता है। चूँकि प्रगतिशील होना भी फैशन का मामला बन चुका है, इसलिए डिकास्ट-डिक्लास होने के फर्जी पद-पंध की जुमलेबाजी के सहारे खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ मनुष्य होने के दावे अक्सर ही किए जाते हैं। ठोस उदाहरण देकर इस नुक्ते पर बात करने की कोशिश करते हैं।
शुद्ध अवसरवादिता के तकाजे से पिछले हफ्ते मैंने ऐपवा की राज्य सचिव कुसुम वर्मा के पति प्रशांत शुक्ल को फोन किया और उनसे भाकपा-माले (लिबरेशन) के जिला सचिव का नंबर मांगा। प्रशांत शुक्ल को मैंने फोन पर नमस्कार कहा लेकिन प्रत्युत्तर में उन्होंने नमस्कार कहने से परहेज किया और प्रोफेसर होने की ऐंठ दिखाई। जबकि वाम दायरे में उन्हें भी लाल सलाम कहने का शौक है। कुसुम वर्मा को भी इस बात का दंभ है कि वह जात-पात को नहीं मानतीं। जबकि हकीकत यह है कि पति-पत्नी दोनों को मार्क्सवाद का ककहरा नहीं मालूम। लिबरेशन में चूँकि यूनिट सिस्टम है ही नहीं तो दोनों की कभी कोई आलोचना भी नहीं हुई होगी और बिना आलोचना के न तो इंसान बदलता है और न ही आत्मालोचना की जरूरत पैदा होती है। कैडर कांफ्रेंस में कुसुम वर्मा भारी उपस्थिति के बीच पूर्व हरफनमौला कॉमरेड को स्त्री-उत्पीड़क बता रही थीं, जबकि उसका पक्ष रखने वाला वहाँ कोई था ही नहीं। कुसुम वर्मा चूँकि स्त्री हैं तो किसी को भी चरित्र-प्रमाणपत्र दे सकती हैं और पुरुष प्रधान समाज में हम यह मानने के लिए फौरन से पेशतर तैयार रहते हैं कि फला तो लंपट है। मैं नाम और चेहरा मिलाकर पहचान भर लेता हूँ कि यही कुसुम वर्मा हैं, लेकिन इन पंक्तियों के सार्वजनिक होते ही इन्हें मुझे कुछ भी कहने में तनिक भी नैतिक-संकोच नहीं होगा।
अब आते हैं मुसाफिर बैठा वाली बिरादरी पर जो हर सवर्ण को मानववाद का शत्रु साबित करने में लगी रहती है। नौदौलतियों के गरीबों का दुश्मन होने वाली बात को यूँ ही नहीं कहा गया है। क्लास बदला-करेक्टर बदला। तथाकथित बहुजनों में भी कौम के नाम पर चंदे पर पलने वाले जातिवादी पैदा हो चुके हैं और सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की बहार है।
और अंत में उस बिंदु को समेटने की कोशिश करते हैं, जिसके चलते इस आलेख को लिखने की जरूरत समझी गई। वर्ग-समाजों में भी प्रेम होता है। मैं आदतन सब्जेक्टिव इंप्रेशंस के साथ लिखता रहा हूँ तो यहाँ भी वैसा ही करूंगा। इस संबंध में सैद्धांतिक प्रस्तुति तो साथी नरेंद्र दे ही चुके हैं। भावनाशून्य घोर-बुद्धिवादी प्रेम पर चर्चा करे मुझे यह नागवार लगा है इसलिए उसका संदर्भ नहीं दे रहा हूँ। आदि सुकुल को कंधे पर बैठाकर (अपना मानने के लिए बहुत मनवनिया करते हैं) मिश्रा जी की दुकान तक ले जाने के लिए हफ्ते भर तक खुशामद करता हूँ, इसे तर्क से कैसे समझेंगे? तर्क की अति मानव-मांस खाने तक जाती है और यह अकारण नहीं कि कभी उस तार्किक के ऐक्टिविस्ट रह चुके लोग उससे इतनी नफरत करते हैं। प्यार अनुभूति है, इस केमिस्ट्री को तर्क से समझने की कोशिश हिमाकत है और अगर आप मानवद्वेषी होने के तमगे से बचना चाहते हैं तो इस तरह की हिमाकत करने से आपको बचना चाहिए।

कामता प्रसाद

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