प्रधान अंतरविरोध चूंकि पूँजी और श्रम के बीच है, लिहाजा कम्युनिस्टों को अंबेडकर के विचारों से नहीं मिलेगी कोई रोशनी

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वाराणसीः भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के पिंडरा ब्लाक सचिव कॉमरेड नंदाराम शास्त्री ने हाल ही में आयोजित भाकपा-माले (लिबरेशन) के जिला सम्मेलन में लेनिन के इस बहु उद्धृत कथन कि राजनीति अर्थनीति की घनीभूत अभिव्यक्ति होती है का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय पूँजी के दबदबे वाले आज के रोजगार-विहीन विकास के इस दौर में सांप्रदायिक सत्यानाशी ताकतें जनता को आपस में लड़ा रही हैं। उन्होंने कहा कि रोजगार, आवासा, चिकित्सा, शिक्षा और मानवीय गरिमा जैसे बुनियादी सवालों पर जनता का ध्यान न जाए इसलिए सत्तारूढ़ भाजपा हिंदू-मुस्लिम का घृणित खेल खेल रही है और वह इसमें कामयाब भी है।
गौरतलब है कि कॉ. नंदाराम अपनी पार्टी लाइन के अनुरूप चयनात्मक ढंग से वामपंथी शिक्षकों को उद्धृत कर रहे थे। वर्ना तो कार्ल मार्क्स पेरिस कम्यून की विफलता के कारणों की समीक्षा करते हुए कह गए हैं कि मज़दूर वर्ग पूँजीपति वर्ग की बनी-बनाई मशीनरी का उपयोग अपने हक़ में नहीं कर सकता। फर्ज कीजिए कि चुनावों के जरिए अगर सत्ता मिल भी गई तो नौकरशाही तो वही रहेगी, वह मज़दूरों के हक़ में भला कैसे काम कर सकती है। 
विगत 6 अप्रैल को सिंधौरा स्थित कॉ. फूलचंद पटेल सभागार में आयोजित माले के दूसरे जिला सम्मेलन में कॉ. अमरनाथ राजभर को दोबारा सर्वसम्मति से जिला सचिव चुना गया। साथी अमरनाथ के जिला सचिव चुने जाने पर उपस्थित पार्टी कॉमरेडों ने करतल ध्वनि से  उनका स्वागत किया।

भाकपा-माले (लिबरेशन) के प्रदेश सचिव कॉ. सुधाकर यादव ने कहा कि संसद के रास्ते समाजवाद लाने की पक्षधर कई वामपंथी पार्टियाँ आज लिबरेशन के साथ हाथ मिलाना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि समानधर्मा पार्टियों के साथ हाथ मिलाने से भविष्य में पार्टी की स्थिति मज़बूत होगी। विचारधारा-कैडर आधारित राजनीति के उलट मुद्दा आधारित राजनीति करने वाले कुशल पैंतरेबाज के रूप में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हमें जनता के बीच धँस जाना होगा और उनके मुद्दों को जोरशोर से उठाना होगा।
ऐपवा की प्रदेश सचिव कॉ. कुसुम वर्मा ने भगतसिंह के हवाले से कहा कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। उन्होंने कहा कि बिना मज़बूत वैचारिकी के क्रांतिकारी व्यवहार मुमकिन नहीं। उन्होंने स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के प्रश्न को मज़बूती से उठाया। उन्होंने कहा कि स्त्री-उत्पीड़न के प्रश्न को पार्टी गंभीरता से लेती है।
स्त्री-उत्पीड़न के प्रश्न पर एक जाने-माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि उत्पीड़न सत्ता के ढाँचे में अवस्थिति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। स्त्री-उत्पीड़क वही हो सकता है, जिसके पास किसी न किसी प्रकार की सत्ता हो। स्त्री-उत्पीड़क होने के लिए जैविक रूप से पुरुष होना काफी नहीं। पहले गाँवों में शादी-ब्याह में पतुरिया का नाच होता था। तबला-मृदंग बजाने वाले यानि भाँड़-मिरासी भी होते तो पुरुष ही हैं लेकिन क्या वे स्त्री-उत्पीड़क हो सकते हैं? कदापि नहीं। वे स्त्री-उत्पीड़क नहीं हो सकते क्योंकि उनके पास कोई सत्ता नहीं है, वे तो खुद अपने भरण-पोषण के लिए स्त्री-श्रम, स्त्री-धन पर निर्भर हैं।
इस मौके पर कॉ. वी. के. सिंह ने काडर कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को निरंतर आत्मालोचना करते रहना चाहिए। आलोचना-आत्मालोचना से ही नए मानव का निर्माण होता है। जब वे नए मानव के निर्माण संबंधी अपनी बात कह रहे थे तो सुविधाजनक ढंग से इस बात को भूल गए थे कि पार्टी में यूनिट सिस्टम है ही नहीं। बोल्शेविक पद्धति तो यही है कि सभी पार्टी सदस्यों को किसी न किसी यूनिट का सदस्य होना चाहिए। यूनिट की बैठकों में ही आलोचना-आत्मालोचना की व्यवस्था होती है। यूनिट मीटिंग्स का मिनट बनाए रखा जाता है।
काडर कांफ्रेस के सम्मुख अपनी बात रखते हुए पार्टी के प्राथमिक सदस्य साथी कामता प्रसाद ने पार्टी के संस्थापक कॉ. चारु मजूमदार के हवाले से कहा कि चूँकि वर्ग-संघर्ष से ही इतिहास आगे बढ़ता है लेकिन आज की तारीख में वर्ग-संघर्ष को संसदीय रास्ते से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता इसलिए पार्टी को संघर्ष के दूसरे तरीकों को भी आजमाते रहना चाहिए। एकमात्र संसदीय चुनावों में हिस्सेदारी की रणनीति पार्टी के लिए आत्मघाती होगी। उन्होंने मार्क्सवाद की क्लासिक कृतियों को सामूहिक अध्ययन में शामिल करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
सम्मेलन के दौरान दलित बुर्जुआ के विश्व-दृष्टिकोण यानि कि अंबेडकरवाद पर भी सवाल उठे। ऐपवा की अगुआई में घरेलू कामगार महिलाओं की शानदार गोलबंदी होने लेकिन उन्हें मार्क्सवाद में दीक्षित नहीं किए जाने पर भी बात हुई। माना जाता है कि जो लोग आज भी जनवादी या नव जनवादी क्रांति, भूमि-सुधार आंदोलन आदि को एजेंडा बनाए हुए हैं उनके लिए अंबेडकर को आगे रखना आसान होगा लेकिन जो लोग विश्व पूंजीवाद और उससे जुड़े भारतीय पूंजीवाद को प्रहार के मुख्य बिंदु के रूप में देखते हैं उनके लिए अंबेडकर के विचारों से कोई भी रोशनी नहीं मिलती है क्योंकि, अंबेडकर कभी भी निजी संपत्ति के खात्मे, उत्पादन के तमाम संसाधनों के समाजीकरण तथा सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के समर्थक नहीं थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कि माओवादियों के हमदर्द-कार्यकर्ता क्यों अंबेडकराइटों की पूँछ में कंघी करते रहते हैं, चुनावी कम्युनिस्टों का तो कहना ही क्या, उनके तो वे आराध्य देव हैं ही क्योंकि भावनात्मक तुष्टीकरण के आधार पर उन्हें दलितों का वोट चाहिए और बिहार में उन्हें मिलता भी है।
कैडर कांफ्रेंस 45 डिग्री तापमान में सीमेंट की चद्दर के नीचे बिना पंखे-बिजली के हो रही थी। सम्मेलन लगभग 7 घंटे चला। अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आए पार्टी सदस्य अडिग-निष्कंप भाव से सम्मेलन को सफल बनाते हुए पूरी मुस्तैदी से डटे हुए थे। सम्मेलन की शुरुआत में दोने में आलू की कचालू का नाश्ता पेश किया गया और फिर गाँव के गुड़ की मिठास का सभी ने आनंद लिया। शाम ढलते-ढलते गन्ने के रस का भरपूर मात्रा में सेवन किया गया। और रात आठ बजे के करीब बाटी-चोखा का दिव्य आयोजन किया गया। चोखे में पड़ी अदरख उसके स्वाद को बेजोड़ बना रही थी। पार्टी सदस्य निहार भट्टाचार्य अदरक-मिश्रित चोखे की तारीफ करते नहीं अघाए।

 

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