बेरोजगारों को जल्द से जल्द पक्का रोजगार दिया जाए: कॉ. सत्यम

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वाराणसीः उत्तर प्रदेश निर्माण व असंगठित मज़दूर यूनियन के सदस्य सत्यम पटेल ने सरकार से मांग की है कि  कमरतोड़ महँगाई पर तुरंत लगाम लगाई जाए। मज़दूरों के वेतन/पीसरेट/दिहाड़ी में बढ़ोतरी की जाए। महिला मज़दूरों को पुरषों के बराबर वेतन दिया जाए। सारी मेहनतकश जनता के लिए सरकार द्वारा मुफ्त/सस्ते राशन और अन्य जरूरी चीजों की व्यवस्था की जाए। सरकारी तौर पर इलाज, शिक्षा, बिजली, परिवहन आदि सभी सहूलियतें मुहैया कराई जाएं। बेरोजगारों को जल्द से जल्द पक्का रोजगार दिया जाए। रोजगार नहीं मिलने तक गुजारे लायक बेरोजगारी भत्ता मिले।
मीडिया को जारी एक बयान में कॉमरेड सत्यम पटे ने कहा है कि कमरतोड़ महँगाई ने चारों तरफ़ हाहाकार मचा रखा है। भोजन, दवा-इलाज, रेल-बस सफ़र, कमरों के किराए, शिक्षा आदि से संबंधित ज़रूरी ख़र्चे आम लोगों के बस के बाहर होते जा रहे हैं। रसोई गैस के घरेलू सिलेंडर की क़ीमत अगस्त 2021 में 886 रुपए थी, जो अब बढ़कर 1080 रुपए हो गई है। सरसों के तेल की क़ीमत, जो साल 2018-19 में करीब 100 रुपए (प्रति लीटर) थी, अब 200 रुपए से भी ज़्यादा हो चुकी है। पेट्रोल 96 रुपए और डीजल 89 रुपए (प्रति लीटर) से ऊपर बिक रहा है। पिछले एक साल में पेट्रोल में 20 प्रतिशत और डीजल में 11 प्रतिशत की बढ़ौतरी देखी गई है।
मज़दूरों की पस्त-हिम्मती को लेकर चिंतित कॉ. सत्यम ने जोर देकर कहा कि पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों में इस इज़ाफ़े से भी अन्य चीज़ों की क़ीमतों में उछाल आया है। ग़रीब आबादी तो पहले ही भयानक मंदहाली की जिंदगी जीने पर मजबूर है। उसके लिए तो हमेशा ही महँगाई रहती है। मौजूदा महँगाई ने ग़रीबों को ग़रीबी-बदहाली के और गहरे गढ्ढे में धकेल दिया है। महँगाई की मार इतनी भारी है कि मध्य-वर्ग के लोगों तक की आह निकल गई है।
उन्होंने आगे कहा कि केंद्र की मोदी सरकार हो, उत्तर-प्रदेश की योगी सरकार हो या अन्य राज्यों की सरकारें हों, सभी पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने की नीतियाँ धड़ाधड़ लागू कर रही हैं। जनता को महँगाई की मार से बचाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाए जा रहे। औद्योगिक, खेतीहर और सेवा क्षेत्र के पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरों के वेतन, दिहाड़ी, पीसरेट नहीं बढ़ाए जा रहे, जबकि वे ढेरों मुनाफ़े कमा रहे हैं। वे तो क़ानूनी न्यूनतम वेतन तक लागू करने को तैयार नहीं। कोरोना की तथाकथित महामारी से नुक़सान को बहाना बनाकर बहुत जगहों पर मज़दूरों के वेतन घटा दिए गए हैं, छँटनी कर दी गई है। सरकारें पूँजीपतियों पर कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं। उलटा, श्रम क़ानूनों में बदलाव करके पूँजीपतियों को मज़दूरों की लूट करने की और भी ज़्यादा खुली छूट दे दी गई है। उधर छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले मेहनतकशों की आमदनी पहले से भी सिकुड़ गई है। इस तरह आसमान छू रही महँगाई और बेहद कम आमदनी ने मज़दूरों और अन्य तमाम मेहनतकशों के हालातों को बहुत बदतर बना दिया है। सरकारी आँकड़े बता रहे हैं कि आने वाले दिनों में रुपए की क़ीमत और ज़्यादा गिरेगी यानी महँगाई और ज़्यादा बढ़ेगी।
इस कमरतोड़ महँगाई का जि़म्मेदार कौन है और हम मज़दूर-मेहनतकश क्या करें, इस बात पर कॉमरेड सत्यम ने बताया कि इस महँगाई का कारण पूँजीपति वर्ग की मुनाफ़े की कभी न ख़त्म होने वाली लालसा है और सरकारों द्वारा पूँजीपतियों, राजनेताओं, अफ़सरशाही को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने के लिए महँगाई का बोझ जनता पर डालना है। इस तरह लुटेरा पूँजीपति वर्ग हमारी मेहनत की कमाई डकार रहा है, हमारी कमाई पर अय्याशी कर रहा है, हमें ग़रीबी-बदहाली-महँगाई के अँधेरे गढ्ढे में और भी गहरा धकेलता जा रहा है।
उत्तर प्रदेश निर्माण व असंगठित मज़दूर यूनियन के जुझारू कार्यकर्ता सत्यम ने कहा कि यह समय चुपचाप सब कुछ सहन करते रहने का नहीं है। शहरों-क़स्बों-गाँवों के तमाम मज़दूरों को अपने वेतन-दिहाड़ी-पीसरेट बढ़ौतरी के लिए पूँजीपतियों और सरकारों के खिलाफ़ ज़ोरदार संघर्ष छेड़ना होगा। सरकारें मज़ूदरों का न्यूनतम वेतन 25 हज़ार रुपए प्रति महीना तय करें। पहले से इससे ज़्यादा वेतन हासिल कर रहे मज़दूरों के वेतन में ज़रूरी बढ़ौतरी की जाए। दिहाड़ी-पीसरेट इसी हिसाब से तय किए जाएँ, बढ़ाए जाएँ। मज़दूरों का हक़ मारने वाले पूँजीपतियों को जेल और भारी जुर्मानों की सख्त से सख्त सज़ा दी जाए।

सभी मेहनतकश लोगों को सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि जनता पर महँगाई का बोझ कम करने के लिए पुख्ता क़दम उठाए। सरकारें पेट्रोल-डीजल और अन्य तमाम चीज़ों पर मेहनतकश जनता से वसूले जाने वाले टेक्सों को ख़त्म करें। सभी मेहनतकशों के लिए सरकार मुफ्त और सस्ते राशन और अन्य बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों का प्रबंध करे। इसके लिए राशन डिपो व्यवस्था (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) का विस्तार किया जाए। सभी मेहनतकशों के राशन कार्ड बनाए जाएँ। साथ ही सभी मेहनतकशों के लिए इलाज, शिक्षा, बस/रेल परिवहन, बिजली आदि सुविधाओं की सरकारी तौर पर पुख्ता व्यवस्था की जाए। पूँजीपतियों द्वारा हो रही कालाबाज़ारी-जमाखोरी पर तुरंत लगाम कसी जाए।
जनता को सुविधाएँ देने के लिए पूँजीपतियों की आमदनी पर, जो असल में लूट की कमाई ही है, टेक्स लगाकर सरकारी ख़र्च चलाया जाए। भारत की सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी का देश की कुल दौलत के 77 प्रतिशत से भी ज़्यादा हिस्से पर क़ब्ज़ा है। जनवरी 2022 में जारी आँकड़ों के मुताबिक़ मार्च 2020 से लेकर 30 नवंबर 2021 तक भारत के सबसे अमीर 142 व्यक्तियों की दौलत 23 लाख करोड़ से बढ़कर 53 लाख करोड़ हो गई है। गौरतलब है कि कोरोना पाबंदियों के इन दो सालों में पूँजीपति वर्ग द्वारा नाजायज तौर पर घाटे का रोना रोया जाता रहा है, मदद के नाम पर सरकार से लाखों करोड़ रुपए लिए गए हैं, मज़दूरों के वेतन घटाए गए हैं, छँटनी की गई है, मज़दूरों से सुविधाएँ छीनी गई हैं। इसलिए सिर्फ़ पूँजीपतियों पर टेक्स लगाकर सरकारी ख़र्च चलाए जाने की जनता की माँग पूरी तरह जायज है। इसके साथ ही राजनेताओं, अफ़सरशाही के वेतन-भत्तों-सहूलतों में भारी कटौती की जाए। गैर-ज़रूरी सरकारी विज्ञापनों को बंद किया जाए। सरकारों द्वारा पूँजीपतियों को उन्हें मुफ़्त या सस्ती बिजली, तरह-तरह के बहानों तले राहत पैकेज देकर, क़र्जे माफ़ी आदि के ज़रिए सरकारी ख़ज़ाना लुटाना बंद किया जाए। उत्तर प्रदेश निर्माण व असंगठित मज़दूर यूनियन के सक्रिय एक्टिविस्ट कॉमरेड सत्यम ने अंत में कहा कि किसी भी पूँजीवादी पार्टी से हमें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि उनकी सरकार हमें बनते अधिकार देगी या कोई पूँजीवादी पार्टी हमारे लिए लड़ाई लड़ेगी। हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी, एकजुट होकर लड़नी होगी।

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