लोकतांत्रिक शक्तियों को इकट्ठा होकर पूरी शक्ति के साथ हिटलर शाही सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए खड़ा होना होगा – दीपांकर भट्टाचार्य

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  • विशद कुमार
जननेता एके राय की आज दूसरी पुण्यतिथि पर धनबाद के निरसा में संकल्प सप्ताह सभा मनाया गया। मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय महासचिव भाकपा (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य, मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) के केंद्रीय अध्यक्ष सह पूर्व विधायक आनंद महतो, माले विधायक विनोद सिंह, निरसा के पूर्व विधायक अरूप चटर्जी (मासस), मासस के केंद्रीय महासचिव हलधर महतो, सचिव निताई महतो, मार्क्सवादी युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष पवन महतो, आगम राम, टुटन मुखर्जी, बादल बाउरी आदि शामिल हुए।
इस संकल्प सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय महासचिव भाकपा (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार देश की सार्वजनिक उपक्रमों को निजीकरण तो कर ही रही है, लेकिन सबसे बड़ी लड़ाई हमें शिक्षा व स्वास्थ्य के निजीकरण करने के खिलाफ लड़नी होगी। प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड तो लोगों को थमा दिया पर क्या सरकारी अस्पतालों में डाक्टर, बेड, दवा आदि की व्यवस्था नहीं है। ऐसी स्थिति में आमजन आयुष्मान कार्ड के माध्यम से अपना इलाज निजी अस्पतालों में कराने को मजबूर हैं। और निजी अस्पताल आयुष्मान कार्ड का पैसा उठाकर करोड़ों का वारा न्यारा कर रहे हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य का अधिकार सिर्फ नारा नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आमजनों को गोलबंद कर लड़ाई लड़नी होगी।
 दीपांकर ने कहा कि संकल्प सप्ताह सभा बुधवार को एके राय की पुण्यतिथि से आरंभ हुई है। यह कार्यक्रम 28 जुलाई को भाकपा माले के संस्थापक चारु मजूमदार के शहादत दिवस पर समाप्त होगा। 28 जुलाई को रांची में चारू मजूमदार के शहादत दिवस पर वामपंथी एकता को लेकर सेमिनार का आयोजन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकार में मजदूरों की नौकरी गई। मजदूरों की छटनी हो रही है। मजदूरी में कटौती की जा रही है। दूसरी तरफ पूंजीपतियों की संपत्ति बढ़ रही है। केंद्र सरकार पूंजीपतियों से दो प्रतिशत कोरोना टैक्स वसूल कर लोगों का इलाज और जिनकी कोरोना से मौत हुई है उनके आश्रितों को मुआवजा के देने का काम क्यों नहीं कर रही? जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोरोना से जिनकी मौत हुई है, उनके स्वजनों को चार लाख रुपया मुआवजा के तौर पर दें तो केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए। पीएम केयर्स फंड बनाकर कहां से कितना पैसा आया और कितना खर्च किया गया, इसका हिसाब मांगने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा है। कोरोना काल में कितने लोगों की मौत हुई यह आंकड़ा भी केंद्र सरकार छुपा रही है। गंगा में बह रही लाशों की यदि गिनती की जाए तो सरकार जो आंकड़ा दे रही है उससे कई गुना ज्यादा लोग कोरोना काल में मौत के गाल में समाए।
दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि वर्तमान झारखंड सरकार ने वामपंथियों को अलग कर विपक्षी एकता बनाई। यदि वामपंथियों को साथ रखते तो एक मजबूत और पूर्ण बहुमत की सरकार बनती। बिहार में एमपी चुनाव के समय वामपंथियों को अलग कर संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ा गया परिणाम सबके सामने था। बिहार के राजनीतिज्ञों ने इस बात को समझा और विधानसभा का चुनाव वामपंथियों को साथ रखकर लड़ा तो परिणाम सामने है। 2024 का लोकसभा चुनाव जबरदस्त होगा। वामपंथियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी। 2024 के चुनाव को मद्देनजर रखते हुए जिस भी राज्य में भाजपा विरोधी सरकार है। उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता ने भाजपा को हराया तो वहां की लोकतांत्रिक सरकार को प्रताड़ित करने के लिए सीबीआई, ईडी व अन्य केंद्रीय एजेंसियों का सहारा लेकर टीएमसी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है। भाजपा को सबसे ज्यादा डर वामपंथियों से है।
दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि इजराइल की कंपनी पेगासस ऐसा तंत्र विकसित किया है जो आपके टेलीफोन मोबाइल कंप्यूटर की जासूसी कर रहा है। इसके माध्यम से आपके बगैर जानकारी के आपके कंप्यूटर, मोबाइल फोन में कुछ भी आपत्तिजनक चीज डालकर आपको आसानी से देशद्रोही व आतंकवादी ठहराया जा सकता है। इसी के सहारे भीमा कोरेगांव के मामले में स्टेन स्वामी सहित 16 लोगों को फंसाया गया। लोकतांत्रिक शक्तियों को पुन: इकट्ठा होकर पूरी शक्ति के साथ हिटलर शाही सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए खड़ा होना होगा।

भ्रष्टाचार व महंगाई का विरोध करने वाले को भेजा जा रहा जेल : विनोद सिंह
भाकपा माले के बगोदर विधायक विनोद सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार कोरोना आपदा में भी अवसर खोज रही है। इसी के तहत झारखंड सहित देश के कई कोल ब्लाक को निजी हाथों को सौंप दिया गया। मजदूरों के अधिकारों में कटौती कर उन्हें पुन: बंधुआ मजदूर बनाने की साजिश रची जा रही है। नक्सली के नाम पर निर्दोषों को मारा जा रहा है। बकोरिया कांड में निर्दोषों को मारा गया। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाजों को रखने वाले को राजद्रोह व अन्य मुकदमों में फंसाकर जेल में भरा जा रहा है। महंगाई भ्रष्टाचार पर जो भी सवाल उठाना चाहता है उसे देशद्रोही व आतंकवादी संरक्षक करार देकर जेल भिजवाया जा रहा है।

जेल में रहकर रिकार्ड वोटों से जीते थे एके राय : अरूप                                                                                                                            
पूर्व विधायक अरूप चटर्जी ने कहा कि एके राय मात्र 14 वर्ष की अवस्था में भाषा आंदोलन के कारण जेल गए थे। लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल का विरोध किया जा रहा था तो सबसे पहले विधायकी से इस्तीफा देनेवाले एके राय थे। जेल में रहकर उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और रिकार्ड वोटों से जीते। जब संसद में सांसदों के भत्ता व अन्य सुविधाओं के लिए पैसे की बढ़ोतरी की जा रही थी तो सबसे पहले विरोध इन्होंने किया तथा बढ़ा हुआ पैसा भी नहीं लिया। उन्होंने आजीवन विधायक व सांसद का पेंशन नहीं लिया। वह सांसद आवास से पैदल ही संसद जाया करते थे। उनकी सादगी व सिद्धांत की प्रशंसा विपक्षी भी करते थे। मासस व वामपंथ को उनसे हमेशा प्रेरणा मिलती रही है।

एके राय व चारू मजूमदार वामपंथियों के प्रेरणा : आनंद महतो
मासस के केंद्रीय अध्यक्ष आनंद महतो ने कहा कि एके राय व चारू मजूमदार वामपंथ की प्रेरणा हैं। दोनों ने ही मजदूरों, किसानों, छात्रों व नौजवानों के हक व अधिकार के लिए लगातार आवाज उठाई। देश में वामपंथ के कमजोर होने से हिटलर शाही व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। वामपंथी ही है जो आज भी अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लगातार लोगों को गोलबंद कर आंदोलन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि राजनीति में शुचिता और सदाशयता के प्रतीक थे, जिन्होंने न केवल धनबाद, बल्कि दशकों तक अखंड बिहार की राजनीति को दिशा दी। उन्होंने केवल मार्क्सवादी समन्वय समिति की ही स्थापना नहीं की, बल्कि राजनीति के ऐसे आदर्श सिद्धांतों का भी निर्धारण किया, जिसका अवलंबन करना आज के सियासतदां के लिए असंभव सा है।

       बता दें कि  ए. के. राय का जन्म मौजूदा बांग्लादेश के राजशाही जिले के सपुरा गांव में 15 जून 1935 को हुआ था। उन्होंने दसवीं तक की शिक्षा गांव के ही विद्यालय से पूरी की। उसके बाद बेलूर स्थित रामकृष्ण मिशन स्कूल से विज्ञान में इंटरमीडिएट की शिक्षा ग्रहण की। कोलकाता के प्रतिष्ठित सुरेन्द्र नाथ काॅलेज से स्नातक की उपाधि ली। कोलकाता विश्वविद्यालय से 1959 में रसायन अभियंत्रण में एमएससी करने के बाद उन्होंने दो साल तक कोलकाता में काम किया था और 1961 में सिंदरी के पीडीआइएल में नौकरी प्राप्त की थी। यहां उन्हें प्रखर वैज्ञानिक पद्मश्री डाॅ. क्षितिज रंजन चक्रवर्ती के संरक्षण में काम करने का मौका मिला। नौकरी के दौरान भी एके राय का आंदोलनकारी मन-मस्तिष्क लगातार जरूरतमंदों, पीड़ितों, दबे-कुचलों के लिए काम करता रहा। कोयला क्षेत्र के दो जनवादी नेता काॅमरेड सत्यनारायण सिंह और काॅमरेड नागा बाबा ने युवा एके राय का मार्गदर्शन किया था। इससे इनका तेवर और तीक्ष्णतर हो गया। विभिन्न अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित होने वाले इंजीनियर राय के लेखों में व्यवस्था के खिलाफ व्यक्त आक्रोश, उनकी ‘अंतरात्मा की आवाज’ को मुखरित करता था। राय, नौ अगस्त 1966 ई. को हुए ‘बिहार बंद’ में सक्रियतापूर्वक भूमिका निभाने में गिरफ्तार कर लिए गए और नौकरी से भी हाथ धो बैठे। उसके बाद तो उनकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ी। जिस दृढ़ता व रफ्तार से वे काम करने लगे, ऐसा लगा कि उन्हें नौकरी से नहीं, बल्कि जेल से छुटकारा मिला हो। सन् 1967 ई. में माकपा के टिकट पर सिंदरी के वे पहले विधायक बने। उसके बाद सन् 1969 ई. के मध्यावधि चुनाव में भी दूसरी बार जीतने में कामयाब रहे। सन् 1972 ई. में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (एम) से वैचारिक मतभेद होने की वजह से वे किसान संग्राम समिति के बैनर तले चुनाव लड़े और लगातार तीसरी बार विधायक बने।
        तीन-तीन बार विधायक बनने और लगातार जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने वाले राय साहब की छवि पूरे धनबाद में एक बड़े नेता की बन गई थी। जनता अब चाह रही थी कि वे धनबाद लोकसभा क्षेत्र का नेतृत्व करें। 1977 के लोस चुनाव की जब अधिसूचना जारी हुई, उस समय एके राय हजारीबाग जेल में बंद थे। हालांकि एक आंदोलनकारी के रूप में जेल उनका दूसरा घर ही था। राय साहब के साथ यह विडंबना जुड़ी रही थी कि उनके पिता (अधिवक्ता शिवेश चन्द्र राय) का आजीवन कोर्ट से नाता रहा और पुत्र अरूण का जेल से। जन-आंदोलनों के कारण उन्हें अक्सर कारागार में रहना पड़ता था।
सन् 1952 में, जब एके राय महज 15 वर्ष के थे, तभी एक भाषाई आंदोलन में भड़काऊ भाषण देने के जुर्म में जेल जाना पड़ा था। 1977 में, उन्हें जनता पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ने का ऑफर मिला था। लेकिन, उन्होंने जनता पार्टी के टिकट के बजाय, खुद की पार्टी मासस की ओर से चुनाव में उतरने का फैसला लिया। हजारीबाग जेल में बंद राय के चुनाव की कमान धनबाद में विनोद बिहारी महतो, एसके बक्सी, केपी भट्ट, यमुना सहाय, उमाशंकर शुक्ल, राजनंदन सिंह आदि ने संभाली थी। तूफानी चुनाव प्रचार, कांग्रेस के विरोध में हवा और एके राय का धनबाद की राजनीति में बढ़ते कद ने उन्हें शानदार जीत दिला दी थी।
1977 में छठी लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में धनबाद में कुल 13 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। इनमें तीन प्रत्याशी को पार्टी का सिंबल मिला था। शेष 10 निर्दलीय की श्रेणी में रखे गए थे। माक्र्सवादी समन्वय समिति की ओर से एके राय, कांग्रेस की ओर से रामनारायण शर्मा और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की तरफ से गया सिंह ने चुनाव में भाग्य आजमाया था। एके राय को 2,05,495, आरएन शर्मा को 63,646 एवं गया सिंह को 17,658 वोट प्राप्त हुए थे। उसके बाद राय साहब 1980 में और 1989 में धनबाद के सांसद बने। तब से लेकर अबतक राय दा की राजनीतिक यात्रा ऐसी सादगीपूर्ण और निष्कल रही कि वे एक जीता-जागता किंवदंती बन गए थे। आजीवन सांसद और विधायक को मिलने वाली पेंशन न लेना, अविवाहित रहना, जनप्रतिनिधि को मिलने वाली सुविधाएं स्वीकार न करना जैसे कठोर फैसले के कारण राय साहब भले ही आजीवन तंगहाली में रहे हों, लेकिन विचारों के धनी तो वे हमेशा बने रहे।

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