मानव समाज में सामूहिक ख़ुशियाँ मनाने, उल्लास, उमंग भरने के लिए हमेशा बना रहेगा त्योहारों का महत्व

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दिवाली त्योहार को मनाये जाने के पीछे यूँ तो अलग-अलग मत हैं, पर सबसे अधिक प्रचलित मत के अनुसार अयोध्या के राजकुमार रामचन्द्र चौदह वर्ष का वनवास बिताकर लंका के राजा रावण की हत्या करके इसी दिन अयोध्या वापस आये थे। उनके अयोध्या लौटने की ख़ुशी में उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर नगर को सजाया। स्वादिष्ट पकवान व मिठाइयाँ बाँटी तभी से  दिवाली के रूप में यह दिन मनाया जाने लगा।

पर यह कहानी हिन्दू धर्मग्रंथों व इस त्योहार को मनाने के तौर तरीक़ों से मेल नहीं खाती है…
सबसे प्राचीन रामायण ‘बाल्मीकी रामायण’ में राम के अयोध्या लौटने पर नगर में सुगन्धित द्रव्यों के छिड़काव करने, पुष्प बरसाने का उल्लेख तो मिलता है, राम-लक्ष्मण-सीता का भव्य स्वागत का उल्लेख भी मिलता है, लेकिन कहीं भी इस ख़ुशी पर दीप जलाने, गणेश-लक्ष्मी की पूजा करने का उल्लेख नहीं मिलता है।
यदि मान भी लिया जाये कि यह राम के स्वागत करने का उत्सव था तो फिर इस दिन पूजा भी राम, सीता, लक्ष्मण की होनी चाहिये लेकिन इस त्योहार पर तो लक्ष्मी व गणेश की पूजा होती है। उनके अयोध्या वापसी की वार्षिकी पर शुभ स्वागतम, शुभ आगमन आदि लिखा होना चाहिये लेकिन लिखा जाता है शुभ लाभ जिसका सम्बन्ध धन-सम्पत्ति की प्राप्ति से है। दिवाली का आरम्भ धन तेरस से होना, धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करना दिखाता है कि इस त्योहार का सम्बन्ध धन अर्जित करने की इच्छा से रहा होगा।
हाँ, इसका संदर्भ एक दूसरे ग्रन्थ ‘दंपति चतुर्थी’ में ज़रूर मिलता है। इस ग्रंथ में दिवाली को वैश्यों का त्योहार बताया गया है। परम्परागत व्यापारी आज भी इसी दिन से अपना खाता खतौनी आरम्भ करते हैं। इस दिन वैश्य लोग धन की देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा करते आये हैं।वही आज भी दिवाली पर होता है, बल्कि दिवाली पर अब यह पूजा हिन्दू समाज के बड़े हिस्से में की जाने लगी है।
इस बात की बहुत सम्भावना है कि इस त्योहार की जड़ें धन की देवी की पूजा करने से भी पहले से किसी न किसी रूप में किन्ही आदिम समाजों की परम्पराओं में रही होगी। अधिकतर त्योहार अपनी उत्पत्ति के समय कृषि, पशुपालन, मौसम आदि से जुड़े हुए थे। फिर संस्‍थाबद्ध धर्मों के आगमन के बाद तत्कालीन शासकवर्गों के हितों के अनुरूप इन त्‍योहारों के साथ तरह-तरह की धार्मिक मिथकीय कथाऍं और अनुष्‍ठान जोड़ दिये गये। आज पूँजीवाद ने इन त्योहारों के साथ उपभोक्तावाद, दिखावे का भोंडा प्रदर्शन आदि विकृतियाँ भी जोड़ दी हैं।
आज के समाज में त्योहार जो भी रूप धारण कर चुके हों लेकिन मानव समाज में सामूहिक ख़ुशियाँ मनाने, उल्लास, उमंग भरने के लिये त्योहारों का महत्व हमेशा बना रहेगा।
शोषण उत्पीड़न पर टिके वर्गीय समाज में त्योहार मेहनतकशों की संस्कृति को भी प्रतिबिम्बित कर रहे हों ऐसी कल्पना करना ही निरर्थक है। निश्चित ही भविष्य के गर्भ में पल रहे जन आन्दोलनों/ क्रान्तियों से महान जन नायक पैदा होंगे, सामूहिकता की नयी मिसालें क़ायम होंगी, वहीं से जनता नये त्योहार गढ़ेगी जो मेहनतकशों की संस्कृति से ओत प्रोत होंगे।जब तक जनता के बीच से ऐसे त्योहार नहीं पैदा होते हैं तब तक जनता इन अतीत के त्योहारों में ही अपने लिये भी जीवन की ख़ुशियाँ ढूँढती रहेगी, यह स्वाभाविक भी है। समाज में कोई न कोई त्योहार मौजूद रहेंगे, समाज में त्योहार रिक्तता की स्थिति न तो सम्भव है, न यह समाज के हित में है। प्रगतिशील समाज निर्माण के काम में लगे लोगों का भी त्योहारों से दूर रहना, जनता से उनकी दूरी ही बनायेगा।
दिवाली के त्योहार पर नये/साफ़ सुथरे कपड़े पहनना, घर की साफ़ सफ़ाई करना,घर को सजाना, प्रकाशमान करना, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाइयाँ बाँटना आदि परम्पराओं का आनन्द लेने में भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। लेकिन आतिशबाजी कर पर्यावरण को धुएँ व ध्वनि प्रदूषण से भर देना, जुआ खेलकर पैसा लुटाना,अथाह धन खर्च कर त्योहार को भी दौलत का भोंडा प्रदर्शन का मौक़ा बनाना, काल्पनिक देवी देवताओं से धन प्राप्त करने की प्रार्थना कर अंधविश्वास के अंधे कुएँ में गोते लगाने जैसी परम्पराओं से पर्यावरण व समाज का नुक़सान ही होता है। इनसे दूर रहने व समाज को भी इनसे दूर रहने के वैचारिक प्रयास ज़रूर किये जाने चाहिये।
त्योहार मनाने के साथ एक और महत्वपूर्ण पहलू पर विचार करना चाहिये कि क्या वो लोग जो त्योहार मनाना चाहते हैं पर ग़रीबी-मुफ़लिसी की वजह से त्योहार मना पाने की स्थिति में नहीं हैं, आख़िर उनके जीवन में त्योहारों का उल्लास कैसे लाया जा सकता है?
सरकार का कहना है कि गांवों में रहने वाला व्यक्ति हर दिन 26 रुपये और शहर में रहने वाला व्यक्ति 32 रुपये खर्च नहीं कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से नीचे माना जाएगा। सरकार द्वारा ग़रीबी की रेखा को इतना नीचे निर्धारित करने के बावजूद भी देश में 27 करोड़ से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं। 26 या 32 रुपए भी रोज़ न कमा पाने वाली विशाल आबादी क्या त्योहार पर नये कपड़े ख़रीदने, बिना मिलावट वाली मिठाइयाँ ख़रीदने, भाँति-भाँति के पकवान बनाने आदि के लिये पैसे जुटा सकते हैं? देश की 22 करोड़ कुपोषित आबादी, जिसे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता है, वह भला त्योहार का जश्न कैसे मना सकती है? खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर करोड़ों बेघर लोग आख़िर त्योहार पर किस घर को सजायें? रोज़गार की खोज में दर-दर की ठोकरें खाने वाले करोड़ों बेरोज़गार लोग आख़िर कहाँ से उल्लास व उमंग बटोरकर त्योहार मनायें?

जब तक मेहनतकश आबादी की मेहनत की कमाई अमीरों की तिजोरियों में समाती रहेगी, हर व्यक्ति को सम्माजनक रोज़गार, हर मेहनतकश परिवार को रहने को पक्का मकान नहीं मिल जाता तब तक दिवाली या कोई भी अन्य त्योहार पूरे समाज का त्योहार बन ही नहीं सकता है। कोई भी त्योहार समूचे समाज का त्योहार बन सके इसके लिये धन सम्पदा व संसाधनों को कुछ लोगों के चंगुल से बाहर निकालकर उस पर समूचे समाज का मालिकाना स्थापित करना होगा। तभी त्योहार सभी लोगों के जीवन में उमंग व उल्लास ला पायेंगे। तब त्योहार पर एक बड़ी आबादी के सामने कुंठित होकर अभावों के साथ जीने की मजबूरी नहीं होगी। ख़ुशहाली व सम्पन्नता का ऐसा समाज लक्ष्मी की पूजा करने से नहीं बल्कि संगठित होकर बेहतर समाज निर्माण करने के संघर्ष करने से ही हासिल होगा।

–धर्मेन्द्र आज़ाद

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