कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि समागम का आयोजन हुआ

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12 सितंबर 2021 को  गुरशरन कला भवन, मंडी मुलांपुर (जिला लुधियाना) में अदारा ‘प्रतिबद्ध’ द्वारा कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि समागम करवाया गया। श्रद्धांजलि समागम में पहुंचे साथियों ने कॉमरेड रामनाथ को भावभिन्नी श्रद्धांजलि देते हुए पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ मेहनतकश जनता का क्रांतिकारी संघर्ष जारी रखने का संकल्प किया। बिछड़े साथी को क्रांतिकारी श्रद्धांजलि भेंट करते हुए मज़दूर वर्ग का अन्तर्राष्ट्रीय गीत गाया गया, दो मिनट मौन रखा गया, क्रांतिकारी नारे बुलंद किए गए। नवजोत, कुलविंदर, अर्ष आदि साथियों ने क्रांतिकारी गीत पेश किए। ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर, मज़दूर नेता राजविंदर, सुखदेव भूंदड़ी, नमिता, अजायब टिवाणा और डा. सुखदेव ने विचार सांझे किए।

भारत की कम्युनिस्ट लीग (मार्क्सवादी लेनिनवादी) के संस्थापक कॉमरेड रामनाथ बीती 31 अगस्त को हमारे बीच नहीं रहे। उनकी मौत काफी लम्बे समय से जारी बीमारी के दौरान दिल का दौरा पड़ने से हुई। उनकी उम्र 80 साल से ऊपर थी।

साथी सुखविंदर ने श्रद्धांजलि समागम को संबोधित करते हुए कहा कि कॉमरेड रामनाथ के जीवन का बड़ा हिस्सा (लगभग 6 दशक) भारत की मेहनतकश जनता के मुक्ति संग्राम को समर्पित रहा। वह भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन की एक अहम शख्सियत थे। उन्होंने बताया कि कॉमरेड रामनाथ के क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन की शुरूआत भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से हुई। 1964 में इस पार्टी में फूट पड़ने के बाद वो नई बनी भाकपा (मार्क्सवादी) में शामिल हो गए। यह नई बनी पार्टी भी संशोधनवाद के रास्ते पर ही चली। रामनाथ इस संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष चलाने वाले चिंता ग्रुप (जिसने बाद में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र के रूप में खुद को संगठित किया) में शामिल हो गए। वह 1969 में बनी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) में शामिल हो गए। 1978 में उनकी अगुवाई में भारत की कम्युनिस्ट लीग (मा.ले.) की स्थापना हुई। कॉमरेड रामनाथ ने नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के बाद अस्तित्व में आए क्रांतिकारी खेमे की भारतीय समाज, क्रांति के पड़ाव के बारे में समझ, जो भारत को अर्ध-सामंती अर्ध-उपनिवेश घोषित करती थी और भारतीय समाज को चीनी तर्ज़ की नवजनवादी क्रांति के पड़ाव में मानती थी, को चुनौती दी। कॉमरेड रामनाथ ने भारतीय समाज को गहराई से समझा। 1982 तक भारतीय समाज की गहरी खोज-बीन के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत को अर्ध-सामंती अर्ध-उपनिवेशिक समाज मानना गलत  है, कि भारत एक पिछड़ा पूँजीवादी देश है जो समाजवादी क्रांति के पड़ाव में दाखिल हो चुका है। 1987 में उनकी अगुवाई में साम्राज्यवाद की कार्यप्रणाली में आए बदलावों के बारे में एक दस्तावेज़ प्रकाशित हुआ। साथी सुखविंदर ने कहा कि कॉमरेड रामनाथ ने भारत की ज़मीनी हकीकतों से टूटे नव-जनवादी क्रांति के कार्यक्रम रूपी कठमुल्लेपन से कम्युनिस्टों के एक हिस्से का पीछा छुड़ाया। उन्होंने कम्युनिस्टों को आज़ादाना सोच की वैज्ञानिक हिम्मत दी। साथी रामनाथ हमारे लिए एक अमीर विरासत छोड़ गए हैं। हमें साथी रामनाथ के वारिसों को इस अमीर विरासत पर गर्व है। कॉमरेड रामनाथ को सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि हमें भारत में नए समाजवादी क्रांति की लाईन पर पार्टी निर्माण और जनांदोलनके निर्माण के काम को आगे बढ़ाना होगा।

साथी नमिता ने कॉमरेड रामनाथ से मुलाकात और चिट्ठी-पत्र के बारे में यादें साझा कीं। उन्होंने कहा कि कॉमरेड रामनाथ एक बहुत अच्छे इंसान थे। यह कॉमरेड रामनाथ ही थे जिन्होंने भारतीय समाज को इसकी गहराई और व्यापकता में समझा और समाजवादी क्रांति की दिशा दी। आज इस दिशा पर पहरा देने, इसे आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

साथी सुखदेव भूंदड़ी ने कहा कि कॉमरेड रामनाथ ने ऐसे समय में भारतीय समाज की ज़मीनी हकीकतों के बारे में, यहाँ के उत्पादन संबंधों के बारे में, क्रांति के पड़ाव आदि के बारे में नए सिरे से सोचने-विचारने, खोज-पड़ताल, नई राहों पर बढ़ने की हिम्मत की जब कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ग्रुप इन मसलों के बारे में बात तक सुनने को तैयार नहीं थे। साथी राजविंदर और डा. सुखदेव ने कहा कि कॉमरेड रामनाथ के अवदानों को कभी भुलाया नहीं जा सकता, हम उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे। साथी अजायब टिवाणा ने कहा कि आज का यह श्रद्धांजलि समागम विलक्षण किस्म का है। यहाँ कॉमरेड रामनाथ को याद करते हुए जिस तरीके से कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास, चुनौतियों, समस्याओं की चर्चा हुई है उससे काफी कुछ जानने समझने को मिला है जिससे श्रद्धांजलि समागम काफी सार्थक सिद्ध हुआ है।

‘कॉमरेड रामनाथ को लाल सलाम’, ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’, ‘पूँजावाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ नारे बुलंद करते हुए श्रद्धांजलि समागम की समाप्ति की गई। मंच संचालन लखविंदर द्वारा किया गया।

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