दलित साहित्य का दूसरा पक्ष

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दलित हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म में आ गया। इसे लगा कि वह जेल से छूट गया है किन्तु धर्म जनता के लिए एक नशा है। जो नशा हिन्दू धर्म में है वही नशा बौद्ध धर्म में भी है। बस अंतर इतना है कि एक नजरबंद होता है, दूसरा खुली चहारदीवारी में कैद होता है। एक दास होता है जो कहीं नहीं बिक सकता है, अन्त में उसे मालिक के घर जाना ही है, दूसरा स्वतंत्र है, खुले बाजार में अपने को बेंचकर किसी भी मालिक के घर जा सकता है। कार्य का रूप नहीं बदला है, सिर्फ गुलामी का रूप बदला है। बहुत से दलित इस्लाम स्वीकार कर लिए हैं। बहुत से दलित ईसाईयत स्वीकार कर लिया है किन्तु, सब के अपने स्वरूप हैं। सभी धर्मों में एक तरह की गुलामी है। जो दलित किसी की भी आराधना न करने के लिए स्वतंत्र थे, वे दूसरे धर्मों में जाकर वैसी स्वतंत्रता खो बैठे।

बाबूराम बागुल का यह पुरोवाक्य दलित साहित्य के प्रारंभिक दौर से कुछ कदम आगे खिसका हुआ प्रतीत होता है। मैं इस बढे हुए कदम का स्वागत करता हूँ। यह कदम यह साबित करता है कि दलित कविताएँ एक नई विषय-वस्तु और दिशा में आगे बढे हुए कदम की कविताएँ हैं। वास्तव में, मनुष्य अपने शैशवावस्था से आज बहुत ही विकसित अवस्था में पहुँच गया है। अब यह अलग बात है कि विभिन्न दौर की व्यवस्थाओं के आकाओं ने अवाम को बाँट रखा था जिससे वे एक होकर उनके वर्चस्व व संसाधनों पर कब्ज़े के विरुद्ध आंदोलन न कर सकें। समय परिवर्तन की माँग करता है। दलित कविताएँ दलित समय को छोड़ती नहीं हैं बल्कि समय के अंतराल को रेखांकित करती हैं। दलित साहित्य में जहाँ एक दौर में वेदना, आक्रोश, प्रतिशोध, प्रतिरोध, विद्रोह, नकार था, वहीं समकालीन दलितों के मध्य विकसित हुई परिस्थितियों के दौर में परिवर्तित दशाओं, दिशाओं और गिरावटों पर अपनी कलम चलाई है।

दलित साहित्यकारों ने 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 के समय को एक प्रतीक की तरह याद किया है। बाबा साहब डा.भीम राव आम्बेडकर ने संविधान लिखकर संविधान सभा के अध्यक्ष डा.राजेन्द्र प्रसाद को सौंप था। दलित बहुत खुश हो गया। उसे लगा कि अब तो सारा जहाँ मिल गया है। दलित तब नहीं, आज तक भी बेखबर है। दलितों के लिए संविधान अमरबेल की तरह दिखने लगा। साहित्यकारों ने कितना सार्थक चित्रण किया है कि हम सब एक पुस्तक की वजह से इतना निश्चिन्त हो गए कि हमें अपने आगे का कुछ नहीं सुझाई दे रहा है, इसीलिए कवि ने सीधे डा.आम्बेडकर को ही संबोधित करते हुए लिखा कि बाबा साहब! देख रहे हैं अपने इस संतान को, जो आप के संविधान लिख देने से इतना बेखबर हो गया है कि इसे कल का कुछ पता नहीं। यहाँ कवि का चिंतन कितना सार्थक चिंतन से भरा हुआ है और अपनी पीढ़ी को अपनी कविता की दो पंक्तियों से ही आगाह कर रहा है कि सोने वाले दलित साथियों! तुम्हारे लिए सोने का वक्त नहीं है। जो महाविधान तुम्हारे मशीहा ने तुम्हारे लिए लिखा है वह तभी तुम्हें हित पहुँचाने में सार्थक रहेगा जब तुम स्वयं सतत सचेत, सतत चिंतनशील और सतत क्रियाशील रहोगे।

इतना ही नहीं, समकालीन दलित साहित्यकारों की कविताओं में साफ दिखता है कि उन्होंने डा.आम्बेडकर के बाद की परिस्थितियों और संघर्षशील अपने नेतृत्व पर पूरी नज़र रखी है। कविताओं को पढ़ने से एक मंज़र साफ होने लगता है कि हमारे वे नेता जिन्हें हमारी बहुत परवाह थी तथा डा.आम्बेडकर के सपनों और उनके दर्शन की बहुत चिन्ता थी, हमारे हक़-हुक़ूक़ की लड़ाई लड़ते-लड़ते वे न जाने कब इस संसदीय लोकतंत्र के बहाव में बह गए कि हमारे और ब्राह्मणवादी नेताओं में कोई अंतर नहीं रह गया। हम पुनः अनाथ हो गए और हमारे हमसफ़र-हमदोस्त न जाने कब हमारे नायक हो गए। अब वे नायक हैं हम द्रष्टा। उन तक हमारी पहुँच बस उतनी ही है जैसे किसी सामंती नेता से। हम अपने ही साथी अपने ही सपनों के नाविक के दरवाजे पर दूर ही जूता-चप्पल उतारकर उकड़ू-मुकडू साहब के इंतजार में बैठे हैं। साहब कब निकालेंगे और दुखियारी प्रजा की हाल सुनेंगे। सुनेंगे की नहीं, इसकी भी कोई निश्चितता नहीं है। साहब निकलेंगे और किसी अधीनस्थ को डाँटते हुए गाड़ी में बैठेंगे और हनहनाती हुई उनकी गाड़ी चली जाएगी।

समकालीन दलित कविता में हमारे हक़ की लड़ाई लड़ने वाले साथी की न सिर्फ ‘नायक’ बताकर गिरावट दर्ज कराई है बल्कि व्यक्ति की गिराने की सीमा को भी चिन्हित किया है। व्यक्ति के गिरावट की सीमा जहाँ अपने साथी को उपेक्षित करना है, अजरंदाज करना है, वहीं अपने टिकट के लिए कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए भी दर्शाया है। आज के संसदीय राजनीति की यह बड़ी त्रासदी है कि एक विधायक, सांसद व मंत्री बनने के लिए व्यक्ति न सिर्फ अपने समाज को गिरवी रख सकता है बल्कि खुद को भी गिरवी रख सकता है सिर्फ इस लालच में की एक और बार भी मंत्री बन गए तो न जाने कितनों का वारान्यारा कर लेंगे।

हमारा समाज ब्राह्मणवाद से लगातार लड़ रहा है। ब्राह्मणवादी सभ्यता-संस्कृतियों की बुराई कर रहा है। ऋग्वेद से लेकर मनुस्मृति और रामचरितमानस तक का खंडन कर रहा है। डा.आम्बेडकर ने कहा था कि जातिप्रथा की वाहक ये धार्मिक अवधारणाएं हैं और धार्मिक अवधारणाओं की वाहक हैं वेद, पुराण, श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, ब्राह्मण ग्रथ, उपनिषद, मनुस्मृति। उन्हीं की तर्ज पर हमारा दलित समाज ब्राह्मणों के साहित्य की निंदा करता आ रहा है लेकिन, एक आश्चर्यकनक घटना दिखाई पड़ रही है कि दूसरों को ब्राह्मणवादी कहता-कहता हमारा समाज भी ब्राह्मणवादी हो गया है।

हमारे सामाजिक कार्यकर्ता को जब नेता बनने का अवसर मिला, तो उनकी भाषा बदल गई। वे बहुजन से सर्वजन हो गए। वे हाथी से गणेश हो गए। उनके समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्य समरसता हो गए। सत्ता के गलियारे से निकलने को मन नहीं होता है। गाँव-गाँव वाल राइटिंग कौन करे। चलो मजदूरों से करवा लेते हैं। जिन ब्राह्मणों को कोसने में साँस नहीं थकती थी वही उनके प्रिय दोस्त बन गए। अपने बेकारू राम दिन-रात पोस्टर-बैनर चिपकाकर और पम्फलेट बाँटकर बेकार हो गए। “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागेदारी” का सवाल धूल चाटने लगा। वेदों-पुराणों में डाइनामाइट लगाने का दम भरने वाले गीता की कसमें खाने लगे। यह परिवर्तन सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिवादी चिंतन के कारण पैदा हुआ है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र हमें अवसरवाद की राजनीति सिखाती है, व्यक्तिवाद की चेतना से लैस करती है। सत्ता को देखकर ‘नेताओं की लार टपकने लगती है।’ यही नहीं जो रातों-रात हमारे साथ एक अच्छे लोकतंत्र के लिए कसमें खाया करते थे और हम बहुत ही विश्वास के साथ अपना सर उनकी गोद में रखकर बिना विस्तर के ही सो जाते थे, वे ही अपनी बख्तरबंद गाड़ियों में धीरे से-चुपके से मुँह चुराकर चले जाते हैं। कितना फांसला हो गया हमारे और उनमें,  एक आदमी सड़क का दूसरा महलों का राजा। क्या दलित समाज इन हकीकतों से वाकिफ़ नहीं है? फिर क्यों व्यक्तिवाद इतना बढ़ता जा रहा है? यदि ये सवाल प्रत्यक्ष दलित साहित्यकार नहीं लिख रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ वे नेता ही जिम्मेदार हैं। क्या आज के कार्यकर्ता कल के नेता होने का अव्यवहारिक ख़्वाब नहीं पाल रखे हैं? यदि ये सच है तो डा.आम्बेडकर का संविधान क्या कर लेगा? क्या संविधान को मिटाने के लिए कोई और जिम्मेदार होगा, क्या किसी और को जरूरत होगी कि वह संशोधन करे अथवा संविधान समीक्षा करे? यह तो दलित समाज के लार पटकाने वाले नेताओं की भी जरूरत है। बिना दक्षिणपंथ के ये नेता नहीं रहेंगे और बिना पूँजीपतियों के दक्षिणपंथ नहीं रहेगा। क्या दलित क्या ब्राह्मण। सभी एक शिकंजे के दो पहलू हैं। यह है दलितों का दलितों के प्रति समीक्षा।

एक तरफ तो दलित साहित्य में ब्राह्मणवाद विरोध और नकार है दूसरी तरफ दलितों के मध्य पनपती एक स्वविरोधी चिंतनधारा है। एक तरफ हम ब्राह्मणवाद से लड़ने के लिए दलितों के उपजातियों को एक बैनर के अंतर्गत लाने का प्रयास कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ चमार महासभा, कोरी महासभा, धोबी महासभा, पासी महासभा, दुसाध महासभा और सुदर्शन महासभा बनाकर ब्राह्मणवाद को ही पुख़्ता कर रहे हैं। जय भीम के सम्बोधन को जयमूलनिवासी के सम्बोधन में बदल रहे हैं। कितने तरह से स्वार्थ-लालच और बिखराव व्याप्त हो गया है। आखिर कैसे और किस पर विश्वास करें। जिस की पूछ उठाकर देखो, वह मादा।

बाबा साहब डा.भीमराव आम्बेडकर का निर्वाण 6 दिसंबर, 1956 को हो गया था। उन्होंने अपनी बहुप्रतीक्षित महत्वाकांक्षी पुस्तक “भगवान बुद्ध और उनका धम्म” की प्रस्तावना लिखकर नानक चंद रत्तू को घर जाने के लिए कह दिया था। खुद सो गए। सुबह उठे ही नहीं। डा.आम्बेडकर का जाना उनके न जाने का समय था, उम्र से भी और राजनैतिक अवशेषों के लिए भी। यह दबे-कुचले लोगों के बेहतर जीवन के दर्शन के लिए संक्रमण काल था। ऐसा माना जाता है कि डा.आम्बेडकर साहब बुद्ध और मार्क्स की भित्तियों को अनावृत कर रहे थे। वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचने वाले थे। संसदीय लोकतंत्र की ख़ामियों को समझ गए थे। नहीं समझ पाए थे तो यह कि कैसे राजकीय समाजवाद को राज्य के द्वारा संविधान में विहित किया जाय। यह भी कि क्या राजकीय समाजवाद अक्षुण रखा जा सकता है। उन्हें संशय था कि अच्छा से अच्छा विधेयक लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत प्रदाय को बहुमत दल बदल देगा और अपने निहित एजेंडे को पुनर्स्थापित कर देगा। साम्यवादी क्रान्ति में खून अनिवार्य तत्व है तथा सर्वहारा की तानाशाही प्रमुख विधेय है। ये लोकतांत्रिक मूल्यों को ख़त्म कर देंगे। मनुष्य स्वतंत्र नहीं रह जाएगा। क्या कुछ इससे बेहतर हो सकता है? यह सब डा.आम्बेडकर बहुत ही व्यवहारिक रूप से अंजाम देना चाहते थे। उनके सम्पूर्ण वांग्मय में अलिखित पुस्तकों की रूप-रेखाएं मिलती हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि दर्शन को अधूरा छोड़कर बाबा साहब डा.आम्बेडकर ने अंतिम साँस ले लिया। दलित अपनी कविताओं में लिखते समय इन तमाम पीड़ाओं से गुजर रहे होंगे इसलिए उन्हें उनके जाने के बाद के पसमंजर में कीचड़ ही कीचड़ दिखाई पड़ रहा है। यह कीचड़ यूं ही नहीं लिख दिया। वास्तव में कीचड़ तो प्रतीक है हमारी त्रासद स्थिति का।

कवि डा.आम्बेडकर के जाने के बाद बहुत साफ देख सकने में समर्थ हुए हैं कि डा.आम्बेडकर के बाद के दलित नेता “बाबा साहब अमर रहें” के नारे के साथ सबसे कर्मठ नेता बने हुए हैं लेकिन जहाँ वे कहते हैं वहाँ नहीं दिखते हैं और दिख भी गए तो उनका सफ़ेद चमकता हुआ खादी कुर्ता ही एक झलक भर दिखता है। हम और हमारा जुलूस लगातार धूप-बारिश में चलता ही रहता है। “जय भीम” और “इंकलाब” के नारे लगाते-लगाते हम, हमारे बच्चे हमारी स्त्रियों के जान निकल जा रहे हैं। कोई गिर रहा है, कोई बेहोश हो रहा है। हम उन्हें संभाल रहे हैं। किसी तरह जुलूस जब अधिकारी निवास, कचेहरी कैम्पस व पार्क में पहुंचता है, न जाने नेता जी कहाँ से प्रकट होकर जोर-जोर से नारे लगाते हुए महान नेता का आदर्श प्रस्तुत कर देते हैं। हमें यह नहीं समझ में आता है कि यह क्या खेल है, यह कौन सी गणित है।

परिवर्तन की महत्वाकांक्षा के दौर में कमिटेड नेता और कार्यकर्त्ता तो होते ही हैं लेकिन छद्म नेता और कार्यकर्त्ता की एक पूरी जमात होती है। डा.आम्बेडकर साहब के समय में भी रहे हैं लेकिन कार्य का व्यवहारिक रूप इस तरह नुकीला था कि छद्म उस पर बैलेंस नहीं कर पा रहा था, इसलिए डा.आम्बेडकर अपनी प्रक्रिया में सफल रहे। वे हारे तो सिर्फ मृत्यु से। उनके बाद का छल-छद्म खूब बढ़ा और उसकी बाढ़ सी आ गई। जो अधिक चिल्लाते थे। जो अधिक इर्द-गिर्द घूमते थे। वे ही सावन के पीले-फ़ूले मेढकों की भाँति सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हो गए। यहाँ ‘मेढक’ को बहुत ही रासायनिक प्रक्रिया के बिम्ब की तरह प्रयोग किया है। यह कविता का सौंदर्य है और कवि का सामर्थ्य भी। यहाँ कवि के कल्पना शक्ति का निरूपण है।  एक वाक्य है “घड़ियाल विधवा हो गई है”। यहाँ घड़ियाल और विधवा दोनों बिम्ब हैं। घड़ियाल उस जनता का प्रतीक है जो क्रांतिकारी नेता जनती (प्रसव) है लेकिन विधवा हो गई है अर्थात जो रास्ता दिखाने वाले लोग थे, नेतृत्व देने वाले लोग थे, वे मेढक निकले और पाल्हा बदल लिया। अब जनता नेतृत्व के बगैर विधवा हो गई है। वह अपने बुद्धिकौशल को खो दिया है। बुद्धिकौशल ही वह बीज है जो जनता में जनमत तैयार करती है। जनमत नेता तैयार करता है। अब वह हमारा नहीं रहा। हमारे बीच अब वे बचे हैं जिन्हें न आम्बेडकर से मतलब है, न दर्शन से मतलब है। वे न स्त्री की प्रजनन शक्ति रखते हैं और पुरुष का अजेय पौरुष। फिर भी वे अपने को किसी मशीहा से कम नहीं समझते हैं। अब वे ही क्रान्ति की मशीहाई भाषा बोलते हैं।

युग और साहित्य के परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध को समझने के लिए दो  तरीके हैं। एक है जो पुरानी प्रवृतियों से संचालित और नियंत्रित होती है। बहुत से साहित्यकार उन्हें ठीक वैसे ही ग्रहण करते हैं और परिणाम होता है कि विकृतियों को वे ढोते रहते हैं लेकिन सचेत साहित्यकार ऐसा नहीं करता है। वह युग की प्रवृतियों के वास्तविक अभिप्राय के सारगर्भित तथ्यों को लेकर नवचेतन विचार का निर्माण करता है। “आँखे घुमाकर भीतर देख लेंगे” कविता में कवि अपने भीतर के खलनायकों के विकृत मानसिकता को देख रहा है। यह है जनवादी दृष्टिकोण। यहाँ कवि जाति को लेकर बायस्ड नहीं हैं। वह अपने ही पाँति को बार-बार देख रहा है कि कैसे हम दरी-चद्दर उठाते रहे और वे चालाक भेड़िए नेता बन गए। नेता आज एक अभिशप्त शब्द होकर रह गया है। नेता एक बदनाम शब्द बन गया है।

राजनैतिक बिडम्बना के अतिसार को जनता ही झेलती है। कार्यकर्ता किसी सामाजिक-राजनैतिक संगठन से जब भी जुड़ता है तो इस विश्वास के साथ जुड़ता है कि सामाजिक अभिशाप ख़त्म होगा, लोकतंत्र बहाल होगा, दुर्दिन जाएंगे, मानवता आएगी, जातिवाद ख़त्म होगा, धर्म को सांप्रदायिक दंगो के लिए नहीं प्रयोग किया जाएगा, शिक्षा और नौकरियां सभी को सुलभ होंगी, युग बदलेगा। वह दिनों-रात घर-बार, बाल-बच्चों की परवरिश छोड़कर मिशन में लगा रहता है किन्तु बाद में पता चलता है कि वह दिन तो काला दिन था जिस दिन सर्वप्रथम वह नेता हमारे घर आया था। कार्यकर्त्ता उसी की भजन करता है, उसी की तारीफ़ करता है, उसी की बातों को विश्व-दर्शन मानता है, और किसी की सुनता ही नहीं है। वह नेता का अंधभक्त हो जाता है। उस दिन बहुत दुःख होता है जब नेता चुनाव जीतने के लिए हमसे दर्शन बदल लेने को कहता है। एक बार हार जाने के बाद और कड़ी मेहनत करवाता है और फिर चुनाव जीतने के लिए पार्टी बदल लेता है। हमें लगता है कि जैसे हमारी जवानी नष्ट-भ्रष्ट हो गई।

दलित साहित्य की धारा की यह कविताएँ आत्म-साक्षात्कार हैं। ये कविताएँ दलितों को अपने भीतरघात को देखने का दर्शन हैं। दलित कवि बहुत ही प्रबुद्ध व सचेता कवि हैं। दलितों में एक वर्ग है जो बाहर के दुश्मनों को ही देख रहा है लेकिन कवि अपने भीतर के दुश्मनों को भी देख रहे हैं। बाहर के दुश्मन स्पष्ट हैं। उनसे लड़ा जा सकता है लेकिन लड़ने वाली शक्तियाँ तो हमारे ही भीतर हैं। यदि हमारी शक्तियाँ भीतरघात करेंगी, छलछद्म से काम लेंगी, कुर्सी के लिए पार्टी व शिद्धान्त बदल लेंगी, टिकट के लिए कुत्तों की तरह दुम हिलाते फिरेंगे, तो हमारी जीत सुनिश्चित नहीं होगी। युद्ध की वस्तु-परिस्थितियां परिपक्व हैं। परिपक्व नहीं है तो हमारी कर्तागत स्थितियां। हमारे साथियों के लिए  हमारा नेतृत्व जिम्मेदार है। जनता कच्ची सामग्री है। इसे ही पक्का करना है। कहा जाता है चरित्र ऊपर से नीचे की तरत प्रवाहित होता है। ऊपर हमरा नेतृत्व है, हमारा शीर्ष है। यदि वह चरित्रहीन हो जाय तो निचली बॉडी क्या करेगी। ब्रेन हैमरेज होता है ब्रेन का, लेकिन पैरालाइज होती है पूरी बॉडी।

अब बाबा साहब तो हैं नहीं लेकिन यह सवाल सत्तर वर्षों बाद हमारे सामने एक व्यक्तिवाद के रूप में खड़ा है। यह जाति का सवाल नहीं है। यह ब्राह्मणवाद का भी सवाल नहीं है। यह साम्प्रदायिकता का भी सवाल नहीं है। फिर यह कैसा सवाल कवि खड़ा कर रहा है। यह सवाल है कि जातिप्रथा उन्मूलन के लिए हमने संसदीय लोकतंत्र का जो रास्ता चुना है, वह राजनीति की अंधी गलियों में हमारे सच्चे नेतृत्व को भी फंसाने में सक्षम है। अतः नेतृत्व को अंधी गलियों में जाने से कैसे बचाया जाय? “रिपब्लिक” कविता का अंतिम सवाल जिन्दा है। जब तक संसदीय राजनीति के दगाबाजों से नहीं निपट लेते हैं, दलितों का कारवां रुका रहेगा और कवि के इस तरह के प्रश्न से और कई कविताओं के अवलोकन से याह पता चलता है कि जातिप्रथा की लड़ाई समग्रता की लड़ाई है किसी खास जाति, कौम व धर्म की लड़ाई नहीं है।

मानव जीवन में गुलामी सबसे बड़ी त्रासद स्थिति है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता है। इस सत्य का आधार मनुष्य की मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। मनुष्य का मनोविज्ञान उसकी अन्तस्चेतना है। अन्तस्चेतना बाह्य जगत और अंतः जगत के द्वन्द्व से निर्धारित होता है। मनुष्य जीवन में जो भाव, विचार और बिम्ब बनते हैं वे सभी वस्तुपरिस्थितियों की वजह से बनते हैं। भारत अनेक कबीलों अथवा प्रजातियों का मिश्रित भूखंड है। आर्य एक भाषा है अथवा प्रजाति है, अब कोई मायने नहीं रखता है किन्तु जो प्राचीन काल में अस्तित्व में आया, वह आर्य ही है। आर्य प्रजाति ने श्रुतियों के आधार पर अपनी बौद्धिक परम्परा को हजारों वर्षों तक अक्षुण रखा। कालान्तर में उन्हीं ऐतिहासिक श्रुतियों को लिपिबद्ध किया जिसे ऋग्वेद के नाम से जाना जाता है। जीवन का स्वाभाव है जीवन पर आश्रित रहना। एक जीव दूसरे जीव का भक्षण करता है। मनुष्य अपने शैशवावस्था में वन्य पशुओं के अतिरिक्त मनुष्य का भी भक्षण करता था लेकिन, मनुष्य के प्रमस्तिष्क का आयतन अन्य जानवरों से अधिक था जिसने इसे सोचने की शक्ति प्रदान की, और यह जानवरों के मध्य से होता हुआ प्रबुद्ध मनुष्य बन गया। मूलतः मनुष्य भी जानवर है इसलिए इसकी मनोवृत्ति में सरवाइबल ऑफ़ दी फिटेस्ट बना रहा। ऋग्वेद के प्रारम्भ में मनुष्यों ने काबिले, ग्राम और जनपद के जनगण के खाने, पीने, रहने और सुरक्षा के दृष्टिकोण से वर्ण बनाए। एक वर्ण पुरोहित, दूसरा वर्ण संरक्षक और तीसरा वर्ग खेती करने वालों का अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य। बाद में जीवन यापन की सुविधाओं के आभाव के कारण व स्वयं के वर्चस्व के कारण इसी को जन्म के आधार पर पुख़्ता घोषित कर दिया। यही नहीं, तदन्तर,12वीं शताब्दी तक एक और वर्ग की परिकल्पना करके अपने शत्रुओं को शूद्र बना दिया। बुद्ध के समय तक मनुष्य के दिमांग का विकास समुचित हो चुका था। ब्राह्मण वर्ग ने अपने वर्चस्व के लिए ऋग्वेद में 10वां मंडल पुरुष सूक्त नाम से जोड़कर एक विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रीय, जंघा से वैश्य और पैर से शूद्र की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित कर जड़ बना दिया, जिसे आज तक कोई भी वर्ण तोड़ सकने ही हिम्मत नहीं जुटा पाया।

भारत 1600 ईसवी में अंग्रेजों का गुलाम हो गया। भारत के गुलाम होने के कारण ब्राह्मण अंग्रेजों का गुलाम हो गया। इस तरह शूद्र गुलामों का गुलाम बना रहा। 15 अगस्त, 1947 में देश आज़ाद हो गया अर्थात ब्राह्मण आज़ाद हो गया। देश आज़ाद हुआ वहाँ देश का ब्राह्मण वर्ण भी आज़ाद हो गया किन्तु क्या ऐसा शूद्र वर्ग के साथ हुआ? नहीं हुआ। वह तब ब्राह्मणों के गुलामी के साथ अंग्रेजों का भी गुलामी बजा रहा था। अब वह अंग्रेजों से तो स्वतंत्र हो गया किन्तु ब्राह्मणों का गुलाम बना हुआ है। यहाँ यह स्पष्ट करना अधिक जरूरी है कि अंग्रेज अपने शक्ति सामर्थ्य के बल पर हम सभी पर शासन कर रहे थे किन्तु ब्राह्मणों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। ब्राह्मणों ने वर्ण और जाति में समाज को इस तरह बाँट दिया है कि कोई अपने को एक से बड़ा कहता है तो कोई एक से अपने को नीचा समझता है। एक जाति दूसरे को छूता नहीं। उसके घर खाता नहीं। उसके बाल-बच्चों से शादी-ब्याह नहीं करता है। इसे क्रमिक गैर बराबरी कहा जाता है। ऊँच-नीच का सिद्धांत हर जातियों में इस कदर समाई हुई है कि उसके विरुद्ध व्यवहार करने की कोई हिम्मत नहीं करता है। लोकनाथ यशवंत का “आखिर क्या हुआ” एक ऐसा काव्य संग्रह है जिसकी कविताएँ चीख-चीख कर कहती हैं कि दलित वर्ग मानसिक रूप से अभी भी गुलाम है। यही नहीं, जब दलित अपने स्वतंत्र होने की बात सोचता है तो ब्राह्मण मुस्कुराता है। ऐसा क्यों? क्योंकि उसे पता है कि उसके कुछ किए बिना ही शूद्र वर्ण गुलाम बना रहेगा। उसके चिंतन में उसका दर्शन है। वह अपने दर्शन पर पूर्ण आश्वस्त है।

दलित हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म में आ गया। इसे लगा कि वह जेल से छूट गया है किन्तु धर्म जनता के लिए एक नशा है। जो नशा हिन्दू धर्म में है वही नशा बौद्ध धर्म में भी है। बस अंतर इतना है कि एक नजरबंद होता है, दूसरा खुली चहारदीवारी में कैद होता है। एक दास होता है जो कहीं नहीं बिक सकता है, अन्त में उसे मालिक के घर जाना ही है, दूसरा स्वतंत्र है, खुले बाजार में अपने को बेंचकर किसी भी मालिक के घर जा सकता है। कार्य का रूप नहीं बदला है, सिर्फ गुलामी का रूप बदला है। बहुत से दलित इस्लाम स्वीकार कर लिए हैं। बहुत से दलित ईसाईयत स्वीकार कर लिया है किन्तु, सब के अपने स्वरूप हैं। सभी धर्मों में एक तरह की गुलामी है। जो दलित किसी की भी आराधना न करने के लिए स्वतंत्र थे, वे दूसरे धर्मों में जाकर वैसी स्वतंत्रता खो बैठे। हिंदुओं में स्वर्ग है, तो इस्लाम में जन्नत है और बौद्ध धर्म में मोख्ख अथवा निर्वाण है। एक जगह राम, दूसरे जगह अल्लाह, तीसरे जगह बुद्ध। सभी ईष्ट हैं। कोई भी इन प्रतिष्ठितों की अवहेलना नहीं कर सकता है। लोकनाथ यशवंत की दृष्टि सिर्फ दलित दृष्टि नहीं है। वे जब बौद्ध धर्म की भी आलोचना की हिम्मत रखते हैं तो जरूर मार्क्सवाद के दरवाजे पर खड़े होकर दस्तक दे रहे हैं।

भारत जातियों का देश है। यह वाक्य न जाने कितनी बार इसी रूप ने रिपीट होता रहता है। किसी भी वाक्य की पुनरावृत्ति दोष माना जाता है लेकिन हमारे समाज की यह हक़ीक़त है और यह हक़ीक़त एक गंभीर समस्या है। समस्या को दोहराना कोई दोष नहीं है। उसके इलाज का हर कोण हर उस गंभीर समस्या की पुनरावृत्ति का आह्वान करता है। वर्ण में जातियाँ है या वर्ण जातियों में विभक्त है। दलित शब्द डा.आम्बेडकर के ऑप्रेस्ड और डिप्रेस्ड का हिंदी वर्जन है। दलित जातियां 6743 जातियों में विभक्त हैं। टॉप पर बैठे ब्राह्मण वर्ण को दलितों की रखवाली नहीं करना पड़ता है। वह उस जेलर की भाँति बिन्दास है जिस जेल में एक कैदी दूसरे कैसी की ही रखवाली और शिनाख़्त करता रहता है। वही गुलाम भी है,वही मुखबिर भी है।

ऐसी गुलामी से किसी का भी खीझना एक क्रांतिकारी परिणति है। मार खाता-खाता एक बच्चा भी चीखकर गाली देने लगता है, भले उसके बदले  और चार डंडे मार खा जाय। यह हमारे देश में भारतीय संस्कृति की बिडम्बना ही है कि एक व्यक्ति किसी भी तरह जब दूसरे से मुखातिब होता है, साथ चलता है, साथ बैठता है, दूसरा सुन्दर लगने लगता है, दूसरा अच्छी बातें कर लेता है, तो वह पूँछ ही बैठता है, आप का नाम क्या है, नाम के आगे क्या है, उपनाम का क्या अर्थ है? तरह-तरह से जाति ढूढने लगता है। एक अजीब कौतुहल होता है उसके मस्तिष्क पर। न समझ पाने की स्थिति में अन्त में जाति पूँछ ही बैठता है। उस समय इतना घिनौना लगता है उसका चेहरा जैसे सूअर टट्टी खा रहा हो। चलो, जाति बता भी दो, तो मुँह ऐसे बनाएगा जैसे बहुत बड़ा महापुरुष हो, जैसे कोई तेजस्वी पुरुष हो। ऐसी भाषा का प्रयोग करेगा जैसे यह बात तो वह पूछना ही चाहता था और, यह बात अकारण गलती से निकल गई हो। कवि इस कविता को लिखते समय अत्यधिक क्रोधित रहा होगा तभी ऐसी कविता का जन्म हुआ। कविता का सौंदर्यबोध न उसके शब्द हैं, न उसकी कला है, न उसके अलंकार हैं, न उसकी विधा है, कविता का सौंदर्यबोध उसका घृणाभाव है, उसका नफ़रत है, उसका क्रोध है और क्रोध में ऐसे प्रश्नकर्ता को पीटने की चाहत है।

सच में यह घृणा भाव जातिप्रथा की नीव कमजोर करेगी, बशर्ते, दलित अपनी जातियों के भीतर के द्वंद्व को पहले तोड़ ले क्योंकि, किसी और पर अंगुली उठाने से पहले अपने अंदर के कुरूपता को झांक लेना बेहतर होगा। जिस पर हम अंगुली उठाते हैं वही कहता है अपने अंदर की उपजातियों के मध्य शादी और भोज करके दिखाओं, फिर बाद में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण पर अंगुली उठाना। आखिर क्या रह जाता है हमारा? खैर, विमर्श का अन्त नहीं है यह। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को विरासत में क्रमिक विकास के दर्शन और संघर्ष को थमा ही जाता है। अगली पीढ़ी का क्रमिक विकास बेहतर होता है। हम खेत को जोत रहे हैं। उसमें से खर-पतवार निकाल रहे हैं। उसे उर्वर बना रहे हैं। हमारी अगली पीढ़ी उसमें बीज बोने के क़ाबिल हो जाएगी। फ़सल लहलहाएगी। उसकी अगली पीढ़ी फसल काटने के लिए औजार लेकर आएँगे। कवि की अगली कविता “मुक्तछंद” में बेटा बाप से पहले जागता है, मॉर्निंग वाक् करता है। कभी-कभी ऑफिस आकर बॉस को देखता है और उस पर टिप्पणी करता है। वह बॉस के बारे में एक अलग राय रखता है और बाप से प्रश्न भी करता है। वह कहता है मैं ऐसी नौकरी नहीं कर पाउँगा जहाँ दम घुटता हो, जहाँ गुलामी हो, जहाँ बंधन हो। बाप समझ जाता है कि बेटा विद्रोही होगा। जहाँ मैं बोलने का शाहस नहीं करता वहाँ बेटा विद्रोह करेगा। बाप सोचता है उसकी दुनिया निश्चित अच्छी होगी। यशवंत जी ने बखूबी अपने विचार प्रधान कविता में एक अलग तरह का क्रांतिकारी काव्य सौंदर्य गढ़ा है। कोई भी कलाकृति आत्मानुभूतियों की कल्पना द्वारा पुनर्रचना है। यहाँ कवि का कल्पना सृजन यथार्थ के प्रतिबिम्ब हैं।

साहित्य का सौंदर्य अनेक रूपों में निखरता है लेकिन जब प्रतीकों का एक संसार गढ़ा जाता है, तो पसमंजर अपने वास्तविक रूपों में आकार ग्रहण करने लगते हैं। कई बार यह छायावाद की अभिव्यक्ति भी प्रदान करते हैं किन्तु यह समय छायावाद का समय नहीं है, यह समय है यथार्थवाद का, बल्कि उससे बढ़कर भौतिक परिस्थितियों के मीमांसा का समय है। असल में जो यथार्थ सा दिखता है वह यथार्थ होता ही नहीं है। आज छलछद्म और मुखौटे को भी बेनकाब करना साहित्य की सार्थकता में सुमार हो गया है। इसीलिए, “रेत में डूबा हुआ जहाज” अपने पूर्व की भौतिक परिस्थितियों को संज्ञान में लेने की माँग करता है।

डा.आम्बेडकर साहब ने 1936 में “इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी” की स्थापना की थी, 1942 में “आल इण्डिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन” का गठन किया तथा 1956 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया” का निर्माण किया, जो उनके मरणोपरांत 3 अक्टूबर 1957 को अस्तित्व में आई। डा.आम्बेडकर का उद्देश्य दलित आंदोलन था, एनकेनप्रकारेण सत्ता में आना उद्देश्य नहीं था। डा.आम्बेडकर के मुख्य उद्देश्यों में जातिप्रथा उन्मूलन, दलित आंदोलन, लोकतंत्र की स्थापना और समाजवाद को संविधान में विहित करना था। दलित समाज का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि डा.आम्बेडकर के निर्वाण के उपरान्त “रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया” की दुर्गति हो गई। यह उसी तरह हुआ जैसे एक बाप की संतानें पिता की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति के बँटवारे के लिए सुन्दर सा आशियाना और मजबूत आधार को तोड़कर आपस में लड़ जाते हैं और बँटवारा करके कमजोर हो जाते हैं। आम्बेडकर मिशन का रास्ता भूलकर वर्चस्व का रास्ता अख्तियार करके उन शक्तियों से साँठ-गाँठ कर लेते है जो दलित आंदोलन व आम्बेडकर मिशन के दुश्मन होते हैं। कांग्रेस हमेशा इसी ताक में थी कि आरपीआई किसी भी तरह से फलने-फ़ूलने न पाए। एक तो हमारे नेता कमज़र्फ निकले दूसरे इनकी लालच का फायदा उठाकर कांग्रेस ने आरपीआई के बहुत से नेताओं को अपने में मिला लिया। लगातार आरपीआई के 12 खण्ड हो गए, जिसमें से “रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया”, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (डेमोक्रेटिक)”, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (काम्बले ग्रुप)”, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (खोबरागड़े ग्रुप)”, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (सेलवाराज ग्रुप)”,रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया-2″, “भारतीय रिपब्लिकन पक्ष”, नेशनल रिपब्लिकन पार्टी”, “उत्तर प्रदेश रिपब्लिकन पार्टी”, यूनाइटेड रिपब्लिकन पार्टी”, “सोसलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी” मुख्य रहे हैं। रिपब्लिकन नाम की इन पार्टियों की कस्ती वहीं डूबी जहाँ पानी बहुत कम था लेकिन दलित कविता कहती है, नहीं साहब, रिपब्लिकन नामक जहाज कम पानी में नहीं, रेत में डूब गई। रेत में कोई जहाज डूबती है क्या! कविता का आश्चर्य, दुःख और सौंदर्य यही है कि रिपब्लिकन को जहाँ सरपट भागना चाहिए था, वहाँ लोभ, लालच, ईर्ष्या और दर्शन की ठीक समझ न होने के कारण अवांक्षित जगह पर ही बिखर गई।

नामदेव ढसाल, बीसी काम्बले, राजा ढाले, भाऊसाहेब आडसूल, विजय सोनवड़े, दया पावर, अर्जुन डांगले, यशवंत मनोहर, गंगाधर पनतावड़े, राव साहब कसबे, बाबूराव बागुल, जेवी पवार, बीके गायकवाड़, एन शिवराज,बाबा साहब गायकवाड़, बीडी खोबरागड़े, हरिदास आवडे, आर डी भंडारे, कांशीराम, शिवदयाल सिंह चौरसिया, तिलकचन्द कुरील, दीनानाथ मोदी, अशर्फीलाल पासी, छेदीलाल साथी, बीपी मौर्या, संघप्रिय गौतम, राहत मोलाई, गयाप्रसाद प्रशांत, डा.मुजम्मिल हुसैन हाजी अब्दुल बकी और इसहाक आदि के होने के बाद भी रिपब्लिकन पार्टी टूटी और ख़त्म हो गई। अनेक मुखौटे अनेक चेहरे।

उसी दौरान अफ्रीका के “ब्लैक पैंथर” की तर्ज पर 9 जुलाई 1972 को महाराष्ट्र में “दलित पैंथर” का गठन किया गया। कांशीराम जी ने उत्तर प्रदेश में 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ तथा 1981 में डीएसफोर का गठन किया। 14 अप्रैल 1984 को बसपा का गठन किया। जहाँ डा.आम्बेडकर का मिशन दलित आंदोलन और जातिप्रथा उन्मूलन था, वहीं कांशीराम ने जाति सशक्तिकरण पर बल दिया तथा दलित जातियों को सत्ता में भागीदारी का आह्वान किया। दलित वोट का ध्रुवीकरण किया। अवसरवाद की राजनीति सिखाई। हम बहुत ही बुद्धिमानी दिखाने के चलते लक्ष्य से भटक गए और संसदीय लोकतंत्र के राजनैतिक दलदल में फँस गए।

वैचारिक विश्लेषण के धनी व्यक्तित्व दलित साहित्यकार ने जहाँ परिस्थितियों का बेहतर मूल्यांकन किया है, वहीं अपनी कमी की ओर भी संकेत किया है। इतना ही नहीं, उन नेताओं को डा.आम्बेडकर की उठी हुई एक ऊँगुली के प्रतीक का संकेत भी किया है। बहुसंख्यक दलित डा.आम्बेडकर की उठी हुई एक ऊँगुली का अर्थ यह समझता है कि हमें संसद पर कब्ज़ा करना है, वहीं क्रांतिकारी चेतना का दलित साहित्यकार जैसे प्रबुद्ध, चिंतनशील और प्रज्ञावान साथी ने उस ऊँगुली का संकेत यह बताया है कि बाबा साहब हमें “नालायक” कह रहे हैं। सत्य जो भी हो लेकिन हम नालायक हैं। न हम आंदोलन रच सके, न सत्ता प्राप्त कर सके, न लोकतंत्र को पूर्णतः परिभाषित और स्थापित ही कर सके और न समाजवाद को संविधान में विहित ही कर सके। ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिए हुआ कि हम संघर्ष से भागते रहे हैं। हम आंदोलन से डरते रहे हैं। हम बैशाखी के आदी हो गए हैं। हमने अवसरवाद को सीखा है। हम अवसरवाद की दोज़ख में खुद ही जल गए। हमें जिस व्यवस्था से लड़ना था उसी को सर पर सजा लिया। बुद्ध का नाम रटते-रटते हम बहुजन से सर्वजन की बात करने लगे। हम धोखा देने के फ़िराक में थे, खुद धोखा खा गए। हम लोकतंत्र को स्थापित करने वाले थे, हम खुद ही अलोकतांत्रिक मर्यादाओं में घिर गए। दलित कविताओं की वैचारिकी यथार्थ को प्रतिबिम्ब की तरह उपस्थित करना नहीं है, फ़िल्म की तरह प्रदर्शित करना ही नहीं है। काव्य की वैचारिक सौंदर्यबोध उसकी हिम्मत और युद्ध के लिए भविष्य के मस्तिष्क में चिंतन का आवेग और आवेग की क्रियागत परिणति के लिए हाथों में हथियार भी हैं।

शब्द अपने अर्थों में बड़े होते हैं। अर्थ बड़े होने के लिए विचार शैली की सकारात्मकता जरूरी विधा है। और यह सब तब होता है जब लेखक/कवि/साहित्यकार अपनी मेधा को लगातार मांझ रहा हो। हर व्यक्ति में एक दर्शन होता है लेकिन सभी दार्शनिक नहीं होते हैं। दार्शनिक वही होता है जो युग और समय को पहचान लेता है। हर समय के एक काल-खण्ड को युग कहा जा सकता है लेकिन कभी-कभी हजारों वर्षों के बीत जाने के उपरान्त भी अलग युग का सूत्रपात नहीं होता है। ऐसा इसलिए होता है कि उस समय में कोई विशेषता नहीं होती है। व्यक्ति सभी होते हैं, खाते-पीते और मरते रहते हैं किन्तु महान व्यक्ति वह होता है जो समय की विशेषता को पहचानकर उसकी दिशा को संचालित करने का अदम्य शाहस रखता हो। क्रान्ति परिवर्तन है लेकिन परिवर्तन क्रान्ति नहीं है। 380 डिग्री परिवर्तन को क्रान्ति कहते हैं। क्रान्ति मूलभूत परिवर्तन को कहते हैं। क्रान्ति समय के अंतराल में स्वतः बिरले ही होती है। क्रान्ति के लिए मनोगत उपक्रम और उद्यम जरूरी है।

लेकिन, समय की चाल देखिए कि जिस डा.आम्बेडकर ने अपने सपनों में एक क्रांतिकारी व्यक्ति को संजोया था; समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, न्याय, लोकतंत्र, राजकीय समाजवाद और एक व्यक्ति एक मूल्य की संकल्पना की थी, आज उन्हीं की औलादे उन्हीं का मुखौटा लगाए दरवाजे-दरवाजे रशीद बुक लेकर समाज विकास, सामाजिक आंदोलन, राजनैतिक परिवर्तन, व्यवस्था परिवर्तन की शब्दावलियों के साथ धन उगाही का व्यवसाय सुचारू चला रहे हैं। हम जानते हैं ये भटके हुए लोग हैं, ये गुमराह किए गए लोग हैं, लेकिन बाबा साहब के नाम पर चन्दा माँग रहे हैं, तो भला हम कैसे न दें और कैसे मना कर दें। हम जानते हैं ये बाबा साहब के दर्शन को न पढ़ते हैं, न उस पर चलते हैं। ये हमें अथवा समाज को भला कैसे नई दिशा देंगे। ये तो खुद भटके लोग हैं। इन पार्टी कलेक्शन अमीनों को क्या कहा जाय-चोर, उचक्का या कुछ और। अजीब बिडम्बना है। और आए दिन का है। हमें समाज की चिंता है, हम बाबा साहब के नाम पर इन दुकानदारों की दुकान भर रहे हैं। ये खा-उड़ा रहे हैं। आज कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा डीएमके, एआईडीएमके में क्या अंतर है? ब्राह्मण और दलित नेताओं में क्या अंतर है?

समाज की ऐसी हालात के पीछे, राजनीतिक गिरावट के पीछे, व्यक्ति के सांस्कृतिक पतन के पीछे के कारण क्या हो सकते हैं? क्या लोभ, लाचक, ईर्ष्या ही इसके कारण हैं? यदि यह सत्य भी हैं, तो क्या मनुष्य में ये सब अकारण पैदा होते हैं? यह सत्य है कि मनुष्य अपने व्यक्तिवादी नजरिए को छोड़ दे, तो समाज, राजनीति और अर्थशास्त्र की दशा चिंताजनक कभी न हो। आखिर क्या कारण हो सकता है? दलित दृष्टिकोण में ब्राह्मणवाद ही वह कारण है जिससे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक गिरावट उत्पन्न होता है। यहाँ दलित भूल जाता है कि ब्राह्मणवाद का जनक खुद क्यों सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गिरावट के परिणाम को झेल रहा है? मैंने पूर्व ही देश, काल और परिस्थितियों का जिक्र किया था, वे देश, काल और परिस्थितियां क्या हैं? आज वैश्वीकरण की स्थिति में उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया हमारी नियति बन गई है। निजीकरण उत्पादन की वह व्यवस्था है जहाँ अधिकतम मुनाफे के लिए पूँजीपति अपने प्रबंधन समिति ( अर्थात सरकार) और उसके अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) पर दबाव डालता है कि वह जनता को विभिन्न जन- समस्याओं में व्यस्त करे, गुमराह करे और सस्ते श्रम तथा अधिक काम के घंटों से मुनाफे को सुनिश्चित करे। ऐसी स्थिति में सरकार में रह रहे सांसद और विधायक का अस्तित्व एक खरीदे गए भांड की तरह होता है। वह पूँजीपतियों का दास है। एक दास अपने मालिक का हुक्म और अपनी सुरक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं सोचता है। जिसे उस व्यवसाय में हिस्सेदारी मिली है वह उच्च नीत-नैतिकता के चक्कर में अपना बसा-बसाया घर नहीं उजाड़ता है, इसलिए जनता को धोखा देता है, उसकी समितियों में पास एजेंडे को अनेक दल अपने-अपने तरीके से समाज में लाते हैं और नेट्वर्किंग मार्केट कंपनियों की तरह अपने-अपने प्रोडक्ट को फायदेमंद सिद्ध करते हैं।

वस्तुगत नियमों की भौतिकवादी अवधारणा से हमारा तात्पर्य वस्तुगत अवस्थाओं की अभिव्यक्ति से है जिन्हें घटनाओं में खोजा जा सकता है। ये संयोग और अवस्थाएं, जो नियम के रूप में अभिव्यक्ति होती हैं, हमारे  ऊपर निर्भर नहीं होती हैं। प्राकृतिक प्रक्रियाएँ नियमों द्वारा नियंत्रित होती हैं, तो यही नियम समाज पर भी लागू होनी चाहिए। सामाजिक प्रक्रियाओं में अवस्थाएँ और सामाजिक घटनाओं में संयोग पाए जाते हैं, जो हमारी चेतना और संकल्प से स्वतंत्र होते हैं। सामाजिक घटनाएं तभी घटित होती हैं जब उनके घटनाओं का कारण बनने वाली स्थितियां उत्पन्न हो चुकी होती हैं। प्रकृति में चेतना विहीन शक्तियां एक दूसरे पर क्रिया करती हैं जबकि समाज में व्यक्ति चेतना संपन्न होते हैं। उनकी क्रियाएँ सचेतन और सुविचारित होती हैं। लेकिन उसके परिणाम जरूरी नहीं वही निकलें जो सुविचारित लक्ष्य था, वह कुछ और भी हो सकता है। भौतिकवादी अवधारणा के अंतर्गत चिंतन का विषय यह है कि जो मनुष्य के मस्तिष्क में संकल्प और उद्देश्य को प्रेरित करते हैं और सामाजिक क्रिया-कलाप के अंतिम परिणाम निर्धारित करते हैं, उन्हें समाज के भौतिक जीवन के विकास में, आर्थिक विकास में, उत्पादन के और उत्पादन तथा विनिमय की दशाओं के विकास में खोजा जा सकता है। समाज के भौतिक जीवन की दशाओं के विकास को नियंत्रित करने वाले सामाजिक विकास के इन बुनियादी नियमों से जनता अनभिज्ञ रहती है किन्तु उन नियमों की क्रियाशीलता निश्चित परिस्थितियों को जन्म देती हैं। ये परिस्थितियां जनता के सचेतन दृष्टिकोण और संघर्ष की प्रेरणाओं को जन्म देती हैं और उनके इरादों से स्वतंत्र रहकर उसके कार्यों का वास्तविक परिणाम निर्धारित करती हैं। सामाजिक विचार समाज के भौतिक जीवन की दशाओं में जन्म लेते हैं लेकिन वे ही विचार भौतिक जीवन के विकास में सक्रीय भूमिका निभाते हैं। ये विचार या तो सामाजिक विकास को प्रोत्साहित करते हैं या फिर बाधा डालते है। एक खास बात गाँठ बढ़ लेना जरूरी है कि मनुष्य की चेतना उसका अस्तित्व निर्धारित नहीं करता है बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।

परिणाम किसी कार्य और कारण का ही प्रतिफल है। हमें उन नियमों को खोजना पड़ेगा। कवि का संकेत है कि हमारे महापुरुषों के जाने के बाद उनके अनुयाई या तो चुप बैठ गए, जो नहीं बैठे वे भी मूलभूत परिवर्तन के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। वे उनके नाम पर किसी संगठन का रजिष्ट्रेशन करवाकर अपना व्यवसाय चला रहे हैं, अपनी दुकान चला रहे हैं। सवाल है क्या उनकी मंशा पूर्व ही ऐसी थी या बाद में बनी है? पूर्व में थी तो भी, बाद में हुई तो भी, उसके पीछे उसकी भौतिक परिस्थितियां उनके चेतना से स्वतंत्र क्रियाशील थीं। हमें आज महापुरुषों के नाम के दुकानदारों को दोष देंने से वांक्षित फल प्राप्त होने वाला नहीं है। हमें लोकनाथ के साथ उन अनभिज्ञ भौतिक प्रतिबिम्बों को ज्ञेय बनाना होगा। दलित समाज की जितनी भी प्रस्थापनाएं होती हैं, वे मनोगत होती हैं लेकिन वे स्वयं भी अपने मनोगत के पीछे के स्वतंत्र प्राकृतिक अन्ध चेतना को नहीं समझते हैं जिसके कारण हम वास्तविक वस्तुपरिस्थिति का मूल्यांकन में असफल हो जाते हैं। इसका परिणाम होता है कि हम अपने सचेतन व सुविचारित लक्ष्य को भी निर्धारित नहीं कर पाते हैं।

एक लंबी बहस है कि भारतीय संस्करण के साम्यवादी किसी भी दक्षिणपंथी नेता से कम पूँजीवादी-ब्राह्मणवादी नहीं हैं। भारतीय साम्यवादियों ने अगुवा दस्ते के नेता अपने कार्य कार्यकर्ताओं में बिल्कुल एक अलग किस्म का रिश्ता बनाए रखते हैं। उनके खाने की, सोने की, टट्टी-पेशाब की व्यवस्था वह नहीं होती है जो एक आम सदस्य की होती है। एक ब्राह्मण खाने की मेज और भाषण तक तो दलित के साथ सामूहिक रहता है किन्तु घर में प्रवेश करते ही वह ब्राह्मण हो जाता है, क्षत्रीय हो जाता है। क्या मज़ाल की साधारण कामरेड का छोकरा पंडित जी अथवा ठाकुर साहब के बेटी-बेटों से भाईचारे की अपेक्षा कर पाए। घर में वही उपनयन संस्कार, वही यज्ञोपवीत, वही ईश्वर स्तुति, वही हनुमान चालीसा। हो सकता है स्वयं कामरेड ने जनेऊ धारण न किया हो लेकिन मज़ाल क्या कि बेटे को यज्ञोपवीत से रोक सकें। प्रथम भी वह सवर्ण था आखिर में भी वह सवर्ण है। क्या बदला कामरेड? प्रगतिशीलता कहाँ चली गई? आप सामन्त मैं दास। आप मालिक मैं मजदूर। कैसे निभेगी केर बेर के संग? कैसे आएगी वर्गीय एकता? कौन करेगा विश्वास? फिर कैसे आएगी क्रान्ति?

लेकिन, आक्षेप के बाद रास्ता यही बंद नहीं हो जाता है, विमर्श यहीं रुक नहीं जाता है, क्रांतियों के द्वार ख़त्म नहीं हो जाते हैं, मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ और चार्वाक निरर्थक और अप्रासंगिक नहीं हो जाते हैं। मजदूरों को साहब के मिथ को तोड़ना पड़ेगा। यह साहब की जिम्मेदारी हो न हो, बड़े नेताओं की जिम्मेदारी हो न हो, हमारी अकाश्यकता है, हमारी जिम्मेदारी है। जब सर्वहारा ने क्रान्ति के लिए जीवन कुर्बान करने का संकल्प लिया है तो क्या धोखेबाज नेताओं को अपनी सेन्ट्रल बॉडी से घसीट कर पीट नहीं सकती है लेकिन स्थानापन्न को भरने की कूबत सिर्फ शारीरिक ही नहीं बौद्धिक भी होती है। बिना क्रांतिकारी सिद्धांत और दर्शन को सीखे कोई भी साधारण सदस्य ऐसी कार्यवाही नहीं कर सकता है और जब तक रैंक एन्ड फ़ाइल अपने चरित्र, ज्ञान, एक्सप्रेशन और शाहस को उच्चतम अवस्था तक नहीं ले जाएगा, क्रान्ति नहीं होगी, जातिप्रथा नहीं टूटेगी, और तो और नेता, नेता कभी भी पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति के लिए न रास्ता छोड़ेगा और न स्वयं व्याहारिक नेतृत्व ही प्रदान करेगा।

पूँजीवाद और ब्राह्मणवाद के संरक्षक उतने जहरीले होते नहीं हैं जितना हमें बताया जाता है। इसका मायने यह है कि ये बहुत ही डरपोक जाति है। ये बिना गुंडे, माफ़िया, चोर, बदमाश, तथा पुलिस और मिलिट्री के कुछ नहीं हैं। ऐसी ही एक कविता है “साँप की कविताएँ” जिसमें जहरीला बताने वाला दोगला किस्म का व्यक्ति है जो हमें इतना डरवा देता है कि हम साँप के जहर से नहीं, जहर की दहशत से मर जाते हैं:

अगर हमारे बीच के लोग खुद ही साँप बनकर हमें न डँसे, और सर्वहारा संस्कृति से लैस होकर अगुवा दस्ते की तरह हमारा नेतृत्व करें, तो हम क्रान्ति की विजय उनके नाम कर दें। लेकिन, दो जीभ वाला मनुष्य इधर भी है और उधर भी। वह समुचित कार्य नहीं करता है। वह ग़फ़लत में रखता है। जनता बंदूक चलाना जानती है, आदेश का अनुपालन जानती है, क्रान्ति के लिए मरना जानती है, नेतृत्व पर भरोसा करना जानती है।

लेकिन, मेजॉरिटी सिर्फ आँसू बहाना जानती है। आम्बेडकर आम्बेडकर, मार्क्स मार्क्स चिल्लाना जानती है। ईशू के शरीर में ठोकी जा रही कीलों पर आँसू बहाना जानती है। यही जनता आँसू घूटना जानती, नेतृव करना जानती, दोगले नेताओं को पीटना जानती, तो ईशू को कीलें न ठोंकी जातीं। कीलें ठोकने वाले उन्हीं दीवालों में गाड़ दिए जाते। आखिर क्या हुआ नहीं? हुआ। जनता ने ही किया। कवि “मेजॉरिटी” कविता में विचार देता है कि मैं टेसुए बहाने वालों से दूर रहता हूँ। शायद, कवि को इन रोने वाले लोगों से क्रान्ति की उम्मीद नहीं है। जहाँ एक तरह कवि दोगले नेताओं से ख़फ़ा हैं,वहीं रोने वाले लोगों से भी दूर रहता है।

समाज का विकास उत्पादन शक्तियों के विकास के साथ जुड़ा प्रश्न है। समाज का विकास उत्पादन की शक्तियों के विकास के परिणाम स्वरूप उत्पादन में जुड़े लोगों के बीच सम्बंधों में परिवर्तन द्वारा निश्चित होता है। एक निश्चित समय के दौरान उत्पादन शक्तियां और उत्पादन सम्बन्ध मिलकर उत्पादन की प्रणाली की रचना करते हैं। व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म उत्पादन में श्रम के विभाजन से होता है। इस प्रकार शोषण का प्रारम्भ होता है और परस्पर विरोधी वर्गों में समाज का विभाजन आरम्भ हो जाता है। वर्तमान दौर पूँजीवाद का साम्राज्यवादी दौर है। आज हम घोर भूमंडलीकरण की चपेट में हैं। भूमंडलीकरण विश्व बाजार की अर्थ-व्यवस्था है। देश और राष्ट्र की सीमाएं टूटी हुई हैं। कोई भी देश किसी भी देश में अपनी पूँजी लगा सकता है। उद्योग खड़ा कर सकता है। वहाँ की श्रम-शक्ति क्रय कर सकता है। साम्राज्यवादी शक्तियों का आग्रह ही नहीं, आदेश भी है कि सभी देश की सरकारें उदारीकरण की नीति को अपनाएं तथा अपने देश के पब्लिक सेक्टर्स को प्राइवेट सेक्टर्स को देने की नीति तैयार करें। लगभग सभी औपनिवेशिक देश ऐसा ही कर रहे हैं। हमारे देश ने “कम एन्ड मेक इन इण्डिया” का आह्वान किया है। वैसे भारत में वैश्वीकरण की चलन 1991 में ही शुरू हो गई थी। आज वैश्वीकरण ने प्राइवेट सेक्टर्स को एक नया नाम दिया है-“कारपोरेट।” निजी घराने आज कारपोरेट कहलाते हैं। हम उन्हें तब भी पूँजीपति के नाम से जानते थे, आज भी हम उन्हें पूँजीपति के ही नाम से जानते हैं। शब्दों के बदलने से उत्पादन के उद्देश्य नहीं बदल गए हैं। हाँ, कारपोरेट ने जगत को जरूर बदल दिया है। ये अपना डेरा वहीं डालते हैं जहाँ मुनाफे की अपार संभावना दिखाई देती है। ये उन्हीं कार्यों में अपने हाथ डालते हैं जिसमें अकूत सम्पदा होती है। वालमार्ट भारत में लाबिंग कर के मुनाफे का आंकलन कर गया है।

खोमचे से लेकर भूमि तक पर वालमार्ट जैसे न जाने कितने कारपोरेट्स के भारतीय कारपोरेट्स से समझौता हो चुका है। एक ही छत के नीचे लहसुन से लेकर मर्सडीज तक, टैक्सी के टिकट से लेकर हवाई जहाज के टिकट तक, चड्ढी से लेकर लाखों की साड़ीयाँ तक, पान से लेकर बेलेंडर प्राइस तक, बीड़ी से लेकर सिगार तक, स्टूल से लेकर फर्नीचर तक, शेम्पू से लेकर बाथ टैब तक, मिट्टी से लेकर बिल्डिंग तक सब मुहैया करवाया जाएगा। मॉल्स और मल्टीप्लेक्स उसी के नमूने हैं। ठेले पर भी उनकी निगाह है, तो जमीन पर भी उनकी निगाह है। कारपोरेट सुख-सुबिधाओं का भरपूर खजाना लेकर आया है। कारपोरेट न रिक्शा रहने देगा न रिक्शेवाला, न खेती करने की जरूरत न किसान आत्महत्या करेगा। न खेती रहेगी न किसान। अब नौकरियां नहीं होंगी, जॉब मिलेगा। अब सेवा की जरूरत नहीं है, दाम लो और घर जाओ। इंज्वॉय द टाइम। कुँआ खोदो पानी पीओ। न धन होगा न चोर आएँगे। न जमीन होगी न भाई बांटेगा। दुनिया के कार्पोरेट्स ने हमारे उद्योग, हमारी नौकरियां और हमारी जमीनें देख ली हैं। जब से जयचंद ने उन्हें शरण दी है, हमारा दिल बैठता जा रहा है, होंठ सूखते जा रहे हैं, पेड़ों ने पत्तियाँ छोड़ना शुरू कर दिया है, जमीन पत्थर होती जा रही है। आप ने सुना होगा, चिकवा (बकरियों को खरीद कर उसका गोस्त बेंचने वाला) यदि किसी बकरी को छू ले, तो उसी दिन से बकरी दुबली होती चली जाती है अर्थात उसे पता चल जाता है कि मेरी मृत्यु नजदीक आ गई है। इसी तरह कारपोरेट्स एक कसाई (चिकवा) है, उसने भारत भूमि देख लिया है, अब भारत की संतानों ने अपना कठिन दिन भांफ लिया हैं। उन्हें संघर्ष की कठिन घड़ी का अंदाज हो गया है।

बड़े-बड़े बिल्डर्स के लिए हमारी जमीनें उनके भोजन के सदृश्य हैं। इन जमीनों को वे कौड़ी के दाम पर खरीदेंगे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं बनाएँगे, अपार्टमेंट्स बनाएँगे, युनिवर्सिटीज बनाएँगे, हॉस्टल बनाएँगे। मोटी-मोटी रकमों पर बैंचेंगे और बड़े-बड़े किराए पर उठाएंगे। कैम्पस हॉस्टल तैयार करेंगे। ऊँची फीसें उगाहेंगे। कवि कविता के माध्यम से गिद्ध के मोलभाव को भी संज्ञान में लिया है। वह हर भारतीयों को जो भूमिधर हैं, को माँ के रूप में प्रोजेक्ट करता है। गिद्ध यानी कारपोरेट के मोलभाव को माँ के नज़रों में एक दृश्यगत रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसी स्थिति में खेत को एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में दिखाते हुए कवि नें खेत और  अपनी मिट्टी का रिश्ता निर्धारित किया है।

जहाँ देशी-विदेशी कारपोरेट्स का गठजोड़ हो, वहाँ भला जनता को सुख-चैन से रखने का अधिकार कहाँ। इसीलिए कहा जाता है कि सरकारें पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमीटी होती है तथा सरकार का मुखिया कारपोरेट्स का वफ़ादार प्रबंधक होता है। जब भी विदेशी कम्पनियाँ किसी भी देश में प्रवेश करती हैं, सर्वप्रथम वहाँ की जनता उनका विरोध करना शुरू कर देती हैं। भारत में एक ईस्ट इण्डिया कंपनी 1600 में आयी थी और लाखों लोगों के बलिदान के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो पाया। 3 वर्ष 8 माह तक अंग्रेजों ने भारत पर राज किया। इसलिए देशवासी कभी भी विदेशी हुकूमत के लंबरदारों को देश में घुसपैठ का विरोध करते हैं। कारपोरेट्स अब बहुत ही हुशियार हो गया है। वह रिस्क नहीं लेना चाहता है। अब वह प्रत्यक्ष शासन नहीं करता है। वह उस देश के शासकों को निर्देशित करता है कि हम तुम्हारे देश में अपना उद्योग तभी स्थापित करेंगे जब तुम यह सुनिश्चित कर दोगे कि तुम्हारी जनता दंगा-फ़साद नहीं करेगी। हमारे व्यवसाय में कोई व्यवधान नहीं चाहिए। इसलिए, सरकारें पड़ोसी देशों के आक्रमण का हौवा खड़ा करते हैं और अपनी सेना को प्रायोजित तौर पर उस देश के लोगों और सैनिकों पर हमला करने को प्रेरित करते हैं। हमारे सपूत देश-राष्ट्र के नाम पर बार्डर पर मरते-खपते हैं। उन्हें राजनीति से दूर रखा जाता है और नेता खुद देश-प्रेम और राष्ट्र-प्रेम दूर रहते हैं। जनता का ध्यान बार्डर पर और मस्तिष्क देश व राष्ट्र-प्रेम में फँसा कर सरकारें जनता का दिमांग कारपोरेट्स से हटा देते हैं लेकिन कोई गुंगाइस न बचे, सांप्रदायिक तनाव, धार्मिक जुनून, जातीय संकीर्णता का उन्माद फैला कर इंतजाम पुख़्ता किया जाता है।

एक वाक्य है “अभी भी लड़ रहे हैं आपस में”, बहुत ही मार्मिक और संज्ञान में लेने वाला वाक्य है। “आपस में” का क्या मतलब है? सैनिक दो अलग-अलग देश के हैं। अपने-अपने देश के लिए लड़ रहे हैं। फिर वे आपस में नहीं, एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रहे हैं। परन्तु कवि का इम्फैसिस है कि वे आपस में लड़ रहे हैं। यहाँ कवि की चेतना वर्ग पर आधारित है। किसी भी देश का सैनिक सम्भ्रांत घर नहीं होता है। वह मिडिल क्लास का भी नहीं होता है। किसी पूँजीपति का बेटा राष्ट्र-भक्त होता है क्या? वह कभी सेना में भर्ती होता है क्या? चलो, उसे रूपए की जरूरत नहीं है, कोई बात नहीं लेकिन सेवा की जरूरत तो उसे भी है। देश तो उसका भी है। लेकिन नहीं, पूँजीपति का बेटा सैनिक बनकर देश सेवा क्यों करे, वह तो संपत्ति दान करके सेवा अर्जित करता है न। एक नेता तो बड़ा देश भक्त होता है, फिर उसका बेटा देश व राष्ट्र-प्रेम में भारत माता के लिए शीष क्यों नहीं बलिदान करता है? इसलिए कि उसे सैनिक जैसी छोटी नौकरी क्यों करनी है?देश सेवा भी करेंगे, तो मंत्री बनकर करेंगे। किसी भी ब्यूरोक्रेट्स का लड़का देश सेवा के नाम पर सैनिक में भर्ती क्यों नहीं होता? वह क्यों नहीं अपना सर भारत माता को चढ़ाता है? किसी भी संस्थान में क्लास वन का लड़का भी सैनिक नहीं बनता है। देश सेवा गरीब, मजदूर, किसान,और क्लास टू, थ्री, और फोर का हाई स्कूल और इण्टर पास लड़का ही सैनिक बनेगा। कुछ प्रतिशत ग्रेज्युएट और पोस्ट ग्रेज्युएट भी गरीबी के कारण सैनिक में भर्ती हो जाते हैं। वैसे अधिकतर गरीब के 10वीं और 12वीं ही जाते हैं क्योंकि 18 वर्ष के लड़कों को ही प्रेफर किया जाता है। ये होते हैं देश भक्त। एक तो कम पढ़े-लिखे, दूसरे इन्हें न राजनीति का ज्ञान अर्जित करने दिया जाता है और न दर्शनशास्त्र तथा विज्ञान ही पढ़ने दिया जाता है। धर्म की किताबें चाहे जितनी पढ़ो। इसलिए, कवि की तर्क शक्ति उसकी रचना में दिखाई पड़ती है। वहाँ आपस का मतलब है दोनों अपने देश के गरीब और कम पढ़े-लिखे धार्मिक युवा ही सैनिक होते हैं। धर्म का निर्वहन करते हुए वे अपने वर्ग-शत्रु पर नहीं अपने भाई पर गोली चलाते हैं। क्या कभी किसी देश के नेता को दूसरे देश के नेता को दुश्मन मानकर लड़ते देखा गया है? वर्ग-युद्ध के समय सैनिकों के अतिरिक्त देश की जनता भी सैनिकों के साथ लड़ती है। वहाँ किसी देश का नेता भी मारा जाता है इसलिए वर्ग की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए साम्यवादी दार्शनिकों ले लिखा है कि सरकार, सैनिक, पुलिस, कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका स्टेट की रक्षा के नाम पर पूँजीवाद और पूँजीपतियों की रक्षा करते हैं।

कवि की कविता में शब्द तो प्रतीक हैं ही, अर्थ भी प्रतीक है। भाषा रूपांतरित कविताओं में अंलकार के समुच्चय का लोप हो जाता है। संधि और संधि-विच्छेद का कोई मायने नहीं रह जाता है। समास का भी पता नहीं चलता है। विधा के खास चरित्र का भी विलोप रहता है। इन सब के बावजूद सुप्रसिद्ध दलित कवि और चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के अनुवाद में कोई त्रुटि का संशय नहीं है और न ही अनुवाद से अर्थों पर कोई प्रभाव पड़ा है। कवि के विचार-सौंदर्य को वाल्मीकि जी ने सहज ही हिंदी अनुवाद में जान डाल दिया है।

“टूटे-फूटे दीवारों” से अभिप्राय संसदीय राजनीति के छिन्न-भिन्न रूप से है। छिन्न-भिन्न रूप का अर्थ है कि संविधान में विधिक परिवर्तन के नाम पर 117 अनुच्छेदों को परिवर्तित कर दिया गया है। “दीवार” यहाँ संसद और विधान सभाएं हैं। “सपेरे” नेता हैं। उनका “खेल” राजनीति है। यहाँ “साँप” जनता है और “नेवला” विपक्षी नेता हैं। ये सब तभी से हैं जब से देश आज़ाद हुआ है। “साँप औए नेवला की लड़ाई” चुनाव का प्रतिनिधि शब्द है।  हाँ, पीढियां जरूर बदली हैं। कवि की एक अच्छी कविता होने के बावजूद कवि की निराशा यहाँ दिखती है लेकिन उस निराशा के बाद भी उन्हें उम्मीद है कि उनकी तीसरी पीढ़ी यह सब खेल नहीं देखेगी। किन्तु, यहाँ भी समस्याओं से बाल-बाल बचने की बात है। तीसरी पीढ़ी ने वहाँ न खड़े होने से भी तो यह खेल नहीं रुक जाएगा। इस खेल को रोकने के लिए आगे बढ़ना ही पड़ेगा। जरूरी है कि वह इस संसदीय राजनीति का मोहरा बने। वह क्रांतिकारी भी तो बन सकता है। वह विद्रोह भी तो कर सकता है। आंबेडकरवाद की अगली कड़ी है मार्क्सवाद। दलित वर्ग को ईमानदारी से मार्क्सवाद का अध्ययन करना लाज़िमी है। वर्ग-संघर्ष किए बिना गंदी राजनीति, पूँजीवाद-साम्राज्यवाद और ब्राह्मणवाद से मुक्ति संभव नहीं है। खैर कवि के आशा और निराश को आप तब समझ सकते हैं जब “सपेरा” कविता के निहितार्थ को समझेंगे।

यही नहीं, कवि बहुत ही स्पष्ट है कि इन्हीं हाथों ने हमारे मशीहाओं को मिट्टी में मिला दिया। हमारे मशीहाओं ने प्यार को प्यार समझ था। उन्होंने इसे स्लो पवाइजन नहीं समझा। मुस्कुराने को अदा नहीं, भाईचारा समझा था और हुआ क्या कि हमारा मशीहा हमारे रहते हुए भी अकेला हो गया। इसके उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में लेबर पार्टी, आल इण्डिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया और उत्तर प्रदेश में बसपा के नेतृत्व का फेल्योर और हस्र समझा जा सकता है।

कवि समझौता नहीं करना चाहता है। यहाँ कवि के समझौता न करने का दूरगामी अर्थ और संदेश है। महाराष्ट्र ब्राह्मणवाद के झांसे से अभी भी नहीं उबरा। इधर उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती के सिर पर राजा बलि की तरह ब्राह्मण बामन का पैर है, तो निश्चित ही रसातल में जाना ही है। इसलिए इस कविता से हमारे क्रांतिवीर दलित सर्वहारा को ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद के हर चालों से बचकर वर्गीय एकता की स्थापित करना ही चाहिए तथा हर दुश्मन के हाथ को कंधे से झटक ही देना चाहिए। कवि ने कहा, हाथ हटा लीजिए, नहीं तो मैं इस तरह तुम्हारा हाथ झटकूँगा कि पखुरा सहित उखड़ जाएगा।

दलित कवि अपने जनवाद के चरम पर निराला की वह तोड़ती पत्थर के समान हथौड़े से पत्थर पर प्रहार करता हुआ दिखा। “प्रहार” शब्द अपने-आप में ही सारगर्भित है, चाहे वह पत्थर पर पड़े या किसी के सिर पर, उसे तोड़ ही देता है। हथौड़े का प्रहार रूप परिवर्तित कर देता है। यहाँ प्रहार जनवादी क्रान्ति का प्रतीक है। जुल्मखोर कौन है? पूँजीपति, कारपोरेट्स, ब्राह्मणवादी, मुल्क के रहबर, ब्यूरोक्रेट्स जुल्मखोर हैं। कवि इन्हीं के सर पर हथौड़ा मरना चाहता है। लेकिन, यह याद रखने की जरूरत है कि ये सारे लोग मार भी दिए जाँय, तो फिर दूसरा कोई स्थानापन्न कर लेगा। मैंने प्रारम्भ में ही इशारा किया था कि उत्पादन की शक्तियाँ उत्पादन में लगे हुए लोगों के बीच में एक सम्बन्ध स्थापित होता है। इस तरह उत्पादन में श्रम विभाजन से व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म होता है जिससे शोषक और शोषित दो वर्ग उत्पन्न होते हैं। उत्पादन के साधन इनके हाथों में होते है। उत्पादन का उद्देश्य अधिकतम मुनाफा कामना होता है। सर्वहारा के सामूहिक प्रयास से उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा करना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा करने के लिए पूँजीवाद विरोधी सामूहिक लड़ाई ही ही असली सर्वहारा की लड़ाई है। यही क्रान्ति है। क्रान्ति के उपरान्त समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन का उद्देश्य जनता के नैतिक और भौतिक जरूरतों की आपूर्ति होगी।


आर डी आनंद
एल-1316, आवास विकास कॉलोनी,
बेनीगंज, फैज़ाबाद, अयोध्या-224001
मो.9451203713
Email:rd.anand813@gmail.com

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