दलितों में कमजोरियाँ, संभावनाएँ और मित्रता

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दलितों में कमजोरियाँ, संभावनाएँ और मित्रता

दलितों की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह संभावनाओं की तलाश नहीं करता है और न ही संभावनाओं से मित्रता ही करता है। दलितों का जो व्यक्ति, विचार व संगठन निकटस्थ होता है, उसकी वह इतनी आलोचना, निंदा व तिरस्कार करता है कि वह शत्रुओं की शक्ति के रूप में दिखाई पड़ने लगता है। हालाँकि, सचमुच वह शत्रुओं के खेमे में नहीं जाता है और न ही शत्रुओं की शक्ति बनता है लेकिन एक भ्रम उपस्थित हो जाता है। उदाहरण के लिए-

मार्क्सवाद एक विज्ञान है और दलितों के पक्ष में वह ब्राह्मणवादी अधिभौतिक शक्तियों का न सिर्फ तर्कपूर्ण खंडन करता है बल्कि कार्य और कारण की भी मीमांसा करता है लेकिन दलित ब्राह्मणवाद से अधिक मार्क्सवाद से चिढ़ता है।

कम्युनिस्ट वर्ग-संघर्ष के लिए वर्गीय एकता का प्रयास करता है तथा सर्वहारा के पक्ष में आंदोलन करता है लेकिन दलित वर्गीय एकता में न विश्वास करता है और न ही प्रयास करता है।

प्रगतिशीलता ब्राह्मणवाद विरोधी है और बहुत से सवर्ण प्रगतिशील चेतना से लैश हैं लेकिन दलित इस बात को स्वीकार करने को ही नहीं तैयार होता है कि सवर्ण प्रगतिशील भी हो सकता है।

मुंशी प्रेमचंद, शरतचंद, निराला, अवतार सिंह पाश, गोरख पाण्डेय, चारु मजूमदार, कानू सान्याल, शिवदास घोस, निहार मुखर्जी, प्रभास घोस, दाभोलकर, गौरी लंकेश, पानसरे, विनोद मिश्रा, सुधा भारद्वाज, गोंजाल्विस इत्यादि दलितों के बहुत नजदीक हैं लेकिन दलित इन्हें अपना हितैषी मानता ही नहीं है।

दलित, ठीक ब्राह्मणों की तरह, अलगाववादी और वर्चस्ववादी होता जा रहा है। यह अलगाववाद और वर्चस्ववाद ब्राह्मणवाद का प्रतीक है। अतीत में ऐसी ही स्थिति ने एक वर्ग को ‘ब्राह्मण वर्ण’ में रूपांतरित किया था। आज दलितों के मध्य पुनः एक ‘नव-ब्राह्मण वर्ग’ पैदा हो चुका है।

डॉ. आम्बेडकर हमें मानवतावादी बना रहे थे इसलिए बंधुत्व पर बल दे रहे थे लेकिन वर्तमान में दलितों में बंधुत्व भाव बिल्कुल नहीं है। जब दलितों के मध्य आपस में बंधुत्व नहीं पैदा हो रहा है तो सवर्णों के साथ बंधुत्व की पहल संभव नहीं बन पाएगी। जब तक हम बंधुत्व नहीं पनपने देंगे तब तक जातिप्रथा में दरार नहीं पड़ेगी।

डॉ. आम्बेडकर कहते थे कि अंतरजातीय भोज और विवाह जातिप्रथा में दरार डाल सकता है लेकिन यदि कोई सवर्ण किसी दलित लड़की से विवाह कर ले तो लोग उस लड़की को कोस डालते हैं कि उसे प्रेम के लिए सवर्ण ही मिला था और यदि सवर्ण लड़की किसी दलित लड़के से विवाह कर ले तो दलित कहता है कि देखा, हमारे होनहार लड़के को ब्राह्मण ने बड़ी चालाकी से फँसा लिया है। दलित सगोत्रीय विवाह में ही फँसा हुआ जातिप्रथा में दरार डालने की पहल नहीं करता है।

डॉ. आम्बेडकर के अनुसार, जातिप्रथा की संरचना में दूसरों से सीखने की प्रवृत्ति की बड़ी भूमिका है।…भारत में जातिप्रथा निम्न वर्ग द्वारा उच्च वर्ग की नकल का प्रतिफल है।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-1, पेज-21) यह सच है कि दलित अभी भी ब्राह्मणों की नकल पर ही आश्रित दिखाई पड़ता है। दलित ब्राह्मण विद्वानों, जैसे- तिलक, नेहरू, राहुल इत्यादि की थ्योरी को मान लेता है लेकिन उसी मत पर अपने ही मसीहा डॉ. आम्बेडकर की थ्योरी को मानता ही नहीं है।

डॉ. आम्बेडकर के अनुसार, जातिप्रथा तो एक ही प्रजाति के लोगों का सामाजिक विभाजन है।” (खण्ड-1, पेज-55)। अर्थात जातिप्रथा दलितों और ब्राह्मणों में प्रजातीय अंतर न होकर सामाजिक अलगाव है लेकिन दलित है कि सवर्णों का खून शुद्ध और श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिए उसके डीएनए तक का प्रणाम दे रहा है। जबकि डॉ. आम्बेडकर का कहना है, “आर्य प्रजाति का सम्बंध रक्त से नहीं है, वैज्ञानिक भाषा में आर्य शब्द का प्रयोग प्रजाति के सम्बंध में हो ही नहीं सकता। इसका अर्थ भाषा होता है, भाषा के अतिरिक्त और कुछ नहीं, और यदि हम आर्य प्रजाति की बात करते भी हैं, तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि इसका अर्थ कुछ नहीं बस आर्य भाषा है।

मैं बार-बार यह कह चुका हूं कि जब मैं ‘आर्य’ शब्द का उच्चारण करता हूँ तो मेरा आशय न तो रक्त से होता है न ही अस्थियों से, न तो बालों से और न ही खोपड़ी से मेरा आशय तो बस उन लोगों से होता है जो एक आर्य भाषा बोलते हैं। यही बात हिंदुओं, यूनानियाँ, रोमनों, जर्मनों, कैल्टों, और स्लावों पर भी लागू होती है। जब में उनकी बात करता हूं तो किसी विशिष्ट शारीरिक विशेषता की बात नहीं करता। नीली आंखों और सफेद बालों वाले स्कैंडिनेवियाई विजेता रहे होंगे या फिर विजित, उन्होंने अपने काले मालिकों की भाषा अपनाई होगी या फिर उनकी प्रजा की, या फिर इससे उलटा रहा होगा। जब में उन्हें हिंदू, यूनानी, रोमन, जर्मन, केल्ट और स्लाव कहता हूं तो मैं उनकी भाषा के अतिरिक्त और किसी बात पर जोर नहीं देता; और उस अर्थ में, केवल उसी अर्थ में में यह कहता हूं कि गोरे से गोरे स्कैंडिनेवियाई की तुलना में काले से काले हिंदू भी आर्य भाषा और चिंतन के एक प्रारंभिक चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय (शूद्र कौन थे), पेज 78)

“आक्रमण वाला सिद्धांत तो एक आविष्कार है। यह आविष्कार पाश्चात्य सिद्धांत में निहित एक अकारण धारणा के कारण आवश्यक हो गया है। धारणा यह है कि भारतीय जर्मन लोग तो मूल आर्य प्रजाति के वर्तमान प्रतिनिधियों में सबसे अधिक शुद्ध हैं। इनका पहला मूल निवास यूरोप में कहीं माना गया है। इन धारणाओं से एक सवाल उठता है-आर्य भाषा भारत में कैसे आई होगी? इस सवाल का जवाब केवल इस धारणा में मिल सकता है कि आर्य लोग भारत में बाहर से ही आए होंगे। इसीलिए आक्रमण वाले सिद्धांत का आविष्कार करना आवश्यक हो गया।

तीसरी धारणा यह है कि आर्य लोगों की प्रजाति श्रेष्ठ थी। इस सिद्धांत के मूल में यह विश्वास है कि आर्य लोग यूरोपीय प्रजाति के हैं और एक यूरोपीय प्रजाति होने के नाते यह एशियाई प्रजातियों से तो श्रेष्ठ होगी ही। इसकी श्रेष्ठता की धारणा बना लेने के बाद, अगला तार्किक कदम यह हो जाता है कि श्रेष्ठता के तथ्य को प्रमाणित किया जाए। पाश्चात्य लेखकों को यह पता था कि आर्य प्रजाति की श्रेष्ठता प्रमाणित करने का सबसे अच्छा आधार है। मूल स्वदेशी प्रजातियों पर आक्रमण और जीत, इसलिए उन्होंने आर्यों द्वारा भारत पर आक्रमण और दासों तथा दस्तुओं पर विजय की कहानी को आविष्कृत कर लिया।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, (शूद्र कौन थे), खण्ड-13, पेज 88-89)

“आर्य प्रजाति वाला सिद्धांत इतना अनर्गल है कि इसे तो बहुत पहले मृत (प्रचलन से बाहर) हो जाना चाहिए था। किंतु प्रचलन से बाहर होने की बात तो छोड़िए, इसने तो लोगों पर अच्छा-खासा असर जमा रखा है। इस स्थिति की दो व्याख्याएं हैं। पहली व्याख्या इस सिद्धांत को ब्राह्मण विद्वानों से प्राप्त होने वाले समर्थन के रूप में मिलती है। यह अत्यंत विचित्र स्थिति है। हिंदू होने के नाते, आम तौर पर उन्हें तो आर्य सिद्धांत को नापसंद कर देना चाहिए था जो एशियाई प्रजातियों पर यूरोपीय प्रजातियों की श्रेष्ठता का दम भरता है। किंतु ब्राह्मण विद्वान में ऐसी अरुचि तो है ही नहीं, बल्कि वह तो बड़ी तत्परता से इसका जय-जयकार करता है। इसके कारण भी स्पष्ट हैं। ब्राह्मण द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में विश्वास करता है। वह आर्य प्रजाति का प्रतिनिधि होने का दावा करता है और यह शेष हिंदुओं को अनार्यों की संतान मानता है। इस सिद्धांत से उसे यूरोपीय प्रजातियों के साथ अपनी नातेदारी प्रमाणित करने और उनकी तरह अपना दंभ और अपनी श्रेष्ठता जताने में मदद मिलती है। उसे इस सिद्धांत का वह हिस्सा विशेष अच्छा लगता है जिसमें आर्य प्रजाति को अनार्य आदिम प्रजातियों का विजेता और आक्रमणकारी बताया जाता है। क्योंकि इससे उसे गैर-ब्राह्मणों पर अपना आधिपत्य बनाए रखने और उसे उचित ठहराने में भी मदद मिलती है।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, (शूद्र कौन थे), खण्ड-13, पेज 88-89)

डॉ. आम्बेडकर ने संविधान सभा के लिए जिस मूल ड्राफ्ट को तैयार किया था उस पर संविधान बनाने ही नहीं दिया गया। वह ड्राफ्ट “राज्य और अल्पसंख्यक” के रूप में उनके वाङ्गमय खण्ड-1 में संरक्षित है। उस पर दलितों को संविधान बनाकर रख लेना चाहिए तथा उन तथ्यों पर विमर्श आमंत्रित होते रहना चाहिए किन्तु दलित वर्तमान संसोधित (117 संसोधन हो चुके हैं) संविधान को ही अपना भाग्य मान बैठा है। दलितों को नए संविधान की जरूरत नहीं है। ऐसा इसलिए है कि दलित कोई जहमत नहीं उठाना चाहता है। यह दलितों की बुद्धि और साहस का सवाल है।

डॉ. आम्बेडकर ने दलितों के सम्मुख समाजवादी राज्य का मसौदा रखा था। उनकी कल्पना में था कि समाजवादी राज्य में व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन हो जाएगा तथा संसाधनों को व्यक्तिगत हाथों से लेकर राष्ट्रीयकरण कर दिया जाएगा तब जातिप्रथा कमजोर हो जाएगी लेकिन पूरी दलित कौम डॉ. आम्बेडकर साहब के समाजवाद वाले मैटर पर चुप्पी साध कर बैठा है बल्कि दलित समाजवाद वाले मैटर पर इतना आक्रोशित हो जाता है कि जैसे कोई उसे कम्युनिस्ट बनने की नसीहत दे रहा हो।

शोध का विषय यह है कि दलित जिस ब्राह्मणवाद से पीड़ित है और जिसे वह नेस्तानाबूत करना चाहता है, उसको सिर्फ कोसता है, और हाँ, यदि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कुछ स्टेप लेता भी है तो वह ब्राह्मणवाद के बाहरी आवरण की आलोचना व निंदा भर करता है। दलित ब्राह्मणवाद के मात्र कुछ बिंदुओं को नकारता है, जैसे-ईश्वर, आत्मा, भाग्य, कर्म, पुण्य, पाप, पुनर्जन्म, तंत्र-मंत्र, त्योहार, रीति, रिवाज़, विवाह कर्म, कथा, भागवत, वेद, पुराण, श्रुति, स्मृति, पूजा, पाठ, मंदिर, प्रसाद, तिलक, चंदन इत्यादि लेकिन बस नकारता भर है, रोकनाहीं पाता है। दलित जातिप्रथा को न अपने मध्य से निकाल पा रहा है और न सवर्णों के मध्य से। जातिप्रथा ज्यों की त्यों है। जातिप्रथा का बाल भी बाँका नहीं हो रहा है क्योंकि दलितों के पास जातिप्रथा उन्मूलन का- न मन है न मसौदा, न कार्यक्रम है न योजना, न बुद्धि है न कौशल, न सिद्धांत है न संगठन। ईश्वर, आत्मा, कर्म, भाग्य और रिवाज़ से सम्बन्धित जितने भी झूठ, गल्प, सिद्धांत हैं, दलित नकारता भले हो लेकिन उसके अस्तित्व व मान्यता को तनिक भी छति नहीं पहुँचा पा रहा है क्योंकि दलितों के पास जातिप्रथा उन्मूलन के सपने, सिद्धांत और साहस की कमी है।

आर डी आनंद

23.04.2022

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