उपभोक्तावाद का नशा धर्म और अफीम से अधिक ताकतवर हैः प्रो. अरुण कुमार

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इंदौर। कोविड महामारी के कारण वैश्विक व्यवस्था बदल रही है। यूक्रेन युद्ध ने नए शीत युद्ध को प्रारंभ कर दिया है। चीन की शुन्य आधारित कोविड नीति से विश्व व्यापार संकट में है। दुनियां आर्थिक मंदी की चपेट में आ चुकी है। नई तकनीक लोगों का रोजगार छीन रही है। इन सब का असर देश के विशाल असंगठित क्षेत्र पर पड़ रहा है। विडंबना है कि सरकार रोजगार के क्षेत्र में असंगठित वर्ग की गणना ही नहीं करती, न हीं जीडीपी में इस क्षेत्र के योगदान को स्वीकार करती है।

ये विचार देश के जाने-माने विख्यात अर्थशास्त्री जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने व्यक्त किए वे सामाजिक संगठन “संदर्भ केंद्र” द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति विषय पर आयोजित गोष्ठी में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत में तीन बड़ी घटनाओं नोटबंदी, जीएसटी और लाक डाउन ने असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों को बुरी तरह से प्रभावित किया है उसके दुष्परिणामों को यह क्षेत्र भुगतने पर अभिशप्त है। देश में असंगठित क्षेत्र की आबादी 94 प्रतिशत है बावजूद इसके इस क्षेत्र की गणना सरकार करती ही नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की महती भूमिका रही है। काले धन की व्यवस्था ने देश की आर्थिक स्थिति को खराब कर दिया है, इसके कारण असंगठित क्षेत्र के लिए बनाई गई सरकारी नीतियों का लाभ इस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है। देश के श्रम संगठनों को चाहिए कि वे जनता को इस संबंध में शिक्षित करें।

. प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि लोग वर्तमान परिपेक्ष में ही विचार करते हैं जबकि आज वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सोचने की जरूरत है, क्योंकि सभी देश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज जो समस्याएं सामने हैं वह आज की नहीं है उसके कारण अतीत में है।

पूंजीवादी देश प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने के लिए युद्धरत हैं। यूक्रेन युद्ध ने इसे प्रमाणित किया है। बीता शीत युद्ध विचारधारा आधारित था। एक तरफ समाजवादी खेमा तथा दूसरी और पूंजीवादी देश थे। वर्तमान में अमेरिका और चीन अन्य देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ में लगे हैं। हम चीन को पूंजीवादी देश ही मानते हैं। चीन की शून्य आधारित कोविड पालिसी ने विश्व व्यापार को प्रभावित किया है। भारत सहित अनेक देशों को कच्चा माल न मिल पाने के कारण उनके उत्पादन और निर्यात में गिरावट आई है। वैश्विक मंदी का दौर प्रारंभ हो गया है।

दुनिया में दक्षिण पंथ उभार पर है। वैश्वीकरण को कमजोर किया जा रहा है। दुनियां कैसे चलाई जाएगी उसकी नीतियां वाशिंगटन में बनाई जाती है। नैनो तकनीक ने बड़े पैमाने पर रोजगार को समाप्त किया है। आज एक डॉक्टर, इंजीनियर के मुकाबले कंप्यूटर अधिक विद्वान है। मशीनों ने कृषि सहित अनेक क्षेत्रों में रोजगार समाप्त कर दिए हैं।

पूंजीवाद ने प्राकृतिक संसाधनों का बाजारीकरण कर दिया है। हवा- पानी सहित हर प्राकृतिक नियामत बिक रही है। जो उन्हें खरीद नहीं पाते वे समाप्त हो रहे हैं। वैश्वीकरण की नीतियों ने रोजगार शिक्षा स्वास्थ्य को बाजार के हवाले कर दिया है। बाजार के पास नैतिकता या करुणा नहीं होती, उसके लिए व्यक्ति मात्र एक नंबर है। उपभोक्तावाद का नशा अफीम और धर्म से भी अधिक ताकतवर है।

1915 में विश्व बैंक ने अपनी नीतियों में परिवर्तन किया। वह चाहता है कि ऋण लेने वाले देश अपनी जनता के लिए सार्वभौम न्यूनतम आय निर्धारित करें और जो नहीं कमाते हैं उन्हें नगद भुगतान करें। महामारी के समय जनता में धन वितरण तो उचित हो सकता है, अन्य दिनों में ऐसा धन व्यक्ति के गौरव भाव को समाप्त कर देगा।

प्रो. अरुण कुमार ने वैश्विक स्तर पर बाजारवाद का विश्लेषण करते हुए कहा कि व्यापार, तकनीक और वित्तीय प्रबंधन अलग-अलग ब्लॉक हैं जो उपभोक्तावादी नीतियों को विस्तारित करते हैं। इन नीतियों में मार्केट आगे है समाज और सरकार उसके पीछे। बाजार ही सरकार की नीतियां निर्धारित करता है और सरकारों को विवश करता है कि वह कल्याणकारी नीतियों को न अपनाए। भारत में बदलती तकनीक व बाजारवाद के कारण गैर बराबरी चरम पर है। आजादी के बाद बनी आर्थिक नीतियों में विकास ऊपर से लेकर नीचे तक पहुंचता था। अब वह ऊपर ही रुक गया है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह समझ विकसित हुई थी की व्यवस्था बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन अब उसे बाजार के हवाले किया जा रहा है। भारत की विकास दर निरंतर गिर रही है वर्तमान में वह मात्र 3.03 प्रतिशत है।

रोजगार देने के क्षेत्र में हम चीन और ब्राजील से पीछे हैं। देश में युवाओं और महिलाओं में बेरोजगारी अधिक है। काले धन ने देश की आर्थिक स्थिति को खराब कर दिया है। देश की आय का प्रमुख साधन कर व्यवस्था है। देश के खजाने को 11 प्रतिशत अप्रत्यक्ष करों से तथा 6 प्रतिशत प्रत्यक्ष करों से आमदनी होती है। काले धन की व्यवस्था ना हो तो करो में वृद्धि हो सकती है। वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था में ठहराव सा आ गया है। 140 करोड़ की आबादी में से मात्र 30.4 करोड लोगों के पास ही रोजगार है। देश में प्रति वर्ष ढाई करोड़ युवा रोजगार प्राप्ति के क्षेत्र में उतरते हैं, परंतु बहुत कम ही पूर्णकालिक रोजगार प्राप्त कर पाते हैं। तकनीक और ऑटोमेशन ने रोजगार के अवसरों को सीमित कर दिया है। विद्यार्थी कैरियर के क्षेत्र में उलझे हुए हैं वे अपने भविष्य के प्रति अनिश्चित और आशंकित हैं।

यूक्रेन के युद्ध से भारत का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। भविष्य में क्रिप्टोकरंसी और डिजिटल करंसी अर्थव्यवस्था पर बड़े पैमाने पर असर करेगी। आर्थिक क्षेत्र के हर परिवर्तन का खामियाजा गरीबों को भुगतना पड़ रहा है। भारत में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है। पर्यावरण विनाश के कारण जानवर और इंसान एक दूसरे के नजदीक आ गए हैं। वायरस जनित बीमारियों का खतरा बना हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन प्रणाली पर अभी और अन्वेषण की जरूरत है। बच्चों में ग्रहण करने की क्षमता कम हो गई है।

प्रो. अरुण कुमार के अनुसार तमाम तरह की निराशाओं के बाद भी उम्मीद बनी हुई है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कि देश की मात्र एक प्रतिशत आबादी ही सड़कों पर थी। आज भी इतने ही लोग परिवर्तन के वाहक हो सकते हैं।

गोष्ठी में अतिथि परिचय विवेक मेहता ने दिया संचालन हरनाम सिंह ने तथा आभार केसरी सिंह चढ़ार ने माना

हरनाम सिंह

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