ग़ज़ल-संग्रह ‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था’ का भव्य विमोचन

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गर्म रोटी के ऊपर नमक-तेल था,
माँ ने हँसकर दुलारा तो अच्छा लगा।हर घड़ी जीतने का चढ़ा था नशा, अपने बच्चों से हारा तो अच्छा लगा।

वाराणसीः बीएचयू | प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप की गजलें हिंदी संस्कृति और भारतीय काव्य परंपरा की ईमानदार और प्रतिनिधि अभिव्यक्ति है | इनमें युग के दर्द के साथ प्यार और अंधेरे की दास्तान के साथ प्रकाश के झरोखे भी हैं | यह सत्य का संधान करने वाली मनुष्य की जिजीविषा की गजलें हैं | उक्त बातें वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जितेन्द्रनाथ मिश्र ने बीएचयू के हिंदी विभाग में प्रसिद्ध गज़लकार प्रो. वशिष्ठ अनूप के आठवें गजल संग्रह ‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था’ के विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में कहीं | हिन्दी विभाग की छात्राओं द्वारा कुलगीत गायन के उपरांत आत्मवक्तव्य देते हुए प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि ग़ज़ल आमजन से संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है | मेरी ग़ज़लों में जिंदगी के सभी रंग व्यक्त होते हैं, इसलिए इनमें यथार्थ और प्रतिरोध के साथ प्रेम और सौंदर्य भी है |

उन्होंने अपनी कुछ ग़ज़लों का पाठ भी किया।वरिष्ठ कवि हीरालाल मिश्र मधुकर ने कहा कि दुष्यंत के बाद गजल को राष्ट्रीय स्तर पर जनभाषा में प्रस्तुत करने का श्रेय प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप को ही है।उनकी ग़ज़लों का फलक बहुत बड़ा है | उनकी गजलें पढ़ने के बाद किसी और की गजलें अच्छी नहीं लगतीं | गीतकार ओम धीरज ने कहा कि प्रो अनूप की ग़ज़लें भारतीयता की परिधि में परंपरा और आधुनिकताबोध को सम्यक रूप से प्रकट करती हैं| ये गजलें आम जनमानस में घुल मिलकर संवाद करती हैं इनमें प्यार और ललकार दोनों है | आलोचक डा राम सुधार सिंह ने कहा कि ये गजलें विषय वस्तु की दृष्टि से अनेकमुखी हैं | इनमें बचपन की कोमलता, गाँवों का बदलता रूप, टूटते मूल्य और व्यंग्य सब कुछ है इनमें माँ और गाँव की मोहक यादें हैं।| नए का़फि़यों और नई शब्दावली के कारण ये गजलें नई चमक बिखेरती हैं | पूर्व न्यायाधीश और ग़ज़लकार डा चंद्रभाल श्रीवास्तव ‘सुकुमार’ ने कहा कि हिंदी गजल के प्रतिनिधि हस्ताक्षर वशिष्ठ अनूप की गजलें जीवन के हर क्षेत्र में मानवीय क्षरण से मुठभेड़ करती हैं | तथ्य, कथ्य और शिल्प की ताजगी तथा कहने के सधे हुएअंदाज़, के कारण ये एक नए आस्वाद और नए परिवेश से परिचित कराती हैं | ये गजलें काव्य को नई दिशा प्रदान करेंगी | वरिष्ठ ग़ज़लकार शिवकुमार पराग ने कहा कि उनकी ग़ज़लों में आम आदमी के दुख-दर्द और उसके सपनों व संघर्षों से गहरी वाबस्तगी मिलती है | उनकी ग़ज़लों की संरचना हिंदी की है जिसमें वह बहुत सरलता और खूबी से ग़ज़लियत को बरक़रार रखते हैं।उन्होंने इन ग़ज़लों के सौन्दर्य की भी चर्चा की।
संचालन डॉ. प्रभात कुमार मिश्र ने, स्वागत डॉ. मनीष कुमार ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सत्य प्रकाश पाल ने किया। यह भव्य आयोजन कला संकाय प्रमुख और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. विजय बहादुर सिंह के संरक्षण और अध्यक्षता में संपन्न हुआ। उन्होंने ग़ज़ल की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों की संवेदना की सराहना की।इस अवसर पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत साहित्यकारों- डा जय प्रकाश मिश्र, प्रो दयाशंकर त्रिपाठी, मधुकर मिश्र, चंद्रभाल श्रीवास्तव सुकुमार को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध गायक डा दुर्गेश कुमार उपाध्याय द्वारा गायी गईं अनूप जी की ग़ज़लों का आडियो भी प्रस्तुत किया गया। आकांक्षा मिश्रा ने उनके एक गीत की सुमधुर प्रस्तुति की।नगर के साहित्यकारों, विभाग के शिक्षकों और छात्र-छात्राओं ने अपनी सहभागिता से आयोजन को समृद्ध किया |

65 COMMENTS

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