सांप्रदायिक सत्यानाशियों के हथकंडों से मेहनतकशों को बचने की सीख

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नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाना है। फैक्ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में, गंदी-बस्तियों और गांव की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जाएगा।
-भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया पत्र
भगत सिंह क्रांति के प्रतीक का नाम है। अंग्रेजों के समय में जिस आजाद भारत का सपना भगत सिंह और उनके साथियों ने देखा था वह आज तक पूरा नहीं किया जा सका है। भगत सिंह के आजादी का मकसद सिर्फ अंग्रेजों को खदेड़-भगाने का नहीं था बल्कि वह मानते थे कि सही मायने में आजादी का मतलब है एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण ना हो। पर क्या अंग्रेजों के जाने के 75 साल बाद भी ऐसी आजादी मिल पाई है? आज हम जिस ओर नजर दौड़ाएं उधर ही शोषण व उत्पीड़न ही व्याप्त है। हमारा देश अभूतपूर्व भुखमरी के दौर से गुजर रहा है। वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 107वें स्थान पर है। एक तरफ जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही, वहीं दूसरी तरफ देश भर में सांप्रदायिकता का माहौल बनाया जा रहा है।
भगत सिंह अपने समय में हर उन मुद्दों पर स्पष्ट व दृढ़ राय रखते थे जो देश की जनता में फूट पैदा करती थी व अपने असली दुश्मन के खिलाफ संघर्ष करने से रोकती थी।
सांप्रदायिक दंगे व उनका इलाज लेख में वह कहते हैं कि ‘धर्मों’ ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। उन्होंने इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ बताया था। आज भी हम यह देख पा रहे हैं कि आज भी मीडिया व अखबार भड़काऊ शीर्षक देकर लोगों की भड़काते हैं। आज एक खास धर्म के खिलाफ यह मीडिया प्रोपेगेंडा का काम रहे हैं। भगत सिंह ने अखबारों का अपना कर्तव्य बताया है- “अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिकता बनाना, लड़ाई झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारत वर्ष की वर्तमान दिशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं।” यदि इन सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो इसका कारण आर्थिक ही है। गरीब मेहनतकश मजदूर किसानों को दोस्त और दुश्मन की पहचान करनी होगी सामान तो वह सांप्रदायिक समाजवादियों के हथकंडे से बचना होगा लोग परस्पर रोकने के लिए वर्ग चेतना की की समझ देनी होगी।
अछूत समस्या लेख में भगत सिंह यह सवाल करते हैं कि जब विदेशों में हमारे साथ अच्छा सलूक नहीं होता, अंग्रेजी शासन अंग्रेजों के समान नहीं समझता तो हम उलाहना देते हैं। लेकिन अछूत कहकर अपने ही लोगों से खुद को स्पर्श तक नहीं होने देते! उनके स्पर्श मात्र से हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाता है! उनके मंदिरों में प्रवेश करने से देवगढ़ नाराज हो जाते हैं! क्या इस दोहरी चरित्र पर शर्म नहीं आती? क्या यह शिकायत करने का अधिकार है? भगत सिंह संदेश देते हैं कि सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ है न कार्य विभाजन से। अर्थात क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है इसलिए जीवनभर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी भी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, यह बातें फिजूल हैं। वह अपील करते हैं कि अछूत कहलाने वाले असली जन सेवकों तथा भाइयों उठो! अपना इतिहास देखो तुम असली सर्वहारा हो! संगठनबद्ध हो जाओ!
अंग्रेज हमारे देश में एक कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से आई थी। पर आज हमारे देश में ऐसी सैकड़ों कंपनियां प्रवेश कर चुकी हैं जो हमारे देश की प्राकृतिक संसाधन और हमारे देश की जनता की मेहनत को लूट रही है।
भारत सरकार की तीन कृषि बिल, मजदूर बिल, नई शिक्षा नीति, सीएए एनआरसी जैसी अनेक साम्राज्यवाद परस्त नीतियां जनता में त्रासदी का कारण बनी हुई है। यह सरकार पूरी तरह से बहरी बनी हुई है इसको जनता की आवाज सुनाई नहीं देती तीनों कृषि बिल के खिलाफ किसानों के एक साल तक चले आंदोलन करने के बाद यह सरकार पीछे हटी। इस आंदोलन में सैकड़ों किसान शहीद हो गए। ऐसे ही सीएए-एनआरसी के खिलाफ पूरे देश में महीनों तक आंदोलन चला।
आज पूरे देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में नई शिक्षा नीति और शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं।
भगतसिंह ने ऐसे ही उस समय अंग्रेजों द्वारा लाए गए दो जन विरोधी कानून पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के खिलाफ बहरी अंग्रेज सरकार को जानता की आवाज सुनाने के लिए संसद में बम धमाका किया। आज भी सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ बोल लिख रहे बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, प्रोफेसरों को जेल में डाल दिया जा रहा है। भगत सिंह ने कहा था कि जो आजाद जो चीज आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए यह सत्ता भी आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर पा रही। भगत सिंह अपने लेख विद्यार्थी और राजनीति में कहते हैं की विद्यार्थियों का प्रमुख काम पढ़ाई करना है। उन्हें खूब पढ़ना चाहिए। लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं है?
यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाय।
उस समय के छात्र नौजवानों से सवाल करते हैं जो आज उससे भी ज्यादा मौजूद है कि क्या यह जीने योग्य जिंदगी है? क्या हम मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट हैं? आज नौजवानों को चाहिए कि वह स्वतंत्रता पूर्वक गंभीरता से शांतिऔर सब्र के साथ सोचें। उन्हें चाहिए कि वह भगत सिंह के आदर्शों को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य के रूप में अपनाएं खुद को साम्राज्यवादी व सामंती मूल्यों के प्रभाव से दूर रखें। फैक्ट्रियों और गांवों के मेहनतकश जनता के बीच में जाएं। उन्हें संगठित करें ताकि ऐसा संघर्ष खड़ा हो सके जो सच्चे अर्थों में भगत सिंह के सपनों का भारत बन सके।

विनय, उपाध्यक्ष, भगत सिंह छात्र मोर्चा

 

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