ब्राह्मणवादी पूंजीपति बनाम दलित पूंजीपति!

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हमारी समझ से पूंजी की कोई जाति नहीं होती है ।पूंजीपति किसी भी जाति का हो जब वह श्रम शक्ति खरीदता है , तो उससे अतिरिक्त मूल्य और मुनाफे का निर्माण करता है ।यहां तक की छोटी पूंजी भी जब बड़ी पूंजी का हिस्सा या साझीदार बनकर बाजार में उतरता है , तब वह बड़ी पूंजी का पाटनर होता है और उसी के चरित्र के अनुसार खूंखार होता है । यदि बडी पूजी के खिलाफ लड़ते हुए दलित समाज का या कोई भी मालिक जब छोटी पूंजी के मालिक के रूप मे लड़ता है, तो इस अंतर्विरोध में सर्वहारा वर्ग अपने बड़े दुश्मन के खिलाफ व्यापक मोर्चा बनाता है । यहाँ यह देखने की आवश्यकता है कि पूंजी के दलित मालिक बाजार व्यवस्था के अंदर एकाधिकार वित्त पूंजी के खिलाफ खड़े हैं या उनका सहयोगी है ।हमारे लिए बड़ी और छोटी पूंजी के चरित्र का बस यही महत्व है लेकिन किसी भी हालत में किसी भी पूंजी के खिलाफ श्रम शक्ति के हितों के साथ हम खड़ा होंगे ।
भारत के वर्ग और जाति संबंध में ऐतिहासिक तौर पर यह तथ्य विकासमान है कि उत्पादन के साधनों पर सबसे पहले वैश्यों का नियंत्रण था जिसमें आज की लगभग सभी ओबीसी की जातियां आती है । ईशा की पहली शताब्दी के बाद मनु के नेतृत्व में वैश्यों के खिलाफ ब्राह्मण व क्षत्रिययों ने जो संघर्ष छेड़ा और सामंतवाद की जो स्थापना हुई, उसमें क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय उत्पादन के साधनों के मालिक होते गए। दलित जातियां हमेशा ही श्रमिक वर्ग के प्रतिनिधि रहे। बाद के दिनों में भारत में पूंजीवाद के विकास के साथ कई दलित जातियां ऐसे पेशे से जुड़ी थी, जिनका बाजार व्यवस्था में अपना खास योगदान था , जैसे चमड़े के व्यापार और निर्माण में चमार या रविदास जाति की अहम भूमिका थी। ऐसी ही जातियों को पूंजी जमा करने और व्यापार में आगे बढ़ने का अवसर मिला। एक हद तक पूंजी के मालिक होने के बावजूद इन्हें जातीय उत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। इसलिए जहां उनके मालिक होने के बावजूद जातीय कारणों से इन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ता है ‘सर्वहारा वर्ग’ उनके साथ मजबूती से खड़ा होगा । लेकिन जहां पूंजी के मालिक की हैसियत से यह वर्ग बड़ी पूंजी के मालिकों के साथ गठबंधन करते हैं , हम पूरी ताकत के साथ इन पर प्रहार करते हैं या हमें करना चाहिए ।
एक साथी ने पूछा कि जब ब्राह्मणवादी पूंजीपति हमने लिखा है तो फिर दलितवादी पूंजीपति के बदले “दलित पूंजीपति” क्यों लिखा?
इस साथी के लिए हमारा जवाब है: — ब्राह्मणवादी पूंजीपति इसलिए क्योंकि पूंजीपतियों की श्रेणी में ब्राह्मणों से कहीं अधिक व्यापारी वर्ग है। सिर्फ ब्राह्मण पूंजीपति कहने से यह पूरा समूह बाहर रह जाता लेकिन ब्राह्मणवादी पूंजीपति कहने पर यह सभी समूह इसमें आ जाता है। हालांकि अन्य धर्मों के पूंजीपति भी भारत में बड़े पैमाने पर हैं। 19वीं सदी में तो बनिया जाति के व्यापारियों के साथ-साथ इन्हीं पारसी समाज के पूंजीपतियों का बोलबाला था। दलित पूंजीपति या दलितवादी पूंजीपति भी शोषण ही करते है। लेकिन दलितवाद का सकारात्मक पक्ष सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने के क्रम में भी चर्चा में आता है, जबकि दलित पूंजीपति किसी भी रूप में हैं, शोषण करने वालों के पक्षों में ही होगा जिसका श्रमिक शक्ति और मजदूर वर्ग से शोषण के व्यापकता के आधार पर शत्रुतापूर्ण संघर्ष होगा।
नरेंद्र कुमार

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