दलबदल संसदीय लोकतंत्र का कोढ़ है

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– एल. एस. हरदेनिया

20/10/2020

दलबदल संसदीय लोकतंत्र का कोढ़ है. भारतीय संविधान लागू होने के सबसे बड़ा दलबदल सन् 1967 में हुआ था. उस दलबदल में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका श्रीमती विजयाराजे सिंधिया (जिन्हें राजमाता के नाम से भी जाना जाता है)  की थी. राजमाता लगभग व्यक्तिगत कारणों से तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र से नाराज हो गईं थीं. उस समय वे स्वयं कांग्रेस में थीं. उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और कांग्रेस और मिश्रजी के विरूद्ध चुनाव लड़ा.  यद्यपि चुनाव में मिश्रजी जीत गए परंतु उसके बावजूद राजमाता ने मिश्रजी को अपदस्थ करने का अभियान प्रारंभ कर दिया.

मिश्रजी को ‘लौह पुरूष‘‘ भी कहा जाता था. वे सख्त प्रशासक थे. वे पहली बार सन् 1963 में मुख्यमंत्री बने थे. उन्हें प्रशासन में अपनी पार्टी के नेताओं की दखलअंदाजी कतई पसंद नहीं थी. उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि विधायक या सांसद अधिकारियों के ट्रांसफर की मांग लेकर उनके पास आएं. उनका कहना था कि यदि विधायकों या सांसदों के कहने पर अधिकारियों, विशेषकर कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर होने लगेंगे तो प्रशासन चलाना कठिन हो जाएगा. इसके अतिरिक्त वे विधायकों की अन्य नाजायज मांगों को भी स्वीकार नहीं करते थे.

इसके साथ ही उनका व्यवहार भी सख्त रहता था. कुल मिलाकर बहुसंख्यक विधायक उनसे प्रसन्न नहीं थे. विधायकों की नाराजगी को भांपकर राजमाता ने उनके आक्रोश को संगठित करने का अभियान प्रारंभ किया. इस मामले में उन्हें सहयोग मिला गोविन्द नारायण सिंह का. गोविंद नारायण सिंह एक अत्यंत दृढ़ निश्चयी राजनीतिज्ञ थे. वे मिश्रजी की मंत्रिपरिषद के सदस्य थे और विंध्यप्रदेश के सर्वाधिक प्रभावशाली नेता कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के पुत्र थे. कप्तान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और विंध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.

अंततः गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में 36 कांग्रेस विधायकों ने पार्टी छोड़ दीं इन सभी विधायकों ने सदन में मिश्रजी के विरूद्ध मतदान किया. उसके बाद इन दलबदलू विधायकों ने जनसंघ व राजमाता के समर्थन से चुने गए विधायकों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दल (संविद) का गठन किया. राजमाता को इस विधायक दल का नेता चुना गया और उनसे मुख्यमंत्री का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया गया. परंतु उन्होंने इस अनुरोध को अस्वीकार किया और गोविन्द नारायण सिंह से मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदार संभालने को कहा.

सदन में मतदान के पूर्व सभी दलबदलू विधायकों को दिल्ली के एक होटल में ठहराया गया था. इन विधायकों को होटल छोड़ने की इजाजत नहीं थी. इन सभी विधायकों को बस से दिल्ली ले जाया गया था.

अंततः संविद की सरकार बन गई. सरकार बनते ही संविद के भीतर गंभीर मतभेद उभर आए. दलबदलू विधायकों में से कुछ मंत्री बने, कुछ नहीं बन पाए. ट्रांसफर एक उद्योग बन गया. उस दौरान मंत्रिपरिषद के एक सदस्य कहा करते थे कि हमारी सरकार ‘‘ला एंड आर्डर‘‘ है. अर्थात, पैसे लाओ और आर्डर ले जाओ. भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया. स्वयं गोविन्द नारायण सिंह इससे परेशान हो गए. वे सार्वजनिक रूप से अपना आक्रोश प्रकट करते थे. एक दिन उन्होंने हम पत्रकारों के सामने कहा कि मेरे कुछ मंत्री चैक से भी रिश्वत लेने में नहीं हिचकिचाते.

गोविन्द नारायण सिंह इतने परेशान हो गए कि एक दिन यकायक वे त्यागपत्र दे बैठे. गोविन्द नारायण सिंह के स्थान पर राजमाता ने राजा नरेश चन्द्र सिंह को मुख्यमंत्री बनाया परंतु उनसे भी सरकार नहीं चली. इसके कुछ समय बाद सभी 36 दलबदलू विधायक कांग्रेस में वापिस आ गए. ऐसे में मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार मिश्रजी ही होते. सन् 1963 में हुए एक उपचुनाव में वे विधायक बने थे. उस चुनाव को लेकर एक चुनाव याचिका हाईकोर्ट में पेंडिंग थी. ठीक उस मौके पर जब कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ गई थी याचिका का फैसला आ गया और मिश्रजी के निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया गया. ऐसी स्थिति में कांग्रेस विधायक दल के नेता का चुनाव हुआ जिसमें पूर्व स्पीकर एवं पूर्व मंत्री कुंजीलाल दुबे को हराकर श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने.

श्यामाचरण को भी शासन करने में बहुत कठिनाई महसूस होने लगी. दलबदलू विधायकों की कमाई की प्यास ज्यों की त्यों रही. शुक्लजी की मंत्रिपरिषद में 40 सदस्य थे. शुक्लजी भी अपनी परेशानी का बखान सार्वजनिक रूप से करते थे. चूंकि वे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे इसलिए इंदिरा गांधी भी उनसे नाराज थीं. इंदिराजी की इस नाराजी का पंडित मिश्र ने लाभ लिया. मिश्रजी और उनके समर्थक शुक्लजी की मंत्रिपरिषद को ‘अलीबाबा और चालीस चोर‘ कहते थे. अंततः श्यामाचरणजी को त्यागपत्र देने के लिए कहा गया. और 23 जनवरी 1972 को पी. सी. सेठी केन्द्रीय मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देकर मुख्यमंत्री बने.

मध्यप्रदेश के अलावा देश के अन्य कुछ राज्यों में भी दलबदल के कारण चुनी हुई कांग्रेस सरकारों को इस्तीफा देना पड़ा. दलबदल की शुरूआत हरियाणा से हुई थी. हरियाणा में इतनी जल्दी-जल्दी दलबदल हुआ कि दलबदल की प्रक्रिया को ‘आयाराम गयाराम‘ का नाम दे दिया गया. जहां-जहां दलबदल हुआ वहां राजनीतिक वफादारियां खरीदी जाने लगीं. विधायक को पद और पैसे का लालच दिया जाने लगा. राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया और मुख्यमंत्रियों का दबदबा समाप्त हो गया. प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ गया. अक्षम और हां में हां मिलाने वाले अधिकारियों को महत्वपूर्ण पद दिए जाने लगे.

एक समय था जब यह माना जाता था कि मध्यप्रदेश सर्वश्रेष्ठ प्रशासित प्रदेश है. जब मिश्रजी को अपदस्थ किया गया था उस समय आरसीव्हीपी नरोन्हा मुख्यसचिव थे. संविद की सरकार बनाते ही नरोन्हा को हटा दिया गया. यद्यपि गोविन्द नारायण सिंह नहीं चाहते थे कि नरोन्हा को हटाया जाए. बाद में उन्हें दुबारा मुख्य सचिव बनाया गया.

इस तरह दलबदल से चौतरफा ह्रास हुआ. उस समय का अनुभव बताता है कि दलबदल से बनीं सरकारें न  तो अच्छा शासन दे सकती हैं और ना ही विकास कर सकती हैं. दलबदल के पीछे डॉ राममनोहर लोहिया का चिंतन था. वे कहा करते थे कि ‘‘जिन्दा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं‘‘ अर्थात यदि सरकारें ठीक से नहीं चल रही हैं तो उन्हें अगले चुनाव के पहले ही हटा दिया जाना चाहिए.

अब यदि उपचुनावों के बाद मध्यप्रदेश में दलबदलुओं के सहारे सरकार बनती है तो देखना होगा कि उसका क्या हश्र होता है. परंतु एक बात साफ है कि यदि दलबदल के माध्यम से सरकारें बदलती रहेंगी तो चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. आवष्यकता है ऐसा कानून बनाने की जिसके माध्यम से दलबदल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा सके.

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